हम, भारत के परमाणु ऊर्जा चक्र के अलग-अलग चरणों में रेडिएशन से पीड़ित लोगों के समर्थन में खड़े हस्ताक्षरकर्ता, भारत के सार्वजनिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी कंपनियों के हवाले करने का पुरजोर विरोध करते हैं. भारत सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण और जन स्वास्थ्य की हिफाजत करे. लेकिन निजी कंपनियों पर ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं होती. अगर उन्हें परमाणु संयंत्रों के डिजाइन, मालिकाना हक, संचालन या इस्तेमाल में शामिल किया गया, तो डिजाइन, संचालन, रखरखाव और रेडियोधर्मी कचरे के निपटारे तक में सुरक्षा से समझौते का बड़ा खतरा पैदा होगा.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह निजीकरण ऐसे वक्त में किया जा रहा है, जब परमाणु और पर्यावरण सुरक्षा के नियम पहले से ही कमजोर कर दिए गए हैं. पिछले दस साल में नियामक एजेंसियों के वे न्यूनतम और आधे-अधूरे कानूनी अधिकार भी खत्म किए जा चुके हैं जो पहले कभी मौजूद थे. उदाहरण के तौर पर, दुर्लभ खनिज धातुएं और रेडियोधर्मी पदार्थों के खनन से पहले होने वाली जन सुनवाई की प्रक्रिया को सितंबर 2025 में ही बंद कर दिया गया. यह प्रक्रिया प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को स्थानीय लोगों की चिंताओं और उनकी जानकारी समझने का मौका देती थी, ताकि वे किसी भी प्रस्तावित परियोजना से होने वाले पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों का सही आकलन कर सकें. स्थानीय लोगों की आवाज को अनसुना करना और उनकी जमीनें रेडियोधर्मी पदार्थ इस्तेमाल करने वाली निजी कंपनियों के लिए खोल देना बिल्कुल अवैज्ञानिक और गैर जिम्मेदाराना कदम है. यह भी सबको मालूम है कि रेडियोधर्मी पदार्थों के अंश पूरी तरह खत्म होने में लाखों साल लगते हैं, और ये हमारी धरती, पर्यावरण और हमारे शरीरों पर धीमे जहर की तरह लगातार असर डालते रहते हैं. इसी बीच, ताजा खबरों में यह बात भी सामने आई है कि बिहार के गंगा मैदानी इलाकों में कुछ स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में रेडियोधर्मी तत्व पाए गए हैं. यह संभव है कि यह भूजल में यूरेनियम की मिलावट की वजह से हो रहा हो.
इसके अलावा,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभी तक न तो रेडियोधर्मी कचरे को हमेशा के लिए सुरक्षित तरीके से निपटाने के तरीके पर और न ही रेडिएशन से संपर्क की सुरक्षित सीमा क्या हो, इस पर कोई वैज्ञानिक सहमति बनी है. ऐसे हालात में सरकार का इन पदार्थों पर से सरकारी नियंत्रण को ढीला करने पर विचार करना आपराधिक और बेहद खतरनाक है. साथ ही, साल 2000-2010 के बीच 16 मामले ऐसे थे जहां रेडियोधर्मी स्रोतों के निजी ऑपरेटर ने उनका नियंत्रण खो दिया, और इनमें से 11 स्रोत को कभी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) कभी वापस हासिल नहीं कर सका. इनमें से कम से कम 9 केस औद्योगिक रेडियोग्राफी में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के थे, जो ज्यादातर निजी और कुछ सार्वजनिक उद्योगों में उपयोग किए जाते थे. बाकी रेडियोधर्मी स्रोत चोरी हो गए, यात्रा के दौरान गुम हो गए, नदियों में फेंक दिए गए, या गांवों से बरामद हुए जहां के लोग किसी न किसी स्तर पर इसके रेडिएशन की चपेट में आए. अगर निजी क्षेत्र को इस तरह के रेडियोधर्मी उपकरणों को इस्तेमाल करने का अधिकार दिया जाए, भले ही उन्हें रखने का न हो, तो इनके चोरी या खो जाने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे जानबूझकर या बिना जानबूझकर जनता को नुकसान हो सकता है.
इन सारी गंभीर चिंताओं के मद्देनजर, हम नीचे हस्ताक्षर करने वाले लोग, ‘परमाणु ऊर्जा विधेयक 2025’ को संसद में पेश किए जाने और निजी निवेश लाने के लिए ‘सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010’ में सूचित संशोधनों की कड़ी निंदा करते हैं. हम विपक्षी दलों से मांग करते हैं कि वे अपनी पूरी ताकत लगाकर परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के निजीकरण को रोकें. हम बेहद आहत और परेशान हैं कि भारत सरकार अपने नागरिकों और भारत की पारिस्थितिकी को इन खतरों से बचाने की अपनी जिम्मेदारी को छोड़ रही है. हमारी मांग है कि परमाणु नीति पर सरकार की कठोर और निरंकुश नियंत्रण की जगह ऐसी सार्वजनिक नीति बने जिसमें लोग और पर्यावरण दोनों शामिल हों और उन्हें हर तरह के परमाणु और रेडियोधर्मी खतरों से बचाया जाए. हम यह भी मांग करते हैं कि भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए अंततः ऐसे सभी परमाणु संचालन धीरे-धीरे बंद (डिकमीशन) किए जाएं जो लंबे समय तक चलने वाले गंभीर खतरे को पैदा करते हैं.
हस्ताक्षरकर्ता (संगठन) :
1. Coalition for Nuclear Disarmament and Peace ( CNDP)
2. National Alliance of Anti&nuclear Movements ( NAAM )
3. People’s Movement Against Nuclear Energy (PMANE)
4. चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति, मध्य प्रदेश
5. चीमेनी एंटी-न्यूक्लियर पीपुल्स विजिलेंस फोरम, केरल
6. भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन, भोपाल
7. इंडियन सोशल एक्शन फोरम
8. ग्रोथवॉच
9. भारत जन विज्ञान यात्रा, नई दिल्ली
10. नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स (NAPM)
11. नेशनल एलायंस फॉर क्लाइमेट एंड इकॉलॉजिकल जस्टिस (NACEJ)
12. झारखंडी ऑर्गनाइजेशन अगेंस्ट रेडिएशन (JOAR), जादूगोड़ा
13. ह्यूमन राइट्स फोरम
14. ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम
15. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन
16. ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स
17. फ्रैटर्निटी मूवमेंट
18. कम्युनिटी नेटवर्क अगेंस्ट प्रोटेक्टेड एरियाज (CNAPA)
19. फोरम अगेंस्ट ओप्रेशन ऑफ वीमेन, मुंबई.
हस्ताक्षरकर्ता (व्यक्तिगत)
1. विद्या डिंकर
2. ललिता रामदास
3. अचिन विनायक
4. सिंथिया स्टीफन
5. एम. जी. देवासहायम
6. मधु भदुरी
7. अमिताभ पांडे
8. अदिति घोष मेहता
9. बीनू मैथ्यू,
10. रोहिणी हेन्समैन
11. सुनीता शील
12. फिरोज मिथिबोरवाला
13. निशा विश्वास
14. सूजी थारू
15. गोविंद केलकर
16. कल्याणी मेनन सेन
17. रक्षा कुमार
18. अमृता छाछी
19. इरफान इंजीनियर
20. अमिता पित्रो,
21. छाया दातार
22. वाणी सुब्रमण्यम
23. अम्मू अब्राहम
24. अभा भैया
25. रीता मनचंदा
26. अनुराधा कपूर
27. पामेला फिलिप्पोस
28. वनिता मुखर्जी
29. इंदिरा हीरवे
30. चयनिका शाह
31. हर्ष कपूर,
32. शैलेन्द्र बूरा
33. एसआर शर्मा
34. उर्वशी सरकार,
35. सुधीर वोम्बतकेरे
36. डी. गोपालकृष्णा,
37. मिसरिया शेख अली
38. एसपी उदयकुमार