हर साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विजयादशमी के दिन अपना स्थापना दिवस मनाता है. इस बार यह दिन 2 अक्टूबर को पड़ा – यानी वही तारीख जिसे भारत हमेशा गांधी जयंती के रूप में मनाता है, और संयोग से यही आरएसएस की सौवीं वर्षगांठ भी थी. यह अपने आप में आधुनिक भारत का एक बेहद बड़ा और अजीब विरोधाभास है – एक तरफ गांधी जी की विरासत का जश्न, जो दुनिया में भारत का सबसे मशहूर और सम्मानित चेहरा हैं, और दूसरी तरफ उस संगठन का महिमामंडन, जिस पर गांधी जी की हत्या में भूमिका के आरोप में कभी प्रतिबंध लगाया गया था. यह विरोधाभास इसलिए और भी तीखा हो जाता है क्योंकि तब और अब के भारतीय राज्य की भूमिका में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है.
फरवरी 1948 में, स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था. उन्होंने साफ कहा था कि ‘हमें उन नफरत और हिंसा की ताकतों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा जो देश की आजादी के लिए खतरा हैं और उसकी अच्छी छवि को कलंकित करती हैं.’ लेकिन 2025 में तस्वीर बिल्कुल उलट है. मोदी सरकार ने आरएसएस की सौवीं सालगिरह को एक सरकारी उत्सव में बदल दिया – खुद प्रधानमंत्री मोदी ने आगे बढ़कर पूरे तामझाम के साथ समारोहों का नेतृत्व किया, आरएसएस के नाम पर डाक टिकट और स्मारक सिक्का जारी किया, और सरकारी विभागों व संस्थाओं के जरिए उसकी तारीफ में आक्रामक प्रचार अभियान चलवाया.
नरेंद्र मोदी, जिन्होंने 2025 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में आरएसएस को “दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ” बताया था, ने इस बार उसकी सौवीं सालगिरह के मंच को संगठन की खुलकर प्रशंसा करने के लिए इस्तेमाल किया. उन्होंने आरएसएस को भारत की “सनातन राष्ट्रीय चेतना” का आधुनिक रूप बताते हुए उसकी भरपूर तारीफ की.
मोदी ने आरएसएस को भारत के आजादी आंदोलन से जोड़ने की एक बेतुकी कोशिश भी की. उन्होंने यह तो जरूर बताया कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कभी आजादी आंदोलन के दौरान जेल गए थे, लेकिन चालाकी से यह अहम बात नहीं बताया कि उनकी पहली गिरफ्तारी 1921-22 में हुई थी, जब वे कांग्रेस से जुड़े थे और आरएसएस की स्थापना भी नहीं हुई थी. 1930-31 में जब वे दोबारा जेल गए, तब उन्होंने साफ कहा था कि वे सत्याग्रह में अपनी व्यक्तिगत हैसियत से शामिल हैं, संगठन की ओर से नहीं. उसी दौर के दूसरे चर्चित हिंदुत्ववादी नेताओं में सावरकर अपने “माफीनामों” और गांधी हत्या की साजिश में कथित भूमिका के लिए बदनाम हैं, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के साथ खुले तौर पर सहयोग कर रहे थे.
वाजपेयी के दौर में भी यह कोशिश की गई कि उन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जोड़कर उस दौर का तथाकथित ‘नायक’ दिखाया जाए. कहा गया कि उन्हें अपने पुश्तैनी गांव बटेश्वर (मध्य प्रदेश) से गिरफ्तार किया गया था और वे करीब बीस दिनों तक जेल में रहे. लेकिन जब यह खबरें सामने आने लगीं कि उन्होंने पुलिस से सहयोग किया था, तब खुद वाजपेयी ने यह मानने से इनकार कर दिया कि उनका उस आंदोलन से कोई संबंध था. उन्होंने खुद को आंदोलन का सहभागी नहीं, बल्कि सिर्फ दर्शक बताया – बस भीड़ का हिस्सा. देश के हर हिस्से में आजादी आंदोलन का इतिहास यही दिखाता है कि आरएसएस उस आंदोलन से पूरी तरह अलग-थलग रहा. यह कोई संयोग नहीं, बल्कि आरएसएस की सोची-समझी नीति थी कि वह औपनिवेशिक शासन से किसी सीधी टकराव से बचे और अपनी सारी ताकत संगठन का ढांचा खड़ा करने और हिंदू वर्चस्ववादी विचारधारा फैलाने में लगाए. लेकिन आज, जब संघ परिवार सत्ता के शिखर पर बैठा है, वह इतिहास को फिर से लिखने में लगा है – ताकि हिंदुत्व को केंद्र में लाया जा सके और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को हाशिए पर धकेला जा सके.
इतिहास की लड़ाई जीतने की यह बेचैनी आरएसएस की उस लगातार कोशिश में भी साफ झलकती है, जिसमें वह नेहरू को अलग-थलग और बदनाम करने की कोशिश करता है, और बाकी ऐतिहासिक नेताओं को उनकी असली भूमिका से काटकर अपने मतलब के हिसाब से पेश करना चाहता है. गांधी और अंबेडकर इस संघी रणनीति के सबसे प्रमुख निशाने पर हैं. हाल के वर्षों में हमने देखा है कि किस तरह गांधी को “स्वच्छता” या “सफाई” के प्रतीक के रूप में बार-बार इस्तेमाल किया गया. अब जब ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारत के विदेशी व्यापार को झटका दिया है, तो फिर से “गांधीवादी स्वदेशी” और “स्वावलंबन” की बातें उठाई जा रही हैं. यानी आत्मनिर्भरता का नारा गांधी के नाम पर उधार लिया जा रहा है. गांधी के भाषणों और प्रतीकों में हिंदू धार्मिक रूपकों का इस्तेमाल संघ के लिए उन्हें अपने मतलब का बनाना आसान बनाता है. लेकिन उनकी सबसे अहम बात, हिंदू-मुस्लिम एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द को भारत की ताकत और राष्ट्रीय एकता की बुनियाद मानना, आज भी संघ की विचारधारा के लिए असहनीय और अस्वीकार्य है.
इतिहास की किसी और शख्सियत से ज्यादा, संघ डॉ. आंबेडकर की छवि को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और उनकी बराबरी और इंसाफ की बात को कुंद करने में सबसे ज्यादा उतावला दिखता है. वह संविधान की लोकप्रियता और आंबेडकर के आकर्षण को अपने फासीवादी एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी दलित पहचान और राष्ट्रपति पद की वैधता का इस्तेमाल करते हुए यह दावा किया कि आरएसएस “आंबेडकरवादी विचारधारा” के अनुरूप है. उन्होंने 2001 में वाजपेयी के एक भाषण का हवाला देते हुए कहा कि अब भारत की राह दिखाने वाली किताब मनुस्मृति नहीं, भीमस्मृति यानी संविधान होगी. यहां तक कि उन्होंने आरएसएस को “भीमवादी” या “आंबेडकरवादी संगठन” तक कह दिया. लेकिन यही डॉ. अंबेडकर जाति को भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रविरोधी अवरोध मानते थे. उन्होंने जाति के उन्मूलन की जरूरत बताई थी और “हिंदू राज” की संभावना को भारत के लिए सबसे बड़ी संभावित आपदा कहा था. आज वही अंबेडकर संघी विचारकों के जरिए सामाजिक एकरूपता और प्रशासनिक केंद्रीकरण के पैरोकार के रूप में पेश किए जा रहे हैं.
संविधान में निहित सांस्कृतिक विविधता, संघीय ढांचे, अल्पसंख्यक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की गारंटियों को व्यवस्थित रूप से कमजोर और कई जगह उलटा जा रहा है. इसका मकसद संविधान के समतावादी नजरिए और लोकतंत्र की मूल भावना को नष्ट कर, उसे बहुसंख्यकवादी शासन, अंधराष्ट्रवाद, अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक निगरानी के औजार में बदल देना है. गांधी और अंबेडकर के नाम पर खोखली बातें और दिखावटी समर्थन, आजादी की लड़ाई के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखना, और संविधान की आत्मा को कुचलते हुए उसी के नाम पर उसका लगातार दुरुपयोग करना, यही आरएसएस की सौवीं सालगिरह पर संघ-भाजपा सत्ता तंत्र का सबसे खतरनाक कदम है.
वह संगठन जिसने संविधान को अपनाए जाने के वक्त ही उसे ठुकराया था, जिसने तिरंगे को अशुभ बताया था, और जिसने नफरत और हिंसा फैला कर गांधी की हत्या और अंबेडकर की बदनामी की जमीन तैयार की थी, वही आज भारत को अपनी विचारधारा के मुताबिक ढालने में जुटा है. शायद मोदी द्वारा हेडगेवार का यह कथन दोहराना – “लोगों को जैसा है वैसा स्वीकार करो, और फिर उन्हें वैसा बनाओ जैसा वे होने चाहिए” – इसी फासीवादी परियोजना की तरफ इशारा करता है.
अगर भारत को वाकई एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपने संवैधानिक सपने को साकार करना है, तो “हम भारत के लोग” को संविधान और आजादी के आंदोलन की उस क्रांतिकारी, समावेशी और परिवर्तनकारी विरासत को वापस हासिल कर, आगे बढ़ाना होगा. और इसके साथ, संघ को उसी हाशिए पर धकेलना होगा, जहां उसने अपने सौ सालों के अधिकांश वक्त में रहना पसंद किया था.