वर्ष 35 / अंक - 07 / ‘एपस्टीन फाइल्स – ‘हाउडी मोदी’ से इजराइल यात्रा तक...

‘एपस्टीन फाइल्स – ‘हाउडी मोदी’ से इजराइल यात्रा तक : सत्ता, सेक्स और वैश्विक पूंजीवाद का नापाक गठजोड़ और हिंदुत्व की साम्राज्यवादी गुलामी’

‘एपस्टीन फाइल्स – ‘हाउडी मोदी’ से इजराइल यात्रा तक : सत्ता, सेक्स और वैश्विक पूंजीवाद का नापाक गठजोड़ और हिंदुत्व की साम्राज्यवादी गुलामी’

-- मनमोहन

अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट द्वारा सार्वजनिक किए गए बच्चों के साथ यौन अपराधों में सजायाफ्ता कुख्यात पीडोफाइल जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों और ईमेल्स में भारतीय सत्ता-तंत्र और कॉरपोरेट कुलीन वर्ग के कथित अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का जिक्र सामने आने के बाद यह मामला अब भारत की संसद तक गूंज रहा है. संसद में विपक्ष इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा जवाब नहीं दिए जाने को लेकर हमलावर रहा. विपक्षी सांसद ‘पीएम इज कॉम्प्रोमाइज्ड’ लिखी तख्तियां लेकर विरोध करते दिखाई दिए. प्रतिपक्ष का कहना है कि एपस्टीन फाइलों में सामने आए संपर्कों और अडानी से जुड़े अमेरिकी अदालत में चल रहे कथित वित्तीय फर्जीवाड़े के मुकदमे के दबाव ने मोदी सरकार को ऐसा अमेरिका-भारत व्यापार समझौता करने को मजबूर कर दिया है, जिससे देश की संप्रभुता और करोड़ों मजदूरों व किसानों की आजीविका खतरे में पड़ गई है.[1]

कुख्यात एपस्टीन फाइलों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सहित दुनिया के कई प्रभावशाली नेताओं और ताकतवर व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं. इन दस्तावेजों में शाही परिवारों से जुड़े लोग, अरबपति कारोबारी, राजनयिक, टेक उद्योग के बड़े चेहरे और अरब दुनिया के बड़े व्यापारिक समूहों तक का जिक्र मिलता है. यह पूरा मामला उस वैश्विक सत्ता-तंत्र की झलक देता है, जिसमें समझौते, दबाव और ब्लैकमेल के जाल में पूंजी, राजनीति और खुफिया एजेंसियां आपस में जुड़कर महिलाओं और लड़कियों के यौन शोषण को सत्ता और सौदे का जरिया बनाती रही हैं.

इन्हीं दस्तावेजों में एपस्टीन का भारत के बड़े उद्योगपति अनिल अंबानी से भी गहरा संपर्क सामने आया. अंबानी ने एपस्टीन की मदद से ट्रंप प्रशासन में जेरेड कुशनर और स्टीव बैनन जैसे लोगों से संपर्क बनाया, ताकि प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी दौरे की तैयारी हो सके. एक ईमेल में एपस्टीन ने यहां तक दावा किया कि मोदी की इजराइल यात्रा उसकी सलाह पर हुई.[2]

यह वही दौर था जब भारत-इजराइल संबंधों में अभूतपूर्व तेजी आई. 2017 का प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा दोनों देशों के बीच सामरिक और रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई पर ले गया. इस दौर में भारत ने इजराइल से सैकड़ों मिलियन डॉलर के हथियार खरीदे और बहु-अरब डॉलर के रक्षा तथा तकनीकी सहयोग के समझौते भी हुए. यानी एपस्टीन जैसा अंतरराष्ट्रीय अपराधी भारत की विदेश नीति में ‘पर्दे के पीछे की खिलाड़ी’ की भूमिका निभा रहा था.[3]

एपस्टीन का वैश्विक नेटवर्क, ब्लैकमेल और इजराइली रिश्ता

पूरे मामले में एक साफ पैटर्न दिखाई देता है. एपस्टीन ने सत्ता और दौलत के शीर्ष तबकों तक अपनी पहुंच बनाई, उन्हें निजी और समझौता करने वाली स्थितियों में फंसाया, और हर चीज का बेहद व्यवस्थित रिकॉर्ड रखा. उसका निजी द्वीप किसी ऐय्याशी की जगह से ज्यादा एक जाल था, जहां हर प्रभावशाली व्यक्ति संभावित नियंत्रण का साधन बन सकता था. एपस्टीन राज इकट्टा करता था, और इन राजों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति और समझौतों को प्रभावित करने के लिए किया जाता था.

अमरीकी खुफिया एजेंसी एफबीआइ तक ने एपस्टीन को ‘मोसाद का एजेंट’ बताया था, जिसका काम अमीर और ताकतवर लोगों को यौन शोषण के जाल में फंसाकर इजराइली हितों के लिए ब्लैकमेल करना था.[4] एपस्टीन के इजराइल से रिश्तों को लेकर कई परिस्थितिजन्य तथ्य गंभीर सवाल खड़े करते हैं. एपस्टीन की सबसे करीबी सहयोगी घिस्लेन मैक्सवेल एक मीडिया कारोबारी रॉबर्ट मैक्सवेल की बेटी थी, जिन पर लंबे समय से इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद से घनिष्ठ संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं.

इसके अलावा, एपस्टीन का इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक से भी गहरा रिश्ता रहा. 2013 से 2017 के बीच बराक 30 से ज्यादा बार एपस्टीन के घर गए, उसके न्यूयॉर्क अपार्टमेंट में ठहरे, और इजराइली ड्रोन कंपनियों समेत सैन्य उद्योग से जुड़े निवेश और साझेदारी के सौदों में शामिल रहे.[5] ये तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि रंगभेदी इजराइली सत्ता प्रतिष्ठान और इस वैश्विक यौन अपराधी के हित कई स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. यह नेटवर्क यह भी दिखाता है कि सत्ता और पूंजी के शीर्ष स्तर पर अपराधों को दबाने का साझा तंत्र किस तरह काम करता है. यही वजह रही कि लंबे समय तक एपस्टीन के अपराधों पर पर्दा पड़ा रहा और न्याय व्यवस्था प्रभावशाली लोगों तक पहुँचने में नाकाम साबित हुई.

एपस्टीन के ‘हनीट्रैप’ की रणनीति दरअसल उसी पितृसत्तात्मक हिंसा का विस्तार है, जिसमें महिलाओं के शरीर को उपनिवेशवादी हितों के लिए ‘चारे’ की तरह इस्तेमाल करना औपनिवेशिक दौर से चली आ रही पॉलिसी है. यह न सिपर्फ व्यक्तिगत शोषण है, बल्कि वैश्विक पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की उस प्रणाली का हिस्सा है जो महिलाओं को सत्ता के खेल में हथियार बनाती है, जहां यौन हिंसा को ब्लैकमेल के औजार में बदल दिया जाता है.

गाजा में जारी जनसंहार के दौरान फिलिस्तीनी महिलाओं पर रेप, निगरानी, दमन और उनके मातृत्व पर इजरायल द्वारा सुनियोजित हमले इसी हिंसक सोच की निरंतरता हैं. यहां महिलाओं की प्रजनन क्षमता को भी नियंत्रण का निशाना बनाया जाता है – ठीक वैसे जैसे औपनिवेशिक काल में तीसरी दुनिया की महिलाओं को जनसांख्यिकीय हथियार के रूप में देखा जाता था.[6]

टेक्नोलॉजी, निगरानी और जनसंहार की मशीनरी

एपस्टीन के नेटवर्क का सबसे भयावह चेहरा गाजा के जनसंहार में दिखाई देता है. एपस्टीन द्वारा ‘पैलेंटिर’ जैसी सर्विलांस कंपनियों में किया गया निवेश आज ‘लैवेंडर’ जैसे एआई टार्गेटिंग सिस्टमों के जरिए फिलिस्तीनी महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाने में इस्तेमाल हो रहा है – एक ऐसी युद्ध मशीनरी, जहां इंसानों को महज ‘डेटा पॉइंट्स’ में बदल दिया जाता है.[7]

एपस्टीन के नेटवर्क ने जिन कूटनीतिक और सत्ता-संबंधों का जाल बुना, उसी ने इजरायल को गाजा में बड़े पैमाने पर जनसंहार के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक छूट दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई. यहां स्पष्ट है कि यौन शोषण, ब्लैकमेल, सैन्य तकनीक और जनसंहार – ये सब एक ही वैश्विक व्यवस्था के अलग-अलग पहलू हैं.

हिंदुत्व की औपनिवेशिक गुलामी

ऐसे दौर में पीएम मोदी का इजरायल जाना और ‘मेरे दोस्त डोनाल्ड’ के लिए नाच-गाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भारत में जितना भी ‘डी-कॉलोनाइजेशन’ का ढोंग रचा जाए, इतिहास गवाह है कि आरएसएस और हिंदुत्व का गठजोड़ हमेशा औपनिवेशिक ताकतों के साथ ही रहा है.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ये लोग अंग्रेजों के सहयोगी थे; सावरकर जैसे नेताओं ने तो अंग्रेजों को माफीनामे लिखकर अपनी वफादारी का ऐलान किया.[8] आज की सत्ताधारी भाजपा यही मानसिकता अमेरिकी-इजरायली धुरी के सामने दोहराती है. मोदी का इजरायल में ‘मैं अकेला ही चला था...’ गाना और ट्रंप के सामने ‘हाउडी मोदी!’ का तमाशा इसी मानसिकता के प्रतीक हैं.

आरएसएस की सोच हमेशा से आधुनिक उपनिवेशवादी तर्क से प्रभावित रही है, जो उसके हिंदू राष्ट्रवाद और नेशन-स्टेट के विचार में साफ दिखाई देता है. उनके लिए राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आज ये लोग ट्रंप और अमेरिका के चहेते बनने को बेताब हैं – अलग बात है कि उनके ‘दोस्त डोनाल्ड’ को इनकी कोई परवाह नहीं. इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि ये लोग आज भी इजरायल जैसे जनसंहारी, रंगभेदी और सेटलर उपनिवेशवादी राज्य के साथ खड़े हैं.

व्यवस्थागत सड़न और न्याय का सवाल

एपस्टीन की फाइलों ने यह बेनकाब कर दिया है कि ये शक्तिशाली लोग नैतिक रूप से कितने खोखले, बौद्धिक रूप से कितने औसत और कितने कट्टर रंगभेदी, लिंगभेदी और जनसंहारी जायोनी राज्य के मददगार हैं. क्या इसमें कोई ताज्जुब है कि ये लोग बिना किसी शर्म या अपराधबोध के पूरी दुनिया को लूटते हैं, जनता पर कंगाली थोपते हैं, युद्ध भड़काते हैं और बेधड़क जनसंहार को अंजाम देते हैं.

अमेरिकी-पश्चिमी मीडिया संस्थान और भारत की मोदी सरकार पूरे मामले पर पर्दापोशी करने में जुटे हैं. वे इसे महज एक अकेले पेडोफाइल और उसके कुछ रईस दोस्तों की कहानी बनाकर पेश कर रहे हैं, ताकि जनता की नजरों से उस कड़वे सच को ओझल किया जा सके कि कैसे इजरायली-अमेरिकी धुरी, उसके जासूसों और गुर्गों ने सरकार, कूटनीति और अकादमिक जगत के शीर्ष स्तरों को अपना गुलाम बना लिया है.

यह व्यवस्थागत सड़न एप्स्टीन की मौत के साथ खत्म नहीं हुई. सभी इस हमाम में नंगे हैं. अमेरिकी-इजरायली धुरी की तानाशाही को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना होगा. इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए – चाहे ट्रंप, नेतन्याहू या मोदी हों. चाहे अमेरिका में यौन शोषण का शिकार हुई लड़कियां हों या फिलिस्तीन में जनसंहार की भेंट चढ़ती जनता. इनके पीड़ितों को इंसाफ ही दुनिया और मानवता को विनाश के कगार से बचा सकता है.

संदर्भ :

[1] US Department of Justice Epstein Files Release, 2025; Indian Parliament Adjournment Motion on Adani Case, Lok Sabha Records, February 2026
[2] Epstein Email Leaks: Ambani-Trump Connections, Al Jazeera Report, December 2025
[3] India-Israel Defense Deals Post-2017 Modi Visit, SIPRI Arms Trade Database, 2018-2024
[4] FBI Memo on Epstein-Mossad Links, Declassified Documents, 2025
[5] Ehud Barak-Epstein Ties, USA Today Inves- tigation, December 2025
[6] Reports on Sexual Violence in Gaza, UN Human Rights Council, 2024; Feminist Critiques of Colonial Reproductive Control, Chandra Talpade Mohanty, “Under Western Eyes,” 1984.
[7] Palantir Investment and AI in Gaza, +972 Magazine, “Lavender” Report, April 2024
[8] RSS-British Collaboration History, Savarkar Mercy Petitions, Archives of India, 1909-1924

14 February, 2026