ऑल इंडिया सेन्ट्रल कौंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एक्टू) ने 12 फरवरी 2026 की आम हड़ताल की सफलता के लिए देश के मजदूरों, कर्मचारियों और किसानों को बधाई देते हुए आगे और भी एकताबद्ध आंदोलनों के लिए तैयार रहने का आह्वान किया है. 12 फरवरी 2026 को केन्द्रीय श्रम संगठनों (सीटीयू), स्वतंत्र क्षेत्रीय संघों और अन्य श्रम संगठनों के संयुक्त मंच ने श्रमिकों, किसानों और अन्य वर्गों द्वारा राष्ट्रव्यापी सफल आम हड़ताल और जन आंदोलन को केंद्र सरकार की जनविरोधी, राष्ट्रविरोधी नीतियों के खिलाफ एक बड़ा प्रतिरोध बताया है. श्रमिक संगठनों ने कहा कि 12 फरवरी 2026 को 30 करोड़ से अधिक श्रमिक, किसान और अन्य वर्ग इस प्रतिरोध संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी किए हैं.
अखिल भारतीय किसान महासभा ने पूरे भारत में 4 श्रम संहिताओं, भारत अमेरिका व्यापार समझौता, बीज व बिजली विधेयकों, वीबी जी ग्रामजी कानून के खिलाफ आयोजित आम हड़ताल के दौरान हुए प्रदर्शनों में अभूतपूर्व भागीदारी के लिए देश के किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों, स्कीम वर्कर्स और ग्रामीण मजदूरों को बधाई दी है. संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इसे अब तक की सबसे बड़ी आम हड़तालों में से एक बताया, जिसने मजदूर-किसान एकता को कॉरपोरेट विरोधी संघर्ष की रीढ़ के रूप में मजबूत किया. एसकेएम ने केंद्र की मोदी सरकार को चेतावनी दी ‘अगर मोदी सरकार सबक नहीं सीखेगी और नीतियों को उलटने के लिए तैयार नहीं होगी, तो नीति परिवर्तन या व्यवस्था परिवर्तन होने तक और अधिक तीव्र, निरंतर, एकजुट अखिल भारतीय संघर्ष होंगे’.
हड़ताल को वामपंथी पार्टियों और इंडिया गठबंधन का भी सक्रिय समर्थन मिला. भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने पटना की सड़कों पर मजदूरों, किसानों और कर्मचारियों के साथ मार्च में हिस्सा लिया. वहीं इंडिया गठबंधन की पार्टियों के सांसदों ने संसद भवन परिषर में इस हड़ताल के समर्थन में प्रदर्शन किया. अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद का. राजा राम सिंह और संगठन सचिव व सांसद का. सुदामा प्रसाद ने हड़ताल के मुद्दों पर सरकार की बेरुखी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के खिलाफ संसद में आवाज उठाते हुए वाक आउट किया. देश भर में वामपंथी पार्टियों के कार्यकर्ता भी आन्दोलनरत कर्मचारी-मजदूर-किसान संगठनों के आन्दोलन के पक्ष में सड़कों पर मार्च करते हुए दिखे.
12 फरवरी की आम हड़ताल स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी आम हड़तालों में से एक है. विशेष रूप से यह हड़ताल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार द्वारा सख्ती से अपनाई जा रही कारपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रतिरोध की रीढ़ के रूप में श्रमिक-किसान एकता को मजबूत करने के लिए जानी जाएगी. एसकेएम ने विशेष रूप से केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, स्वतंत्र क्षेत्रीय महासंघों और अन्य सभी ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच को भी बधाई दी जिन्होंने पूरे देश में आम हड़ताल को प्रभावशाली बनाया. 12 फरवरी 2026 की आम हड़ताल ने जनता के सभी वर्गों में एकताबद्ध जन संघर्षों के प्रति विश्वास भरने में मदद की है. इस हड़ताल ने अन्याय और शोषणकारी, कारपोरेट संचालित नीतियों के खिलाफ खड़े होने और लड़ने के लिए देश की मेहनतकश जनता को प्रोत्साहित किया है.
इस हड़ताल की सफलता और व्यापकता ने जता दिया है कि देश-विरोधी एफटीए, वीबी जीरामजी एक्ट, बिजली बिल, बीज बिल, इंश्योरेंस एक्ट, शांति एक्ट और जन-विरोधी यूनियन बजट 2026-27 के खिलाफ मेहनतकश लोगों में गुस्सा है. साथ ही सभी फसलों के लिए गारंटीशुदा खरीद के साथ ही MPS@C2+50% देने से इनकार, किसान व ग्रामीण मजदूर परिवारों के लिए कर्ज माफी की घोषणा करने में आनाकानी और किसानों-ग्रामीण मजदूरों की दुःखद आत्महत्याओं के खिलाफ नाराजगी आम हड़ताल के दौरान सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शनों में दिखी है. इन सभी मुद्दों का पूरे भारत में असर है और अगर मोदी सरकार इन नीतियों को बदलने को तैयार नहीं है तो आने वाले संघर्ष और भी बड़े पैमाने पर पूरे भारत में होंगे.
आम हड़ताल में सभी क्षेत्रों, औपचारिक/अनौपचारिक, सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्रों, ग्रामीण और शहरी भारत में बड़े पैमाने पर हुए जन आंदोलन ने पिछली सभी हड़तालों को पीछे छोड़ दिया. केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र क्षेत्रीय संघों के संयुक्त मंच ने संयुक्त किसान मोर्चा और कृषि श्रमिक संघों के संयुक्त मोर्चे के सदस्यों के साथ मिलकर देश के 600 से अधिक जिलों में हड़ताल और बड़े पैमाने पर जन आंदोलन आयोजित करने में सफलता प्राप्त की. कई स्थानों पर छात्र और युवा ‘शिक्षा बचाओ’, ‘रोजगार की गारंटी दो’, ‘रिक्त पद भरो’ आदि नारों के साथ भाग लेते देखे गए. रास्ता रोको और रेल रोको आंदोलन में आईसीडीएस, आशा कार्यकर्ता, मध्याह्न भोजन, बीड़ी क्षेत्र, घरेलू कामगारों और अन्य असंगठित क्षेत्रों के कामगारों जैसे निर्माण, फेरीवालों और विक्रेताओं, लोडर/अनलोडर, स्वरोजगार प्राप्त गृहस्थ श्रमिक, मछली श्रमिक आदि ने अग्रणी भूमिका निभाई. कई राज्यों में राज्य व निजी परिवहन सेवा, ई-रिक्शा चालक, ऑटो और टैक्सी यूनियनों ने भी भाग लिया. ग्रामीण इलाकों में किसान और कृषि श्रमिक बड़ी संख्या में एकत्रित हुए.
खनन/विनिर्माण/सेवा क्षेत्र में औपचारिक और अनौपचारिक श्रमिकों के बीच हड़ताल और लामबंदी का व्यापक प्रभाव देखने को मिला. कोयला, एनएमडीसी लिमिटेड, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, एल्युमीनियम, स्वर्ण खान आदि जैसे अन्य गैर-कोयला खनिजों, इस्पात, बैंकों, एलआईसी, जीआईसी, पेट्रोलियम, बिजली, डाक, ग्रामीण डाक सेवक, दूरसंचार, परमाणु ऊर्जा, सीमेंट, बंदरगाह और गोदी, चाय बागान, जूट मिलें, सार्वजनिक परिवहन, निजी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के परिवहन, विभिन्न क्षेत्रों/राज्यों में राज्य सरकार के कर्मचारियों और डाक, आयकर, लेखापरीक्षा आदि प्रमुख क्षेत्रों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों ने हड़ताल की. देश के अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों में, जिनमें कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं, श्रमिकों/कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर हड़ताल में भाग लिया और जुलूस निकाले. रक्षा क्षेत्र के कर्मचारियों ने हड़ताल के समर्थन में एक घंटे का काम बंद करके विरोध प्रदर्शन किया. रेलवे यूनियनों ने लामबंदी की और एकजुटता प्रदर्शनों में भाग लिया.
देश भर में आम लोगों ने इन आंदोलनात्मक कार्रवाइयों का समर्थन किया. हड़ताल/बंद के आह्वान के जवाब में कई जगहों पर बाजार बंद रहे. देश के कई राज्यों जैसे पुडुचेरी, असम, ओडिशा, झारखंड, तमिलनाडु, पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल, गोवा आदि में बंद जैसी स्थिति रही. राजस्थान, हरियाणा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा आदि राज्यों के कई हिस्सों में भी आंशिक बंद की खबरें मिलीं. तमिलनाडु, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और गुजरात में औद्योगिक और क्षेत्रीय हड़तालें हुईं. दिल्ली के जंतर मंतर पर भी एक प्रभाशाली विरोध धरना प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शन में केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और एसकेएम के कई प्रमुख नेताओं ने हिस्सा लिया.
यह हड़ताल ऐसे समय में हुई जब एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बिगड़ रही थी. वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार ने अमेरिका के आगे पूर्ण आत्मसमर्पण कर भारत की खेती किसानी की तबाही का समझौता कर लिया है. केंद्र सरकार ने पूंजी के बढ़ते प्रभाव के सामने ट्रेड यूनियनों को नियंत्रित और कमजोर करने के लिए, उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, हितधारकों से परामर्श किए बिना और भारतीय श्रम सम्मेलन आयोजित किए बिना, चार श्रम संहिताएं और नियम अधिसूचित किए. ये अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन थे, जिन पर भारत एक राष्ट्र राज्य के रूप में हस्ताक्षरकर्ता है. इन संहिताओं को संसद में जबरदस्ती पारित किया गया और तीन संहिताओं के मामले में तो संसद में पूर्ण विपक्ष की अनुपस्थिति में और कोविड-19 महामारी के दौरान आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत पारित किया गया, जिसने सभाओं पर रोक लगा रखी थी.
(केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच व संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा जारी विज्ञप्तियों के आधार पर)