वर्ष 35 / अंक - 12 / आगामी विधानसभा चुनाव : लोकतंत्र के रक्षकों के सामन...

आगामी विधानसभा चुनाव : लोकतंत्र के रक्षकों के सामने चुनौतियां

आगामी विधानसभा चुनाव : लोकतंत्र के रक्षकों के सामने चुनौतियां

15 मार्च को चुनाव आयोग ने असम, केरल, तमिलनाडु, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल की विधानसभाओं के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की. असम, केरल और पुदुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा; तमिलनाडु में 23 अप्रैल को, और पश्चिम बंगाल में दो चरणों में – 23 और 29 अप्रैल को – मतदान होगा. वोटों की गिनती 4 मई को होगी – इसका मतलब है कि केरल, पुदुचेरी और असम के लोगों को अपने वोटों की गिनती के लिए लगभग एक महीने तक इंतजार करना पड़ेगा! जो लोग अभी भी मतदान के लिए ईवीएम का समर्थन करते हैं, इस विश्वास के साथ कि ईवीएम-आधारित मतदान से वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा तेजी से होती है, उन्हें मतदान और गिनती के बीच के इस समयांतराल पर जरूर गौर करना चाहिए.

नवंबर 2024 में हुए बिहार चुनावों की तरह ही विधानसभा चुनावों के इस मौजूदा दौर के पहले भी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) का वही बहिष्करण अभियान चलाया जा रहा है. हर राज्य में, एसआइआर के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं और मतदाता सूची छोटी होती जा रही है. मतदाताओं की संख्या में सबसे कम कमी केरल में हुई है, लेकिन यहां भी मतदाता सूची में लगभग दस लाख (यानी 3 प्रतिशत) की कमी आई है. इसके विपरीत, तमिलनाडु में मतदाता सूची में भारी कमी (12 प्रतिशत) देखने को मिली है. यहां 74 लाख नाम हटा दिए गए हैं, जिससे मतदाता सूची 6.2 करोड़ से घटकर 5.5 करोड़ रह गई है. पश्चिम बंगाल में पहले ही 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं, लेकिन अन्य 60 लाख मतदाताओं का भविष्य अभी भी ‘जांच के दायरे’ में है.

वस्तुतः, एसआइआर प्रक्रिया की अस्पष्ट और मनमानी प्रकृति को पश्चिम बंगाल में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है. जब मतदाताओं को 2002 की मूल मतदाता सूची से जोड़ा गया, तो पहली मसौदा सूची प्रकाशित होने पर 58 लाख नाम मृत्यु, स्थायी पलायन या फर्जी प्रविष्टियों के आधार पर हटा दिए गए थे. लेकिन उस आरंभिक चरण के बाद जो शुरू हुआ, वह था मतदाताओं का बड़े पैमाने पर उत्पीड़न और उन्हें जान-बूझकर सूची से बाहर करना. मालदा और मुर्शिदाबाद के मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में, जहां पहली मसौदा सूची में केवल 2 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, अब लगभग आधी संख्या में मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर किए जाने के अगले संभावित फैसले का इंतजार कर रहे हैं. और इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि चुनाव की तारीखें इन साठ लाख मतदाताओं का भविष्य अधर में लटकाकर घोषित की गई हैं, मानो कि उनके वोट देने के अधिकार का कोई महत्व ही न हो, मानो कि ‘लोकतंत्र के इस महान पर्व’ में उनके वोटों का कोई मायने ही न हो. जो मतदाता एसआइआर की इस छंटनी से बच निकले हैं, उन्हें अपने वोट का इस्तेमाल करके मोदी सरकार को भारत के चुनावी लोकतंत्र पर एसआइआर के इस हमले के लिए अवश्य सजा देनी चाहिए.

चुनाव वाले इन चार राज्यों में से, भाजपा अभी केवल असम में सत्ता में है. असम के मुख्य मंत्री भाजपा के नफरत फैलाने वाले सबसे जहरीले चेहरों में से एक बनकर उभरे हैं, जो अब असम में बंगला-भाषी मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम हिंसा भड़काते हैं. उनकी सरकार के अंतर्गत असम बेलगाम कॉरपोरेट लूट का चरागाह भी बन गया है. पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता हथियाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है. चुनाव की घोषणा से ठीक पहले मोदी सरकार ने तमिलनाडु के विवादित राज्यपाल एन. रवि का तबादला पश्चिम बंगाल कर दिया, जबकि कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने उनके असंवैधानिक कृत्यों के लिए उनकी कड़ी आलोचना की थी. और, घोषणा के तुरंत बाद निर्वाचन आयोग ने चुनाव वाले इस राज्य में पूरी तरह से प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यहां तक कि तमिलनाडु और केरल में भी, जहां निकट भविष्य में भाजपा की जीत की कोई संभावना नहीं है, मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड की आक्रामकता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है.

लोकतंत्र और संविधान के रक्षकों के लिए, विधानसभा चुनाव फासीवाद-विरोधी राजनीतिक लामबंदी का एक मंच बन जाना चाहिए. 1 अप्रैल से सरकार गुलामी थोपने वाले नए श्रम कानूनों को लागू करने जा रही है. काम के घंटों को बढ़ाने की कोशिशों के खिलाफ मजदूरों में बढ़ते असंतोष के संकेत पहले से ही मिल रहे हैं. 12 फरवरी की आम हड़ताल के एजेंडे को साझा चुनावी एजेंडे के रूप में अपनाया जाना चाहिए. ईरान पर बढ़ते अमेरिका-इजराइल युद्ध के विनाशकारी प्रभाव भारत में पहले से ही बहुत तेजी से महसूस किए जा रहे हैं. अमेरिका-इजराइल गठबंधन के सामने मोदी सरकार का समर्पण न केवल भारत की विदेश नीति पर एक कलंक है, बल्कि यह भारत और हमारे आम लोगों के हितों पर सीधा प्रहार भी है – किसानों पर, जिन्हें अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से भारी नुकसान होगा; प्रवासी मजदूरों पर, जो पश्चिम एशिया में फंसे हुए हैं; और हर उस आम भारतीय पर, जो ईंधन संकट और बढ़ती कीमतों की मार झेल रहा है. चुनावों को युद्ध-विरोधी अभियान मंच के रूप में भी देखा जाना चाहिए.

चुनाव वाले सभी राज्य भारत में वामपंथी आंदोलन के जीवंत केंद्र रहे हैं. तात्कालिक चुनावी संदर्भ और परिणामों से परे, हमें इन सभी राज्यों में कम्युनिस्ट आंदोलन की लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए. इन राज्यों में गठबंधन का कोई एक जैसा स्वरूप नहीं है, लेकिन क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को इन चुनावों में हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि जनता के आंदोलन को मजबूत किया जा सके और भारत पर फासीवादी पकड़ को कमजोर किया जा सके. इसी उद्देश्य से, पहली बार भाकपा(माले) पश्चिम बंगाल में माकपा और ‘वाम मोर्चा’ के साथ राज्यस्तरीय चुनावी तालमेल करेगी. असम में पार्टी का कांग्रेस के साथ आंशिक तालमेल होगा और तमिलनाडु, पुदुचेरी तथा केरल में पार्टी चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में कुछ उम्मीदवार उतारेगी, जबकि तमिलनाडु और पुदुचेरी में डीएमके-नीत गठबंधन को और केरल में एलडीएफ को आम तौर पर अपना समर्थन देगी.

21 March, 2026