बिहार की धरती पर लोकतंत्र की गूंज फिर से सुनाई देने लगी है. हवा में नारे हैं, सड़कों पर जनसैलाब है, और गांव-गांव में चर्चा है. “वोट चोर, गद्दी छोड़” यह सब अचानक नहीं हुआ, यह उस लहर का परिणाम है जो ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के रूप में सासाराम से चलकर अब गया, नवादा, शेखुपरा, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया, मिथिलांचल, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी होते हुए महात्मा गांधी की धरती चंपारण तक पहुंच चुकी है. यह यात्रा अब केवल मतदाता सूची से नाम काटे जाने के खिलाफ एक विरोध भर नहीं, बल्कि वोट चोरों के खिलाफ लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा और इस साल के अंत में बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में बदलाव का शंखनाद है.
यात्रा के दूसरे चरण में इसका स्वरूप और अधिक व्यापक हो चुका है. भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी, कांग्रेस के बिहार अध्यक्ष राजेश राम पहले ही दिन से इस यात्रा का एक सुगठित टीम की तरह नेतृत्व कर रहे हैं और इस संघर्ष को दिशा दे रहे हैं. 17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुई यह यात्रा अब 11 दिन पार कर चुकी है और हर दिन, हर शहर और हर गांव में इसे बढ़ता जनसमर्थन मिल रहा है. इस बीच, कई अन्य बड़े नेताओं व दक्षिण भारत के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और तेलांगना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के साथ वायनाड से कांग्रेस की नेत्री प्रियंका गांधी ने भी इस यात्रा में भाग लिया. जाहिर है, बिहार में विपक्ष के मजबूत हो रहे गठबंधन और आंदोलन को एक राष्ट्रीय विमर्श शुरू हो चुका है. स्टालिन ने यात्रा के दौरान अपने वक्तवयों में कहा कि वे उस राज्य में आकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं जहां के लोगों ने तमिलनाडु की जमीन को अपने श्रम से सींचा है. इस तरह भाजपा द्वारा उत्तर-दक्षिण की विभाजनकारी राजनीति को भी यह यात्रा एक मजबूत चुनौती देती नजर आ रही है.
बहरहाल, वोटर अधिकार यात्रा का दूसरा चरण 21 अगस्त से शुरू हुआ. लखीसराय होते हुए यह यात्रा सूर्यगढ़ा, फिर जमालपुर विधानसभा के हमजा गांव पहुंची, जहां मुंगेर जिले की धरती ने इस जनांदोलन का जबरदस्त स्वागत किया. सभा स्थल परविभिन्न मजदूर संगठन, कर्मचारी संघ, व्यवसायिक समुदाय के प्रतिनिधि, युवा और महिला कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने इस आंदोलन की बहुआयामी प्रकृति को उजागर किया. बांक काली स्थान पर जब सभी कार्यकर्ता एकत्रित हुए, तो न केवल भोजन और विश्राम हुआ, बल्कि एक संकल्प भी लिया गया कि इस बार वोट चोरी नहीं होने दी जाएगी. अगली सुबह ग्रामीण महिलाओं, युवाओं, आशा-रसोइया सहित स्कीम वर्करों, कर्मचारियों, संगठनों का जमावड़ा होने लगा. उत्साह का आलम ऐसा था कि फोटो सेशन के साथ-साथ एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें यात्रा का नेतृत्व कर रहे नेताओं को उनके संघर्ष के लिए सम्मानित किया गया. कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य, एसके शर्मा, शशि यादव, संतोष सहर, कुमार दिव्यम जैसे नेताओं को विभिन्न संगठनों की ओर से प्रतीकात्मक सम्मान दिए गए. इन सभी संगठनों ने अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन माले महासचिव को सौंपा.
सभा को संबोधित करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने स्पष्ट कहा कि वोटर अधिकार यात्रा अब एक जनांदोलन का रूप ले चुकी है. यह यात्रा एसआईआर की गड़बड़ियों को रोकने के लिए है और उस डबल इंजन की डबल आपदा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए है, जिसने बीस वर्षों से जनता के कंधें पर बोझ डाल रखा है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि वह चुनाव आयोग के माध्यम से 20 प्रतिशत वोट काटकर चुनाव की चोरी करना चाहते थे, लेकिन बिहार की जनता ऐसा नहीं होने देगी.
भागलपुर में दिखी बदलाव की लहर
मुंगेर के बाद – वोटर अधिकार यात्रा – जब भागलपुर की धरती पर पहुंची, तो यह केवल भौगोलिक विस्तार नहीं था, बल्कि जनसमर्थन की एक नई ऊंचाई थी. यहां यात्रा का स्वागत जितनी गर्मजोशी से हुआ, उसने आगाह कर दिया कि आने वाले चुनाव में भागलपुर जोन में बड़ा बदलाव होने वाला है.
नेताओं व कार्यकर्ताओं का कारवां जैसे ही भागलपुर जिले की सीमा में प्रवेश करता है, जगह-जगह जनसमूह सड़क किनारे झंडों, नारों और जोश से उनका स्वागत करता है. मुख्य नेताओं के अलावा एमएलसी शशि यादव, भाकपा-माले के केंद्रीय नेता सरोज चौबे, और अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में यात्रा आगे बढ़ती है. रास्ते भर बैनरए पोस्टर, घोड़ों पर सवार कार्यकर्ता, और ढोल-नगाड़ों की गूंज यात्रा को एक जनउत्सव का रूप दे रही थी.
बंगला और धरहरा जैसे गांवों में स्थानीय कार्यकर्ताओं – रंजीत, रंजन और कामदेव मांझी – के नेतृत्व में ग्रामीण जनता बड़ी संख्या में यात्रा से जुड़ी. हर चौराहे पर नारे गूंज रहे थे – “वोट चोर गद्दी छोड़”, “लोकतंत्र पर हमला नहीं सहेंगे”, “संविधान बचाओ”. यहां पर आशा संघ की ओर से राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और का. दींपकर भट्टाचार्य को ज्ञापन भी सौंपा गया, जिसमें मतदाता सूची से नाम काटे जाने, सरकारी दबाव और महिला कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के विरुद्ध अपनी पीड़ा को दर्ज कराया गया.
भागलपुर में यात्रा की ऊर्जा को उस समय एक चुनौती का सामना करना पड़ा जब मुंगेर की तरह यहां भी सिविल सर्जन द्वारा आशा कार्यकर्ताओं को धमकाया गया. उन्हें बताया गया कि किसी राजनीतिक आयोजन में ड्रेस में आना “ड्रेस का अपमान” है. यह केवल सरकारी निर्देश नहीं था, यह कार्यकर्ताओं की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर एक प्रकार की सेंसरशिप थी. इसके बाद आशा संगठन की नेता सुनीता देवी सहित कई कार्यकर्ताओं के नाम पर शोकॉज नोटिस भी जारी कर दिया गया.
इस घटनाक्रम ने यात्रा को और भी धारदार बना दिया. जनता ने देखा कि यह संघर्ष केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं है. यह व्यापक अधिकारों की एक लड़ाई है. रसोइया संघ, आशा कार्यकर्ता, कर्मचारी संगठन – सभी अपनी मांगों के साथ यात्रा में शामिल हुए.
भागलपुर से यात्रा नवगछिया और फिर कटिहार की ओर रवाना हुई. कटिहार में माले विधायक दल के नेता का. महबूब आलम के नेतृत्व में यात्रा का शानदार स्वागत किया गया. कटिहार, पूर्णिया, अररिया आदि इलाकों में खासकर, आदिवासी समुदाय ने यात्रा का स्वागत किया और अपने ज्ञापन सौंपे. अररिया में सभी नेताओं ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन आयोजित करके मोदी व नीतीश सरकार पर एक बार फिर जोरदार हमला बोला.
एक दिन के पुनः अवकाश के बाद 26 अगस्त को सुपौल ये यात्रा शुरू हुई. सभी लोग रात में ही नरपतनगर पहुंच गए. माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, माले के पोलित ब्यूरो सदस्य और मिथिलांचल प्रभारी धीरेन्द्र झा, एमएलसी और अखिल भारतीय स्कीम वर्कर्स फेडरेशन की महासचिव शशि यादव तथा भाकपा(माले) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य संतोष सहर भी उनके साथ थे. माले दरभंगा जिला सचिव बैद्यनाथ यादव, इंसाफ मंच के राज्य उपाध्यक्ष नेयाज अहमद, अभिषेक कुमार, पप्पू खान, प्रिंस राज आदि ने नरपतनगर पहुंचने पर उनकी आगवानी की.
सुबह जब यात्रा जब सुपौल के हुसैन चौक से होती हुई डिग्री कॉलेज चौक तक पहुंची, तो न केवल सड़कें जाम हो गईं, बल्कि पूरे शहर ने जैसे अपना दिल खोलकर इस आंदोलन का स्वागत किया. कांग्रेस, राजद, माले और अन्य वामपंथी दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने झंडों के साथ इस जुलूस का हिस्सा बने. हजारों की भीड़ ने यह सिद्ध कर दिया कि बिहार अब सिर्फ देख नहीं रहा, वह बोल रहा है. संगठित हो रहा है. थाना चौक, मल्लिक चौक, हॉस्पिटल चौक, गांधी मैदान, आंबेडकर चौक, लोहिया चौक, बस स्टैंड, चकला निर्मली मोड़, गौरवगढ़ चौक होते हुए यह यात्रा डिग्री कॉलेज चौक पहुंची थी. माले के जिला सचिव जयनारायण यादव, अरविंद कुमार शर्मा, अच्छेलाल मेहता, नवल किशोर मेहता, जितेंद्र चौधरी, मो मन्नान, मो फिरोज, डॉक्टर अमित कुमार चौधरी, पॉवेल कुमार, मनीष कुमार, कुंदन कुमार यादव, जन्मेजय राय, सुरेश यादव, मो मुस्लिम, मो नाजों, सत्यनारायण मुखिया, गुणेश्वर मंडल, गणेश राम, सीपीआई व सीपीएम के लोग यात्रा में भाग लिया. लाल झंडे से पूरा इलाका पट गया था.
यात्रा उसके बाद कम्युनस्टि आंदोलन के पुराने इलाके मधुबनी की ओर बढ़ चली. इस इलाके में लाल झंडे के कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर था. दरभंगा-मधुबनी को जोड़ने वाले सकरी में अप्रत्याशित भीड़ उमड़ी. सभा को राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, प्रियंका गांधी, दीपांकर भट्टाचार्य, मुकेश सहनी आदि ने संबोधित किया. कहा एक-एक वोट बचाने की लडाई जारी रहेगी.
जीवछ घाट से 11वें दिन की यात्रा की शुरुआत हुई. जीवछ घाट से गौसा, गंगवारा, भंडार चौक, बागमोड़, शिवधारा, मब्बी, शोभन, कंसी, भटाढ़ी, सिमरी, शास्त्री चौक, बिठोली और अतरबेल होते हुए बेनीबाद में मुजफ्फरपुर जिले में प्रवेश कर गई. एक बार फिर से दरभंगा के प्रमुख नेताओं के अलावा ऐपवा नेत्री रानी शर्मा व शनिचरी देवी, मो. जमालुद्दीन, आरके सहनी, अशोक पासवान आदि नेताओं की अगुआई में भाकपा(माले) और इंडिया गठबंधन के हजारों कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह सड़क किनारे खड़े होकर झंडों, बैनरों और “वोट चोर, गद्दी छोड़” के जोरदार नारों के साथ राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, दीपंकर भट्टाचार्य व अन्य नेताओं का स्वागत किया.
मुजफ्फरपुर में यात्रा जब जीवछ घाट से होते हुए जारंग हाई स्कूल मैदान, गायघाट पहुंची, तो वहां की सभा ने आंदोलन को एक और नई ऊर्जा दी. गायघाट के जारंग हाई स्कूल की सभा को मुख्य नेताओं के अलावा माले के मुजफ्फरपुर जिला सचिव कृष्णमोहन ने भी संबोधित किया. बेनीबाद – केवटसा चौक पर भाकपा(माले) और बागमती बचाओ संघर्ष मोर्चा के नेता जीतेन्द्र यादव, एआइपीएफ व इंसाफ मंच के सूरज कुमार सिंह, आरवाईए नेताओं दीपक कुमार, विवेक कुमार और शफीकुर रहमान ने हजारों समर्थकों के साथ उनका जोरदार स्वागत किया. बोचहां के शर्फुद्दीनपुर, मझौली, गरहां चौक पर माले नेता रामबालक सहनी, रामनंदन पासवान व विन्देश्वर साह के नेतृत्व में सैकडो लोगों ने तथा जीरोमाईल चौक पर वीरेन्द्र पासवान व राजेश साह के नेतृत्व में स्वागत किया गया. औराई विधान सभा क्षेत्र के पितौझिया में भी इंडिया गठबंधन के पूर्व प्रत्याशी और आरवाइए के राष्ट्रीय अध्यक्ष आफताब आलम के नेतृत्व में यात्रा का जोरदार स्वागत हुआ. वोटर अधिकार यात्रा बेनीबाद से बेरुआ, बोचहां, जीरो माइल (मुजफ्फरपुर) और औराई विधान सभा क्षेत्र के पितौझिया चौक, मकसूदपुर, रामपुरहरि से खनवा घाट होते हुए रुन्नीसैदपुर में सीतामढ़ी जिले में प्रवेश कर गई.
यात्रा के रास्ते में भाकपा(माले) और इंडिया गठबंधन के हजारों कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह सड़क किनारे खड़े होकर झंडों, बैनरों और – वोट चोर, गद्दी चोर – के जोरदार नारों के साथ राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, दीपंकर भट्टाचार्य व अन्य नेताओं का स्वागत किया.
वोटर अधिकार यात्रा कोई एक रैली, अभियान या राजनीतिक काफिला मात्र नहीं है. यह एक चेतना है – जो जाति, धर्म, लिंग, वर्ग की सीमाओं को तोड़कर बिहार के गांवों से निकल रही है. यह यात्रा बताती है कि बिहार की जनता अब न केवल जागरूक है, बल्कि संगठित और सजग भी है.
यह आंदोलन उन तमाम लोगों की आवाज है जो अब तक अनसुने रहे. यह यात्रा उन मजदूरों की भी है जिनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया. यह उन महिलाओं की भी है जो रसोइया और आशा बनकर देश की रीढ़ संभालती हैं और फिर भी अपमानित होती हैं. यह उन युवाओं की भी है जो शिक्षा, रोजगार और इज्जत के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं.
स्कीम वर्करों का ज्ञापन
मुंगेर में महिलाओं की भागीदारी विशेष उल्लेखनीय रही. स्कीम वर्कर संगठनों ने स्पष्ट रूप से अपनी आवाजें उठाईं, और राहुल गांधी तथा तेजस्वी यादव को भी अपने-अपने ज्ञापन सौंपे. उनकी सक्रिय भागीदारी पर जब मुंगेर के सिविल सर्जन ने ड्रेस कोड का हवाला देकर धमकाने की कोशिश की और सो-कॉज नोटिस थमा दिया, तब यह मामला महज एक सरकारी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक जन-अधिकार के खिलाफ दमन का प्रतीक बन गया.
बागमती बचाओ संघर्ष मोर्चा का ज्ञापन
बेनीबाद-केवटसा चौक पर बागमती बचाओ संघर्ष मोर्चा के नेता जितेंद्र यादव ने संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और माले महासचिव का. दींपकर भट्टाचार्य को ज्ञापन देकर निर्माणाधीन बागमती तटबंध से होनेवाली तबाही की जानकारी दी और उसको अविलम्ब रुकवाने का अनुरोध किया.
महिला संगठन ऐपवा के द्वारा माईक्रोफाईनेंस कंपनियों की ज्यादती के खिलाफ भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ज्ञापन सौंपा गया. ऐपवा मुजफ्फरपुर जिला सचिव रानी प्रसाद ने मुशहरी में माईक्रोफाईनेंस कंपनियों की ज्यादती से आत्महत्या के शिकार परिवार की महिला भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं.
भागलपुर में सामाजिक न्याय आंदोलन के राज्य संयोजक रिंकू यादव के नेतृत्व में सामाजिक कार्यकर्ताओं – रामानंद पासवान, अर्जुन शर्मा, अभय शंकर दास व अमरकांत जी ने माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य व संतोष सहर को सम्मानित किया.
का. दीपंकर भट्टाचार्य के तल्ख होते सवाल
अररिया में माले महासचिव ने पूछा – 65 लाख विलोपित मतदाताओं में क्या एक भी भाजपा समर्थक नहीं? इलेक्शन कमीशन दरअसल अब इलेक्शन ओमीशन बन गया है. बिहार में सबसे ज्यादा बीएलए भाजपा के ही हैं, और कहा जाता है कि वे काफी सक्रिय भी हैं. फिर यह कैसे संभव है कि अब तक उन्होंने एक भी आपत्ति नहीं दर्ज कराई? भाजपा और जदयू इस पर चुप क्यों हैं? क्या चुनाव आयोग और भाजपा के बीच कोई अंदरूनी सांठगांठ है? आयोग की प्रक्रिया बेहद जटिल, अपारदर्शी और आम जनता के लिए समझ से बाहर है. इस प्रक्रिया में शिकायत दर्ज कर पाना भी बहुत मुश्किल है.
22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने एक गलत तर्क देकर अपनी जवाबदेही राजनीतिक दलों पर डालने की कोशिश की. आयोग ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों के मिलाकर करीब डेढ़ लाख बीएलए हैं – फिर वे क्या कर रहे हैं? जबकि सच्चाई यह है कि मतदाता सूची का सही निर्माण करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, न कि राजनीतिक दलों की. राजनीतिक पार्टियां और नागरिक समाज केवल सहयोगी हो सकते हैं.
चुनाव आयोग माले के बीएलए की संख्या 1500 बता रहा है, जबकि मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, बिहार के डैशबोर्ड पर यह संख्या 2500 दर्ज है. इनमें से लगभग 1000 बीएलए को अब तक पेंडिंग रखे गए हैं. एसआईआर प्रक्रिया को दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन आयोग अभी तक इन बीएलए को मान्यता नहीं दे पाया है. अपना काम तो ठीक से हो नहीं पा रहा, उलटे हम पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है.
भागलपुर में कहा कि बिहार के प्रवासी मजदूरों के नाम काटे जा रहे हैं, भूमिहीन गरीबों और बड़ी तादाद में महिलाओं के नाम काटे जा रहे हैं, और मोदीजी गया आकर बोल कर गए कि ये सब बांग्लादेशी को हटाने के लिए कर रहें हैं. जबकि आज भी मतदाता सूची से काटे गए पूरे 65 लाख नामों में से एक भी बांग्लादेशी का नाम नहीं है. ये पूरे बिहार के चुनाव में, झारखंड की तरह बांग्लादेशी घुसपैठियों का सवाल खड़ा करके, एक हौवा खड़ा करने की कोशिश है.
मधुबनी में कहा कि जो लोग कर्पूरी जी द्वारा लागू किए गए आरक्षण और 90 के दशक में मंडल कमीशन के खिलाफ उन्माद पैदा कर रहे थे, वही लोग आज सत्ता में बैठकर ओबीसी का नाम लेकर सामाजिक न्याय आंदोलन को गुमराह करने में लगे हुए हैं. ऐसी ताकतों से सचेत रहने की जरूरत है. मिथिलांचल से फासीवादी ताकतों का उखाड़ फेंकना है.
मुजफ्फरपुर में उन्होंने बागमती पर बन रहे तटबंध के सवाल को उठाया. कहा कि इलाके के नागरिक इसकी कोई जरूरत नहीं समझते लेकिन लूट के लिए तटबंध बनाने का काम हर साल जारी कर दिया जाता है. दूसरी ओरए इंद्रपुरी जलाशय के निर्माण और नहरों के पक्कीकरण आदि सवालों पर दिल्ली-पटना की सरकार ने चुपी साध रखी है. जल प्रबंधन के मामले में सरकार पूरी तरह असफल रही. उन्होंने कहा कि 20 बरसो के कुशासन के खिलाफ जनता में बदलाव की तीव्र आकांक्षा है.