वर्ष 35 / अंक - 31 / आसमान में सुराख

आसमान में सुराख

आसमान में सुराख

-- इंदिरा जयसिंह, प्रतीक पटनायक

(शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इसलिए हुआ क्योंकि नौजवानों को यकीन था कि इंसाफ के लिए कोई गलत मौसम नहीं होता, कोई ऐसा ‘सही वक्त’ नहीं होता जब जाकर कोई गलती आखिरकार बोलने लायक बनती है.)

‘कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ – दुष्यंत कुमार

उन्होंने एक किताब उठाई और आसमान में सुराख कर दिया.

याद है वो लड़की, मुंबई वाली, जिसने बाहें फैलाकर एक पुलिस की गाड़ी रोक दी थी? याद है जंतर-मंतर वाली वो लड़की, कई दिनों की भूख से दुबली, जिसने भारत का संविधान अपने सिर से ऊपर उठाया था – गुस्से में नहीं, बल्कि जैसे कोई दिया उठाता है.

हफ्तों तक उनसे कहा जाता रहा कि इसे नीचे रखो, इसे तह करके रख दो, घर जाओ और उस मौसम का इंतजार करो जो कभी आता ही नहीं, कानून को अपना काम करने दो. और फिर एक मामूली-सी दोपहर को मंत्री ने इस्तीफा दे दिया, और वो किताब नीचे नहीं आई. वो और ऊपर उठ गई.

ये बात साफ-साफ कहनी चाहिए, क्योंकि हमारी पीढ़ी इस लफ्ज से शरमाने लगी है – ये जीत थी. कोई समझौता नहीं, कोई संभली हुई पीछे हटाई नहीं, कोई इज्जत बचाने की कोशिश नहीं. एक गलती को नाम दिया गया, और जो ताकत अब तक जवाब देने से बचती आई थी, उसने जवाब दिया. ये नौजवानों ने किया, खाली हाथों से – उस लीक हुए क्वेश्चन पेपर के बाद, जिसकी वजह से बीस लाख बच्चों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी, और जिसकी कीमत कुछ बच्चों ने अपनी जान देकर चुकाई, उस मायूसी में जो बाद में आई.

जो लोग जेन-जेड से बड़े हैं और इसे अधूरी क्रांति कहते हैं, उनसे हम बस इतना कहेंगे – तुमने और मैंने कोई क्रांति नहीं की. हमारे बुजुर्गों ने की थी, और हमने उनकी विरासत का फायदा अपनी उंगलियों से फिसलने दिया. और जो लोग इन बच्चों को देखकर बुदबुदाते हैं कि ये इतनी दूर तक नहीं गए, उनसे हम बस इतना कहेंगे – ‘हम भी नहीं गए थे’. आज और कल के बीच की दूरी घड़ी से नहीं नापी जाती. वो नापी जाती है उस छलांग से, जो बिना रस्सी के लगाई जाती है, और उस हिम्मत से, जो डर के पहुंचने से पहले काम कर जाती है. इतिहास बदन बनाते हैं, सिर्फ राय नहीं. उन बदनों ने, जो डंडों के आगे खड़े रहे और भागे नहीं. उन बदनों ने, जो सड़क पर ठंड और बारिश में रातभर जागते रहे. उन बदनों ने, जिन्होंने खाना छोड़ दिया ताकि एक मुल्क को शर्म महसूस हो सके.

जो चुराया गया था, वो कोई मामूली स्कीम या फाॅर्म नहीं था. वो हमारी इज्जत थी, हमारा आत्म-सम्मान था, नौजवानों का ये यकीन कि मेहनत असली होती है और मेहनत की कद्र होती है. हमारा नुकसान सच्चा था – कइयों की नागरिकता शक के घेरे में आ गई, रोजी-रोटी छिन गई – और इन बच्चों ने इन्हीं नुकसानों की बुनियाद पर जीत खड़ी कर दी, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने अपमान को अपनी आवाज की ताकत बना दिया. लेकिन कोई ये गलतफहमी न पाले कि ये जीत किसकी है. ये छात्रों की जीत थी, हमारी नहीं.

जो लोग जेन-जेड से बड़े हैं और इसे अधूरी क्रांति कहते हैं, उनसे हम बस इतना कहेंगे – तुमने और मैंने कोई क्रांति नहीं की. और ये बच्चे यहां अकेले नहीं पहुंचे. हम बड़े-बड़े लोगों के कंधों पर खड़े हैं, और हमें उनका नाम लेना चाहिए. याद है वो दुबला-पतला आदमी जो मुट्टीभर नमक के लिए समंदर तक पैदल चला गया था, और सुबह होते-होते एक साम्राज्य के हाथ में पूरी कानून की किताब रह गई थी, मगर उसकी सच्चाई का बहुत कुछ रात में ही खो चुका था. याद हैं वो छात्रा, जिन्होंने सत्तर के दशक में अपनी क्लासें खाली कर दी थीं, और एक ऐसी सरकार को हिला दिया था जो खुद को अटल समझती थी. याद हैं वो नौजवान, जिन्होंने दिसंबर 2012 की एक रात इंडिया गेट भर दिया था, एक ऐसी लड़की के लिए मोमबत्तियां लिए, जिसे उन्होंने कभी देखा तक नहीं था, और घर तब तक नहीं गए जब तक कानून खुद दोबारा नहीं लिखा गया. हर दशक में, हर चैक पर, उनसे यही कहा गया – ‘वक्त गलत है, तरीका गलत है, घर जाओ और इंतजार करो’. उनकी लड़ाई हमारी लड़ाई थी, उनका अधूरा भविष्य अब हमारा है. यही वो धागा है जो हमें बांधता है, और उसके आगे बाकी कुछ मायने नहीं रखता.

एक ऐसी पीढ़ी, जिसे मुल्क ने बेपरवाह लिखकर अलग रख दिया था, वो हमेशा से सुन रही थी. सुनने में चूक हमसे हुई है.

वाॅशिंगटन के उस मार्च में, डाॅ किंग का लिखा हुआ भाषण फीका पड़ने लगा था, जब तक महालिया जैक्सन ने उनके पीछे से आवाज नहीं लगाई, ‘मार्टिन, उन्हें अपने सपने के बारे में बताओ.’ और उन्होंने कागज एक तरफ रख दिए. ऐसे लम्हे कभी सावधान लोगों से नहीं आते, सिर्फ उस आवाज से आते हैं जो सम्भला हुआ बयान देने से इनकार कर देती है. धोखा खाने के बावजूद, ये पीढ़ी बंदूक की तरफ जा सकती थी. इन्होंने इसकी बजाय मोमबत्ती थामे रखी, और जो गुस्सा इन्हें सराहना सिखाया गया था, उसे ट्रिगर के बजाय संविधान के रास्ते से निकाला. यही वजह है कि दुष्यंत कुमार का वो शेर कई दिनों से हमारे जेहन में अटका हुआ है:

‘कौन कहता है कि आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो.’

ये जीत कोई हवाई बात नहीं थी, और ये मुफ्त भी नहीं मिली. एक मां पहले ही दिन स्टील का टिफिन लेकर आई और फिर कभी वापस नहीं गई, दूसरों के बच्चों को अपने बच्चों की तरह खिलाती रही. याद है अर्जेंटीना की वो ‘लापता के मांएं’, जो अपने गायब बच्चों के लिए चैक के चक्कर लगाती रहीं, जब तक एक पूरा मुल्क आंखें फेरना छोड़ नहीं बैठा? कुछ और लोग एक तस्वीर और एक ऐसा गम लिए आए, जिसे कोई इस्तीफा हल्का नहीं कर सकता. अजनबियों ने प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाया; छात्र पत्थर पर सोए और घंटों संविधान को हाथों-हाथ आगे बढ़ाते रहे, उसे ऐसे गर्म रखते हुए जैसे वो जिंदा हो. और फिर, बीस जुलाई को, अपनी ही संसद की तरफ जाते हुए, संविधान हाथ में लिए, उसी इमारत की तरफ जहां इसे रहना चाहिए, राज्य ने अपना जवाब दिया. उसने मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए ताकि ये इकट्टा न हो सकें. उसने हमारे लोकतंत्र के दिल के आस-पास इंटरनेट काट दिया, जैसे गणराज्य को खुद देखे जाने से शर्म आ रही हो. उसने निहत्थे नौजवानों के सिरों पर लाठियां बरसाईं, उनके बदन में आंसू गैस दागी, बिना नाम की वर्दी वाले सादे कपड़ों के आदमी भीड़ में भेजे, और भूख हड़ताल पर बैठे लोगों को जमीन से घसीटा, हिरासत में लिए गए लोगों को बसों में ठूंसा. मुल्क ने ये सब देखा.

ये नौजवान एक अजनबी के लिए बाहर निकले थे, एक ऐसे लड़के या लड़की के लिए जो अभी पैदा भी नहीं हुआ, जो एक दिन कोई परीक्षा देगा. ये इसलिए निकले ताकि ये सिलसिला इन्हीं पर खत्म हो जाए, ताकि किसी और छात्रा को एक ईमानदार सुबह की भीख मांगने के लिए डंडों की बौछार में न भागना पड़े.

और अब एक कड़वी सच्चाई, क्योंकि ईमानदारी से जश्न मनाने का मतलब है संतुष्ट होने से इनकार करना. इतिहास आखिर में मार्च को याद नहीं रखता. वो उस कानून को याद रखता है जो मार्च ने बनवाया. 1963 का वाॅशिंगटन सिर्फ ‘सपने’ की वजह से याद नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि वो सपना ‘सिविल राइट्स एक्ट’ बनकर सामने आया. और हमारे पास अपना सबूत भी है, अपने घर में ही. दिसंबर 2012 के बाद का गम और गुस्सा उस फौजदारी कानून में बदला जो बाद में आया. दिल्ली की सरहदों पर बैठे किसानों का एक साल, उन्हीं कानूनों की वापसी में बदल गया जिनका वो विरोध करने आए थे. और हमारा मुल्क आज भी अपने खुद के ‘सिविल राइट्स एक्ट’ का इंतजार कर रहा है – एक समानता और भेदभाव-विरोधी कानून – जो संविधान के दिए वादे में जान और लहू भर सके.

हमारा मुल्क आज भी अपने खुद के ‘सिविल राइट्स एक्ट’ का इंतजार कर रहा है – एक समानता और भेदभाव-विरोधी कानून – जो संविधान के दिए वादे में जान और लहू भर सके. तो, हम अधूरे काम का नाम लेते हैं, तीन कर्ज, और उन्हें साफ-साफ नाम लेकर बताते हैं.

पहला है परीक्षा. इतने बड़े पैमाने की लीक कोई बदकस्मिती नहीं होती, ये एक सिस्टम है, और जो एजेंसी लाखों लोगों के भविष्य की सरपरस्ती करती है, उसे उनके भरोसे को दफ्तरी कागजी काम की तरह बरतने की इजाजत नहीं दी जा सकती. परीक्षा की साख को कानूनन लागू होने वाला फर्ज बनाना होगा, और उन बीस लाख बच्चों के लिए, जो दोबारा अपनी सीट पर भेजे गए, और उन घरों के लिए, जिनके बच्चे वापस अपनी सीट तक नहीं लौट सके - एक सच्चा, नाम लेकर होने वाला हिसाब होना चाहिए.

दूसरा है पुलिस. बीस जुलाई को जो हुआ, वो व्यवस्था बनाए रखना नहीं था, बल्कि उसका उल्टा था. एक निहत्थे छात्र की खोपड़ी पर पड़ा डंडा कोई नियम-कायदे की कार्रवाई नहीं है. वो सोच की, बोली की, नजर और चाल की जगह पर वार है, विकलांगता या मौत का दरवाजा. किसी बदन में दागा गया आंसू गैस का गोला भीड़ को काबू करना नहीं है. बिना नाम-पट्टी वाले सादे कपड़ों का आदमी कानून का अफसर नहीं, उसकी नकल है.

और अब तक राज्य ने वो स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर पेश नहीं किया, जिसे अदालतें 2018 से बार-बार मांगती आई हैं, और हमें ये पूछने का पूरा हक है कि खुद अदालतों ने कैसा मौन व्रत ले लिया है, या वीडियो देखने की फुरसत तक नहीं निकाल पाईं. कोई प्रक्रिया नहीं है. सिर्फ विवेकाधिकार है, और जो विवेकाधिकार अप्रकाशित और बेजवाबदेह हो, वो सिर्फ ऐसी ताकत है जो खुद तय करती है किसे बख्शना है और किसे सलाखों के पीछे डालना है. उस दिन जिस भी अफसर ने हाथ उठाया, उसका नाम आना चाहिए; जिसका नाम नहीं आ सकता, वो हेलमेट पहने हुए एक इकबाल-ए-जुर्म है.

तीसरा कर्ज हमारे सबसे करीब है, और सबसे मुश्किल भी, क्योंकि वो हमारा अपना है. हम काले-सफेद कपड़े पहनते हैं. हम उन्हीं अदालतों के अफसर हैं, जिन्हें अब हमें कटघरे में खड़ा करना है. एक मंत्री से जवाबदेही मांगना बेमानी है, जब हम खुद को चुप्पी की छूट देते रहें. जब किसी हक की बहाली के लिए इतना लंबा इंतजार करना पड़े कि सुनवाई शुरू होने से पहले ही प्रदर्शन खत्म हो जाए, तो इंसाफ नहीं हुआ, वो बस थका दिया गया. जिस अदालत के पास सबके लिए वक्त हो, सिवाय उस नागरिक के जो बैरिकेड पर खड़ा है, वो भूल चुकी है कि वो किसलिए है. जज इंसाफ के सेवक हैं, उसके मालिक नहीं. या तो दो, या रास्ता छोड़ो. हमने भुलाने की कीमत देखी है. जामिया के छात्रों की वो तस्वीरें, जो अपनी ही लाइब्रेरी में भागते हुए मेजों के नीचे दुबक गए थे जब पुलिस अंदर घुसी, आज भी हमें सताती हैं. बरसों बीत गए. कानून आज भी अपना काम कर रहा है, एक भी अफसर को जवाबदेह नहीं ठहराया गया, और मामला आज भी अदालतों में पड़ा है.

और यहां हमें अपने बारे में भी एक बात कहनी होगी, हम सब जो इन संस्थाओं से मोहब्बत करते हैं और उस मोहब्बत को वफादारी समझ बैठते हैं. कोई संस्था इमारत नहीं होती, और न ही कोई वर्दी. वो एक वादा है, अमानत में रखा हुआ, और हम उसके अमानतदार हैं, मालिक कभी नहीं. किसी चीज की हिफाजत करने का मतलब उसे आलोचना से बचाना नहीं है. इसका मतलब है उसे उसी कसौटी पर रखना, जिसने उसे हिफाजत के लायक बनाया था. वो वकील जो अदालत से सवाल नहीं करेगा, वो नागरिक जो राज्य से सवाल नहीं करेगा, वो बुजुर्ग जो सिर्फ सब्र की सलाह देगा – ये हमारी संस्थाओं के रखवाले नहीं हैं. यही वजह है कि नौजवानों को इन संस्थाओं को दरकिनार करके सड़क पर उतरना पड़ा. रखवाली का मतलब चौकसी है, फरमाबरदारी नहीं.

इस पीढ़ी के पास एक मार्चिंग गीत है, जो ‘लक्ष्य’ फिल्म से आया है, जिसके ढोल धीरे-धीरे उठते हैं, एक कंधा दूसरे कंधे से मिलता है जब तक पूरी कतार एक बदन की तरह नहीं चलने लगती. यही हमने जंतर-मंतर पर सुना, नारों के नीचे, एक ऐसी लय जो हम सबसे पुरानी है, वो आवाज जो कोई कौम तब निकालती है जब वो उम्मीद रखने की इजाजत मांगना छोड़ देती है. ये इतनी धीमी शुरू होती है कि छूट जाए, और खत्म होती है डर के उन काले बादलों को छांटते हुए जो हमारे सिर पर मंडराते हैं. आसमान में अब सुराख है, रोशनी उसमें से छन रही है, और उस चौक में खड़े हर इंसान ने उसे बनाया है. लेकिन आसमान का सुराख अपने-आप खुला नहीं रहता. अगर कोई उस पर नजर न रखे, तो वो चुपचाप बंद हो जाता है. उसे खुला रखने का तरीका है – एक इस्तीफे को कानून में बदलना, और हिम्मत के एक मौसम को इस स्थायी उम्मीद में बदलना कि जब जनता पूछेगी, ताकत जवाब देगी.

क्योंकि कर्ज कभी पूरा नहीं चुकता, और नौजवानों को ये मालूम है. फैज ने उन्हें उनका तराना दिया, और वो सब कुछ मांगता है:

‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, एक बाग नहीं, एक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.’

डाॅ. किंग ने जेल की कोठरी से लिखा था कि सही काम करने का वक्त हमेशा पका होता है, और नौजवानों ने इस बात पर यकीन किया, जब उनसे बड़ा शायद ही कोई करता था. उन्हें यकीन था कि इंसाफ का कोई गलत मौसम नहीं होता, कोई ऐसा ‘सही वक्त’ नहीं होता जब जाकर कोई गलती आखिरकार बोलने लायक बनती है.
उन्होंने आसमान खोला और बदले में कुछ नहीं मांगा. कहीं कोई बच्चा, जो अभी पैदा भी नहीं हुआ, एक दिन एक ईमानदार सुबह किसी परीक्षा हाॅल में दाखिल होगा, उस आसमान के नीचे जिसे इन नौजवानों ने बरसों पहले फाड़ा था, और उसे कभी मालूम नहीं होगा कि वो किसकी बरसात थी जो गिरी, ताकि वो कमरा सूखा रह सके.

ये तूफान में इसलिए खड़े रहे ताकि बाद में आने वालों को बस बारिश से अंदर आना भर पड़े.

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01 August, 2026