का. दीपंकर भट्टाचार्य से उर्मिलेश की बातचीत का संपादित अंश
( वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से बातचीत में भाकपा(माले) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने एसआइआर और चुनाव आयोग के खिलाफ जारी आंदोलन, ‘रिजीम चेंज’ और नेहा बोरा को लेकर गढ़े गए नैरेटिव, डीलिमिटेशन की चर्चा, इंडिया गठबंधन और डीएमके के रिश्तों तथा आगामी विधानसभा चुनावों पर अपनी बात रखी. )
उर्मिलेश: पहला सवाल. एसआइआर और चुनावी धांधली को लेकर ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के प्रति राजनीतिक दलों तथा जनता के बड़े हिस्से में नाराजगी है. 2 अक्टूबर से दिल्ली में बड़े पैमाने पर शुरू हुआ यह प्रदर्शन मुंबई और अन्य जगहों तक पहुंचा है. इस प्रदर्शन और इस पर सरकार, ब्यूरोक्रेसी, पुलिस तथा जनता की प्रतिक्रिया का आप कैसे आकलन करते हैं?
दीपंकर भट्टाचार्य: आपने सही कहा कि 2 अक्टूबर के बाद एक तरह से नया दौर शुरू हुआ है. लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं, सिर्फ दिल्ली में नहीं, बल्कि पूरे देश में. इंडिया गठबंधन का आह्वान तो 2 से 8 अक्टूबर तक, यानी एक सप्ताह के लिए था. इससे पहले वामपंथी पार्टियों ने भी 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक अलग से प्रदर्शन का आह्वान किया था. एक तरह से इस समय पूरे देश में जबरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि एसआइआर को लेकर पहले जो नाराजगी थी, वह अलग-अलग राज्यों तक सीमित थी. बिहार में बिहार को लेकर और बंगाल में बंगाल को लेकर नाराजगी थी. अब लोगों को इसका राष्ट्रीय स्वरूप समझ में आ गया है.
इस आंदोलन से दबाव तो बना है. चुनाव आयोग फिलहाल पूरी तरह बैकफुट पर है, बचाव की मुद्रा में है. वह लगातार जो सर्कुलर जारी कर रहा है, उन्हें हमने कबूलनामा कहा है. धीरे-धीरे वह अपने सारे अपराध कबूल कर रहा है. तो पहली बात यह है कि चुनाव आयोग पर दबाव बना है. दूसरी बात, हमें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को भी यह बात समझ में आएगी. इसीलिए कोर्ट ने भी फाॅर्म-6 को लेकर बात की. मेरे ख्याल से संस्थागत स्तर पर माहौल थोड़ा बदला है. चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, दोनों को यह बात समझ में आ रही है कि यह सब ऐसे नहीं चल सकता. यह पहली बात है और इस आंदोलन की एक उपलब्धि भी है.
दूसरी बात यह है कि इस आंदोलन का लोकप्रिय नारा था, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’. वोट चोरी एक तरह से स्थापित हो रही है और लोग इसे समझ रहे हैं. तो जाहिर है कि इसका अगला कदम भी होगा. जिस तरह से बीजेपी ज्ञानेश कुमार का बचाव कर रही है, ज्ञानेश कुमार खुद जवाब नहीं देते, लेकिन बीजेपी और पूरी सरकार जिस तरह से इस पूरे प्रदर्शन को लेकर सक्रिय हैं, उससे स्थिति साफ है. बात शुरू हुई थी वोट देने के अधिकार से, लेकिन अब बात विरोध प्रदर्शन के अधिकार तक पहुंच गई है. बात जंतर-मंतर और तिरंगे झंडे तक पहुंच गई है. एक तरह से लग रहा है कि सरकार आर-पार के मूड में है और किसी भी कीमत पर इस प्रदर्शन को चलने नहीं देना चाहती. यह हमारे सामने एक नए दौर की शुरुआत है.
इस नए दौर में अच्छी बात यह है कि इंडिया गठबंधन के सभी दल एक साथ सड़क पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं. मेरे ख्याल से इससे पहले आपने इस तरह किसी आंदोलन में सबको एक साथ चलते हुए नहीं देखा होगा. यह अच्छी बात है. इस पूरे आंदोलन को लेकर सिविल सोसाइटी और इंडिया गठबंधन के बीच पहले से बेहतर तालमेल है.
तीसरी बात यह है कि जंतर-मंतर 1.0, यानी धर्मेंद्र प्रधान के समय हुए आंदोलन को लेकर लोगों को लग रहा था कि पेपर लीक के खिलाफ जो जेन-जी है, वह सिर्फ उसी मुद्दे तक सीमित रहेगी. या फिर शिक्षा, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के अलावा लोकतंत्र के दूसरे मुद्दों पर भी उसकी संवेदना होगी और वह उन आंदोलनों में भी शामिल होगी? मेरे ख्याल से जो लोग इसका इंतजार कर रहे थे और देखना चाहते थे, उन्हें इस बार जवाब मिल गया है. चाहे काॅकरोच जनता पार्टी कहिए या आइसा और एसएफआई जैसे छात्रा संगठन, जेन-जी की भी इस आंदोलन में बड़ी भागीदारी है. यह आंदोलन में नई ऊर्जा, नया तेवर और नए दायरे में जनभागीदारी की अच्छी मिसाल है.
मेरे ख्याल से यह आंदोलन अभी लंबा चलेगा. बीजेपी की पूरी कोशिश है कि हम लोगों को कहीं इकट्टा ही न होने दिया जाए. कोई धरने पर न बैठ सके और कोई जुलूस न निकाल सके. आप देख रहे हैं कि पुलिस बहुत ही बर्बर तरीके से पेश आ रही है. पुलिस अकेले नहीं, बल्कि आजकल वर्दीधारी पुलिस भी वर्दीधारी गुंडों की तरह बर्ताव करती है. कुछ लोग सचमुच गुंडे भी हैं, जो कभी पुलिस की वर्दी पहनकर आते हैं और कभी सिविल ड्रेस में. पुलिस और सत्ता-प्रायोजित, सत्ता-संरक्षित गुंडों की यह फौज, दोनों सक्रिय हैं. यह सब लोग देख रहे हैं.
इसका दायरा इतना बड़ा है कि यह सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. पत्रकारों और वकीलों पर हमले हो रहे हैं, महिलाओं पर बर्बर तरीके से हमले किए जा रहे हैं. जिस तरह से हिरासत में लेने के नाम पर कार्रवाई हो रही है, उसे अब उन्होंने ही किडनैपिंग कहा है. अगर आप किसी को हिरासत में लेते हैं, तो उसका कारण बताएंगे, समय बताएंगे, यह बताएंगे कि कहां ले जा रहे हैं और कितनी देर तक हिरासत में रखेंगे. लेकिन आप किसी को बिना बताए गाड़ी में बैठाकर कहीं ले जाएं, यह भी न बताएं कि कहां ले गए, तो वह हिरासत नहीं, अपहरण है. हिरासत के नाम पर यह अपहरण और लोगों को डराने की कोशिश है.
एक तरह से दमन का उनका तरीका पहले से ज्यादा व्यापक हो गया है. अभी तक बहुत गोलीबारी नहीं हुई है, लेकिन दमन बेहद क्रूर और हिंसक है.
दूसरी बात यह है कि जंतर-मंतर 1.0 के समय गोदी मीडिया उस आंदोलन को नजरअंदाज कर रही थी और सरकार के पास भी कोई खास जवाब नहीं था. इस बार गोदी मीडिया को पूरी तरह लगा दिया गया है और सरकार भी जवाबी नैरेटिव बनाने में जुट गई है. आप देख रहे हैं कि किस तरह इस आंदोलन को लेकर ‘एनर्जी फैलाने’, ‘रिजीम चेंज’ जैसी बातें कही जा रही हैं. बीजेपी अब एसआइआर पर बात नहीं कर रही है. ‘वोट चोर’ के नारे से ध्यान हटाकर अब वह ‘गद्दी छोड़’ को संबोधित कर रही है. इस तरह नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हो रही है.
तीसरी बात, मैं देख रहा हूं कि उनकी ओर से जवाबी लामबंदी की भी कोशिश हो रही है. जहां भी प्रदर्शन होता है, वहां वे अपने 50-100 लोगों को भी भेज देते हैं. आपने तिरंगे झंडे वाले घटनाक्रम के दौरान भी देखा होगा कि उनके लोग लगातार आते-जाते रहते हैं. शायद उनकी कोशिश होगी कि किसी तरह लोगों को भड़काया जाए या कोई ऐसी घटना हो जाए, जिससे वे अराजकता का आरोप लगा सकें. लेकिन अभी तक लोगों को ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा है. लोग देख रहे हैं कि आंदोलन शांतिपूर्ण है.
2 अक्टूबर को तो आपने भी शायद पहले कभी ऐसा नजारा नहीं देखा होगा. गांधी जयंती के दिन लोग इस तरह सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे थे कि गांधी जयंती ही प्रदर्शन का दिन बन गई. ऐसा पहली बार हुआ.
लेकिन बीजेपी की पूरी कोशिश है कि जैसे शाहीन बाग आंदोलन के दौरान ‘गोली मारो’ का नारा देकर, सचमुच गोली चलवाकर और दंगा कराकर उसने स्थिति बनाई थी, वैसा ही कुछ किया जाए. मेरे ख्याल से बीजेपी ऐसे किसी षड्यंत्र की तलाश में है, जिससे कोई अराजकता पैदा की जा सके. इसीलिए हम लोगों को थोड़ा और सतर्क रहना होगा.
यह एक बड़ा, शांतिपूर्ण जन आंदोलन है. इंडिया गठबंधन की 12 तारीख को हुई बैठक के बाद, 13 तारीख को भी हम लोग मिले थे. वहां भी यही तय हुआ कि बिना थके, बिना रुके और बिना झुके इस आंदोलन को जारी रखना है और इसकी गति बनाए रखनी है. एक नवंबर को मैदान में कोई बड़ा कार्यक्रम होगा. एसआइआर के खिलाफ पूरे देश के लोग एक साथ आए हैं. 23 अक्टूबर से भी कुछ और कार्यक्रम हैं. यह आंदोलन जारी रहेगा.
उर्मिलेश: एक नवंबर को रामलीला मैदान में होने वाला कार्यक्रम पूरे इंडिया ब्लाॅक का है या सिर्फ कांग्रेस पार्टी का?
दीपंकर भट्टाचार्य: नहीं, वह इंडिया ब्लाॅक का ही कार्यक्रम तय हुआ था. मेरे ख्याल से उसकी लाॅजिस्टिक्स, बुकिंग वगैरह में कांग्रेस ने पहल की है. दूसरा, कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर अभी चर्चा नहीं हुई है. एक चर्चा यह भी हो रही थी कि वहां संसद की तरह अलग-अलग राज्यों में जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, वे लोग आएं. जिस महाभियोग प्रस्ताव को इन्होंने संसद में दबाकर रखा है, उसे जनता की अदालत, यानी जनता की संसद में पेश किया जाए और वहां पारित किया जाए. हो सकता है कि हम लोग कार्यक्रम इसी रूप में भी करें. इस पर चर्चा चल रही है.
इंडिया ब्लाॅक के राजनीतिक दल कमोबेश एकजुट हैं. डीएमके को छोड़कर, जो तमिलनाडु के चुनावों के बाद से अलग हो गई है. लेकिन इस मुद्दे पर वह अलग नहीं है.
उर्मिलेश: काॅकरोच जनता पार्टी ने नीट के मामले में पहल की थी और अभी के आंदोलन में भी उसकी बड़ी भूमिका है. इंडिया ब्लाॅक की तरफ से उन्हें साथ जुड़ने का प्रस्ताव भी आया, लेकिन वे एक दूरी बनाए रखते हैं. क्या इसमें कोई वैचारिक या संगठनात्मक समस्या है?
दीपंकर भट्टाचार्य: यह तो वे लोग ही बता पाएंगे, लेकिन एक बात साफ है. देखिए, काॅकरोच जनता पार्टी, नाम भले ही पार्टी हो, लेकिन वह कोई पार्टी तो है नहीं. जहां तक इंडिया गठबंधन का सवाल है, वह राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन है. काॅकरोच जनता पार्टी के नेताओं को मैंने जहां तक सुना है, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि हम एक आंदोलन हैं, यानी यह एक विरोध आंदोलन है. ठीक है. जो आंदोलन पेपर लीक से शुरू हुआ था, वह अब वोट चोरी के खिलाफ भी आगे बढ़ा है.
काॅकरोच जनता पार्टी के व्यक्तिगत नेता आगे चलकर राजनीति में आ सकते हैं. मेरा मतलब चुनावी राजनीति से है. अभी वे जो कर रहे हैं, वह भी राजनीति है, लेकिन जिसे चुनावी राजनीति या किसी पार्टी की राजनीति कहते हैं, उसमें भी वे आगे चलकर आ सकते हैं. लेकिन वह भविष्य की बात है.
फिलहाल हम इसे इस रूप में देख रहे हैं कि शायद उनके लिए इंडिया गठबंधन में शामिल होना संभव भी नहीं है, क्योंकि वे कोई राजनीतिक पार्टी नहीं हैं. लेकिन इस खास मुद्दे पर इंडिया गठबंधन का रुख यही है कि हम सब मिलकर लड़ें. इसीलिए आपने देखा होगा कि उस दिन प्रशांत भूषण भी वहां थे. नेहा भी थीं. नेहा तो हमारी पार्टी से भी जुड़ी हैं और पार्टी की ओर से भी वहां हो सकती थीं, लेकिन उस दिन वह एक छात्रा आंदोलन की नेता के रूप में ही वहां मौजूद थीं.
जिस तरह नेहा वहां थीं, उसी तरह काॅकरोच जनता पार्टी का कोई नेता भी वहां आ सकता है. मेरे ख्याल से कोई आएगा तो उसका स्वागत होगा, लेकिन यह फैसला उन्हें ही लेना है.
फिलहाल आप देख रहे हैं कि जब आशुतोष रंका और सौरभ दास को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराते हुए पुलिस ने उठा लिया, तो राहुल गांधी ने इस पर टिप्पणी की और विरोध जताया. काॅकरोच जनता पार्टी ने भी इसके लिए धन्यवाद दिया. फिलहाल सोशल मीडिया पर जो संकेत दिख रहे हैं, उनसे लगता है कि पहले जो दूरी थी या एक-दूसरे को लेकर कहीं कोई दुर्भावना थी, वह कम हो रही है. एक-दूसरे के करीब आने की प्रक्रिया दिखाई दे रही है. मैं इसे अभी बहुत शुरुआती चरण की प्रक्रिया कहूंगा.
उर्मिलेश: मैंने यह सवाल इसलिए पूछा कि वे एसआइआर और ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर आपके साथ हैं, लेकिन जब इंडिया ब्लाॅक के दल कहते हैं कि अगले चुनाव में सरकार बदलनी है, तो वे इस मुद्दे पर दूरी बनाते हैं. उन्होंने हाल में कहा है कि वे सरकार बदलने की राजनीति में शामिल नहीं हैं.
दीपंकर भट्टाचार्य: मुझे यह एक तकनीकी बयान लगता है. अभी ‘रिजीम चेंज’ को लेकर लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि हो सकता है यह भी उसी संदर्भ में दिया गया तकनीकी बयान हो.
क्योंकि जब वोट चोरी हो रही है, तो लोगों ने कहा, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’. इसका मतलब है कि जो सरकार सत्ता में है, उसे बदलना है. मेरे ख्याल से जंतर-मंतर पर भी वे पहले यह बात कह चुके हैं. उस समय धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ था, तब भी वे खुद यह बात कह चुके हैं.
तो मेरे ख्याल से यह कहना कि हम सरकार के पक्ष में हैं, बस हमें ज्ञानेश कुमार से दिक्कत है, क्योंकि ज्ञानेश कुमार भी सरकार के प्रतिनिधि हैं, कोई बड़ी बात नहीं है. मैं इसे उनका कोई वैचारिक या रणनीतिक रुख नहीं मानता. वह उनका एक बयान है.
हमने भी कहा है कि हम सब चुनाव आयोग से सवाल पूछ रहे हैं. चुनाव आयोग जवाब नहीं देता, तो बीजेपी वाले जवाब देने के लिए क्यों आ जाते हैं? यह जो आंदोलन सरकार के खिलाफ जा रहा है, उसके लिए सरकार खुद जिम्मेदार है. अगर आप चुनाव आयोग और एसआइआर के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन होने देते, तो बात ज्ञानेश कुमार पर ज्यादा केंद्रित रहती.
आपने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की जगह ही नहीं दी. अगर वहां धरना चलता और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होता, तो बात वहीं तक सीमित रहती. लेकिन आपने ऐसा होने ही नहीं दिया. जाहिर है कि जब आप लोगों को प्रदर्शन नहीं करने देंगे, तो वे मोदी के खिलाफ भी बोलेंगे और सरकार के खिलाफ भी. तब उसमें और मुद्दे भी शामिल होंगे.
जैसा हमने कहा, बात वोट देने के अधिकार से विरोध प्रदर्शन के अधिकार तक पहुंच गई. तिरंगे का मुद्दा भी इसमें शामिल हो गया. इन सबके लिए भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार खुद जिम्मेदार हैं. उन्होंने यह स्थिति पैदा की है और वे डरे हुए हैं. वे डरे हुए हैं और इसीलिए अब अपने बचाव में ये सब कर रहे हैं.
उर्मिलेश: पिछले तीन-चार दिनों से दो जुमले विवाद का विषय बने हुए हैं, जिनके जरिए सत्ताधारी पार्टी और गोदी मीडिया ने नैरेटिव बनाने की कोशिश की. पहला है ‘रिजीम चेंज’ और दूसरा नेहा बोरा का बांग्लादेश के सोशलिस्ट छात्र संगठन के सम्मेलन में भेजा गया संदेश, जिसमें उन्होंने ‘इंस्पिरेशन’ शब्द का इस्तेमाल किया. इन मुद्दों पर इंडिया ब्लाॅक की ओर से एक सुर में बात नहीं आई. मेरे ख्याल से 12 अक्टूबर के बाद दबाव में यह नैरेटिव बनाया गया. आप इन्हें कैसे देखते हैं?
दीपंकर भट्टाचार्य: देखिए, बांग्लादेश वाली बात पर आपको जानकारी सही है कि वह बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट फ्रंट नामक संगठन का सम्मेलन था. किसी संगठन के सम्मेलन में आप जो संदेश भेजते हैं, वह शायद लिखित या वीडियो संदेश रहा होगा. मुझे नहीं मालूम, लेकिन हो सकता है कि वीडियो संदेश ही रहा हो.
ऐसे मौकों पर एक-दूसरे के प्रति समर्थन जताना बहुत स्वाभाविक है. इस तरह के सभी संगठन अंतरराष्ट्रीय छात्रा आंदोलन का हिस्सा हैं. हम ऐसी बात किसी अमेरिकी छात्रा संगठन के लिए भी कहेंगे और किसी दूसरे देश के छात्र संगठन के लिए भी कहेंगे. मेरे ख्याल से यह बहुत सामान्य बात है.
बांग्लादेश में जुलाई का जो व्यापक जनउभार हुआ था, उसमें नेहा ने बुनियादपरस्ती और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष की भी बात की. बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, यानी हिंदुओं, के अधिकारों के लिए वहां के समाजवादियों ने अपने देश में जो भूमिका निभाई और धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में, बुनियादपरस्ती के खिलाफ जो संघर्ष किया, उसकी भी उन्होंने सराहना की. यह स्वाभाविक है और हम लोग भी यहां ऐसा करते हैं.
इसलिए उस संदेश को संदर्भ से काटकर यह कहना कि बांग्लादेश से प्रेरणा लेकर वे भारत को भी बांग्लादेश बनाना चाहते हैं, बिल्कुल बेकार की बात है.
जहां तक ‘रिजीम चेंज’ का सवाल है, मैं भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि अमेरिका ने जब से ‘रिजीम चेंज’ का धंधा शुरू किया है, तब से इस शब्द का एक अलग अर्थ बन गया है. अमेरिका ने कहां-कहां रिजीम चेंज किया है? वह वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाकर ले जाता है, उनका अपहरण करता है. ईरान में वह बाकायदा यह कहते हुए युद्ध शुरू करता है कि हमें रिजीम चेंज करना है.
इसलिए लोग ‘रिजीम चेंज’ को इस रूप में समझते हैं कि बाहर से, खासकर अमेरिका, अपने हितों में कब्जा जमाने के लिए पूरी सत्ता-व्यवस्था को बदलने की साजिश रच रहा है.
जबकि हम जो बात कह रहे हैं, वह बहुत पुरानी है. भारत जैसे देश में, जहां ‘इंकलाब जिंदाबाद’ सबसे पुराने और आज भी सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने वाले नारों में से एक है, वहां हम हमेशा से किसी न किसी रूप में इंकलाब की बात करते रहे हैं. इस देश में सत्ता परिवर्तन से लेकर व्यवस्था परिवर्तन तक की बात होती रही है. समाजवादी हों, वामपंथी हों या कोई और, सभी ने सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की बात की है. संपूर्ण क्रांति की बात भी हुई है.
हम इससे बड़ी बात क्या करेंगे? ये तो हमारी मुख्यधारा की राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा हैं. आज ये लोग कह दें कि जेपी गलत थे और उन्होंने संपूर्ण क्रांति की बात करके गलती की थी. संपूर्ण क्रांति का मतलब क्या है? इसमें राजनीतिक परिवर्तन से लेकर सामाजिक परिवर्तन तक, हर स्तर पर बड़े बदलाव की बात होती है.
मेरे ख्याल से हमारे पास सत्ता परिवर्तन, व्यवस्था परिवर्तन और संपूर्ण क्रांति जैसे शब्द हैं. हम हमेशा ‘गद्दी छोड़’ का नारा भी देते हैं. किसी सरकार को सत्ता से हटाना बहुत स्वाभाविक और सामान्य बात है.
अब ‘रिजीम चेंज’ शब्द लाकर इसे ऐसा बनाने की कोशिश की जा रही है, मानो यह किसी अमेरिकी साजिश का हिस्सा हो. जबकि जहां-जहां अमेरिकी साजिशें चली हैं, क्या भारत सरकार ने उनका विरोध किया है? ईरान पर जब रिजीम चेंज के नाम पर युद्ध शुरू हुआ, तब तो भारत को उसका विरोध करना चाहिए था. अगर आप सचमुच रिजीम चेंज के खिलाफ हैं, तो आपको उस कार्रवाई का विरोध करना चाहिए था.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण हुआ, तब आपने क्या किया? आपने उसका विरोध नहीं किया. मादुरो का अपहरण करते समय जो रिजीम चेंज की बात थी, वह एक साम्राज्यवादी परियोजना और अभियान का हिस्सा थी.
इसलिए लोगों को ‘रिजीम चेंज’ शब्द को लेकर शक है, संदेह है. अब वे इस शब्द का हिंदी में अनुवाद करके और उसकी व्याख्या करते हुए कहेंगे, ‘भाई, ये सरकार को हटाना चाहते हैं.’ लोग कहेंगे कि इसमें गलत क्या है, सरकार को तो हटाना ही चाहिए.
अगर इसका हिंदी में अनुवाद करके लोगों को बताया जाए कि हम पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि हम भी सरकार को हटाना चाहते हैं, तो हमारा जवाब है कि बिल्कुल चाहते हैं, बिल्कुल चाहते हैं. जनता भी यही चाहती थी. 2024 के चुनाव का परिणाम देखिए. ‘400 पार’ का नारा लगाने वालों को जनता 240 पर ले आई. जनता तो यही चाहती थी.
इसलिए हमें लगता है कि इस शब्द का हिंदी में अनुवाद करके लोगों को बताना चाहिए कि ‘रिजीम चेंज’ का इस्तेमाल करके उन्हें लगता है कि वे हमें गुमराह कर लेंगे. लेकिन अभी तक लोग समझ रहे हैं कि वे अपने बचाव में चालाकी कर रहे हैं. कोई न कोई नया जुमला लाया जा रहा है. ‘रिजीम चेंज’ उनके लिए नया जुमला है, लेकिन इससे काम नहीं चलेगा. यह बिल्कुल जुमला है. इसीलिए मैंने ‘जुमला’ शब्द का इस्तेमाल किया था.
उर्मिलेश: इससे साफ है कि मौजूदा सरकार मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है. संसद के विशेष सत्र की बात हो रही है. डीलिमिटेशन को लेकर नई चर्चा छिड़ गई है कि जो काम वे पिछली बार नहीं कर पाए, वह इस बार कर देंगे. केंद्रीय मंत्री मेघवाल और बीजेपी के कुछ अन्य नेताओं ने डीएमके से बातचीत की बात ऑन रिकाॅर्ड कही है. डीएमके की ओर से यह बयान नहीं आया कि बीजेपी के साथ सहमति हो गई है. वे कहते हैं कि विकल्प खुले रखे हैं.
लेकिन वे एसआइआर और ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर इंडिया ब्लाॅक के साथ हैं, हालांकि तमिलनाडु चुनाव के बाद से वे इंडिया ब्लाॅक की किसी बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं. क्या डीलिमिटेशन के जरिए सरकार वाकई ध्यान भटकाने में सफल हो जाएगी?
दीपंकर भट्टाचार्य: देखिए, ध्यान भटकाने की कोशिश तो वे हमेशा करते हैं. वोट चोरी बहुत ही गंभीर मुद्दा है. ज्ञानेश कुमार और 2023 के कानून के जरिए ही इनकी सरकार बनी है और चल रही है. लोगों ने कहा है कि राजा की जान तोते में है. अब वह तोता पकड़ में आ गया है. इसलिए किसी भी तरह इस मुद्दे से ध्यान भटकाना जरूरी है. कोई दूसरा मुद्दा ले आइए, कोई नया एजेंडा सामने रख दीजिए, ताकि वोट चोरी की बात पीछे छूट जाए. इसीलिए वे दुनिया भर की बातें कर रहे हैं.
जहां तक डीलिमिटेशन का सवाल है, मुझे नहीं लगता कि उन्हें अभी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि उनके पास जरूरी संख्या भी नहीं है. लेकिन उनकी कोशिशें जारी हैं. मुझे जो सुनाई पड़ रहा है, उसके मुताबिक चर्चा जोरों पर है कि सांसदों को पैसे के ऑफर दिए जा रहे हैं. किस कीमत पर कौन अपना वोट देगा, इसे लेकर करोड़ों के ऑफर चल रहे हैं और पूरा बाजार गर्म है.
दूसरी बात यह है कि बहुत सारे सांसदों को निलंबित करके ऐसे सदन में प्रस्ताव पारित करा दिया जाए, जहां उन्हें दो-तिहाई बहुमत मिल जाए. सदन को छोटा कर दिया जाए. कायदे से डीलिमिटेशन के तहत सदन का आकार बढ़ाया जाना चाहिए. लेकिन सदन का आकार बढ़ाने के लिए उनके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है. इसलिए चर्चा यह भी है कि सदन को छोटा करके इसी तरह अपना दो-तिहाई बहुमत तैयार कर लिया जाए.
इस समय इस तरह की तमाम चर्चाएं चल रही हैं. बीजेपी ऐसी पार्टी है जिसने अपने बारे में यह छवि बना ली है कि वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी बोल सकती है और कभी भी कुछ भी कर सकती है. उसने अपने बारे में यह धारणा खुद बनाई है, ताकि कोई भी बात हो, तो लोग मान लें कि हां, ऐसा हो सकता है.
लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक रूप से मुझे फिलहाल नहीं लगता कि वे अभी डीलिमिटेशन की दिशा में आगे बढ़ेंगे या यह प्रस्ताव पारित हो जाएगा. लेकिन जैसा हमने कहा, उनकी कोशिशें जारी हैं और वे इस मुद्दे के जरिए ध्यान भटकाना चाहेंगे.
उर्मिलेश: आपने कहा कि बीजेपी के बारे में छवि बन गई है कि वह कुछ भी कर सकती है. तो कांग्रेस, जो विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है, डीएमके के साथ अपने रिश्तों को फिर से मजबूत क्यों नहीं करती? हाल में राहुल गांधी तमिलनाडु गए, लेकिन उन्होंने डीएमके नेता से मिलने की कोशिश नहीं की. गठबंधन के साझेदार होने के नाते क्या यह संवादहीनता आपके लिए चिंता का विषय नहीं है?
दीपंकर भट्टाचार्य: यह तो बिल्कुल है. डीएमके हो या आम आदमी पार्टी, दोनों के मामले में यह सवाल उठता है. आम आदमी पार्टी भी एक समय थोड़े समय के लिए इंडिया गठबंधन में शामिल हुई थी.
हमें जो जानकारी मिलती है, उससे लगता है कि पूरी तरह संवादहीनता नहीं है. भले ही राहुल गांधी के स्तर पर मुलाकात नहीं हो रही हो, लेकिन कहीं न कहीं संवाद बना हुआ है.
हमें लगता है कि यहां एक जटिलता है. मामला सिर्फ संवादहीनता या किसी पार्टी के प्रतिष्ठा और सम्मान का नहीं है. वहां एक जटिल स्थिति पैदा हुई है, क्योंकि टीवीके की सरकार बन गई है और डीएमके वहां विपक्ष में है.
इंडिया गठबंधन के सामने पहले भी गैर-बीजेपी सरकारों वाले राज्यों में ऐसी समस्या आई है. केरल में देखिए, वहां राहुल गांधी ने सीपीएम के बारे में कह दिया कि उसका बीजेपी के साथ गठजोड़ है, जबकि सीपीएम भी आज इंडिया गठबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक है.
पश्चिम बंगाल में जब तक टीएमसी की सरकार थी, तब तक टीएमसी को लगता था कि वह अकेले ही काफी है और उसे किसी की जरूरत नहीं है. दूसरी ओर, बाकी दलों के बीच भी तालमेल नहीं बन पाया और वहां इंडिया गठबंधन खड़ा नहीं हो सका.
केरल और बंगाल में जो समस्या दिखती थी, वही पंजाब में भी दिखती है. दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी की सरकार थी, उस समय भी यही समस्या थी. अब तमिलनाडु में भी यही स्थिति है, क्योंकि वहां सरकार बदल गई है और डीएमके को विपक्ष की भूमिका निभानी है.
मेरे ख्याल से यह डीएमके की राजनीतिक परिपक्वता की भी परीक्षा है. राज्य के स्तर पर वह विपक्ष में है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के जिस एजेंडे का मुकाबला करना है, वह पूरे संघवाद को खत्म करने और विविधता को कुचलने का एजेंडा है. इसके खिलाफ डीएमके हमेशा सबसे मजबूती से लड़ी है.
यह पूरा ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ वाला एजेंडा है. इसके खिलाफ सिर्फ कांग्रेस के साथ रिश्तों में किसी तनाव की वजह से डीएमके अपनी राजनीति बदल देगी, ऐसा मुझे नहीं लगता. पार्टियों के बीच समय-समय पर तनाव हो सकता है, लेकिन क्या इसके चलते डीएमके अपना पूरा एजेंडा बदल देगी? मुझे ऐसा नहीं लगता.
डीएमके सामाजिक न्याय के एक माॅडल की बात करती रही है. वह कहती रही है कि हम द्रविड़ माॅडल के साथ आगे बढ़ रहे हैं. इसीलिए मैं अभी भी आशावान हूं कि डीएमके जैसी पुरानी पार्टी, जिसकी अपनी एक राजनीतिक परंपरा है, स्थानीय स्तर के विरोधाभासों या कांग्रेस के साथ मतभेदों के चलते अपना रास्ता नहीं बदलेगी.
मेरे ख्याल से आज का दौर ऐसा है कि बीजू जनता दल और वाईएसआरसीपी जैसी पार्टियां, जो कल तक एनडीए में शामिल हुए बिना भी लगभग उसका समर्थन करती थीं, आज कह रही हैं कि उनसे गलती हुई और उन्हें एनडीए का खुलकर विरोध करना चाहिए था.
मैंने जगन को भी यह कहते सुना कि 2023 का कानून गलत था और उन्हें उसका समर्थन नहीं करना चाहिए था. मेरे ख्याल से यह ऐसा दौर है, जब वे पार्टियां भी, जो कभी इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं रही हैं, अब एनडीए, बीजेपी और वोट चोरी के खिलाफ ज्यादा मुखर होकर अपना रुख रख रही हैं.
ऐसे दौर में डीएमके जैसी अनुभवी पार्टी से मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा कदम उठाया जाएगा. हम लोग भी उससे बात करने की कोशिश करेंगे, ताकि एक बड़ी एकता बन सके.
उर्मिलेश:र्मिलेश: मेरा खास सवाल यही था कि डीएमके के साथ वामपंथ का, खासकर सीपीआई(एम) और सीपीआई का, हमेशा गठबंधन रहा है. अगर कांग्रेस के साथ डीएमके का संवाद नहीं हो रहा है, तो क्या वामपंथ पहल कर सकता था या कर रहा है?
दीपंकर भट्टाचार्य: मेरे ख्याल से काॅमरेड बेबी ने हाल में कई लोगों को चिट्टियां भेजी हैं. आपने देखा कि वे केजरीवाल के घर जाकर चिट्टी दे आए. उन्होंने ममता बनर्जी को भी चिट्टी दी. उसी चिट्टी के बाद ममता बनर्जी ने फोन किया, जिससे बातचीत शुरू हुई.
मेरे ख्याल से वामपंथ की ओर से ये कोशिशें हो रही हैं. हम तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों के लोग बैठकर मिले थे, तो हमने भी इस पर बात की थी कि इंडिया गठबंधन को सक्रिय रखना ही है. उस समय तक 30 सितंबर वाली बैठक नहीं हुई थी.
लेकिन दूसरी पार्टियों के साथ-साथ सिविल सोसाइटी के साथ भी हमें नियमित संबंध विकसित करना चाहिए.
उर्मिलेश: आखिरी सवाल. इस प्रदर्शन में आपके तीनों छात्र संगठन, एसएफआई, एआईएसएफ और आइसा, मिलकर काम कर रहे हैं और उनके बीच अच्छा तालमेल है. तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच तालमेल को लेकर भी कोई दो राय नहीं है. विलय तो संभव नहीं है, उसके कई कारण हैं. लेकिन क्या तीनों पार्टियों के बीच एक स्थायी समन्वय समिति बन सकती है?
दीपंकर भट्टाचार्य: नाम के लिहाज से कोई स्थायी समिति नहीं है, लेकिन समन्वय के लिए समय-समय पर बैठकें होती हैं. संयुक्त आह्वान किए जाते हैं, संयुक्त बयान जारी किए जाते हैं. एक स्थायी समिति से जिस तरह के काम की उम्मीद की जाती है, वे सारी चीजें हो रही हैं. बस, इसके लिए अलग से कोई समिति नहीं बनी है.
अब आगे देखा जाएगा, क्योंकि वाम मोर्चे में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थितियां बनी हुई हैं. आप देखेंगे कि आरएसपी और फाॅरवर्ड ब्लाॅक केरल में यूडीएफ के साथ हैं. वे वहां वाम मोर्चे में नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ का हिस्सा हैं.
मेरे ख्याल से तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच आपसी संवाद और सहयोग पहले से बढ़ा है. आपसी भरोसा भी बढ़ा है. हम बिल्कुल कोशिश करेंगे कि इस समन्वय को जहां तक संभव हो, संस्थागत रूप दिया जाए और इसमें और तेजी लाई जाए.
उर्मिलेश: एक सवाल मैं पूछना भूल रहा था. आपने कहा कि यह लंबी लड़ाई है, लेकिन कुछ महीनों बाद उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. क्या आप लोग यह स्वीकार करेंगे कि वे ज्ञानेश कुमार की निगरानी और संचालन में हों, जिन पर इतने गंभीर आरोप हैं कि उनके रहते निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद नहीं की जा सकती?
दीपंकर भट्टाचार्य: यह कैसे संभव है? बिल्कुल नहीं. इसीलिए यह सवाल इतना जोर पकड़ रहा है. यह सिर्फ अतीत की वजह से नहीं है कि बिहार में क्या हुआ, दिल्ली में क्या हुआ और बंगाल में क्या हुआ. आगे जो चुनाव होने वाले हैं, उनकी वजह से भी यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गया है.
मेरे ख्याल से इसी कारण यह इतनी जरूरी मांग है कि इस पर तत्काल फैसला होना चाहिए. ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंभव हैं. एसआइआर के रहते इस देश में सबको मतदान का अधिकार मिलना असंभव है.
और इस देश में 2023 का जो कानून है, उसके रहते आप किसी भी चुनाव आयोग से निष्पक्षता की उम्मीद नहीं कर सकते. ज्ञानेश कुमार भले ही हट जाएं, लेकिन अगर वह कानून बना रहता है, तो उनके बाद आने वाले किसी भी कुमार से निष्पक्षता और पारदर्शिता की उम्मीद करना बेकार होगा.
इसलिए कम से कम ये बुनियादी बदलाव जरूरी हैं. इसके साथ ही, पिछली बैठक में यह बात भी हुई थी कि हमें ईवीएम छोड़कर बैलेट पेपर की ओर बढ़ना होगा. चुनाव में आम जनता का भरोसा फिर से कायम करना तभी संभव होगा, जब इसमें बड़ा बदलाव किया जाएगा.
उर्मिलेश: लेकिन क्या जनता के लिए यह मुश्किल नहीं होगा कि आपके गठबंधन के रुख को देखते हुए, अगर आप फिर भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और चुनाव से पहले ज्ञानेश कुमार को नहीं हटाया जाता?
दीपंकर भट्टाचार्य: बहुत से लोग सोचते हैं कि उन्हें भी धर्मेंद्र प्रधान की तरह हटा दिया जाएगा. लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. धर्मेंद्र प्रधान को हटाना बहुत आसान था, लेकिन ज्ञानेश कुमार को हटाना बहुत कठिन है. बिल्कुल कठिन है.
उन्हें पता है कि ज्ञानेश कुमार के साथ एसआइआर और 2023 का कानून, सब कुछ जुड़ा हुआ है. यह कठिन है, लेकिन अभी समय है.
मेरे ख्याल से हम लोग अभी एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचे हैं. ज्ञानेश कुमार को जल्दी कैसे हटाया जाए, यह अहम सवाल है. कल आपने देखा कि वैश्विक विरोध दिवस था. लंदन में कितना बड़ा प्रदर्शन हुआ. ऑस्ट्रेलिया में भी कई जगह प्रदर्शन हुए. दुनिया भर में, जहां भी भारतीय मूल के लोग रहते हैं, वहां भारतीय प्रवासी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर हैं.
मेरे ख्याल से अभी पूरी कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि ज्ञानेश कुमार को जल्द से जल्द हटाया जाए. अभी इसके लिए समय है. ज्ञानेश कुमार के बाद क्या होगा, इस पर सोचने के लिए समय मिल जाएगा.