वर्ष 34 / अंक-24 / सवाल सत्ता का नहीं दिशोम गुरू की आंदोलनकारी विरासत...

सवाल सत्ता का नहीं दिशोम गुरू की आंदोलनकारी विरासत का है

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गत 19 जून को श्री शिबू सोरेन सर गंगाराम अस्पताल में गंभीर स्थिति में भर्ती हुए थे. लोग आशंकित थे कि शायद गुरू जी इस बार नहीं लौटें. बावजूद 4 अगस्त को उनके जाने की खबर ने झारखंड को शोक से झकझोर दिया. उम्र और अस्वस्थता ने उन्हें लंबे समय से सक्रिय नहीं रहने दिया था. कभी-कभार सार्वजनिक मंचों पर उनकी उपस्थिति एक मुहर की तरह होती. वे एक ऐसे नेता थे जिसके साथ आंदोलनों के धागों से पूरा झारखंड बंधा हुआ था. उत्तरी छोटानागपुर में डुगडुगी की आवाज शिबू सोरेन के नेतृत्व में जमीन और फसल पर आदिवासी दावेदारी की आवाज बन गई थी. जल, जंगल, जमीन और खनिज पर कॉरपोरेट निर्मम हमला कटु वर्तमान है. आदिवासी स्वायत्तता और अस्तित्व के सामने गेरुआ संकट मंडरा रहा है. एक बेचैन सवाल सबके सामने है कि शिबू सोरेन की अनुपस्थिति में आदिवासी दावेदारी को आक्रामक आंदोलन में तब्दील करना झारखंड के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा.

संसदीय राजनीति में प्रवेश के बहुत पहले ही 70 दशक के मध्य में शिबू सोरेन आदिवासियों के बीच किवदंती नायक के रूप में उभर रहे थे. झारखंड का आदिवासी समुदाय महाजनी जाल में फंसी जमीन की मुक्ति की लड़ाई के लिए कुद पड़ा था. महाजनों के पक्ष में लठैतों और पुलिस-प्रशासन की हिंसक कार्रवाइयों की वजह से आदिवासियों के लिए यह आसान नहीं था. शिबू सोरन इस संघर्ष का चेहरा था और अभी वह नौजवान ही था. महाजनों-सुदखोरों से उत्पीड़ित समुदायों ने उसे गुरू जी का नाम दिया. महाजनों और सरकारी भट्ठों से शराब में झूमता आदिवासी महिला-पुरुषों का दल नशे से बाहर हो रहा था. जमीन-मुक्ति का यह संघर्ष ही झारखंड आंदोलन की नयी उठान का एक मात्र कारक नहीं था.

नक्सलबाड़ी वामपंथ की नई अंगड़ाई थी और जमीन पर पांव जमा रही थी. जन्म से ही नक्सलबाड़ी आंदोलन को भीषण दमन से गुजरना पड़ा. फिर भी वाम आंदोलन की ताजगी फैलती गई और झारखंड क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं था. का. ए के राय ने लाल झंडे के नेतृत्व में कोयलांचल के आदिवासियों, दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के मलकट्टों को महाजनी, माफिया, कंपनी एवं पुलिस के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ गोलबंद करना शुरू किया था. विनोद बिहारी महतो शिक्षा और संघर्ष का नारा देकर नए जागरण का आह्वान कर रहे थे और स्वंय शिबू सोरेन भी वामपंथी प्रभाव से अछूते नहीं थे. झारखंड आंदोलन के निर्माण में जमीन मुक्ति के साथ-साथ मजदूर वर्ग के सामाजिक सवाल और उत्पीड़ित जनता का प्रगतिशील जागरण प्रमुख कारक के बतौर शामिल थे. निस्संदेह आदिवासी समुदाय इस आंदोलन का मुख्य आधार था और 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद इस आंदोलन के केंद्र में शिबू सोरेन आ गए.

दिकू शब्द आमतौर पर महाजनों और मालिकों के लिए आदिवासी इस्तेमाल करते हैं. आदिवासी अपने समुदाय के सदस्यों के लिए होड़ शब्द का इस्तेमाल करते हैं. दिकूओं के खिलाफ आदिवासियों के संघर्ष ने उत्तरी छोटानागपुर और संताल परगना में भू-स्वामित्व के वास्तविक नक्शे को एक हद तक सिर के बल खड़ा कर दिया. झारखंड में वामपंथी आंदोलन की मजबूती और खासकर धनबाद में स्थानीय मजदूरों की दावेदारी ने नयी ताकत को जन्म दिया. झारखंड की जमीन से उठती इस दावेदारी को कुचलने और इसमें दरार डालने की हर तरह की कोशिशें हुईं. शिबू सोरेन को इन साजिशों का सामना करना पड़ा और कई बार शिकार भी होना पड़ा. का. ए के राय के साथ अलगाव भी इसका एक प्रमुख नतीजा था. सांसद, झारखंड स्वायत्तशासी परिषद के अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री और फिर झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की राजनीति में बड़ी सफलताएं हासिल करने के बावजूद वे आदिवासियों के स्वार्थ को समझने वाले अखड़ नेता बने रहे जिसे दिकूओं ने कभी पसंद नही किया और न ही नौकरशाही मनचाहे तरीके से इस्तेमाल कर पाया.

शिबू सोरेन को 1974 में गिरिडीह जिले के कुड़को गांव में एक दोहरे हत्याकांड और 1975 में जामताड़ा के चिरूडीह में 11 लोगों के हत्याकांड के मामले में मुख्य अभियुक्त बनाया गया था. राजनीति के आरंभ में ही शिबू सोरेन का अंत कर देने की यह दिकुओं की सबसे बड़ी साजिश थी. लेकिन शिबू यहां रूके नहीं. समय-समय पर राजनीतिक लगाम लगाने के लिए इन मुकदमों का इस्तेमाल भी किया गया. लेकिन अंततः उन पर लगाये गए आरोप खारिज हुए.

1993 में पी वी नरसिम्हा राव सरकार के पक्ष में मतदान के लिए झामुमो घुसकांड श्री सोरेन के राजनीतिक जीवन में बड़ा दाग साबित हुआ. 1998 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सजा से मुक्ति दे दी थी लेकिन 7 जनवरी 2025 के सुप्रीम कोर्ट ने मामले की समीक्षा पूर्व आदेश का खारिज कर दिया है. शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने. दो बार भाजपा के समर्थन से बने और एक बार गैर-भाजपा दलों के समर्थन से. सब मिलाकर उनका कार्यकाल लगभग छः महीने का रहा. इसमें शिबू सोरेन कुछ समय के लिए भाजपा के नेतृत्व में राजग गठबंधन में भी रहे लेकिन भाजपा के गहरे आदिवासी द्वेष की वजह से वे टिक नहीं पाए.

झारखंड आंदोलन का सबसे आक्रामक दौर खनिजों पर झारखंड की दावेदारी का रहा. केंद्र सरकार को सीधी चुनौती देने का यह समय था. इस आंदोलन को कुचलने के लिए पी वी नरसिम्हा राव सरकार तैयार बैठी थी. झारखंड आंदोलनकारियों का एक हिस्सा केंद्र सरकार के सामने केंद्र शासित राज्य के लिए भी गिड़गिड़ाने की हद तक विचलित हो गया था. लेकिन शिबू सोरेन और भाकपा-माले अलग राज्य से कुछ भी कम के पक्ष में नहीं थे. आंदोलनों और गोलबंदियों का सघन सिलसिला शुरू हुआ.

15 मार्च 1993 से आर्थिक नाकेबंदी की घोषणा की गई – ‘झारखंड राज्य की घोषणा करो, नहीं तो लोहा-कोयला बंद!’. छापेमारियां, गिरफ्तारियां और दमन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ हुआ. झारखंड समन्वय समिति के घटक के बतौर भाकपा-माले का राजनीतिक जन संगठन आईपीएफ (इंडियन पीपुल्स फ्रंट) ने अलग राज्य के आंदोलनों में हमेशा हिस्सेदारी की लेकिन भाकपा-माले ने झामकिस (झारखंड मजदूर किसान समिति) संगठन के जरिए अलग राज्य की लड़ाई में सीधे उतरने की घोषणा की. आर्थिक नाकेबंदी के पहले राज्यव्यापी सभाओं में शिबू सोरेन एक बार फिर का. ए के राय और का. महेंद्र सिंह के साथ मंच साझा करते हुए नजर आते हैं. झामुमो सहित तमाम झारखंडी संगठन और भाकपा-माले की कतारें आर्थिक नाकेबंदी में कुद पड़ी. 1993 में हुई गिरफ्तारियों की संख्या से स्पष्ट हो गया कि कैसे लाल-हरे झंडे की ताकत ने झारखंड में आर्थिक नाकेबंदी को सफल किया था और इसे झारखंड अलग राज्य के लिए निर्णायक आंदोलन बना दिया.

शिबू सोरेन की मृत्यु ऐसे वक्त हुई जब झारखंड में उनकी पार्टी के नेतृत्व में सरकार है और उनके पुत्र मुख्यमंत्री हैं. लेकिन गुरू जी केंद्र की मोदी सरकार के नेतृत्व में झारखंड के लिए तैयार किए जा रहे अडाणी के फंदे से अनजान नहीं होंगे और न ही आदिवासियों बांटने की भाजपा की साजिश से चिंता मुक्त! भाजपा को राज्य की सत्ता से बाहर कर झामुमो के नेतृत्व में गठबंधन तीसरी बार जीत हासिल की है. इस जीत का बड़ा आधार जल-जंगल-जमीन पर अधिकार एवं पांचवीं अनुसूची लागू करने के लिए आदिवासी आंदोलन की आक्रामकता और व्यापकता रही है. इस आंदोलन के साथ-साथ स्कीम वर्करों और नौजवानों का आंदोलन भी भाजपा के खिलाफ बड़ी राजनीतिक ताकत बना रहा. इन आंदोलनों में भाकपा माले की भी बड़ी भूमिका है.

ये तमाम सवाल आज भी राज्य सरकार के सामने हैं. मोदी सरकार ने कोयला-लोहा के अंधाधुंध निजीकरण के जरिये रोजगार का रास्ता रोक दिया है और अडाणी गोड्डा के बाद हजारीबाग और झारखंड के दूसरे हिस्सों में जमीन-खनिज हथियाने के लिए चक्कर लगा रहे हैं. नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर आदिवासियों का जनसंहार हो रहा है. उनके रहवासों को उजाड़ा जा रहा है. पेसा कानून और स्थानीयता आधारित रोजगार नीति अभी भी सरकार की राह देख रहे हैं. जमीन पर अधिग्रहण की मुहरें धड़ल्ले से लग रही हैं. ऐसी स्थिति में सवाल सरकार का नहीं रह जाता है. सवाल आंदोलन की विरासत का महत्वपूर्ण हो जाता है. इस नये दौर में क्रांतिकारी वामदल भाकपा-माले को झारखंड की इस चुनौती को एक बार फिर स्वीकार कर आगे बढ़ना होगा और आंदोलनकारी ताकतों की व्यापक साझेदारी तैयार करनी होगी.

23 August, 2025