जब वंचित लोग बराबरी की बात करते हैं, तो जातिवादी ताकतें खुद को पीड़ित बताने लगती हैं!
दिल्ली विश्वविद्यालय में यूजीसी सोशल इक्विटी रेगुलेशन्स लागू करने की मांग को लेकर जो प्रदर्शन हुआ, उसे कुछ मीडिया चैनल और दक्षिणपंथी लोग गलत तरीके से “ऊंची जाति के लोगों पर हमला” बताकर पेश कर रहे हैं.
सच्चाई यह है कि रुचि तिवारी नाम की एक महिला, जो खुद को पत्रकार बताती हैं, प्रदर्शन के दौरान माहौल खराब करने की कोशिश कर रही थीं. अब वे खुद को पीड़िता बता रही हैं. दूसरी ओर, आइसा की कार्यकर्ता अंजलि और नेहा को लगातार बलात्कार करने और जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं.
जब-जब दलित, आदिवासी, पिछड़े और वंचित समुदाय अपने सम्मान और बराबरी की बात करते हैं, तब-तब जातिवादी ताकतें उल्टा खुद को पीड़ित बताने लगती हैं. मंडल आंदोलन के समय भी यही हुआ था – बराबरी की मांग करने वालों के खिलाफ नफरत फैलाई गई थी.
आखिर क्या हुआ था?
12 फरवरी को आइसा द्वारा आयोजित समता उत्सव के दौरान आर्ट्स फैकल्टी में इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर एबीवीपी के गुंडों ने हमला किया. प्रो. हबीब ‘आरएसएस का इतिहास लेखन जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता’ संबंधी विषय पर बोल रहे थे. तभी सभा के दौरान पत्थर फेंके गए और पानी से भरी डस्टबिन सार्वजनिक बैठक में फेंकी गई. इसके बावजूद आयोजकों और वक्ता ने शांति बनाए रखी और कार्यक्रम जारी रखा. हमलावरों की पहचान कर ली गई है और उनके वीडियो आइसा द्वारा सार्वजनिक किए गए, जिन्हें व्यापक रूप से देखा गया और निंदा की गई.
यूजीसी नियमावली पर लगी रोक के कारण एससी/एसटी/ओबीसी समुदायों के छात्रों और शिक्षकों में व्यापक आक्रोश है. 13 फरवरी को अखिल भारतीय वंचित अधिकार दिवस के तहत देशभर के 100 से अधिक परिसरों में यूजीसी नियमावली लागू करने की मांग उठी. इसी क्रम में आर्ट्स फैकल्टी में विभिन्न संगठनों और आंदोलनों के छात्रों ने एक शांतिपूर्ण और संगठित सार्वजनिक सभा आयोजित की. सभा के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने उकसाने और अराजकता फैलाने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया.
स्वयं को पत्रकार बताने वाली रुचि तिवारी, जो यूजीसी नियमावली के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों में लगातार उकसावे की भूमिका निभाती रही हैं, अपने साथ कई लोगों को लेकर वहां पहुंचीं. उन्होंने दलित पत्रकार नवीन को निशाना बनाया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया. नवीन के अनुसार, आइसा की कार्यकर्ता अंजलि और नेहा ने हस्तक्षेप करते हुए रुचि तिवारी को पुलिस के हवाले करने की कोशिश की.
इस घटना के दो वीडियो सामने आए हैं. एक वीडियो में रुचि तिवारी नवीन पर हमला और अंजलि को मुक्का मारती दिख रही हैं, जिससे अंजलि गिर जाती हैं. दूसरे वीडियो में अंजलि और नेहा रुचि तिवारी को पकड़कर पुलिस के पास ले जाने की कोशिश कर रही हैं. दूसरा वीडियो जातिवादी तंत्र द्वारा बिना आवाज के प्रसारित किया जा रहा है, क्योंकि आवाज के साथ स्पष्ट सुना जा सकता है – “मार के भागी है ये, इसको पुलिस के पास लेकर जाना है.”
तमाम व्यवधानों के बावजूद सार्वजनिक सभा शाम 5 बजे शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हुई. शाम 6:30 बजे अंजलि और अन्य आइसा कार्यकर्ता मॉरिस नगर थाने में रुचि तिवारी और उनके साथियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने पहुंचे. वहां पहले से ही एक भीड़ मौजूद थी, जिसने अंजलि को पहचान कर थाने के अंदर उनका पीछा किया. पुलिस ने आइसा कार्यकर्ताओं को एक छोटे कमरे में ले जाकर बंद किया, जबकि लगभग 50 लोगों की भीड़ ने गालियां दीं और बलात्कार व हत्या की धमकियां दीं. लगभग 4 घंटे तक चार आइसा कार्यकर्ता थाने के अंदर घिरे रहे.
दिल्ली विश्वविद्यालय के सामान्य छात्रा और आइसा कार्यकर्ता एवं अन्य लोग भी मॉरिस नगर थाने के बाहर एकत्र हुए. पुलिस 200 से अधिक जातिवादी गुंडों की भीड़ को नियंत्रित करने में असफल रही. कई वीडियो में स्पष्ट दिखता है कि भीड़, पुलिस की मौजूदगी में, ‘गोली मारो सालों को’ और ‘ब्राह्मणवाद जिंदाबाद’ जैसे नारे लगा रही थी. कई घंटों तक धमकाने और डराने का सिलसिला जारी रहा.
रात लगभग 12 बजे पुलिस ने भीड़ को हटाया और आइसा कार्यकर्ताओं की शिकायत दर्ज की गई. कार्यकर्ताओं को रिहा किया गया और अंजलि का चिकित्सीय परीक्षण (मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट) कराया गया.
वहीं दक्षिणपंथी सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया छात्राओं के खिलाफ लगातार झूठे नैरेटिव चला रही है, जिसके कारण छात्राओं को लगातार मारपीट करने की धमकी दी जा रही है. साथ ही, आंदोलन को भी बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन क्या समानता की मांग को जातिवादी और स्त्री-विरोधी भीड़ से नहीं दबाया जा सकता है?
न्यायप्रिय लोगों को इस नफरत भरे नैरेटिव का प्रतिरोध और विश्वविद्यालयों में वंचित समुदायों की गरिमा और समानता की मांग का समर्थन करना चाहिए.
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के मनमाने कफ्र्यू को खारिज करो!
यूजीसी इक्विटी एक्ट को लागू करने का संघर्ष जारी रहेगा!
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस में लगाए गए मनमाने कफ्र्यू की कड़ी निंदा करती है. यह कफ्र्यू उस वक्त लगाया गया जब जातिवादी दक्षिणपंथी ताकतों ने उन छात्रों पर हिंसा बरपाई, जो शांतिपूर्ण तरीके से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा तय किए गए समानता के नियमों को पूरी तरह और बिना किसी समझौते के लागू करने की मांग कर रहे थे. यह फैसला साफ तौर पर दिखाता है कि राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल जान-बूझकर जाति-विरोधी आंदोलन को दबाने के लिए किया जा रहा है, जबकि जो लोग डरा-धमकाकर और तोड़फोड़ करके न्याय की मांग को कमजोर कर रहे हैं, उनको बचाया जा रहा है.
13 फरवरी को छात्रा इस बात के लिए इकट्ठा हुए थे कि यूनिवर्सिटी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाए और भेदभाव रोकने वाले नियमों को लागू करे. साथ ही, ऐसी ठोस व्यवस्था बनाई जाए जो उच्च शिक्षा में जातिगत बहिष्कार की जड़ जमा चुकी सच्चाई से निपट सके. ये सच्चाई आज भी तय करती है कि हाशिए पर धकेल दिए गए छात्रों को संसाधन कितने मिलेंगे, संस्थानों में उनकी जगह कैसी होगी और बुनियादी तौर से उनकी इज्जत कितनी बचेगी. ये मांगें खुद यूजीसी के आंकड़ों और संरचनात्मक भेदभाव के उन जीते-जागते अनुभवों से पैदा हुई हैं, जिन्हें इक्का-दुक्का वाकया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.
फिर भी, इन चिंताओं की असलियत पर ध्यान देने के बजाय, संगठित राइट-विंग ग्रुप्स ने सोचे-समझे तरीके से दखल दिया ताकि टकराव को बढ़ावा दिया जा सके और गड़बड़ी पैदा की जा सके, ताकि सामाजिक न्याय से ध्यान हटाकर ‘बदअमनी’ की कहानी गढ़ी जा सके, जिससे छात्रों की आवाज को बदनाम किया जा सके. समानता और संस्थान की जिम्मेदारी के सवाल उठाने वाले छात्रों को व्यवस्था को खतरे में डालने वाली रुकावट डालने वाली ताकतों के तौर पर दिखाया गया, जबकि दुश्मनी और डराने-धमकाने वाले लोग सही जांच से बचते रहे.
इसके बाद जो संस्थागत जवाब आया, उसने इस संकट को और गहरा कर दिया और यूनिवर्सिटी के लोकतांत्रिक होने का दावा पूरी तरह बेनकाब कर दिया. महिला और लैंगिक अल्पसंख्यक छात्र नेता जब मौरिस नगर थाने में धमकियों और डराने-धमकाने की शिकायत दर्ज कराने गईं, तो वहां पुलिस के सामने ही उनके साथ खुलेआम यौन उत्पीड़न और गाली-गलौज की गई. जो लोग इंसाफ मांगने आए थे, उनके साथ और ज्यादा बदसलूकी हुई. ये पूरी घटना साफ कर देती है कि जातिगत ऊंच-नीच और पितृसत्ता की बेखौफ सत्ता में कितनी गहरी सांठ-गांठ है. ये गठजोड़ उन लोगों को सबक सिखाना चाहता है जो इस संरचनात्मक दबदबे को चुनौती देते हैं और अपनी सुरक्षा एवं बराबरी का हक मांगते हैं.
ऐसे हालात में, अब लागू किया गया कफ्र्यू असल में सामूह के बतौर इकट्ठा होने को अपराध बनाने और पूरे विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक मेल-जोल को खत्म करने का काम कर रहा है, इसे 19 मार्च तक बढ़ा दिया गया है – यानी उस तारीख तक, जब सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई होनी है. ये समय तय करना सियासत है. जब तक अदालत समीक्षा करे, तब तक आंदोलन पर रोक लगाने से असल में जनता का दबाव कम हो जाता है. ठीक उस वक्त जब समानता और जवाबदेही पर बहस अपने चरम पर है, जांच-परख की गुंजाइश कम कर दी गई है. यानी जब संस्थान के तौर-तरीकों पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, ठीक उसी वक्त प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल असहमति को कंट्रोल करने में किया जा रहा है.
एक यूनिवर्सिटी जो जाति-विरोधी विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाती है, लेकिन अपने छात्रों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने में नाकाम रहती है, वह साफ बता देती है कि उसकी सोच और शासन की असली प्राथमिकताएं क्या हैं. संरचनात्मक भेदभाव के खिलाफ विरोध का जवाब उकसावे, यौन उत्पीड़न और प्रशासनिक पाबंदियों से दिया गया है. ये तरीका उन सबके लिए एक सख्त चेतावनी देना है जो पुरानी जातिगत ऊंच-नीच पर सवाल उठाने की हिम्मत करते हैं – कि उनकी आवाज सुनी नहीं जाएगी, बल्कि दबा दी जाएगी.
हम उस सोच को खारिज करते हैं जो अकादमिक जगत को को केवल ‘सवर्ण सुख-सुविधा’ और प्रशासन की सहूलियत के हिसाब से ढालती है. हम उस नैरेटिव को भी खारिज करते हैं जो लोकतांत्रिक आंदोलन को ‘अराजकता’ करार देती है, लेकिन उस व्यवस्थागत असमानता को नजरअंदाज कर देती है जिसके चलते आंदोलन शुरू हुआ. हम ऐसे समय में सामूहिक राजनीतिक जीवन पर रोक लगाने के फैसले को भी नामंजूर करते हैं, जब पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए यूनिवर्सिटी समुदाय का खुला और लगातार भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी है.
यूजीसी समानता दिशानिर्देशों को लागू करने की यह लड़ाई एक बड़े संघर्ष का हिस्सा है – उस जातिगत विशेषाधिकार को तोड़ने की लड़ाई जो संस्थानों के तौर-तरीकों, प्रशासन की पारदर्शिता की कमी और उस डिसिप्लिनरी फ्रेमवर्क में छिपा है, जो हाशिए के छात्रों को बुरी तरह निशाना बनाते हैं और तटस्थता का दिखावा करते हुए जातिगत असमानता को बढ़ावा देते हैं. यूनिवर्सिटी तब तक खुद को सही नहीं ठहरा सकती, जब तक वो ऐसी संरचनाओं को बनाए रखेगी जो बहिष्कार और हाशिए पर धकेलने का काम करती हैं. 13 फरवरी को उठाए गए सवाल किसी भी प्रशासनिक आदेश से परे हैं, जो उन्हें दबाने की कोशिश करता है.
जाति-विरोधी प्रतिरोध उन पीढ़ियों की देन है जिन्होंने अपमान को अपनी नियति कभी नहीं माना. उनकी विरासत आज भी इस कैंपस के उन छात्रों के इरादों को ताकत देती है जो अपने हक के लिए डटे रहने को प्रतिबद्ध हैं
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