वर्ष 34 / अंक-29 / संघ-भाजपा का युगल नृत्य और दो जन्मदिवसों की कहानी

संघ-भाजपा का युगल नृत्य और दो जन्मदिवसों की कहानी

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आरएसएस अभी अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है. 11 सितंबर को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत 75 वर्ष के हो गए. एक सप्ताह बाद 17 सितंबर को नरेंद्र मोदी ने भी यह आयु रेखा छू ली. आरएसएस की शब्दावली में ये दानों नेता अब अपने ‘अमृत काल’ में चल रहे हैं.  मोदी युग में 75 वर्ष पार के वरिष्ठ भाजपा नेताओं को सामान्यतः रिटायर्ड सलाहकारों के पैनल में धकेल दिया जाता है, और इस साल के शुरू में भागवत ने भी 75 वर्ष की उम्र में अवकाश-प्राप्ति का ‘सिद्धांत’ घोषित किया था. किंतु हाल ही में भागवत ने यह स्पष्ट कर दिया कि 70 वर्ष पूरा कर चुके ये दानों नेता संघ ब्रिगेड के संपूरक अंगों – ‘शाखा विशेषज्ञों’ और ‘राज्य प्रबंधकों’ – के मुखिया बने रहेंगे. इस वर्ष अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में नरेंद्र मोदी ने आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ घोषित किया था, और अब भागवत के जन्मदिन पर उन्होंने तारीफों की झड़ी लगा दी जो लगभग शोक संदेश में कही बातें ही प्रतीत हो रही थीं. अब यही देखना शेष है कि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की जगह कौन लेता है और कब लेता है.

यह ख्याल एक उदारवादी भ्रम ही है कि मोदी व्यक्ति पूजा से आरएसएस को परेशानी है अथवा यह कि मोदी-अडानी मिलनसारिता अब इतनी गहरी हो गई है कि आरएसएस मोदी शासन पर रास्ता सुधारने के लिए कोई दबाव डालेगा. आरएसएस को आज मोदी सरकार की उतनी ही जरूरत है जितना कि मोदी सरकार को आरएसएस की. विपक्ष में बैठी भाजपा को जिस तरह से आरएसएस का पूरा सहयोग मिला, खासकर राम जन्मभूमि अभियान शुरू होने के बाद से, उसी तरह सत्तासीन भाजपा को भी आरएसएस का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त है. आरएसएस के किसी विचारक अथवा पदाधिकारी की ओर से उठने वाला आलोचना या चिंता का कोई स्वर संघ परिवार के इस मूलभूत समीकरण अथवा आंतरिक संबंध में कोई बदलाव नहीं लाता है.

आरएसएस किसी मुरली मनोहर जोशी को जरूर इस बात की इजाजत दे सकता है कि वे भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता पर चिंता जाहिर करें और यहां तक कि वे अमर्त्य सेन की बातों को भी उद्धृत कर सकते हैं, जबकि मोदी सरकार अडानी ग्रुप को भारी मुनाफा कमाने का मौका देती है और भाजपा का आईटी सेल अमर्त्य सेन को ‘राष्ट्रविरोधी’ अर्थशास्त्री कहते हुए उन्हें पानी पी-पीकर कोसता है. मूल बात यह है कि आरएसएस हर संभव हद तक विरोधी दबाव झेल लेगा, लेकिन वह कभी भी मोदी सरकार को कमजोर करने का प्रयास नहीं करेगा. वस्तुतः, जब मुरली मनोहर जोशी खतरनाक ढंग से बढ़ती असमानता के बारे में आगाह कर रहे थे, तो उसी समय विधान सभा चुनाव की ओर बढ़ते बिहार में भाजपा-नीत सरकार लगभग 8000 भू सर्वेक्षण कर्मचारियों को बर्खास्त करने और एक रुपया के टोकन सालाना लीज पर गौतम अडानी को 10 लाख पेड़ों के साथ 1,050 एकड़ जमीन सौंपने में मशगूल थी.

उम्मीद के अनुसार ही नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन पर उन्हें ढेरों-ढेर शुभकामनाएं और उपहार मिले. मुकेश अंबानी ने आशा जताई कि मोदी 2047 तक पीएम बने रहें या न बने रहें, लेकिन किसी-न-किसी रूप में वे तबतक मौजूद जरूर रहेंगे और अंबानी की अगुवाई में ‘विकसित भारत’ को आकार लेता देख सकेंगे. इजरायली प्रधान मंत्री नेतान्याहू, इटली के प्रधान मंत्री जियोर्जिया मेलोनी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के संदेश आए, और यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप ने भी फोन पर बधाई दी. लेकिन ट्रंप की तरफ से असली उपहार तो अमेरिका में कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए ‘एच 1 बी’ वीसा पर 1,00,000 डॉलर के दंडात्मक शुल्क के रूप में आया – इन कर्मचारियों में अमेरिकी आईटी कंपनियों द्वारा नियोजित भारतीय इंजीनियरिंग स्नातकों की बड़ी तादाद शामिल है. अमेरिका में भारतीय इंजीनियरों के रोजगार पर इस लगभग रोक जैसी स्थिति के साथ अगर अमेरिका में दस्तावेज-विहीन भारतीयों के जबरन निष्कासन और अमेरिका को निर्यात की जानेवाली भारतीय वस्तुओं पर प्रतिबंधात्मक टैरिफ को जोड़ दें, तो यह आसानी से देखा जा सकता है कि ट्रंप लगातार भारत को निशाना बना रहे हैं और उनकी यह हरकत दिन-ब-दिन कठोरतर होती जा रही है.

मोदी की विदेश नीति की परेशानियां ट्रंप के भारत-विरोधी कदमों अथवा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत के बढ़ते अलगाव तक ही सीमित नहीं हैं. पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के मोदी सरकार के अनथक प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान की रणनीतिक हैसियत में लगातार इजाफा इस परेशानी को और बढ़ा रहा है. पाकिस्तान के समर्थन में सबसे जोरदार बयान सउदी अरब की तरफ से आया, जिसने पाकिस्तान के साथ सामरिक प्रतिरक्षा समझौता किया जिसके अनुसार दोनों में से किसी भी देश पर हमला दोनों देशों पर हमला समझा जाएगा. पहलगाम हमले के बाद जब मोदी ने एक तरह से कहिए तो ‘स्थायी युद्ध’ का सिद्धांत घोषित करते हुए यह चेतावनी दी कि आतंक की हर कार्रवाई को युद्ध समझा जाएगा, तो उसी समय रियाध और इस्लामाबाद के बीच का यह प्रतिरक्षा समझौता एक सामरिक शह-मात के रूप में सामने आया है.

वाह्य व्यापार और विदेश नीति, दोनों मोर्चे पर कोने में धकिया दिये जाने के बाद मोदी सरकार अब ‘स्वदेशी’ और ‘आत्मनिर्भरता’ के पुराने जुमले पर पड़ी गर्द को साफ करने में मशगूल हो गई है. मोदी हमें यकीन दिलाना चाहते हैं कि भारत को अंततः बाहरी मदद पर अपनी आदतन निर्भरता पर काबू पाने और अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिल गया है. नई जीएसटी व्यवस्था को घरेलू मांग में उछाल लाने वाले एक बड़े कदम के बतौर उछाला जा रहा है. लेकिन संपत्ति और आमदनी के पुनर्वितरण, सामाजिक क्षत्रों में सार्वजनिक खर्च बढ़ाने पर केंद्रीकरण अथवा रोजगार पैदा करने वाले उत्पादक निवेश के बगैर आम जनता की क्रय शक्ति में कोई असरदार इजाफा नहीं हो सकता है. सीमित मात्रा में टैक्स कटौती, जिसका वास्तविक फायदा उपभोक्ताओं को मिलना बताया जा रहा है, टैरिफ की वजह से निर्यात में होने वाली कमी से उत्पन्न रोजगार विनाश के चलते निष्प्रभावी हो जाएगी. मोदी नई जीएसटी दरों को बचत का उत्सवी तोहफा बता रहे हैं. क्या अपने तरीके से वे यह कबूल कर रहे हैं कि अबतक जनता को लूट के महाभोज का ग्रास बनाया जा रहा था?

27 September, 2025