वर्ष 34 / अंक-33 / श्रम संहिताओं पर मोदी सरकार के दावे का सच

श्रम संहिताओं पर मोदी सरकार के दावे का सच

श्रम संहिताओं पर मोदी सरकार के दावे का सच

21 नवंबर 2025 को मोदी सरकार ने बिना किसी पूर्व सूचना, बिना जनता को बताए और बिना ट्रेड यूनियनों से सलाह लिए, देश की करोड़ों मेहनतकश आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली आवाजों को नजरअंदाज करते हुए चारों श्रम संहिताएं लागू कर दी हैं – ये हैं : वेज कोड (मजदूरी संहिता), इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड (औद्योगिक संबंध संहिता), ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ कोड (व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता) और सोशल सेक्योरिटी कोड (सामाजिक सुरक्षा संहिता).

इन संहिताओं का लागू होना मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला है और पूंजीपतियों के लिए मजदूरों को लगभग गुलामी की हालत में धकेल देने का कदम है. यह दरअसल उन अधिकारों, सुरक्षा उपायों और न्यायिक गारंटियों को दफनाने जैसा है, जिन्हें मजदूर तबके ने बीते  75 साल  के संघर्षों से हासिल किया था.

इन चारों संहिताओं ने एक ही झटके में देश के लगभग आधे मजदूरों को कानून की सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है, क्योंकि अब ये कानून सिर्फ एक तय आकार से ऊपर वाले प्रतिष्ठानों पर ही लागू होंगे.

जैसा पहले से साफ था, मुख्यधारा मीडिया ने सरकार की प्रेस रिलीज को बिना जांच-पड़ताल, बिना सवाल, ज्यों-का-त्यों दोहरा कर इन संहिताओं का स्वागत किया, मानो वही ‘सच’ हो. 

लेकिन असलियत बिल्कुल उलट है. भारत सरकार के प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की इस प्रेस रिलीज ने सच को तोड़-मरोड़कर यह दिखाने की शर्मनाक कोशिश की कि इन तथाकथित “श्रम सुधारों” का लक्ष्य “सामाजिक न्याय” है, और मीडिया ने इस झूठ को आंख मूंद कर अपना लिया.

यहां हम सरकार के दावे  और झूठ को बेनकाब कर रहे हैं और बता रहे हैं कि ये श्रम संहिताएं किस तरह मजदूरों के अधिकार, सुरक्षा और रोजी-रोटी पर हमला करती हैं.

जैसा कि नीचे विस्तार  से बताया  गया है, ये संहिताएं संविधान की बुनियादी मूल्यों का उल्लंघन करती हैं, करोड़ों मजदूरों को श्रम कघनूनों की सुरक्षा के दायरे से बाहर करती हैं, और अस्थायी व असुरक्षित रोजगार को बढ़ावा देती हैं. इससे मजदूरों की जिंदगी और भी अस्थिर होगी और समाज में आर्थिक-सामाजिक असमानता बढ़ेगी. ये संहिताएं इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) के मानकों पर भी खरी नहीं उतरतीं.

1. रोजगार को  पक्का  करने का झूठ

दावा : हर मजदूर को अनिवार्य नियुक्ति पत्र  देकर रोजगार को सुरक्षित बनाया जाएगा.

हकीकत : ये संहिताएं कहीं से भी रोजगार को सुरक्षित नहीं बनातीं. महज एक नियुक्ति पत्र जारी करने से रोजगार जादुई ढंग से अस्थाई  से स्थाई नहीं हो जाता. स्थाई रोजगार की एक बुनियादी शर्त ‘रोजगार की सुरक्षा’ है – जिसे ये संहिताएं ‘निश्चित अवधि के रोजगार’ को कानूनी जामा पहनाकर और ‘ठेका श्रम’ के दायरे को बढ़ाकर खत्म कर देती हैं.

नतीजतन, न केवल प्रतिष्ठानों को अपने यहां ठेके पर मजदूर  बढ़ाने की खुली छूट मिल गई है, बल्कि नियोक्ताओं को एकतरफा और अक्सर अवैध शर्तें थोपने, जैसे मनमानी बर्खास्तगी, का रास्ता खोल दिया  गया है.

असली सुरक्षा स्थायी आदेशों (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) से आती है. ये ऐसे नियम होते हैं, जिन्हें प्रबंधन और मजदूरों की भागीदारी से तैयार किया जाता है और जो सेवा की शर्तों को तय करते हैं, ताकि नियोक्ता मनमानी कार्रवाई न कर सके. इन स्थायी आदेशों को औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के तहत लागू किया जाता था, लेकिन औद्योगिक संबंध संहिता ने इस कानून को ही खत्म कर दिया.

इसके अलावा, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा (OSH) संहिता जहां एक तरफ नियुक्ति पत्र जारी करने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ अपने ही दायरे को सीमित कर देती है. इसकी लागू होने की न्यूनतम सीमा बढ़ा दी गई है, जिससे अब यह केवल बड़ी इकाइयों पर ही लागू होगी. नतीजा यह कि मध्यम और छोटे प्रतिष्ठानों में काम करने वाले लाखों मजदूर इस तथाकथित सुरक्षा से पूरी तरह बाहर कर दिए गए हैं.

2. सुरक्षित कार्यबल – दावा और सच्चाई

दावा : श्रम  संहिताओं का उद्देश्य  “सुरक्षित कार्यबल” तैयार  करना

हकीकत : श्रम संहिताएं किसी तरह का सुरक्षित कार्यबल नहीं बनातीं. उल्टा, ये मजदूरों के पहले से मौजूद अधिकारों को छीनती हैं और बड़ी संख्या में मजदूरों को कानून की सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल देती हैं.

इन श्रम संहिताओं की पूरी बनावट ही मजदूरों को श्रम कानूनों से बाहर करने की है. कानून के दायरे में जितने मजदूर लाए जा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा मजदूर बाहर किए जा रहे हैं.

(ए) फैक्टरी ऐक्ट की पात्रता सीमा का बढ़ाना

फैक्टरी ऐक्ट की जगह लेने वाली व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा (OSH) संहिता के तहत, कानून लागू होने की सीमा दो गुनी कर दी गई है.

बिजली से चलने वाले फैक्टरी को अब कानून के दायरे में आने के लिए 10 की जगह 20 मजदूर चाहिए.

बिजली के बिना चलने वाले फैक्टरी को अब 20 की जगह 40 मजदूर चाहिए.

इस एक बदलाव से ही मजदूरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षा के दायरे से वंचित  हो जाता है. एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्री (2017-18) के मुताबिक, 47% पंजीकृत फैक्ट्रियों में 20 से कम मजदूर काम करते हैं. यानी लगभग आधी फैक्ट्रियां अब सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े बुनियादी प्रावधानों के दायरे में नहीं आएगी.

(बी) औद्योगिक संबंधों की  पात्रता सीमाएं बढ़ाना 

इसी तरह, औद्योगिक संबंध संहिता के तहत स्थायी आदेशों (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) की आवश्यकता, जो मजदूरों के अधिकारों और सेवा शर्तों को तय करते हैं, 100 श्रमिकों (औद्योगिक रोजगार) (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1956 की धारा 1(3) के तहत) की अनिवार्यता बढ़ाकर 300 मजदूर (औद्योगिक संबंध संहिता की धारा 28) कर दी गई है.

यानी छंटनी, हटाना और बंदी के खिलाफ सुरक्षा, जो पहले 100 मजदूर वाली इकाइयों (औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25K) पर लागू होती थी, अब सिर्फ 300 मजदूर वाली इकाइयों (औद्योगिक संबंध संहिता की धारा 77) पर लागू होगी.

(सी) कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों की सुरक्षा का कम करना

साथ ही, ठेका श्रम (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970 के तहत 20 या अधिक मजदूरों वाले प्रतिष्ठानों के कॉन्ट्रैक्ट मजदूर संरक्षित थे. लेकिन औद्योगिक संबंध संहिता इस सीमा को बढ़ाकर 50 कर देती है. इससे तत्काल प्रभाव से लाखों कार्यस्थल कानून के दायरे से बाहर हो जाते हैं और मजदूरों से समय पर मजदूरी का भुगतान, आवश्यक सुविधाओं का प्रावधान, और ठेकेदार के भुगतान न करने पर प्रधान नियोक्ता की जिम्मेदारी, जैसे बुनियादी अधिकार छीन लिए गए हैं.

इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में प्रतिष्ठान अब पूरी तरह कानून के बाहर हो गए हैं, और लाखों मजदूरों को एक तरह के कानूनी बियाबान (नो-मैन्स लैंड) में धकेल दिया गया है, जहां न अधिकार है, न सुरक्षा, न न्याय.

उदाहरण के तौर पर, 20 से कम मजदूरों वाली फैक्ट्रियों के कर्मचारियों को पहले सुरक्षा प्रबंध, शौचालय और साफ पानी जैसी सुविधाएं अधिकार के रूप में हासिल थीं, जिससे वे अब वंचित हैं और इन्हें अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकते. इसी तरह, 50 से कम कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों वाली इकाइयों में काम करने वाले मजदूर अब यह भी नहीं मांग सकते कि ठेकेदार के भुगतान न करने पर प्रधान नियोक्ता मजदूरी देने के लिए बाध्य होगा, जो अधिकार पहले उन्हें हासिल था.

3. मजदूरों का सशक्तिकरण

दावा : श्रम संहिताएं मजदूरों का “सशक्तिकरण” करती हैं

हकीकत : सशक्तिकरण तो दूर, ये संहिताएं मजदूरों के सबसे बुनियादी अधिकारों यानी संगठन बनाने, सामूहिक कार्रवाई करने और बातचीत या सौदेबाजी करने के अधिकार पर सीधा हमला करती हैं. यही वे अधिकार हैं जिनकी बदौलत मजदूर अपनी मजदूरी, काम की शर्तें और नौकरी की सुरक्षा की लड़ाई लड़ते आए हैं. हड़ताल का अधिकार सामूहिक सौदेबाजी की रीढ़ है और ये संहिताएं इसी सबसे अहम हथियार को व्यवस्थित तरीके से कमजोर करती हैं.

हमें याद रखना चाहिए कि मजदूरों ने आज जो भी अधिकार हासिल किए हैं, वे हड़ताल के अधिकार की वजह से ही मुमकिन हुए हैं. सफाईकर्मियों को कई जगहों पर स्थायी नियुक्ति ऐतिहासिक हड़ताल के बाद मिली थी. इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्रा में मजदूरी और सेवा शर्तें इसलिए सुधरीं क्योंकि कर्मचारी हड़ताल कर सके थे.

(ए) हड़ताल से पहले नोटिस

1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत हड़ताल का नोटिस केवल जन उपयोगी सेवाओं में जरूरी था. नई संहिताएं इस नियम को सभी उद्योगों पर लागू कर देती हैं और हर हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस अनिवार्य कर देती हैं (औद्योगिक संबंध संहिता, धारा 62).

इसका मतलब यह है कि चाहे कानून का साफ-साफ उल्लंघन हो, चाहे मजदूरों की सुरक्षा खतरे में हो या कोई तात्कालिक विवाद खड़ा हो, मजदूर तुरंत कार्रवाई नहीं कर सकते. उन्हें मजबूरन दो हफ्ते इंतजार करना पड़ेगा. इससे उनकी प्रतिरोध क्षमता और बातचीत या सौदेबाजी की ताकत, दोनों कमजोर हो जाती हैं.

(बी) सजाएं और जुर्माने

गैर कानूनी घोषित हड़तालों पर अब बेहद कठोर सजाएं लगाई गई हैं. मजदूरों को एक महीने तक की जेल और 1,000 से 10,000 रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है, जो कई मजदूरों की पूरे महीने की तनखवाह के बराबर या उससे भी ज्यादा होता है. ऐसी कथित गैर कानूनी हड़तालों को उकसाने, नेतृत्व देने या फंड करने वालों पर 10,000 से 50,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है (औद्योगिक संबंध संहिता, धारा 86).

ये सजाएं सामूहिक कार्रवाई को अपराध की तरह पेश करती हैं. मजदूरों में डर और दमन का माहौल बनाती हैं. उन्हें अपने ही अधिकार की लड़ाई से पीछे धकेलती हैं. इसका सीधा असर यह है कि मजदूर और ज्यादा असुरक्षित और शोषण के निशाने पर आ जाते हैं.

(सी) ट्रेड यूनियन का रजिस्ट्रेशन

नई संहिताएं ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार को अभूतपूर्व और मनमानी शक्तियां देती हैं. अब रजिस्ट्रार सिर्फ प्राप्त सूचना के आधार पर यानी बिना किसी सबूत और बिना किसी जांच के यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द या वापस ले सकता है (औद्योगिक संबंध संहिता, धारा 9).

ऐसा अधिकार ट्रेड यूनियनों को कमजोर करेगा और मजदूरों को अपने अधिकार मांगने से रोकेगा. इतना व्यापक और अनियंत्रित अधिकार यूनियनों पर मनचाही कार्रवाई का रास्ता खोल देता है. इसका नतीजा यह होगा कि मजदूरों के अधिकार और सुरक्षा करने वाली संस्थाएं लगातार कमजोर होती जाएंगी.

4. सामाजिक सुरक्षा

दावा : सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर सहित सभी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा.

हकीकत : इन संहिताओं से सामाजिक सुरक्षा बढ़ती नहीं है, बल्कि और कमजोर होती है. यह दावा कि सभी मजदूरों को पीएफ, ईएसआईसी, बीमा और अन्य लाभ मिलेंगे, गुमराह करने वाला है. असलियत यह है कि गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों को ईएसआई की कोई गारंटी नहीं दी गई है और उन्हें मिलने वाला एकमात्र लाभ सिर्फ रजिस्ट्रेशन का अधिकार है. उन्हें किसी भी सामाजिक सुरक्षा प्रावधान का हकदार नहीं बनाया गया है. संहिताएं सिर्फ यह वादा करती हैं कि भविष्य में कुछ योजनाएं लाई जाएंगी, लेकिन इन योजनाओं में क्या मिलेगा और कब मिलेगा, इसका कोई जिक्र नहीं है.

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 और कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 के तहत पहले से मौजूद अधिकार मजबूत नहीं किए गए हैं, उलटा उन्हें और कमजोर कर दिया गया है. मजदूर पहले से ही कानूनी हक के तौर पर ईएसआई और पीएफ पाने के अधिकारी थे. नई संहिता इसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ती, बल्कि मौजूदा सुरक्षा को ढीला करती है.

आज भी ईएसआई का दायरा उन्हीं प्रतिष्ठानों तक है जहां 10 या उससे ज्यादा मजदूर काम करते हैं और पीएफ उन्हीं प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जिनमें 20 या उससे ज्यादा मजदूर हैं. नई संहिता उन पुरानी शर्तों को ज्यों का त्यों रखती है, जिनकी वजह से  देश की बड़ी  मजदूर आबादी अब भी अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा से बाहर रहती है.

यूनिवर्सल सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय संहिता मजदूरों के दो असमान तबके बना देती है. एक, संगठित क्षेत्र के मजदूर, जिन्हें वही लाभ मिलते रहते हैं जो पहले से मिल रहे थे. दूसरे, असंगठित क्षेत्र और गिग व प्लेटफॉर्म वर्कर, जिन्हें कोई गारंटीशुदा अधिकार नहीं दिया गया है और जिन्हें सरकार की भविष्य की योजनाओं पर निर्भर रहना होगा, जो कब आएंगी, आएंगी भी या नहीं, यह तय नहीं है.

संहिताएं वर्तमान कानूनों में नियोक्ता और सरकार की जो जिम्मेदारी तय थी, उसे हटाकर मजदूरों के सिर पर डाल देती हैं. ईएसआई और ईपीएफ अधिनियमों के तहत नियोक्ता के लिए यह अनिवार्य था कि वह अपने हर कर्मचारी का रजिस्ट्रेशन कराए. नई संहिताएं संगठित क्षेत्र में तो यह प्रावधान रखती हैं, लेकिन असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के लिए अलग और कमजोर व्यवस्था बनाती हैं, जिसमें मजदूरों को खुद रजिस्ट्रेशन कराना होगा तभी वे किसी लाभ की उम्मीद कर सकते हैं.

भारत की 93 प्रतिशत से ज्यादा मजदूर आबादी असंगठित क्षेत्र में है और इन संहिताओं के तहत उन्हें कोई भी सामाजिक सुरक्षा का अधिकार गारंटी के साथ नहीं मिलता. सरकार सिर्फ भविष्य की योजनाओं की बात करती है जिनमें न समय तय है, न लाभ तय है और न कोई कानूनी अधिकार तय है. यह सामाजिक सुरक्षा नहीं है, बल्कि अनिश्चितता और भेदभाव को कघनूनी रूप देना है.

5. न्यूनतम मजदूरी

दावा : मजदूरी संहिता, 2019 के तहत सभी मजदूरों को कानूनी हक के तौर पर न्यूनतम मजदूरी मिलेगी

हकीकत : संहिताएं न्यूनतम मजदूरी की कोई गारंटी नहीं देतीं. उल्टे, ये मजदूरी को नीचे धकेलती हैं और मजदूरों को और गहरी गरीबी में झोंकती हैं. 1948 के न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में यह गारंटी साफ-साफ मौजूद थी, लेकिन नई संहिता उस कानून को कमजोर कर देती है. संहिता सिर्फ सबसे नीचे की मजदूरी तय करती है, पर यह परिवार की जरूरतें पूरी कर पाएगी या नहीं, इसका कोई भरोसा नहीं देती.

संहिता ‘फ्लोर वेज’ यानी न्यूनतम आधार-मजदूरी की नई अवधारणा लाती है, लेकिन इसका मतलब और दायरा साफ नहीं है. कागज पर कहा गया है कि फ्लोर वेज न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं हो सकती, लेकिन असलियत में यह फ्लोर वेज पूरे देश में मजदूरी के स्तर को नीचे खींचने का ही काम करेगी.

मिसाल के तौर पर मोदी सरकार ने अभी जो फ्लोर वेज तय की है, वह सिर्फ 178 रुपये रोज है, जबकि कर्नाटक में न्यूनतम मजदूरी 707 से 723 रुपये रोज है. यानी फ्लोर वेज को आधार बनाकर मजदूरी को घटाया जा सकता है.

संहिताओं में न्यूनतम मजदूरी की गणना का फॉर्मूला भी सुप्रीम कोर्ट के रिप्टाकोस ब्रेट फैसले में तय वैज्ञानिक फॉर्मूले से बहुत कमजोर और कटौती वाला है. सबसे बड़ी कटौती मकान-किराया के हिस्से में की गई है, जो मजदूर का सबसे भारी खर्च होता है. संहिता के फॉर्मूले में किराये को भोजन और कपड़े की लागत के सिर्फ 10% तक सीमित कर दिया गया है. यह अवैज्ञानिक है, मजदूर की असल जरूरतों से कटा हुआ है, और इससे न्यूनतम मजदूरी जरूर कम होगी.

जब कर्नाटक की प्रस्तावित मजदूरी की तुलना मजदूरी संहिता के फॉर्मूले से निकली मजदूरी से की जाए, तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है.

वास्तविक जरूरतों के आधार पर कर्नाटक में न्यूनतम मजदूरी

भोजन : 8,947 रुपये
कपड़े : 630 रुपये
मकान : 5,660 रुपये
अतिरिक्त 45% : 12,426 रुपये
कुल : 27,613 रुपये

वहीं मजदूरी संहिता के फॉर्मूले के मुताबिकः

भोजनः 8,947 रुपये
कपड़ेः 630 रुपये
मकानः सिर्फ 958 रुपये
अतिरिक्त 45% : 8,620 रुपये
कुल : 19,155 रुपये

यह बिलकुल साफ है कि श्रम संहिता के मुताबिक तय न्यूनतम मजदूरी मजदूर की असल जरूरतों के अनुसार नहीं है. यह मजदूरी को बहुत नीचे ले आती है और करोड़ों मजदूरों की कमाई पर सीधा हमला करती है.

6. मजदूरों की सुरक्षा

दावा : 40 साल से ऊपर के हर मजदूर को मालिक मुफ्त वार्षिक हेल्थ चेक-अप देंगे.

हकीकत : नई संहिताएं मजदूरों की सुरक्षा बढ़ाने के बजाय, पहले से मौजूद सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर करती हैं और कार्यस्थलों को और ज्यादा असुरक्षित बनाती हैं.

‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020’ की धारा 6(ब) में सिर्फ इतना कहा गया है कि मालिक, सरकार जैसे नियम बनाएगी, उसके मुताबिक कुछ उम्र या कुछ वर्ग के कर्मचारियों को वार्षिक हेल्थ चेक-अप “दे सकते हैं”. यानी यह कोई सार्वभौमिक हक नहीं, बल्कि एक शर्तों वाला प्रावधान है.

फैक्टरीज ऐक्ट 1948 की धारा 41ब् के तहत खतरनाक फैक्ट्रियों में हर साल मजदूरों का मेडिकल टेस्ट अनिवार्य है.

फैक्टरीज ऐक्ट 1948 में मजदूरों की सुरक्षा के लिए मौजूद कई ठोस और विस्तार से लिखे नियमों को नई संहिता ने लगभग खत्म कर दिया है. फैक्टरीज ऐक्ट में खतरनाक प्रोसेस वाली हर फैक्टरी में दो-तरफा ;मजदूर-प्रबंधनद्ध सेफ्रटी कमेटी अनिवार्य थी. जबकि ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020’ की धारा 22 इसे राज्यों के नोटिफिकेशन पर छोड़ देती है.

बार-बार यह समझना होगा कि इस संहिता ने कवरेज की सीमा बढ़ाकर बड़ी संख्या में प्रतिष्ठानों और करोड़ों मजदूरों को कानून के दायरे से बाहर कर दिया है. जब पूरी फैक्टरी ही कानून के बाहर धकेल दी जाए, तो “सुरक्षा” के किसी वादे की क्या अहमियत रह जाती है?

जो अधिकार आप पर लागू ही नहीं होता, वह अधिकार नहीं, सिर्फ बेमानी शब्द है.

मजदूरों की सुरक्षा तभी सुनिश्चित हो सकती है जब निरीक्षण (इंस्पेक्शन) की व्यवस्था मजबूत और सख्त हो. नई संहिताएं यह गारंटी नहीं देतीं. उल्टे, वे मालिकों की जवाबदेही बढ़ाने के बजाय, सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर मजदूरों को ही सजा देती  हैं.

7. मजदूरी का समय पर भुगतान

दावा : पहली बार मजदूरी का भुगतान तय समय पर होगा.

हकीकत : समय पर मजदूरी देना कोई नया नियम नहीं है. यह 1936 से ही लागू है. ‘पेमेंट ऑफ वेजेज ऐक्ट’ की धारा 7 में साफ लिखा है कि हर महीने की मजदूरी 7 तारीख तक देनी होगी.

8. महिलाओं का काम और सुरक्षा

दावा : महिलाओं की कार्य-भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति मिलेगी.

हकीकत : नई संहिताएं महिलाओं की  हालात सुधारती नहीं, बल्कि हालात को और बदतर बनाती हैं और भेदभाव को कानूनन अमलीजामा पहनाती हैं.

नाइट शिफ्ट की यह तथाकथित “अनुमतिय” औरतों की आजादी नहीं, मालिकों की आजादी है. पहले कानून में रोक इसलिए थी कि मालिक औरतों को रात में काम करने के लिए मजबूर न कर सकें, क्योंकि ताकत का संतुलन पहले से असमान है और सुरक्षा जोखिम ज्यादा हैं. अब यह रोक हटाकर पूरा फायदा मालिकों को मिल गया है.

जो चीज “विकल्प” की तरह पेश की जा रही है, वह असल में मजबूरी बनेगी. नाइट शिफ्ट से इंकार करने पर औरतों की नौकरी या पदोन्नति खतरे में पड़ सकती है. नाइट शिफ्ट सेहत, नींद और सुरक्षाकृतीनों पर बुरा असर डालती है, यह दुनिया भर के शोध बताते हैं.

सबके लिए नाइट शिफ्ट पर रोक या सीमा तय करने के बजाय, नई संहिताएँ मालिकों को यह ताकत देती हैं कि वे औरतों को रात में काम करने पर मजबूर कर सकें.

9. नियम-पालन का बोझ घटाने का झूठा दावा

दावा : नियम-पालन का बोझ कम होगा

हकीकत : नियम-पालन कोई “बोझ” नहीं है. यह मजदूरों के अधिकारों की रीढ़ है. इसे बोझ कहना साफ दिखाता है कि असली मंशा मजदूरों के हक लागू कराने की जिम्मेदारी से बचना है.

नियम-पालन कमजोर होता है तो कानून लागू होना भी ढह जाता है. इससे मजदूर असुरक्षित हो जाते हैं और मालिक बेलगाम. हाल के वर्षों में कई औद्योगिक हादसे मालिकों की लापरवाही से हुए हैं. निरीक्षण कम होंगे तो ऐसे हादसे और बढ़ेंगे. इंस्पेक्टरों की शक्तियां कम करने और बिना सूचना वाले निरीक्षण हटाने का असर यही होगा कि जो कुछ कानून बचे हैं, वे भी प्रभावी नहीं रहेंगे.

10. विभिन्न सेक्टरों पर पड़ने वाले अहम प्रभाव और बड़े झूठ

दावा : निश्चित अवधि के कर्मचारी (फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट) की बेहतरी

हकीकत : फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट नई किस्म की नौकरी है जिसे संहिताओं में बढ़ावा दिया गया है. यह दरअसल अस्थायी, असुरक्षित और किस्तों में टिकने वाली नौकरी को कानूनी रूप देकर मजदूरों की स्थायी नौकरी का अधिकार छीन लेने का तरीका है. नाम भले ही “कुछ समय की नौकरी” रखा गया हो, लेकिन असलियत में मालिक लगातार एक-एक साल के कॉन्ट्रैक्ट देकर मजदूरों को सालों-साल तक अस्थायी बनाए रखते हैं. मिसाल के तौर पर, कोई मजदूर 10 साल नौकरी करे और हर साल सिर्फ एक साल का कॉन्ट्रैक्ट मिले, यही होता है फिक्स्ड-टर्म रोजगार. यह पूरी प्रणाली मजदूरों को नियमित, स्थायी रोजगार से जुड़े अधिकारों और सुरक्षा से वंचित रखने का एक छलावा बन जाती है. यह दावा कि फिक्स्ड-टर्म वालों को “समान फायदे” मिलते हैं, पूरी तरह गुमराह करने वाला है. असलियत यह है कि फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट लाकर संहिताएं असुरक्षा को ही कानूनी बना देती हैं. यह मजदूरों की नौकरी की स्थिरता और उनके वास्तविक अधिकार से वंचित किए जाने के लिए मालिकों को खुली छूट देने का पिछले दरवाजे का रास्ता खोल देता है.

यह मालिकों को मनमर्जी से नौकरी से निकालने की छूट देना सीधे-सीधे यूनियन बनाने और आवाज उठाने के अधिकार पर हमला है. जो भी मजदूर अन्याय के खिलाफ खड़ा होगा, उसे हटाने का पूरा रास्ता मौजूद रहेगा.

फिक्स्ड-टर्म मजदूरों को “एक साल में ग्रैच्युटी” देना फायदा नहीं, बल्कि मजदूरों को धोखे में रखने का तरीका है, मानो किसी का पैर काटकर उसे सहारा देने के लिए एक छड़ी पकड़ा दी जाए. स्थायी नौकरी और सुरक्षा का जो असली अधिकार है, उसे खत्म किए बिना ग्रैच्युटी कोई मुआवजा नहीं हो सकती. फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट लाकर नौकरी की असुरक्षा को कानूनी दर्जा दे दिया गया है ,यानी अस्थिरता को ही स्थायी बना देने की कोशिश.

गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर

दावा : नई संहिताएँ गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों को परिभाषित करती हैं और उन्हें फायदे देती हैं.

हकीकत : गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के वास्तविक अधिकारों को नकार दिया गया है. उन्हें “वर्कर” या “वर्कमैन” की परिभाषा से बाहर रखकर एक अलग श्रेणी में डाल दिया गया है ताकि उन्हें वे अधिकार न मिलें जो बाकी मजदूरों को मिलते हैं.

हकीकत यह है कि गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर हर मायने में मजदूर हैं, लेकिन ये संहिताएं उन्हें जानबूझकर “वर्कर” मानने से इंकार करती हैं. इस वजह से वे वे सारे अधिकार खो देते हैं जो एक वर्कर होने के नाते हर मजदूर को मिलने चाहिए. जैसे नौकरी की सुरक्षा. मजदूरी की गारंटी. और सोशल सिक्योरिटी.

“मजदूर” की परिभाषा से बाहर रखकर संहिताएं उन्हें सुरक्षा के पूरे ढांचे से दूर कर देती हैं जिसके हर मजदूर हकदार होता है. न स्थायी रोजगार का हक. न मजदूरी की गारंटी. न बीमा. न पेंशन. कुछ भी नहीं.

गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों को मिलने वाला एकमात्र लाभ महज रजिस्ट्रेशन का अधिकार है. सामाजिक सुरक्षा का कोई भी प्रावधान उन्हें अधिकार के रूप में नहीं दिया गया. संहिताएं सिर्फ इतना कहती हैं कि कभी न कभी कुछ लाभ वाली योजनाएं लाई जाएंगी, लेकिन कब, कैसी और कितनी – इसका कोई जिक्र नहीं.

इस तरह एक तेजी से बढ़ते तबके को दोयम दर्जे का मजदूर बना दिया गया है. वे अर्थव्यवस्था को चलाने में बेहद जरूरी हैं, लेकिन उनके अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान को जरूरी नहीं माना गया.

ठेका मजदूर

दावा : निश्चित अवधि के कर्मचारियों से रोजगार बढ़ेगा, सामाजिक सुरक्षा मिलेगी और कानूनी संरक्षण मजबूत होगा. एक साल की नौकरी के बाद फिक्स्ड-टर्म कर्मचारी ग्रैच्युटी के हकदार होंगे. प्रधान नियोक्ता ठेका मजदूरों को स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराएगा.

हकीकत : ठेका मजदूरी प्रणाली, जो आज के समय में आधुनिक गुलामी की तरह काम करती है, इन श्रम संहिताओं में और बढ़ावा पाती है. यूनियनें लंबे समय से मांग करती रही हैं कि ठेका मजदूरी और निश्चित अवधि के रोजगार जैसी असुरक्षित नौकरी की व्यवस्थाओं को खत्म कर मजदूरों को स्थायी किया जाए.

हाल ही के जग्गो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि “cजदूरों को लंबे समय तक अस्थायी रखकर, जबकि उनका काम संस्था के मूल कामकाज का हिस्सा हो, न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के खिलाफ है बल्कि कर्मचारियों का मनोबल तोड़ता है और संस्थान को हमेशा कानूनी चुनौती के खतरे में डालता है.”

लेकिन ये संहिताएं सुरक्षित और स्थिर रोजगार सुनिश्चित करने की बजाय अस्थायी रोजगार को ही बढ़ाती हैं. फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट असल में मजदूरों के वास्तविक अधिकार और नौकरी की स्थिरता छीनने का पिछला दरवाजा है. यह मजदूरों को कोई लाभ नहीं देता. इसका एकमात्र काम है मालिकों को मनमर्जी से रऽने और निकालने की पूरी आजादी देना. इससे सुरक्षा नहीं बढ़ती, बल्कि असुरक्षा को कानूनी दर्जा मिल जाता है.

ठेका मजदूरों को भी इन संहिताओं में कोई राहत नहीं दी गई. शोषणकारी ठेका प्रणाली को खत्म करने की बजाय, संहिताएं इसे और मजबूत और स्थायी बनाती हैं. ठेका मजदूरी असल में बंधुआ मजदूरी का आधुनिक रूप है, और ये श्रम संहिताएं इसे खुले तौर पर बढ़ावा देती हैं.

1970 के कॉन्ट्रैक्ट लेबर ऐक्ट में मुख्य काम को ठेका पर देने की मनाही थी. फ्व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020य् इसे सिद्धांत रूप में मानती तो है, लेकिन “मुख्य काम” की परिभाषा को इतना छोटा कर देती है कि पहले से सुरक्षित बहुत सारे काम अब इस सुरक्षा से बाहर हो गए हैं. कई जरूरी कामों को “मुख्य काम” से हटाकर लाखों मजदूरों को स्थायी रूप से ठेका मजदूर बनने के लिए धकेल दिया गया है. इससे नौकरी की सुरक्षा और संरक्षण दोनों खत्म हो जाते हैं.

“व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020” की धारा 2(पी) के तहत सफाई, चौकीदारी, कैंटीन-कैटरिंग, लोडिंग-अनलोडिंग, हॉस्पिटल-स्कूल-गेस्ट हाउस चलाना, कोरियर सेवा, निर्माण कार्य, बागवानी, हाउसकीपिंग-लॉन्ड्री और ट्रांसपोर्ट सेवा (एम्बुलेंस सहित) जैसे कई अहम कामों को “मुख्य या आवश्यक काम” की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है. इसका सीधा मतलब है कि इन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर स्थायी रूप से ठेका पर ही रखे जाएंगे.

यह बदलाव उन महिलाओं और दलित मजदूरों पर सबसे ज्यादा बोझ डालता है जो इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में काम करते हैं. ये श्रम संहिताएं जातीय-सामाजिक श्रम विभाजन को और मजबूत करती हैं और मजदूरों को जिंदगी भर की अस्थिरता में धकेल देती हैं. यह आधुनिक गुलामी को कानूनी मंजूरी देने जैसा है, जहां मालिकों को पूरी आजादी है और मजदूरों को कोई सुरक्षा नहीं.

इसके अलावा 1970 का कॉन्ट्रैक्ट लेबर ऐक्ट उन संस्थानों पर लागू होता था जहां 20 से ज्यादा मजदूर काम करते हों. लेकिन “व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020” ने यह सीमा बढ़ाकर 50 कर दी है. इससे लाखों छोटे-मंझोले कार्यस्थल कानून के दायरे से बाहर हो जाते हैं और मजदूरों को समय पर मजदूरी और कानूनी लाभ जैसे बुनियादी अधिकार भी नहीं मिल पाते. यह मजदूरों के अधिकारों का सीधा और पूरा सफाया है.

महिला अधिकार

दावा : संहिताओं द्वारा लैंगिक भेदभाव पर रोक लगाकर, समान काम के लिए समान वेतन और महिलाओं के लिए रात्रि पाली की अनुमति देकर महिला अधिकारों को संरक्षित किया गया है.

हकीकत : संहिताएं महिला अधिकारों को कुचलती हैं और भेदभाव को कानून में स्थापित करती हैं. लैंगिक समानता कोई नई चीज नहीं है – यह 1950 से ही संविधान द्वारा अनिवार्य है, जो समानता की गारंटी देता है.

पुरुषों और महिलाओं के लिए समान पारिश्रमिक 1976 के समान पारिश्रमिक अधिनियम के तहत कानूनी रूप से सुनिश्चित था. लेकिन मजदूरी संहिता, 2019 ने इस कानून को पूरी तरह रद्द कर दिया है.

इन सुरक्षा-प्रावधानों को मजबूत करने की बजाय, नई संहिताएं इन्हें और कमजोर करती हैं. संहिताएं भेदभाव की गुंजाइश छोड़कर समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को कमजोर कर देती हैं. 1976 के अधिनियम के तहत नियोक्ताओं को साफ तौर पर एक ही काम के लिए महिला और पुरुष को अलग वेतन देने से रोका गया था.

लेकिन मजदूरी संहिता “मजदूरी” की परिभाषा बदलकर कई महत्वपूर्ण घटकों को बाहर कर देती है. धारा 2(ल) के अनुसार “मजदूरी” में कोई भी बोनस, आवास या उपयोगिताओं एवं सुविधाओं का मूल्य, परिवहन भत्ता और घर किराया भत्ता (HRA) सहित अन्य भत्ते को बाहर करके संहिता नियोक्ताओं को ऐसा वेतन ढांचा बनाने की छूट देती है जहां “मूल वेतन” तो समान दिखे, लेकिन असल कमाई जो भत्तों के जरिये तय होती है – पुरुष और महिलाओं के बीच भारी फर्क डाल सकती है.

उदाहरण : मान लीजिए पुरुष और महिला दोनों को 12,000 रुपये का मूल वेतन मिलता है

पुरुष : 12,000 मूल + 4,000 HRA + 2,000 विशेष भत्ता

महिला : 12,000 मूल + 1,000 HRA + कोई विशेष भत्ता नहीं

कानून के अनुसार उनकी “मजदूरी” समान मानी जाएगी, लेकिन असली कमाई में भारी अंतर रहेगा. यानी संहिता न सिर्फ वेतन भेदभाव को वैध बनाती है, बल्कि मातृत्व लाभों को भी कम कर देती है क्योंकि उनकी गणना भी इसी संकीर्ण “मजदूरी” पर की जाएगी.

क्रेच सुविधाएं

संहिताएं क्रेच सुविधाओं की गारंटी को भी काफी कमजोर करती हैं. कई क्षेत्रीय कानूनों में क्रेच के लिए मजबूत, विस्तृत और लागू करने योग्य मानक थे – जैसे वेंटिलेशन, स्वच्छता, पर्याप्त जगह और प्रशिक्षित महिला द्वारा प्रबंधन. यह सुरक्षा यह सुनिश्चित करती थी कि महिलाएं गरिमा के साथ काम कर सकें और बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिले.

सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 67 ऊपर से तो क्रेच की आवश्यकता “बनाए रखती” है, लेकिन क्षेत्र-विशेष अनिवार्यताएं हटा दी गई हैं, जिससे गंभीर नतीजे हुए हैं :

अब केवल “प्रतिष्ठान” ही कवर होंगे

पहले BOCW अधिनियम के तहत 50 मजदूरों वाला कोई भी स्थान कवर था – अब निर्माण मजदूर यह अधिकार खो देंगे.

30 महिला मजदूरों वाली लेकिन कुल 50 से कम मजदूरों वाली फैक्ट्रियां अब बाहर – हजारों महिलाएं क्रेच सुविधा से वंचित.

वेंटिलेशन, स्वच्छता, उचित जगह और प्रशिक्षित स्टाफ जैसी बुनियादी कानूनी गारंटियां हट गईं – अब सब मालिक की मर्जी पर निर्भर.

प्रतिनिधित्व

संहिताएं वैधानिक निकायों में महिलाओं के वास्तविक और सार्थक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम हैं. जहां प्रतिनिधित्व को कार्यबल की वास्तविक हिस्सेदारी के अनुसार होना चाहिए, संहिताएं सिर्फ औपचारिकता निभाती हैं.

उदाहरण :

भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड, जिसमें 16 सदस्य हो सकते हैं, उसमें शर्त बस इतनी है – “कम से कम एक महिला.”

यही दिखावटी नियम सामाजिक सुरक्षा संहिता के कल्याण बोर्डों पर भी लागू होता है. यानी महिलाओं को समान अधिकार देने तो दूर, संहिताएं भेदभाव को संस्थागत रूप दे देती हैं.

युवा

दावा : सभी के लिए न्यूनतम मजदूरी की गारंटी देकर, अपॉइंटमेंट लेटर सुनिश्चित करके, सामाजिक सुरक्षा बढ़ाकर, शोषण रोककर ये संहिताएं युवाओं को सशक्त बनाती हैं –


हकीकत : युवा, जो आज के और आने वाले कल के मजदूर हैं – इन संहिताओं के सबसे बड़े धोखे का शिकार हैं. ये संहिताएं उन्हें सुरक्षा और सम्मान नहीं देतीं, बल्कि उन्हें अस्थिर और असुरक्षित रोजगार की दलदल में धकेल देती हैं.

जो भी दावे किए जा रहे हैं, वे कोई नए अधिकार नहीं हैं. बल्कि, जैसा ऊपर बताया गया है, मौजूदा अधिकार छीन लिए गए हैं या फिर मजदूरों को पूरी तरह सुरक्षा दायरे से बाहर कर दिया गया है. युवाओं के लिए कोई भी विशेष प्रावधान नहीं है.

अपॉइंटमेंट लेटर अपने आप में रोजगार को औपचारिक नहीं बना सकता – खासकर तब, जब नई संहिताएं खुद “फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट” के नाम पर अस्थायी रोजगार को बढ़ावा देती हैं.

छुट्टी के दौरान वेतन देना तो पहले भी जरूरी था – इसे कोई “उपलब्धि” कहने का मतलब ही नहीं है. फ्लोर वेज तो पहले से ही न्यूनतम वेतन से कम हैं, और नियमों से साफ है कि संहिताएं मजदूरी को और नीचे धकेलेंगी.

युवाओं के लिए ये संहिताएं सबसे ज्यादा खतरनाक हैं. ये पूरी एक पीढ़ी को ऐसे भविष्य में धकेल देती हैं जहां रोजगार अस्थिर होगा, मजदूरी कम होगी, और सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं होगी.

ये संहिताएं असुरक्षा को ही “नॉर्मल” बना देती हैं – उन सभी अधिकारों को कमजोर करके जो युवा मजदूरों का अधिकार हैं और जिनकी गारंटी संविधान देता है.

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मजदूर

दावा : सोशल सेक्योरिटी कोड 2020 के तहत सारे एमएसएमई मजदूर कवर होंगे, कर्मचारियों की संख्या के हिसाब से पात्रता तय होगी. हर मजदूर को मिनिमम वेतन मिलेगा. कैंटीन, पानी, आराम की जगह जैसे फैसिलिटीज मिलेंगी. तयशुदा काम के घंटे, डबल ओवरटाइम और पेड लीव का प्रावधान है. समय पर वेतन मिलना सुनिश्चित किया गया है.

हकीकत : एमएसएमई मजदूरों पर सबसे बड़ी मार पड़ी है, क्योंकि उन्हें कानून की सुरक्षा से बाहर धकेल दिया गया है. पहले से मौजूद मजदूर कानून एमएसएमई मजदूरों पर लागू थे. इएसआइ और पीएफ की सुविधा पहले से ही चल रही थी, इसे किसी नए उपलब्धि की तरह पेश करना धोखा है.

असलियत यह है कि नए ओएसएचडब्ल्यू संहिता अब सिर्फ उन फैक्ट्रियों को कवर  करता  है जहां बिना बिजली के 40 मजदूर या बिजली के साथ 20 मजदूर हों. इस बदलाव से बड़ी संख्या में एमएसएमई मजदूरों  को कवरेज के बाहर कर दिया गया है, और लाखों मजदूर बुनियादी कानूनी सुरक्षा से भी वंचित कर दिए  गए हैं , यहां तक कि पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी.

“स्टैंडर्ड वर्किंग ऑवर्स” का दावा पूरी तरह गलत और भ्रामक है.

फैक्टरी ऐक्ट 1948 की धारा 51 हफ्ते में 48 घंटे और धारा 54 रोजाना 9 घंटे से ज्यादा काम की इजाजत नहीं देती थी. एमएसएमई संहिता इन साफ-स्पष्ट सुरक्षा प्रावधानों को खत्म कर देता है.

धारा 25(ए) में भले ही 8 घंटे के वर्कडे की बात कही गई है, लेकिन धारा 25(इ) तुरंत सरकार को “स्प्रेड-ओवर” बढ़ाने की खुली छूट देती है, यानी 8 घंटे महज एक दिखावा बन जाता है.

इसी तरह, फैक्टरी ऐक्ट की धारा 59(1) में रोज 9 घंटे या हफ्ते में 48 घंटे से ऊपर के काम पर डबल ओवरटाइम की गारंटी थी. एमएसएमई संहिता इन तय सीमाओं को हटाकर बस इतना कहता है कि ओवरटाइम होगा, लेकिन सीमा क्या है, यह साफ नहीं है.

महिला मजदूरों की सुरक्षा भी कमजोर कर दी गई है

पहले कानून में महिलाओं को खतरनाक और जोखिम भरे कामों में लगाए जाने पर सख्त रोक थी – यह महिलाओं की “आजादी” नहीं बल्कि उन्हें शोषण से बचाने की सुरक्षा थी. ओएसएचडब्ल्यू संहिता कोड इस सुरक्षा को हटा देती है, और “अनुमति” के नाम पर महिलाओं को असुरक्षित रात , और खतरनाक शिफ्टों में धकेलने का रास्ता खोल देती है. यह “आजादी” महिलाओं के लिए नहीं ,बल्कि उनके  मालिकों के लिए है. हकीकत यह है कि महिलाओं को विकल्प नहीं, मजबूरी मिलेगी : जो मना करेंगी, उन्हें शिफ्ट, प्रमोशन या नौकरी खोने का दबाव झेलना पड़ेगा.

कपड़ा मिल मजदूर

दावा : सभी टेक्सटाइल मजदूरों को समान वेतन, जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ और सार्वजानिक  वितरण प्रणाली के तहत कहीं भी राशन लेने का अधिकार मिलेगा. ओवरटाइम पर दोगुनी मजदूरी दी जाएगी.

हकीकत : ये सारे दावे मृग-मरीचिका हैं. जिन “फायदों” को श्रम संहिताओं की उपलब्धि बताया जा रहा है, वे अधिकार मजदूरों के पास पहले से मौजूद थे. “समान काम का समान वेतन” कोई नया प्रावधान नहीं. ओवरटाइम पर दोगुनी मजदूरी भी नया नहीं है, लेकिन संहिताओं ने सरकार को काम के घंटे तय करने का अधिकार देकर ओवरटाइम की सीमा भी सरकार की मर्जी पर छोड़ दी.

यानी हकीकत में ये श्रम संहिताएं टैक्सटाइल मजदूरों के अधिकारों को मजबूत नहीं, कमजोर करती हैं.

आईटी और आईटीईएस मजदूर

दावा : हर महीने की 7 तारीख तक वेतन देना अनिवार्य होगा. पारदर्शिता बढ़ेगी. समान काम का समान वेतन मिलेगा. महिलाएं रात की शिफ्ट में काम कर सकेंगी और ज्यादा कमाई कर पाएँगी. उत्पीड़न, भेदभाव और वेतन-संबंधी शिकायतों का समय पर निपटारा होगा. फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट और अपॉइंटमेंट लेटर से सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी.

हकीकत : आईटी और आईटीईएस मजदूरों के लिए बताए गए लगभग सभी “फायदे” पहले से कानून में गारंटीशुदा थे, और नई श्रम संहिताएं इन्हें और कमजोर करती हैं.

वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 पहले से समय पर वेतन देना अनिवार्य करता है, देरी पर दंड के साथ. इसलिए, महीने की 7 तारीख तक वेतन देने को नई उपलब्धि बताना सीधा-सीधा भ्रामक प्रचार है.

समानता को दरकिनार कर इसे कमजोर करना

“मजदूरी” की नई परिभाषा में कई भत्तों को बाहर कर दिया गया है, जिससे वेतन में भेदभाव को ही कानूनी मान्यता मिल जाती है. इसे सुधार कहना सच्चाई  को छुपाना है, क्योंकि “समान काम का समान वेतन” जैसा संवैधानिक अधिकार ही कमजोर कर दिया गया है.

रात में काम की इजाजत : आजादी नहीं, मजबूरी

महिलाओं को रात में “काम करने का अवसर” देना असल में आजादी नहीं, उनके मालिकों के हाथ में और ज्यादा ताकत देना है. पहले सुरक्षा, खतरों और शक्ति-संतुलन को देखते हुए रात या खतरनाक काम में लगाने पर पाबंदी थी. अब इसे “विकल्प” का नाम देकर हटा दिया गया है , लेकिन यह विकल्प नहीं, मजबूरी बनेगा. मना करने पर प्रमोशन, शिफ्ट या नौकरी खोने का खतरा हमेशा सिर पर रहेगा.

फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट : सुरक्षा नहीं, अस्थिरता

निश्चित अवधि का रोजगार सामाजिक सुरक्षा की गारंटी बिल्कुल नहीं देता. यह अस्थिरता को स्थायी बनाता है. छोटे-छोटे कॉन्ट्रैक्ट आम हो जाते हैं और नौकरी का स्थायित्व दूर की चीज बन जाता है. नई संहिताएं अस्थायी मजदूरी को ही सामान्य बनाकर पूरे मजदूर तबके पर थोप देती हैं.

(ऑल इण्डिया सेन्ट्रल कौंसिल (ऐक्टू) द्वारा शीघ्र प्रकाशित पुस्तिका)
(हिंदी अनुवाद : मनमोहन)


13 December, 2025