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ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला और बदलती दुनिया का व्याकरण

ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला और बदलती दुनिया का व्याकरण

-- मनमोहन

अमेरिका-इजरायल के फासिस्ट गठजोड़ द्वारा ईरान पर थोपा गया अवैध साम्राज्यवादी युद्ध, जो “ग्रेटर इजरायल” के मंसूबे और तेल-गैस पर कब्जे की लालसा से शुरू हुआ था, अब 20वें दिन में प्रवेश कर चुका है (28 फरवरी से शुरू, अब मार्च के तीसरे सप्ताह में). कोई “रेजीम चेंज” नहीं हुआ है. इसमें कोई शक नहीं कि ईरान ने असरदार जवाब दिया है – मिसाइल बैराज, क्लस्टर मुनिशन्स सहित तेल अवीव और इजरायल के केंद्रीय इलाकों पर हमले, खाड़ी देशों की ऊर्जा सुविधाओं पर हमले – और खाड़ी देश अमेरिकी ठिकानों को अपने यहां जगह देने की कीमत चुका रहे हैं. ट्रंप तक को यह स्वीकार करना पड़ा कि उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान इस तरह जवाब देगा. युद्धविराम की पेशकशें अब तक ईरान ने ठुकरा दी हैं. इजरायल ने इस युद्ध की आड़ में सीजफायर का उल्लंघन कर लेबनान पर भी हमला कर दिया है, जिसमें सैकड़ों निरपराध नागरिक मारे गए और 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. बेरूत को गाजा जैसा बना देने की धमकी दी जा रही है.

अमरीका-इजरायल का एक और युद्ध अपराध 

इस युद्ध की भयावहता से पूरी दुनिया पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. अमेरिका और इजरायल ने शुरू से ही लगातार युद्ध अपराध किए हैं – ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खामेनेई को 28 फरवरी को शुरूआती हमलों में मार डाला, उनके परिवार और शीर्ष कमांडरों को निशाना बनाया, मिनाब के एक स्कूल में 175 बच्चियों का जनसंहार किया, लगभग 2,000 आम नागरिकों की हत्या की, अस्पतालों और नागरिक व ऊर्जा ढांचों पर हमले किए, और अब सिक्योरिटी चीफ अली लारिजानी की हत्या कर दी (16-17 मार्च रात को तेहरान के पास इजरायली हमले में, साथ ही बासिज कमांडर घोलामरेजा सुलेमानी और इंटेलिजेंस मिनिस्टर इस्माइल खातिब भी मारे गए). ईरान के नेता बंकरों में नहीं छिपते. खामेनेई जानते थे कि वे निशाने पर हैं, फिर भी छिपे नहीं. लारिजानी तो युद्ध के बीचोबीच घूम रहे थे; हत्या के समय भी वे अपनी बेटी से मिलने गए थे.

ईरान में शहादत की संस्कृति रही है. इसलिए, यहां मरने की खबरों को दबाया नहीं जाता, बल्कि पुष्टि की जाती है और कई बार आंकड़े स्वयं जारी किए जाते हैं. वहीं, अमरीका अपने हताहत सैनिकों की संख्या कम दिखा रहा है (13 अमेरिकी सैनिक मारे गए, 200 घायल), और इजरायल में जो तबाही ईरान ने मचाई है उसके बारे तो कुछ भी जानकारी सेंसरशिप की वजह से नहीं आ रही है.

अमेरिका-इजरायल की तरफ से युद्ध ‘जीतने’ के लिए जो भी कोशिशें हो रही हैं, वे हालात और बदतर कर रही हैं. लारिजानी की हत्या के बाद ईरान में वही ‘बदला’ का टोन सुनाई दे रहा है जो खामनेई पर हमला होने के समय सुनाई देता था. सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका इस जंग में बुरी तरह फंस चुका है – यह अब उसके गले की हड्डी बन गया है; न निगल पा रहा है, न उगल पा रहा है. हालत यह है कि उसके अपने राइट-विंग समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा भी इस युद्ध के खिलाफ खड़ा हो गया है. अमेरिकी काउंटर-टेररिज्म हेड जो केंट ने इस्तीफा दे दिया, यह कहते हुए कि ईरान से अमेरिका को कोई तात्कालिक खतरा नहीं था, पर इजरायली लॉबी के दबाव में अमेरिका ने ‘इजरायल फर्स्ट’ नीति अपनाई. अमेरिका का बड़ा जनमत अब इस युद्ध के खिलाफ खड़ा है (ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 37-43% के बीच, डिसअप्रूवल 54-60% तक; कई पोल में नेगेटिव नेट रेटिंग – 13 से -20).

ईरान द्वारा होर्मुज जलसन्धि में अमेरिकी और सहयोगी जहाजों को रोकने का ऐलान सिर्फ सैन्य या राजनयिक विफलता नहीं है; यह वैश्विक भू-राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है. ट्रंप ने चीन, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस समेत सात प्रमुख देशों से अपील की कि वे होर्मुज को खुला रखने में अपनी नौसेनाएं भेजें. जवाब में मिली खामोशी कहीं ज्यादा प्रभावी संदेश लिए हुए थी. कोई भी देश अब तक अमेरिकी गठबंधन में शामिल नहीं हुआ, और जर्मनी व जापान जैसे पुराने सहयोगियों ने साफ तौर पर दूरी बना ली.

दूसरी तरफ, ईरान में माहौल बिल्कुल अलग है. हर दिन और हर रात बड़ी तादाद में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं – जैसे कोई त्योहार हो. पानी और चाय बांटी जा रही हैं, लोग हाथों में ईरान का परचम लिए निकल रहे हैं, कार रैलियां हो रही हैं. जनता में गहरा गुस्सा और जोश है – उनका कहना साफ है कि हमारे नेता को शहीद किया गया है, और बिना बदला लिए यह जंग नहीं रुकेगी. सड़कों पर जो नारा गूंज रहा है, वह भी यही है – न कोई साजिश, न कोई समझौता, न अमेरिका के सामने झुकना. लोगों की एक ही मांग है कि किसी भी समझौते के नाम पर बात खत्म न की जाए, बल्कि अमेरिका को उसकी औकात दिखाई जाए.

भरत समेत पूरी दुनिया में बढ़ता तेल संकट 

लारिजानी की हत्या के बाद की कार्रवाइयों ने बातचीत की जो थोड़ी-बहुत गुंजाइश बची थी, उसे भी खत्म कर दिया है. इसके बाद इजरायल द्वारा ईरान के सबसे बड़े गैस फील्ड (साउथ पार्स) पर हमला हालात और भड़का गया. जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों की रिफाइनरियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

इन घटनाओं के बीच दुनिया भर में तेल की कीमतें इस हफ्ते के आखिर तक 100-105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंची हैं (कुछ रिपोर्ट्स में 120 तक की आशंका, लेकिन वर्तमान में ~$100-103 ब्रेंट, WTI ~$93-97; युद्ध से पहले ~69 डॉलर). यह ध्यान देने वाली बात है कि ईरान के खिलाफ इस साम्राज्यवादी हमले से पहले कीमतें लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल थीं. यानी महज 20 दिनों में तेज उछाल आया है. यह बढ़ोतरी किसी असली कमी से ज्यादा, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका से पैदा हुई है (20% वैश्विक तेल और गैस इसी से गुजरता है – रूस के कुल उत्पादन से दोगुना). मौजूदा हालात में यह उछाल पूरे युद्ध काल तक जारी रह सकता है. और अटकलों को शांत करने के बजाय ट्रंप ने इस बढ़ोतरी को तवज्जो न देते हुए इसे युद्ध के लक्ष्यों को हासिल करने की “एक छोटी सी कीमत” तक बता दिया है.

अगर तेल के दाम इसी तरह लंबे समय तक बढ़ते रहे, तो यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देगा. इसकी मार सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि महंगाई का एक खतरनाक चक्र शुरू होगा, जिससे कोई नहीं बच पाएगा. तेल महंगा होते ही सबसे पहले खेती पर असर पड़ता है. खाद और डीजल महंगे होते हैं, जिससे अनाज उगाने की लागत बढ़ती है और सीधा असर हमारी थाली पर पड़ता है. इसके साथ ही, फैक्ट्रियों में बनने वाली हर छोटी-बड़ी चीज की लागत भी बढ़ जाती है, क्योंकि उत्पादन से लेकर माल ढुलाई तक हर चरण में महंगे ईंधन का इस्तेमाल होता है. साफ बात है, तेल की महंगाई एक ऐसी जंजीर है जो खेती, कारखाने और परिवहन – सबको अपनी चपेट में लेकर आम आदमी के निवाले को भी महंगा कर देती है.

दुनिया भर में तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट खड़ा कर सकती हैं. हमारे देश की जरूरत का लगभग 84% कच्चा तेल उसी समुद्री मार्ग – होर्मुज जलडमरूमध्य – से आता है, जहां आज युद्ध का खतरा मंडरा रहा है. यह संकट मोदी सरकार की नीतियों से और बढ़ा है. खबरें आईं कि भारत के विदेशमंत्री ने ईरानी समकक्ष से बातचीत की. भारत के दो जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई, पर ईरान ने स्पष्ट शर्त रखी कि भारत ने अमेरिकी इशारे पर जिन तीन ईरानी जहाजों को रोका था, उन्हें पहले छोड़ें. साथ ही, ईरान ने यह भी कहा कि भारत, ब्रिक्स देशों के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में, इस युद्ध के खिलाफ प्रस्ताव लेकर आए – जो पूरी तरह उचित है. लेकिन मोदी सरकार की तरफ से इस पर कोई जवाब नहीं आया.

अमेरिका की बात करें तो ट्रंप द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ देना हमारे आत्मसम्मान पर सीधी चोट है. आजादी के इतने साल बाद भी अगर एक संप्रभु देश को अपनी जरूरत का तेल खरीदने के लिए किसी और की अनुमति का इंतजार करना पड़े, तो यह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है. यह गुलामी है.

यह बेहद शर्मनाक है कि हमारी सरकार इस अपमान का विरोध करने के बजाय चुपचाप मान रही है – और यह भी तब, जब यह ‘इजाजत’ महज एक महीने की बताई गई है, जिसके बाद संकट और गहरा सकता है. अमेरिकी-इजरायली हमलों पर भारत की चुप्पी सिर्फ कूटनीतिक चूक नहीं, बल्कि देश के हितों के खिलाफ एक आत्मघाती रुख है. साथ ही, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय मजदूरों द्वारा भेजी जाने वाली लगभग 50 अरब डॉलर की सालाना रकम में भी तेज गिरावट आ सकती है, जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा सहारा है.

ईरान के सैन्य कमांडर तो तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंंचने की बात कर रहे हैं, जो भारत जैसे ‘तीसरी दुनिया’ के देशों के आम आदमी की कमर तोड़ देगा. ऐसे में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना खुद को बर्बादी की ओर धकेलना है; अब वक्त आ गया है कि दुनिया की जनता एकजुट होकर इस साम्राज्यवादी हमले को पीछे धकेले.

तटस्थता नहीं, इजरायल-अमरीका से साझेदारी

भारत की फासीवादी मोदी सरकार और पूरा शासक वर्ग 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके पिट्ठू इजरायल द्वारा चलाए जा रहे इस आपराधिक युद्ध में वास्तविक साझेदार बन चुका है. मोदी सरकार ने अगर कहीं ‘एकजुटता’ दिखाई है, तो वह उन राजशाही और निरंकुश खाड़ी देशों के साथ है, जो अपने यहां अमेरिकी सैन्य ठिकानों को पनाह देते हैं और जिनका इस्तेमाल ईरान की निगरानी और हमले के लिए किया जा रहा है. हद तो यह है कि नई दिल्ली ने जिस एकमात्र देश की खुलकर निंदा की, वह ईरान है – सिर्फ इसलिए कि उसने अपनी आत्मरक्षा का हक इस्तेमाल करने की हिम्मत दिखाई.

साथ ही, भारत पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका-समर्थित युद्ध-समर्थक प्रस्ताव का सह-प्रायोजक बन गया. संकल्प 2817 जो 11 मार्च 2026 को 13-0-2 वोट से पारित हुआ, उसमें अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए अवैध, बिना किसी उकसावे के बड़े पैमाने पर हमलों और उसके नेताओं पर ‘सिर कलम’ हमलों को पूरी तरह नजरअंदाज किया. जबकि कश्मीर, पहलगाम जैसे मुद्दों पर ईरान ने हमेशा यूएन में भारत का साथ दिया था.

इस प्रस्ताव का मकसद साफ था – तेहरान को हमलावर के बतौर पेश करना और ईरानी राज्य व उसके 9.3 करोड़ लोगों के खिलाफ छेड़े गए विनाशकारी युद्ध को अंतरराष्ट्रीय वैधता का आवरण देना. वाशिंगटन के खाड़ी सहयोगियों पर ईरान के जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों का हवाला देते हुए, भारत द्वारा समर्थित इस प्रस्ताव ने उल्टे पीड़ित ईरान को ही अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने और ‘अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा’ के लिए खतरा बताने की कोशिश की.

अपने पड़ोसी और सहयोगी ईरान का इस तरह बेरहमी से मोदी सरकार द्वारा साथ छोड़ देना कोई चौंकाने वाली बात नहीं है. इससे पहले भी भारत ने पिछले जून में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की निंदा करने से इनकार कर दिया था – वह हमला भी, आज की तरह, राजनयिक बातचीत के छलावे के बीच अंजाम दिया गया था.

2014 में सत्ता संभालने के बाद से मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति को पूरी तरह अमेरिका और इजरायल के खेमे में डाल दिया है. आज नई दिल्ली अमेरिकी साम्राज्यवाद के एक ‘अग्रिम दस्ते’ की तरह काम कर रही है. भारतीय शासक वर्ग महाशक्ति बनने के अपने लालच में वाशिंगटन के इशारों पर चीन के खिलाफ सैन्य मोर्चेबंदी में जुटा है. इसी जन-विरोधी, जायोनिस्ट गठजोड़ के बीच – और खुद ‘हिंदू राष्ट्र’ के अपने एजेंडे के साथ – मोदी ने इजरायल से रिश्ते उस दौर में और गहरे किए, जब ट्रंप और नेतन्याहू खुलकर ईरान पर हमले की साजिश रच रहे थे. मोदी ने अपनी इजरायल यात्रा भी ठीक उसी वक्त 25-26 फरवरी को की, जब ईरान पर बमबारी शुरू होने में 48 घंटे से भी कम का समय बचा था.

इस झूठ का पर्दाफाश जरूरी है 

आज इस सच्चाई को बेनकाब करना जरूरी है कि ईरान के खिलाफ छेड़े गए इस युद्ध में भारतीय हुक्मरान और शासक वर्ग भी बराबर के साझेदार हैं. मोदी सरकार अपनी इस काली भूमिका और साम्राज्यवादी ताकतों की बर्बरता में अपनी हिस्सेदारी को जनता से छिपाना चाहती है.

वे इस युद्ध के भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर से भी डरे हुए हैं. हालात ऐसे हैं कि ट्रंप के वैश्विक टैरिफ युद्ध ने पहले ही भारत की विकास दर को धीमा कर दिया है, और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, बढ़ती गरीबी और भूख के चलते सामाजिक गुस्सा तेजी से उभर रहा है. भारत फारस की खाड़ी क्षेत्र से तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर भारी निर्भर है. इसी संकट के बीच मोदी सरकार को आपात कदम उठाते हुए औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं से एलपीजी की आपूर्ति काटकर घरेलू उपभोक्ताओं की ओर मोड़नी पड़ी है, जो इसे खाना पकाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इसका सीधा असर छोटे-छोटे कारोबारी प्रतिष्ठानों पर पड़ा है – कई को अपने काम के घंटे घटाने पड़े हैं, और कई को आंशिक तौर पर ताला लगाना पड़ा है.

गैस सिलेंडर के लिए बढ़ती कतारों और जनता के गुस्से से ध्यान भटकाने के लिए मोदी सरकार, अपने अनुकूल कॉरपोरेट मीडिया के साथ मिलकर यह झूठ फैला रही है कि भारत एक ‘तटस्थ’ तीसरी ताकत है, जो शांति और राज्य की संप्रभुता जैसे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों की रक्षा कर रहा है. युद्ध शुरू होते ही भाजपा सरकार लगभग पूरी तरह खामोश रही. उसकी ओर से सिर्फ तीन-वाक्यों का बयान आया, जिसमें न तो अमेरिका का नाम था, न इजरायल का, और न ही उनके खुलेआम आक्रमण की कोई निंदा. उल्टे ‘संयम बरतने’ और ‘तनाव बढ़ाने से बचने’ की अपील की गई – यानी असल में तेहरान से कहा गया कि वह अमेरिकी-इजरायली हमले को चुपचाप सहन करे.

न उस समय, न बाद में, नई दिल्ली ने उस ‘सिर कलम’ हमले की निंदा की, जिसमें आयातुल्ला खामेनेई मारे गए – जो न सिर्फ ईरान के राष्ट्राध्यक्ष थे, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों शिया मुसलमानों के आध्यात्मिक नेता भी थे. इसी तरह, मिनाब के एक प्राथमिक स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले में 175 स्कूली बच्चियों और उनके शिक्षकों की हत्या पर भी भारत ने एक शब्द नहीं कहा.

भाजपा सरकार को यह तक करने में पांच दिन लग गए कि वह विदेश सचिव विक्रम मिस्री को नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास भेजकर संवेदना पुस्तिका पर हस्ताक्षर कराए. इसके बाद ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अरागची से फोन पर बात की. साफ लगता है कि इस न्यूनतम औपचारिकता के बिना उच्च-स्तरीय बातचीत संभव नहीं थी, इसलिए मजबूरी में यह कदम उठाया गया.

यह रवैया खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर ईरान के जवाबी हमलों को लेकर भाजपा सरकार की प्रतिक्रिया से बिल्कुल उलट है. 1 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने उसी दिन संयुक्त अरब अमीरात पर हुए हमले की, जिसमें कथित तौर पर चार लोगों की मौत हुई थी, तुरंत निंदा की और यूएई के राष्ट्रपति को फोन कर व्यक्तिगत संवेदना भी जताई. यह दोहरा रवैया साफ दिखाता है कि नई दिल्ली किसके साथ खड़ी है.

इसी तरह, नई दिल्ली ने आईआरआईएस डेना पर अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा किए गए टॉरपीडो हमले की भी कभी निंदा नहीं की, जिसमें 150 ईरानी नाविक मारे गए. ये वही नाविक थे, जो अभी-अभी भारतीय नौसेना के साथ एक अंतरराष्ट्रीय अभ्यास में शामिल होकर लौटे थे – ऐसे में नैतिक तौर पर तो कम से कम भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि वह इस हमले का विरोध करती.

भारतीय सैन्य और राष्ट्रीय सुरक्षा हलकों में अमेरिकी कार्रवाई को लेकर कुछ नाराजगी जरूर है, लेकिन उसका आधार भी सीमित है. असल शिकायत यह नहीं कि अमेरिका ने हमला किया, बल्कि यह कि उसने हिंद महासागर में कार्रवाई से पहले भारत से सलाह-मशविरा करना जरूरी नहीं समझा – जबकि पेंटागन अक्सर भारत को इस क्षेत्र में ‘सुरक्षा का भरोसेमंद साझेदार’ बताता रहा है. दरअसल यह घटना तो पूरे भारत की संप्रभुता को चुनौती है.

आज की यह चुप्पी भविष्य में और भी भयानक साबित हो सकती है. जब इस युद्ध की वजह से अमेरिका के भीतर महंगाई और मंदी बढ़ेगी और जनता का गुस्सा डोनाल्ड ट्रंप पर फूटेगा, तो वह अपनी साख बचाने के लिए ईरान पर परमाणु हमला करने जैसा आत्मघाती कदम उठा सकते हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका दुनिया का इकलौता देश है जिसने पहले भी परमाणु बमों से तबाही मचाई है, और इतिहास गवाह है कि वह कई बार दोबारा ऐसा करने की फिराक में रहा है. अगर आज दुनिया की सरकारों और आवाम ने अमेरिका की इस गुंडागर्दी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने के खिलाफ मजबूती से आवाज नहीं उठाई, तो परमाणु तबाही का वही मंजर फिर से हकीतत बन सकता है.

आज हम अभूतपूर्व समय को जी रहे हैं, जहां होर्मुज की लहरें कुछ कह रही हैं – अब वाशिंगटन के इशारे पर सब कुछ नहीं चल सकता. लगभग 600 वर्षों तक यूरोप और अमेरिका ने धरती पर शासन किया, उसके संसाधनों को लूटा और लोगों को दबाया. इस दौरान पश्चिमी उपनिवेशवाद लगभग पूरे विश्व में फैल गया. लेकिन वे दिन अब खत्म हो रहे हैं.

ईद से ठीक एक दिन पहले, ईरान ने एक कड़ा और साफ संदेश जारी किया है. उसने साफ किया कि यह सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लड़ी जा रही घिसावट की जंग है, जिसका पहला निशाना अमेरिका, इजरायली लॉबी और उनके अधीन काम करने वाले देश हैं. ईरान का कहना है कि उसकी कार्रवाई उन सभी ताकतों पर दबाव बढ़ाने के लिए है, जिन्होंने वेनेजुएला की तरह यह समझ लिया था कि उसके खिलाफ आक्रामकता आसानी से सफल हो जाएगी, और अब हर किसी को किसी न किसी रूप में इसकी कीमत चुकानी होगी. कहा है कि उसका मकसद गैर-पक्षधर देशों की जनता को भूखों मारना नहीं है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सख्त रुख अपनाया जाएगा, जहां केवल शुल्क देने वाले तटस्थ देशों को ही गुजरने की इजाजत मिल सकती है. ईरान ने इस पूरी लड़ाई को अमेरिकी घमंड और वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश बताया है, ताकि दुनिया एक ऐसे माफिया जैसी ताकत के दबदबे से मुक्त हो सके, जिसके पास न कोई नैतिकता है, न इंसानियत. इस संदेश में यह भी दोहराया गया कि जंग का केंद्रीय सवाल फिलिस्तीन की आजादी और जियोनिस्ट रंगभेदी राज्य के खात्मे से जुड़ा है, और दुनिया को चाहिए कि वह ईरान के साथ खड़ी हो और उसके बलिदानों का बोझ साझा करे.



21 March, 2026