वर्ष 35 / अंक - 13 / गाजा की नजर से दुनिया

गाजा की नजर से दुनिया

गाजा की नजर से दुनिया

-- क्रिस हेजेज

ईरान पर युद्ध और गाजा को मलबे के ढेर में बदल देना तो बस शुरुआत है. नए वर्ल्ड ऑर्डर में आपका स्वागत है – एक ऐसा दौर, जहां टेक्नोलॉजी आसमान छू रही है, लेकिन इंसानियत आदिम बर्बरता में गिर चुकी है. यहां कायदे-कानून सिर्फ कमजोरों के लिए हैं, ताकतवर तो हर कानून से ऊपर है. अगर आप इस ताकतवर सत्ता के आगे झुकने से इनकार करें, उसकी मनमानी को चुनौती दें, तो आपके हिस्से आती है – मिसाइलों और बमों की बारिश.

अस्पताल, स्कूल, यूनिवर्सिटी और रिहायशी इमारतें मलबे में तब्दील कर दी जाती हैं. डॉक्टर, छात्र, पत्रकार, कवि, लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार और राजनीतिक नेता – जिनमें वार्ता दलों के प्रमुख भी शामिल हैं – मिसाइलों और हत्यारे ड्रोनों द्वारा हजारों की तादाद में कत्ल किए जाते हैं.

संसाधनों की खुली लूट मची है – जैसा वेनेजुएला के लोग देख चुके हैं. और गाजा में तो खाना, पानी और दवाइयों को भी हथियार बना दिया गया है. साफ संदेश है : ‘उन्हें दाने-दाने को तरसाओ, धूल चाटने पर मजबूर करो.’

संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान अब महज दिखावा बनकर रह गए हैं – एक गुजरे दौर के बेकार अवशेष. व्यक्तिगत अधिकारों, खुली सरहदें और अंतरराष्ट्रीय कानून की मर्यादा – सब गायब कर दिए गए हैं.

इंसानी इतिहास के सबसे वहशी और दरिंदा नेता – जिन्होंने शहरों को राख में बदला, कैद आबादी को कत्लगाहों तक हांका, और कब्जाई गई जमीनों को सामूहिक कब्रों  और लाशों से भर दिया – वे अब और भी ज्यादा ताकत और बेशर्मी के साथ लौट आए हैं.

वे वही माचो, जहरीली मर्दानगी के जुमले दोहराते हैं. वही घटिया, नस्लभेदी जहर उगलते हैं. दुनिया को अच्छे-बुरे, काले-गोरे के दो खांचों में बांटकर देखते हैं. और वही बचकानी जुबान बोलते हैं – पूर्ण वर्चस्व और बेलगाम हिंसा की.

ये कातिल जोकर हैं. मसखरे. जाहिल. लेकिन सत्ता की लगाम इन्हीं के हाथ में है, ताकि अपनी सनक और कार्टून जैसे लगने वाले खौफनाक मंसूबों को अंजाम दे सकें – और साथ ही राज्य को लूटकर अपनी जेबें भर सकें.

पंकज मिश्रा अपनी किताब ‘द वर्ल्ड ऑफ्टर गाजा’ में लिखते हैं, “कई महीनों तक इस बर्बर सामूहिक जनसंहार को अपनी आंखों से देखने के बाद – और यह जानते हुए कि इसे ऐसे लोगों ने सोचा, अंजाम दिया और जायज ठहराया, जो हमारे जैसे ही दिखते हैं, और इसे एक सामूहिक जरूरत, वैध, बल्कि इंसानी काम बताकर पेश किया – तो अब लाखों लोगों को इस दुनिया में अपनापन कम महसूस होता है.”

वे आगे लिखते हैं, “इस तरह की एक खास आधुनिक बुराई से दोबारा सामना – ऐसी बुराई, जो पहले के दौर में सिर्फ सनकी दरिंदों तक सीमित थी, लेकिन पिछले सदी में अमीर और तथाकथित सभ्य समाजों के हुक्मरानों और आम लोगों द्वारा खुलेआम की गई – उसके सदमे को कम करके नहीं आंका जा सकता. और न ही उस नैतिक खाई को, जिसके सामने हम आज खड़े हैं.”

जिन्हें दबाया गया है, पराधीन बनाया गया है, वे अब इंसान नहीं – जायदाद हैं, माल हैं, जिन्हें मुनाफे या हवस के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. एप्स्टीन फाइल्स हुक्मरान तबके की इस बीमार और बेजान जमीर को बेनकाब करती हैं. लिबरल हों या कंजरवेटिव. यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट. अकादमिक. परोपकार के ठेकेदार. वॉल स्ट्रीट के दिग्गज. सेलिब्रिटीज. डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन – सब एक ही सड़े हुए ढांचे का हिस्सा हैं.

ये लोग बेलगाम ऐश-ओ-इशरत में डूबे हुए हैं. इनके बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल, इनके लिए अलग हेल्थ केयर. चाटुकारों, पीआर एजेंटों, फाइनेंशियल एडवाइजरों, वकीलों, नौकरों, ड्राइवरों, सेल्फ-हेल्प गुरुओं, प्लास्टिक सर्जनों और पर्सनल ट्रेनरों की परतों में ये खुद को एक बंद बुलबुले में कैद रखते हैं. कड़ी सुरक्षा वाले महलों में रहते हैं, प्राइवेट टापुओं पर छुट्टियां मनाते हैं. प्राइवेट जेट्स और विशाल यॉट्स पर घूमते हैं.

ये एक अलग ही हकीकत में जीते हैं – जिसे रिचिस्तान कहा गया है – एक ऐसी दुनिया, जहां अपने-अपने निजी ‘जन्नत’ बसाए गए हैं. वहीं ये नीरो जैसी रंगरलियां मनाते हैं, अपने गंदे सौदे करते हैं, अरबों जमा करते हैं, और जिनका इस्तेमाल कर लेते हैं – यहां तक कि बच्चों को भी – कचरे की तरह फेंक देते हैं.

इस बंद दायरे में किसी से कोई जवाबदेही नहीं. कोई गुनाह इतना घिनौना नहीं जो ये न करें. ये इंसानी शक्ल में परजीवी हैं. अपने फायदे के लिए राज्य को चीर-फाड़ देते हैं. धरती के ‘कमतर’ लोगों को दहशत में रखते हैं. और हमारी खुली समाज की जो आखिरी, कमजोर बची-खुची निशानियां हैं, उन्हें भी खत्म कर रहे हैं.

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास ‘नाइंटीन एटी-फोर (1984)’ में लिखा थाः

“जिंदगी के सफर में कोई जिज्ञासा नहीं बचेगी, हर तरह की खुशियां मिटा दी जाएंगी. लेकिन हमेशा – इसे कभी मत भूलना, विंस्टन – हमेशा सत्ता का नशा रहेगा, जो लगातार बढ़ता जाएगा, और भी गहरा और बारीक होता जाएगा. हर पल, हर घड़ी, बस जीत का रोमांच होगा – एक असहाय दुश्मन को अपने पैरों तले कुचलने का एहसास. अगर तुम भविष्य की तस्वीर देखना चाहते हो, तो कल्पना करो कि एक इंसानी चेहरे पर एक फौजी बूट लगातार पड़ रहा है – हमेशा के लिए.”

कानून, मुट्टी भर जजों के कुछ साहसी प्रयासों के बावजूद, जिन्हें जल्द ही हटा दिया जाएगा, अब दमन का हथियार बन चुका है. न्यायपालिका का काम सिर्फ दिखावटी मुकदमे चलाना रह गया है. मैंने जूलियन असांज के उत्पीड़न के दौरान लंदन की अदालतों में उस ‘डिकेंस-युग’ जैसी नौटंकी को कवर करने में काफी समय बिताया – थेम्स के किनारे एक ‘लुब्यांका’ (जेल) जैसा मंजर. हमारी अदालतें भी इससे बेहतर नहीं हैं. हमारा न्याय विभाग बदले की मशीन बन चुका है.

नकाबपोश, हथियारबंद गुंडे अमेरिका की सड़कों पर उतरते हैं और आम लोगों को मारते हैं – यहां तक कि अपने ही नागरिकों को. हुक्मरान अरबों डॉलर खर्च कर गोदामों को हिरासत केंद्रों और कंसंट्रेशन कैंपों में बदल रहे हैं. वे कहते हैं कि ये सिर्फ बिना कागजात वालों या अपराधियों के लिए हैं, लेकिन वैश्विक सत्ताधारी तबका झूठ ऐसे बोलता है जैसे सांस लेता है. उनकी नजर में हम या तो आंख मूंदकर आज्ञा मानने वाले हैं, या अपराधी – बीच का कोई रास्ता नहीं.

ये कंसंट्रेशन कैंप – जहां कानूनी प्रक्रिया का कोई वजूद नहीं, और लोग यूं ही ‘गायब’ कर दिए जाते हैं – असल में हमारे लिए ही बनाए जा रहे हैं. और ‘हम’ से मतलब है इस मृत हो चुके गणतंत्र के नागरिक.

फिर भी हम स्तब्ध, अविश्वास में डूबे, चुपचाप – अपनी ही गुलामी का इंतजार कर रहे हैं.

अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है.

ईरान, लेबनान और गाजा में जारी यह वहशियाना बर्बरता वही है, जिसका सामना हम अपने देश में कर रहे हैं. जो लोग जनसंहार, सामूहिक कत्लेआम और ईरान पर बेवजह थोपे गए युद्ध को अंजाम दे रहे हैं, वही लोग हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी तहस-नहस कर रहे हैं.

सामाजिक मानवविज्ञानी अर्जुन अप्पादुराई इस पूरी प्रक्रिया को ‘एक विशाल वैश्विक माल्थुसियन सुधार’ कहते हैं, जिसका मकसद “दुनिया को वैश्वीकरण के विजेताओं के लिए तैयार करना है, ताकि हारने वालों का ‘असहज शोर’ खामोश किया जा सके.”

अक्सर आलोचक कहते हैं – इतना निराशावादी मत बनो, इतना नेगेटिव मत सोचो. उम्मीद कहां है? असल में हालात इतने बुरे भी नहीं हैं.

अगर आप ऐसा मानते हैं, तो आप भी इस समस्या का हिस्सा हैं – जाने-अनजाने उस तेजी से मजबूत हो रहे फासीवादी निजाम की मशीनरी का एक पुर्जा.

हकीकत आखिरकार इन “उम्मीद भरी” कल्पनाओं को चकनाचूर कर देगी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

सच्ची मायूसी हकीकत को सही-सही समझने से नहीं आती. असली मायूसी तब आती है जब हम खतरनाक सत्ता के आगे – चाहे ख्वाबों में खोकर या उदासीनता में डूबकर – हार मान लेते हैं. असली मायूसी बेबसी है. और प्रतिरोध – अर्थपूर्ण प्रतिरोध – चाहे वह लगभग नाकाम ही क्यों न हो – इंसान को ताकत देता है. वह आत्मसम्मान देता है. वह गरिमा देता है. वह इंसान को अपने फैसले लेने की ताकत देता है. यही एक रास्ता है, जो हमें “उम्मीद” शब्द इस्तेमाल करने का हक देता है.

ईरान, लेबनान और फिलिस्तीन के लोग जानते हैं कि इन दरिंदों को मनाया नहीं जा सकता. वैश्विक अभिजात वर्ग किसी चीज पर यकीन नहीं करता. उन्हें कुछ महसूस नहीं होता. उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. उनमें हर साइकोपैथ जैसी खासियतें हैं – ऊपर-ऊपर की चमक, खुद को बहुत बड़ा समझना, लगातार उत्तेजना की चाह, झूठ, धोखा और चालाकी की आदत, और पछतावे या अपराधबोध का बिल्कुल अभाव. वे हमदर्दी, ईमानदारी, करुणा और कुर्बानी जैसे गुणों को कमजोरी समझते हैं. उनका उसूल है : “मैं, मेरा और मुझे.”

एरिक फ्रॉम ने ‘द सेन सोसाइटी’ में लिखा है : “यह हकीकत कि लाखों लोग एक ही तरह की बुराइयों में शामिल हैं, उन बुराइयों को अच्छाई नहीं बना देती. यह हकीकत कि वे एक ही तरह की गलतियां दोहरा रहे हैं, उन गलतियों को सच नहीं बना देती. और यह कि लाखों लोग एक ही मानसिक बीमारी का शिकार हैं, उन्हें स्वस्थ नहीं बना देती.”

हमने लगभग तीन साल से गाजा में इस साक्षात शैतानियत को देखा है. अब हम इसे लेबनान और ईरान में भी देख रहे हैं. और हम यह भी देख रहे हैं कि कैसे सियासी नेता और मीडिया इस बुराई को या तो जायज ठहराते हैं, या उस पर पर्दा डालते हैं.

‘न्यूयॉर्क टाइम्स’  ने बिल्कुल ऑरवेलियन अंदाज में – अपने पत्रकारों और संपादकों को एक आंतरिक मेमो भेजा, जिसमें गाजा के बारे में लिखते समय ‘रिफ्यूजी कैंप’, ‘कब्जा किया गया इलाका’, ‘नस्ली सफाया’ और ‘जनसंहार’ जैसे शब्दों से बचने को कहा गया.

जो लोग इस शैतानियत का नाम लेते हैं और इसकी निंदा करते हैं, उन्हें बदनाम किया जा रहा है, ब्लैकलिस्ट किया जा रहा है और यूनिवर्सिटी कैंपस व सार्वजनिक मंचों से बाहर फेंका जा रहा है. उन्हें गिरफ्तार और निर्वासित किया जा रहा है. हमारे ऊपर एक घुटन भरा सन्नाटा उतर रहा है – वही सन्नाटा जो हर तानाशाही निजाम की पहचान है.

अपना फर्ज निभाने में नाकाम रहिए, ईरान के खिलाफ युद्ध का गुणगान करने से इनकार कीजिए – और देखिए कि कैसे आपका ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है – जैसा कि एफ.सी.सी. के अध्यक्ष ब्रेंडन कैर ने प्रस्ताव दिया है.

हमारे दुश्मन हैं. लेकिन वे फिलिस्तीन में नहीं हैं. वे लेबनान में नहीं हैं. वे ईरान में नहीं हैं. वे यहीं हैं – हमारे बीच.

वे हमारी जिंदगी तय करते हैं. वे हमारे आदर्शों के गद्दार हैं. वे हमारे देश के गद्दार हैं. वे एक ऐसी दुनिया चाहते हैं, जहां कुछ मालिक हों और बाकी सब गुलाम. गाजा तो बस शुरुआत है. सुधार का कोई अंदरूनी रास्ता नहीं बचा है. हमारे पास बस दो ही रास्ते हैं – या तो प्रतिरोध करो, या आत्मसमर्पण करो.

अब यही दो विकल्प बचे हैं.

(क्रिस हेजेज पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त एक लेखक व पत्रकार हैं. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद – मनमोहन)


28 March, 2026