अयोध्या के राम मंदिर में चंदे और चढ़ावे की चोरी की खबरों के बीच उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ मंदिर में भी चढ़ावे में चोरी की सुगबुगाहट होने लगी थी.
इसी बीच बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष के वैयक्तिक सहायक (पीए) प्रमोद नौटियाल पर यह आरोप लगा कि उन्होंने चढ़ावे की गणना करते हुए पैसे की हेराफेरी की. यह भी आरोप है कि सीसीटीवी फुटेज में प्रमोद नौटियाल नोटों की गड़्डी बाहर ले जाते हुए देखे गए हैं. हालिया खबरों के अनुसार नौटियाल ने एक नहीं, कई बार चढ़ावे की चोरी की.
चढ़ावे की चोरी की खबरें आने के बाद नौटियाल को निलंबित कर दिया गया और 8 जुलाई को उनके विरुद्ध बद्रीनाथ थाने में बी.एन.एस. की धारा 306 और 316 (5) के तहत मुकदमा दर्ज करवाया गया और उसी दिन उन्हें निलंबित भी कर दिया गया. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है.
जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका कि प्रमोद नौटियाल, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष के वैयक्तिक सहायक (पीए) के पद पर तैनात थे. वे तीन अध्यक्षों के साथ इस भूमिका को निभा चुके थे. सवाल यह है कि जब वे मंदिर समिति के अध्यक्ष के पीए हैं तो उन्हें तो हर वक्त समिति के अध्यक्ष के साथ होना चाहिए था. अध्यक्ष देहरादून में बैठे हुए थे और उनके पीए बद्रीनाथ में चढ़ावे की गणना के लिए गणना अधिकारी की भूमिका में थे, यह कैसे संभव है? क्या पीए को बद्रीनाथ में तैनात करने का फैसला बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष का था? अगर यह फैसला अध्यक्ष का था तो ऐसा फैसला लेने के पीछे क्या तर्क है? यह फैसला तो अध्यक्ष को ही सवालों और शंका के घेरे में खड़ा करता है!
प्रमोद नौटियाल को निलंबित करने की बाद उनको मंदिर समिति के जोशीमठ कार्यालय से संबद्ध किया गया था. लेकिन वे वहां नहीं गए बल्कि बिना किसी सूचना और वैध अनुमति के ही गायब हो गए और फिर उनके नैनीताल हाईकोर्ट जाने की खबरें आई. हाईकोर्ट से उनको कोई राहत नहीं मिली. उसके बाद 13 जुलाई को उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. ऐसा लगता है कि निलंबन और गिरफ्तारी की बीच उन्हें हाईकोर्ट जा कर राहत पाने का अवसर प्रदान किया गया था और कोर्ट से राहत न मिल पाने के बाद ही गिरफ्तार किया गया.
बद्रीनाथ में मामला सिर्फ चढ़ावे के गबन पर ही नहीं ठहरा. चढ़ावे की चोरी के खुलासे के बाद यह भी खबर आई कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) को पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न बैंकों ने सीएसआर फंड के तहत 20 से 25 लैपटाॅप दिए थे, लेकिन उनका कोई पता ठिकाना नहीं है. इसी तरह दान में मिली दो एंबुलेंस और एक टेम्पो ट्रेवलर भी गायब पाया गया.
उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर, 1939 के बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम से संचालित होते हैं. इसमें समिति के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं. चूंकि लगभग पिछले एक दशक से उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है तो बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति में भी भाजपा के ही लोग काबिज हैं. इस दौरान बार-बार विवादों में समिति के क्रियाकलाप और गतिविधियां आती रही.
2023 में यह आरोप लगा कि केदारनाथ मंदिर के अंदर सोने की परत चढ़ाने के लिए एक दानदाता ने 228 किलो सोना दान किया और इस सोने में से बड़ी मात्रा का गबन करके मंदिर में पीतल और तांबे की प्लेटें चढ़ाई गयी. उत्तराखंड सरकार और मंदिर समिति सोने के गबन से लगातार इंकार करती रही पर यह आरोप रह-रह कर उठता रहता है. ज्योतिर्पीठ की शंकराचार्य अविमुक्तेश्वर नंद सरस्वती भी ऐसा आरोप लगा चुके हैं.
4 मई 2025 में भाजपा नेता हेमंत द्विवेदी को उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया. वे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के काफी करीबी बताए जाते हैं. 2009 से 2012 के बीच हेमंत द्विवेदी तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष थे. अध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल खासा विवादास्पद रहा था और उन पर घोटाले के आरोप भी लगे थे. इसके अलावा जमीन की धोखाधड़ी के आरोप भी उन पर लग चुके हैं और लैंड फ्रॉड का मुकदमा भी चल रहा है. इस विवादास्पद छवि के बावजूद उन्हें पुष्कर सिंह धामी से निकटता की वजह से ही मंदिर समिति के अध्यक्ष पद पर आरूढ़ कर दिया गया.
2026 के अप्रैल महीने में अखबारों में यह खबर आई कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष और भाजपा नेता विजय कपरुवाण अपनी पत्नी को मंदिर समिति का चपरासी दर्शा कर उनका वेतन आहरण कर रहे हैं.
हाल के दिनों में ही यह आरोप भी सामने आया कि केदारनाथ में वीआईपी यात्रियों की यात्रा, रहने और खाने-पीने का खर्च मंदिर समिति के पैसे से उठाया गया. कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी की पुत्री और भाजपा नेत्री नेहा जोशी और केदारनाथ की विधायक आशा नौटियाल का नाम उन वीआईपी लोगों में शुमार है, जिनकी केदारनाथ यात्रा का समूचा खर्च बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने उठाया, हालांकि वे दोनों ही इस आरोप से इंकार कर चुकी हैं. यह भी आरोप है कि जिन यात्रियों ने अपना खर्च स्वयं उठाया, बीकेटीसी के कर्मचारियों ने उनके नाम के भी बिल लगा दिए.
दान के पैसे का दुरुपयोग करते हुए इसे यात्रियों के लिए सुविधा जुटाने पर खर्च करने के बजाय मंदिर समिति के कार्यालयों के गैर-जरुरी स्थानान्तरण और फिजूलखर्ची में उड़ाने की बातें भी सामने आई हैं. एक खबर के अनुसार देहरादून के पाॅश इलाके कैनाल रोड में एक बेहद भव्य कार्यालय संचालित किया जा रहा था. 2025 में इसके मेंटिनेंस पर 15 लाख रूपया खर्च किया गया. फिर एकाएक इसे खाली कर ऋृषिकेश में एक किराए के भवन में दफ्तर शिफ्ट कर दिया गया. ऋृषिकेश में प्राइम लोकेशन पर बद्री-केदार मंदिर समिति के दो विश्राम गृह और कार्यालय पहले से मौजूद हैं, जिन्हें मरम्मत और रखरखाव की जरूरत है. लेकिन उन पर ध्यान देने और उनका उपयोग करने के बजाय एक नए किराए के भवन पर हजारों रूपए हर महीने व्यय किये जा रहे हैं.
भाजपा हिंदू धर्म की झंडाबरदार होने का दावा करती है. लेकिन अयोध्या के अलावा भाजपा की अगुवाई वाली बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के कार्यकाल में जिस तरह चढ़ावे की चोर से लेकर गबन, लूट और फिजूलखर्ची के मामले सामने आये हैं, उससे साफ है कि धर्म उसके लिए सिर्फ अवैध कमाई करने और सत्ता पर कब्जा करने की आड़ है.