वर्ष 35 / अंक - 13 / यह अरब दुनिया पर नियंत्रण के लिए अमेरिका और इजराइल...

यह अरब दुनिया पर नियंत्रण के लिए अमेरिका और इजराइल द्वारा थोपी गई वर्चस्व की लड़ाई है

यह अरब दुनिया पर नियंत्रण के लिए अमेरिका और इजराइल द्वारा थोपी गई वर्चस्व की लड़ाई है

[ पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर आधारित एक इंटरव्यू सीरीज के इस पहले भाग में ‘लिबरेशन’ ने अंतर्राष्ट्रीय संबंध समिति की प्रमुख और इजराइल की कम्युनिस्ट पार्टी की पोलितब्यूरो सदस्य रीम हजान से बात की. एक राजनीतिक कार्यकर्ता और अनुवादक रीम सीपीआई (कम्यनिस्ट पार्टी ऑफ इजराइल) के युवा और छात्र संगठनों में पली-बढ़ीं और ‘अल-इत्तिहाद’ अखबार की पूर्व निदेशक हैं. चर्चा का मुख्य केंद्र अमेरिका-इजराइल का ईरान पर युद्ध, एक औपनिवेशिक विश्व व्यवस्था थोपने का प्रयास, और फिलिस्तीन पर कब्जे तथा इस युद्ध के खिलाफ इजराइल के भीतर चल रहा घरेलू आंदोलन था.]


लिबरेशन : इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक सैन्य आक्रमण शुरू किया है, जिसके परिणामस्वरूप बच्चों सहित बड़ी संख्या में आम नागरिकों की जान गई है. आपको क्या लगता है कि इस युद्ध के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?

रीम हजान : इस युद्ध का उद्देश्य वह नहीं है जो वे बता रहे हैं. यह स्पष्ट है कि इसके पीछे कुछ और भी लक्ष्य हैं जिन्हें जाहिर नहीं किया गया है. इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा मौजूदा हर अंतर्राष्ट्रीय कानून का लगातार उल्लंघन यह दर्शाता है कि ये दो ऐसे देश हैं जिनके मन में किसी के लिए कोई सम्मान नहीं है, जिनकी कोई सीमाएं नहीं हैं, कोई हद नहीं है. यह केवल ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने का युद्ध नहीं है, यह इजराइल द्वारा अपने वर्चस्व को स्थापित करने का युद्ध है, ताकि ‘अब्राहम समझौते’ को पूरा किया जा सके और संपूर्ण पश्चिम एशिया पर इजराइल का नियंत्रण कायम हो सके; और इस तरह फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को समाप्त किया जा सके, ‘वेस्ट बैंक’ को अपने में मिलाया जा सके, और शायद एक फिलिस्तीनी राज्य के गठन पर बातचीत की जा सके. 1947 की विभाजन योजना (जो अपने आप में फिलिस्तीनी लोगों के लिए अन्यायपूर्ण थी) में भी परिभाषित सीमाओं के साथ दो-राज्य समाधान का प्रस्ताव रखा गया था. उसके बाद से इजराइल ने संयुक्त राष्ट्र के किसी भी प्रस्ताव का सम्मान नहीं किया है. यदि इजराइल के साथ-साथ एक फिलिस्तीनी राष्ट्र भी स्थापित हो गया होता, तो शायद अस्सी साल बाद आज हमें ये युद्ध देखने को नहीं मिलते. फिलिस्तीनी लोग न तो शरणार्थी बनते, और न ही उन्हें इस नरसंहार का सामना करना पड़ता. बेशक, हम ईरानी शासन का समर्थन नहीं करते, जिसने ईरान में कम्युनिस्ट साथियों और प्रगतिशील वामपंथियों को निशाना बनाया, उन्हें यातनाएं दीं और मार डाला.

लेकिन यह युद्ध वर्चस्व की लड़ाई है – तेल, व्यापार मार्गों और दक्षिण-पश्चिम एशिया तथा भूमध्य सागर पर नियंत्रण की लड़ाई है. अमेरिका के पास कई ऐसे सैन्य अड्डे हैं जिन्हें वह वर्षों से तैयार करता आ रहा है. यदि अरब देशों को नियंत्रित करना और उनकी संप्रभुता को नकारना नहीं, तो इन अड्डों का उद्देश्य क्या है? यदि अमेरिका और इजराइल यह सोचते हैं कि वे ईरान में शासन परिवर्तन के बहाने ऐसा कर सकते हैं, तो या तो वे बेहद अहंकारी हैं, या फिर उन्हें लगता है कि बाकी दुनिया नासमझ है. लेकिन अब दुनिया इस युद्ध के पीछे के असली इरादों पर सवाल उठाने लगी है. पिछले जून में, जिसे उन्होंने ‘12-दिवसीय युद्ध’ का नाम दिया था, उसका घोषित लक्ष्य ईरान की परमाणु क्षमताओं को नष्ट करना था. तब नेतन्याहू ने जीत की घोषणा की थी और दावा किया था कि ईरान की परमाणु क्षमताएं नष्ट हो चुकी हैं. हालाकि, ईरान से कथित परमाणु खतरे का जिक्र आज भी लगातार किया जाता है. साथ ही, ऐसे दावे भी लगातार सामने आते रहते हैं कि इजराइल के पास भी परमाणु क्षमताएं हैं, लेकिन वह इस बात को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वह ऐसे हथियारों का परिसीमन करने वाले किसी भी परमाणु समझौते का हिस्सा बनने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है जो कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन न करने की उसकी पुरानी नीति का ही विस्तार है. अमेरिका और इजराइल ने ईरानी वार्ताकार प्रतिनिधिमंडल की हत्या कर दी, जिसके साथ वे ठीक एक रात पहले ही बैठक कर रहे थे. बातचीत आगे बढ़ रही थी, और ऐसा लग रहा था कि दोनों पक्षों के बीच सहमति बन सकती है, लेकिन फिर इजराइल के पास युद्ध छेड़ने का क्या बहाना बचता? इससे पहले भी, कतर में हमास के एक वार्ताकार प्रतिनिधिमंडल की हत्या के रूप में ऐसी ही एक घटना घट चुकी है. ऐसा नहीं है कि हम हमास का समर्थन करते हैं, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय कानून का सरासर उल्लंघन है. यदि आपका इरादा किसी विवाद को सुलझाने का हो, तो आप इस तरह का बर्ताव नहीं करते. इजराइल विवाद का कोई समाधान नहीं चाहता. अन्यथा, वह अपने युद्धों के लिए मिलने वाली लगातार सैन्य सहायता और समर्थन को कैसे सही ठहरा पाएगा?

लिबरेशन : और आप इस युद्ध को दक्षिण विश्व में साम्राज्यवाद के व्यापक संदर्भ में कैसे देखती हैं?

रीम हजान : जब हम पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम एशिया में वर्चस्व की बात करते हैं, तो हर जगह पैटर्न एक जैसा ही है – साम्राज्यवाद को इन ठिकानों की जरूरत होती है, जैसे इजराइल. इजराइल और अमेरिका दोनों ही नियंत्रण और वर्चस्व के मुद्दे पर स्पष्टतः सहमत हैं. पिछले कुछ सालों में, हमने अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कमजोर होते देखा है, और यह भी कि कैसे लागू करने वाले तंत्रों की कमी ने इजराइली और अमेरिकी आक्रामकता का सामना कर रहे लोगों की मदद नहीं की. दक्षिण विश्व में साम्राज्यवाद सिर्फ प्रत्यक्ष रूप से ही मौजूद नहीं है. कांगो, सूडान, और पूरे अफ्रीका को प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच बनाने के तंत्र के तौर पर देखें. यही बात लैटिन अमेरिका पर भी लागू होती है – वेनेजुएला और क्यूबा. यही साम्राज्यवाद की मूल बात है जो वैश्विक वर्चस्व चाहता है, और जनता व संप्रभु राष्ट्रों के प्रतिरोध का दमन करता है. आप ईरान पर हमले और उसके कारण हुई तेल की कमी को तब तक नहीं समझ सकते, जब तक आप यह न समझ लें कि वेनेजुएला में क्या हुआ था. अमेरिका तेल की आपूर्ति सुरक्षित करना चाहता था – दूसरों को भले ही किल्लत का सामना करना पड़े, लेकिन अमेरिका को नहीं. आप क्यूबा की नाकेबंदी को या 7 अक्टूबर 2023 से पहले बीस सालों तक गाजा की घेराबंदी को नजरअंदाज नहीं कर सकते. साम्राज्यवाद की ये बुनियादी प्रक्रियाएं – लोगों को अधीन बनाना, राष्ट्रों को अधीन बनाना – आपस में जुड़ी हुई हैं. वे एक ही तर्क से सामने आती हैं : प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, लोगों को मातहत बनाना, और फिलिस्तीनियों, ईरानियों, क्यूबावासियों, वेनेजुएलावासियों को उनके आत्मनिर्णय के अधिकार से वंचित करना. हमारे लिए, यह सब आपस में जुड़ा हुआ है. जब हम ईरान पर युद्ध का विरोध करते हैं, तो हम क्यूबा का झंडा भी साथ रखते हैं, क्योंकि यह आक्रामकता का एकल तंत्र है. यह एक बहुत बड़ा युद्ध है. मैं आशावादी हूं, वे सफल नहीं होंगे. यह एक ऐसा तंत्र है जो खुद को ही निगल रहा है.

लिबरेशन : नेतन्याहू की सरकार लगातार बस्तियों का विस्तार करके, लोगों को भूखा रखकर, और गाजा के लोगों पर फौजी हमले करके फिलिस्तीनी मुद्दे को मिटाने की कोशिश कर रही है. आप फिलिस्तीन में बस्ती-उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के संदर्भ में ईरान के साथ इस युद्ध को कैसे समझते हैं?

रीम हजान : जब से यह युद्ध शुरू हुआ है, वेस्ट बैंक में दस से ज्यादा लोगों को बस्तियों में रहने वालों ने मार डाला है. 7 अक्टूबर 2023 के बाद से कब्जे वाले फिलिस्तीनी इलाकों, खासकर वेस्ट बैंक, में बस्तियों में रहने वालों के हमले बेतहाशा बढ़ गए हैं. जॉर्डन घाटी से बेडुइन समुदायों का विस्थापन एक बड़ी चुनौती बन गया है, यहां तक कि उन इजराइली एकजुटता समूहों के लिए भी जो उनकी रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं. यह एक बड़ी त्रासदी बनती जा रही है  असल में, यह वेस्ट बैंक का नृ-जातीय सफाया है. ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद यह और तेज हो गया है. एक हफ्ता पहले, तम्मून में कब्जावर फौज ने एक पूरे परिवार को मार डाला था, सिर्फ दो भाई बच पाए. फिर भी किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया गया है. इजराइल की दूसरी कार्रवाइयों की तरह ही, न तो बस्तियों में रहने वालों को और न ही सेना को किसी नतीजे का सामना करना पड़ता है. गाजा में हुए नरसंहार के लिए किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया गया है. जिन मंत्रियों ने नरसंहार के लिए उकसाया था, उन्हें कोई सजा नहीं मिली है. अभी हम जिस माहौल में जी रहे हैं, वह ऐसा ही है. अगर आप यहूदी नागरिक हैं, तो आपके लिए उकसाना, नफरत फैलाना और हिंसा करना पूरी तरह से कानूनी है. आप फिलिस्तीनियों के खिलाफ खुलेआम उकसा सकते हैं, जिनमें नागरिक, और हमारे सांसदों, स्थानीय अधिकारियों और मेयर जैसे चुने हुए प्रतिनिधि भी शामिल हैं. गाजा पर युद्ध के दौरान, युद्ध-विराम से पहले इजराइली जनता के विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से बंधकों को वापस लाने के मुद्दे पर हो रहे थे, जो बेशक जरूरी भी है. लेकिन दूसरी तरफ, इजराइल में जनता के मन-मिजाज को प्रदूषित कर दिया गया है. इजराइल के लोगों को यह समझने में काफी समय लगा कि हम किस बारे में बात कर रहे थे, और गाजा में नरसंहार और युद्ध को खत्म करने की मांग करने में भी उन्हें काफी समय लगा. पिछले तीन हफ्तों में, ईरान पर युद्ध के विरोध में प्रदर्शन बढ़े हैं – शुरू में पचास लोगों से बढ़कर अब सैकड़ों हो गए हैं. चुनाव नजदीक आ रहे हैं, और नेतन्याहू को हराने की उम्मीद है. हालाकि, जो विकल्प हैं वे भी मौलिक रूप से अलग नहीं हैं. वे उन्हें हटाना चाहते हैं, न कि युद्ध, कब्जे, और बसाहट तथा नवउदारवाद की नीतियों को. हमारी मुख्य चुनौती यह है कि राजनीतिक विमर्श और जनता की मानसिकता को कैसे बदला जाए ताकि यह समझा जा सके कि कब्जे, बसाहट और फासीवाद के साथ लोकतंत्र नहीं चल सकता है. हम इस लामबंदी को और व्यापक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. 28 मार्च को इस युद्ध के चार हफ्ते पूरे हो जाएंगे. हमें इजराइल और दुनिया भर में युद्ध विरोधी मोर्चे को और व्यापक बनाना होगा.

लिबरेशन : इजराइल में युद्ध विरोधी और व्यापक कब्जा विरोधी संघर्ष की क्या स्थिति है ?

रीम हजान : इजराइल में जनमत हकीकत का सामना नहीं करना चाहता. नेतन्याहू ने दिसंबर 2022 में सत्ता संभाली, और तुरंत विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, खासकर प्रस्तावित न्यायिक सुधारों के खिलाफ. तब से अब तक, इनमें से कई उपाय लागू किए जा चुके हैं, जिससे शक्तियों के पृथक्करण की व्यवस्था कमजोर हुई है और न्यायपालिका पर राजनेताओं का नियंत्रण बढ़ गया है. जनवरी से अक्टूबर 2023 तक कम्युनिस्ट पार्टी और ‘हदास’ ने जन-विमर्श को प्रभावित करना शुरू कर दिया, कब्जे और रंगभेद के खिलाफ नारे लगाए, और सभी के लिए समानता की मांग की. इजराइल के एक फिलिस्तीनी नागरिक के तौर पर, मेरे पास अपने यहूदी पड़ोसियों या सहकर्मियों की तुलना में कम अधिकार और कम हैसियत है. हालाकि 7 अक्टूबर के बाद तीखी प्रतिक्रिया हुई. सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया, लोगों को कार्यस्थलों और विश्वविद्यालयों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. अचानक सब कुछ बदल गया. इस युद्ध से पहले भी हम वेस्ट बैंक में बसाए गए लोगों की हिंसा और नृ-जातीय सफाए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन ईरान के साथ युद्ध ने बाकी सब कुछ पीछे छोड़ दिया है. बसावट वालों की हिंसा या यहूदी आतंकवाद, जैसा कि इसे आधिकारिक तौर पर कहा जाता है, बेरोक-टोक जारी है. ये मिलिशिया हैं. ये अपराधी लोग हैं. फिलिस्तीनियों पर अभी भी प्रशासनिक हिरासत लागू है, लेकिन 7 अक्टूबर के बाद से यह यहूदियों के लिए असल में खत्म हो गई है. सेना के गाजा, लेबनान और ईरान में व्यस्त होने के कारण बस्तियों में रहने वाले लोग और भी ज्यादा मनमानी से काम करते हैं. कब्जावर सेना वेस्ट बैंक में इस नृ-जातीय सफाए के विरोध में कुछ नहीं करती. जब वे खुद फिलिस्तीनियों को नहीं मारते, तो वे उन बस्तियों में रहने वालों की रक्षा करते हैं जो ऐसा करते हैं. यह बहुत ज्यादा सैन्यीकरण वाला समाज है. इजराइल और बस्तियों, दोनों में. हिंसा का सामान्य हो जाना युद्ध-विरोधी सक्रियता को बहुत मुश्किल बना देता है.

लिबरेशन : आखिर में, प्रगतिशील आंदोलनों के लिए आपका क्या संदेश है, खासकर इजराइल के अंदर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध-विरोधी, कब्जा-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी एकजुटता बनाने के लिए?

रीम हजान : मुझे लगता है कि यह बहुत जरूरी सवाल है और हम सभी के लिए यह एक संघर्ष है. चाहे भारत हो, इजराइल हो, जर्मनी हो या अमेरिका, हर जगह एक जैसी प्रक्रियाएं चल रही हैं. कम्युनिस्टों के तौर पर हमें पूरी तस्वीर देखनी चाहिए, और हम चीजों को आपस में जोड़ने में समर्थ हैं. लेकिन अगर हम अपने-अपने देशों में वह काम नहीं करेंगे जो हमें करना चाहिए, तो यह सिर्फ नारों तक ही सीमित रह जाएगा. हमें गठबंधन और तालमेल के जरिए अपने युद्ध-विरोधी, फासीवाद-विरोधी, कब्जा-विरोधी मोर्चे को और ज्यादा फैलाना होगा. कम्युनिस्ट पार्टी के तौर पर हम यही करते हैं. क्योंकि अगर हम इजराइल की सरकार नहीं बदलेंगे, तो हम कब्जा खत्म नहीं कर पाएंगे. हम फिलिस्तीनी लोगों के लिए, या यहां तक कि इजराइली लोगों के लिए भी, अपना फर्ज अदा नहीं कर पाएंगे. यह बात सभी देशों पर लागू होती है.

28 March, 2026