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यह सिर्फ परीक्षा पेपर लीक का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही का सवाल है – नेहा

यह सिर्फ परीक्षा पेपर लीक का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही का सवाल है – नेहा

जंतर-मंतर पर मेरी भूख हड़ताल का 17वां दिन 

हमारी परीक्षा व्यवस्था के संकट को सिर्फ ‘तकनीकी खराबी’ या एक और पेपर लीक कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सरकार में किसी को आगे आकर जवाब देना होगा.

हम नीट पेपर लीक और भारत की परीक्षा व्यवस्था के संकट के लिए जवाबदेही की मांग करते हुए अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 17वें दिन पर हैं. नीट पेपर लीक के बाद कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है.

ये युवा बिल्कुल हमारी तरह थे – जिनके पास सपने, महत्वाकांक्षाएं और भविष्य के लिए उम्मीदें थीं. उनके परिवार थे जो उनसे प्यार करते थे, दोस्त थे जो उनके साथ खड़े थे, और ऐसे सपने थे जिन्हें उन्होंने सालों से संजोया था. वे डाॅक्टर बनना चाहते थे और एक सम्मानजनक जीवन जीना चाहते थे. कुछ ने चिकित्सा के माध्यम से समाज की सेवा करने का सपना देखा था; कुछ शोधकर्ता बनने की उम्मीद कर रहे थे; कुछ शिक्षा के माध्यम से अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते थे. उन सभी सपनों को अब चकनाचूर कर दिया गया है. उनकी जिंदगी को किसी रिपोर्ट में महज एक ठंडे आंकड़े तक सीमित नहीं किया जा सकता.

सवाल यह है: जिम्मेदार कौन है? जिम्मेदारी सिर्फ उन युवा जिंदगियों के नुकसान के लिए नहीं है, बल्कि उन लाखों छात्रों के लिए भी है जिन्होंने परीक्षा प्रणाली की विफलता के कारण चिंता, अनिश्चितता और अन्याय का सामना किया है. क्या ऐसे संकट को महज ‘तकनीकी खराबी’ या एक और पेपर लीक कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है? सरकार में किसी को आगे आकर जवाब देना होगा. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की स्थापना के बाद से, इसके द्वारा आयोजित शायद ही कोई बड़ी परीक्षा विवादों से बची हो. नीट इसका सबसे ताजा और शायद सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां तक कि इसी एजेंसी द्वारा आयोजित हालिया यूजीसी-नेट परीक्षा पर भी गंभीर सवाल उठे, जिसमें समाजशास्त्र के पेपर से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं, जब वे उस मंत्रालय के प्रमुख हैं जिसके तहत कई बड़ी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं?

जून 2015 में राजनाथ सिंह ने प्रेस के सामने घोषणा की थी, ‘यह यूपीए सरकार नहीं है, यह एनडीए सरकार है. यहां मंत्रियों को इस्तीफा नहीं देना पड़ता.’ तब से, इस सरकार ने यही रुख बनाए रखा है. लेकिन इस घोषणा का असल में क्या मतलब है? इसे सरकार की ओर से खुद को किसी भी तरह की राजनीतिक जवाबदेही या नैतिक जिम्मेदारी से ऊपर रखने की कोशिश के तौर पर ही देखा जा सकता है, जो लोकतंत्र की सबसे बुनियादी परिभाषा के ही खिलाफ है. एक लोकतांत्रिक सरकार को जिम्मेदार और वैध होना चाहिए, और धर्मेंद्र प्रधान ने सचमुच अपनी नैतिक वैधता खो दी है. उनके इस्तीफे की मांग के लिए ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए हर दिन जंतर-मंतर पर उमड़ने वाली हजारों की भीड़ इस बात का सबूत है.

जब मैं, मशहूर वैज्ञानिक सोनम वांगचुक और कई साथी छात्रों के साथ, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के एक और दिन में प्रवेश कर रही हूं, तो हमारा वजन कम हो गया है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. हम चिलचिलाती गर्मी, लगातार बारिश और दमघोंटू उमस के बावजूद अपना विरोध जारी रखे हुए हैं. छात्रों, अभिभावकों, उम्मीदवारों और बुद्धिजीवियों से हमें जो समर्थन मिला है, वह बहुत उत्साहजनक रहा है. हमारे दो साथी भूख हड़तालियों को बिगड़ती सेहत के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, फिर भी आंदोलन जारी है.

इस स्थिति को एक ऐसी कहानी से बेहतर कोई चीज नहीं समझा सकती जो हममें से कई लोगों ने बचपन में सुनी या पढ़ी होगी. यह एक राजा की कहानी है, जिसके पास एक दिन दो बुनकर आते हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने जादुई कपड़े बनाए हैं जो ऐसे किसी भी व्यक्ति को दिखाई नहीं देंगे जो मूर्ख हो या अपने पद के लायक न हो. अयोग्य दिखने के डर से, राजा अपने दरबार में ये काल्पनिक कपड़े पहनता है. राजा के गुस्से से डरकर, उसके मंत्री और दरबारी उस अदृश्य कपड़े की सुंदरता की तारीफ करते हैं. लेकिन जब राजा बिना कुछ पहने सार्वजनिक जुलूस में निकलता है, तो आखिरकार एक बच्चा सच बोल पड़ता है – ‘राजा नंगा है!’

इस देश के छात्र हमेशा न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष में सबसे आगे रहे हैं. आजादी के आंदोलन से लेकर 1975 के आपातकाल-विरोधी आंदोलन और कई अन्य सामाजिक संघर्षों तक, छात्रों ने देश का इतिहास बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई है. तो फिर, हम कैसे चुप रह सकते हैं जब छात्रों की पूरी पीढ़ी का भविष्य खतरे में हो? हम लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना, व्यापक एकजुटता बनाना और अपनी आवाज उठाना तब तक जारी रखेंगे जब तक जवाबदेही तय नहीं हो जाती. हम यहां वह बात कहने आए हैं जो हर कोई जानता है, लेकिन बहुत से लोग कहने से डरते हैं – राजा नंगा है.
(‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से साभार)

– नेहा, ऑल इंडिया स्टूडेंटृस एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

18 July, 2026