क्या दुनिया को अब एक नई विश्व व्यवस्था की ओर धकेला जा रहा है? क्या संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ), संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी वैश्विक संस्थाएं अब अपना अस्तित्व खो रही हैं? यह तो आने वाला समय ही बताएगा पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपने दूसरे कार्यकाल में चलाए जा रहे एकतरफा टैरिफ युद्ध ने डब्ल्यूटीओ को अप्रसांगिक बना दिया है. इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के कई देशों के संश्रय ने 2001 में अफगानिस्तान, 2003 में ईराक, 2014 में सीरिया पर सैन्य हमला किया. 2015 में यमन पर भी अमेरिका ने सैन्य हस्त्क्षेप किया. अफगानिस्तान और ईराक पर अमेरिकी सेना का कब्जा दो दशक से ज्यादा रहा. 7 अक्तूबर 2023 से अमेरिकी सहयोग से फिलिस्तीन पर इजराइल द्वारा किया जा रहा कब्जा व जनसंहार अभी भी जारी है. वहीं दूसरी तरफ रूस द्वारा यूक्रेन पर सैन्य हमला और उसके इलाकों को कब्जा करने का अभियान भी अभी नहीं रुका है. अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ उसके सहयोगियों तथा रूस द्वारा किए गए इन सैन्य हमलों पर यूएनओ और यूएनएससी मूक दर्शक की भूमिका में हैं. इन स्थितियों ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक नई विश्व व्यवस्था के लिए बनी इन वैश्विक संस्थाओं को आज पूरी तरह से अप्रसांगिक बना दिया है.
भारत में कम्युनिस्टों, कई सामाजिक संस्थाओं, गरीब व मध्यम किसानों के प्रतिनिधि किसान संगठनों ने भारत सरकार से गेट वार्ताओं से बाहर आने और बाद में डब्ल्यूटीओ में शामिल न होने की अपील की थी. पर भारत का शासक वर्ग और हरित क्रांति से किसानों के बीच से उभरा नया कुलक वर्ग डब्ल्यूटीओ में शामिल होकर भारत के किसानों और उद्योगों की खुशहाली के सपने देख रहा था. क्या अब भी कोई शक बचा है कि गेट समझौता और डब्ल्यूटीओ साम्राज्यवादी बहेलियों और विकसित राष्ट्रों द्वारा बिछाया गया एक जाल मात्र था, जिसमें विकासशील और सबसे कम विकसित देशों को भूखे पक्षियों की तरह दाने का लालच देकर फंसाया गया. आज जब दुनिया के ज्यादातर विकासशील व अति पिछड़े देश साम्राज्यवादियों द्वारा बिछाए गए इस जाल में बुरी तरह फंस चुके हैं, तो अब अमेरिकी साम्राज्यवाद और विकसित राष्ट्रों द्वारा उनका आसान शिकार करना शुरू कर दिया गया गया है. जो अमेरिका एक समय तक डब्ल्यूटीओ में शामिल होने की शर्त पर ही विकासशील व अति पिछड़े देशों को मदद देने के लिए दबाव बनाता था, वही आज डब्ल्यूटीओ को ठेंगा दिखा कर इन देशों को अपनी व्यापार शर्तों को मानने के लिए खुले आम धमका रहा है.
गेट समझौता की शुरुआत 1947 में हुई थी. इसका मकसद था दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तबाह हुई विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए आपसी व्यापार को बढ़ावा देना, व्यापारिक बाधाओं जैसे टैरिफ और कोटे को कम करना और मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करना ताकि उनकी अर्थव्यवस्था में स्थिरता और सहयोग बढ़ सके. पर जल्द ही इन विकसित देशों ने विकासशील और अति पिछड़े देशों को भी इसमें शामिल करने की योजना बना ली. इसके लिए गेट वार्ताओं को आगे के लिए भी जारी रखा गया. भारत गेटवार्ता में 1948 से शामिल हो गया था. लगभग 30 वर्षों तक चले कई दौर की वार्ताओं के बाद दुनिया के देश एक व्यापार समझौते पर पहुंच सके. इस नए समझौते से गेट समझौते की जगह 1996 में विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया. 1947 में हुए गेट समझौते में कुल 23 विकसित देश शामिल थे. जबकि 30 वर्षों की वार्ताओं के बाद जब 1996 में यह डब्ल्यूटीओ में परिवर्तित हुआ, तो इसमें हस्ताक्षर करने वाले देशों की संख्या 123 हो चुकी थी. इस समय इसमें शामिल सदस्य देशों की संख्या दुनिया के कुल 195 देशों में से 164 तक पहुंच चुकी है.
विश्व व्यापार संगठन में लम्बी बहसों के बाद विकासशील और सबसे कम विकसित देशों (LDCs) को विकसित देशों के साथ व्यापार में टिके रहने के लिए कई तरह के संरक्षण और विशेष प्रावधान प्रदान किए गए थे. इन्हें “विशेषऔर भिन्न व्यवहार” (Special and Differential Treatment & SDT) के रूपमें जाना जाता है. जैसे –
1. लंबी समयावधि और लचीलापन : विकासशील देशों को डब्ल्यूटीओ समझौतों और प्रतिबद्धताओं को लागू करने के लिए लंबी समयावधि दी जाती है. इससे उन्हें अपनी आर्थिक और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने का समय मिलता है.
2. गैर-पारस्परिकता का सिद्धांत : गेट समझौते के भाग 4 में “गैर-पारस्परिकता” (Non-reciprocity) का प्रावधान है, जिसके तहत विकसित देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे विकासशील देशों को व्यापार रियायतें दें, बिना यह अपेक्षा किए कि विकासशील देश समान रियायतें प्रदान करें.
3. प्राथमिकता आधारित बाजार पहुंच : विकसित देश विकासशील और LDCs को सामान्यीकृत प्राथमिकता प्रणाली (Generalized System of Preferences - GSP) के तहत कम या शून्य शुल्क पर अपने बाजारों में पहुंच प्रदान करें. यह प्रणाली विकासशील देशों के निर्यात को बढ़ावा देती है. LDCs को विशेष रूप से ड्यूटी-मुक्त और कोटा-मुक्त बाजार पहुंच प्रदान की जाती है, ताकि उनके निर्यात को बढ़ावा मिले.
4. तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण : डब्ल्यूटीओ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन, जैसे विश्व बैंक, विकासशील देशों को व्यापार-संबंधी तकनीकी सहायता प्रदान करेंगे. इसमें प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे का विकास और व्यापार नीतियों को लागू करने में सहायता शामिल है. एड फॉर ट्रेड (Aid for Trade) पहल के तहत विकासशील देशों को व्यापार क्षमता बढ़ाने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता दिए जाने का प्रावधान है. 2006 से 2023 तक इस पहल के तहत लगभग 650 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की गई थी.
5. विशेष छूट और संरक्षण : विकासशील देशों को कुछ मामलों में डब्ल्यूटीओ नियमों से छूट देने का प्रावधान था, जैसे कि सब्सिडी देने या आयात प्रतिबंध लगाने की अनुमति, जो उनकी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने या विशिष्ट उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए हो. उदाहरण के लिए, गेट समझौते का अनुच्छेद XVIII विकासशील देशों को भुगतान संतुलन की समस्याओं या उद्योग विकास के लिए आयात प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है. LDCs को कई डब्ल्यूटीओ प्रावधानों से पूर्ण छूट दी जाती है.
6. बाजार पहुंच के अवसर : डब्ल्यूटीओ समझौते में विकासशील देशों के लिए व्यापार अवसर बढ़ाने के लिए प्रावधान किए गए, जैसे कि कपड़ा, सेवाओं और तकनीकी व्यापार संबंधी बाधाओं में कमी करना. विकसित देशों को विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए कुछ घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उपायों को अपनाने का प्रावधान रखा गया.
7. विशेष समितियाँ और निगरानी : डब्ल्यूटीओ की ट्रेड एंड डेवलपमेंट कमेटी और LDC उप-समिति विकासशील और LDCs के व्यापार-संबंधी मुद्दों पर ध्यान देने के लिए बनाई गयी थी. इन समितियों को उनकी समस्याओं को हल करने और व्यापार में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए काम करना होता है.बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (2013) में SDT प्रावधानों की समीक्षा और कार्यान्वयन के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित किया गया था.
8. क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में प्राथमिकता : विकासशील देशों को क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (जैसे यूरोपीय यूनियनके साथ Economic Partnership Agreement) में विशेष रियायतें देने के प्रावधान हैं, जो उनके निर्यात को बढ़ावा देती हैं.
डब्ल्यूटीओ के समझौते में विकासशील और अति पिछड़े देशों के लिए लम्बे संघर्ष के बाद किए गए विशेष संरक्षण के इन प्रावधानों की आज अमेरिका खुलेआम अवहेलना कर रहा है. मगर न तो भारत सरकार अमेरिका की इस दादागिरी के खिलाफ डब्ल्यूटीओ में कोई शिकायत दर्ज कर रही है और न ही डब्ल्यूटीओ अपने नियमों की खुलेआम अवहेलना करने वाले अमेरिका के खिलाफ कोई कदम उठा रहा है. डब्ल्यूटीओ में मौजूद प्रावधानों के अनुसार भारत जैसे विकासशील देश अपने किसानों और लघु उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात में मात्रात्मक प्रतिबन्ध के कानून बना सकते हैं. इस कानून के रहने से हमारी जरूरत के लिए कम पड़ रहे सिर्फ उन्हीं उत्पादों का आयात बाहर से किया जाएगा जिनकी जितनी हमें जरूरत है. जिन वस्तुओं या कृषि उपजों का उत्पादन हमारी जरूरत के अनुसार देश में हो रहा है, उसे आयात नहीं किया जाएगा. हमारे देश में मात्रात्मक प्रतिबन्ध का यह कानून सन् 2000 तक मौजूद था. मगर भाजपा के नेतृत्व वाली अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने अमेरिका के दबाव में भारत के मात्रात्मक प्रतिबन्ध के कानून को खत्म कर कृषि जिंसों और लघु उद्योगों के उत्पादों के लिए देश के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए थे. अटल सरकार के इस फैसले का खामियाजा आज भारत झेल रहा है जिसने भारत की खेती किसानी और लघु उद्योगों को तबाही की दिशा में धकेला.
अब समय आ गया है कि भारत सरकार अमेरिका के आगे घुटने टेकने से बाज आए. भारत की खेती और लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए फिर से आयात के लिए मात्रात्मक प्रतिबन्ध का कानून बनाए. डब्ल्यूटीओ में अमेरिका की इस मनमानी को रोकने के लिए अपील करे. शिकायत के बाद भी डब्ल्यूटीओ द्वारा अमेरिका के खिलाफ कोई कार्यवाही न करने पर विरोध स्वरूप डब्ल्यूटीओ से बाहर निकलने का साहसिक फैसला ले. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी का देश और सबसे बड़ा बाजार है. सीआइए वर्ल्ड फैक्ट बुक के नवीनतम सर्वे के अनुसार भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र 1753693 वर्ग कि. मी. है. इसके बाद क्रमशः अमेरिका 1652028 वर्ग किमी और चीन 1084461 वर्ग किमी आता है. हमारे देश में 20 अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्र हैं. दुनिया भर में मौजूद 60 मिट्टी किस्मों में से भारत में 46 मिट्टी किस्में मौजूद हैं. इसलिए भारत की मिट्टी व जलवायु में दुनिया में पैदा होने वाले ज्यादातर उत्पादों को पैदा करने की क्षमता है. ऐसे में दुनिया के ज्यादातर देश भारत से रिश्तों में आगे बढ़ने को तैयार होंगे. अमेरिका-इजराइल की दोस्ती और अपनी वाहवाही के चक्कर में मोदी सरकार ने न सिर्फ भारत को हमारे पड़ोसियों से दूर किया है बल्कि दुनिया के पैमाने पर भारत जैसे महान देश को अलगाव में धकेला है. हमें अमेरिका इजराइल धुरी से बाहर निकलने और फिर से भारत के गौरव को लौटाने के लिए एक बड़े राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की जरूरत है.
कई अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार समझौते भी मौजूद हैं
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अलावा कई क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार समझौते मौजूद हैं, जो सम्बंधित देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने, टैरिफ कम करने और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के लिए बनाए गए हैं. ये समझौते या तो क्षेत्रीय या बहुपक्षीय (वैश्विक स्तर पर कुछ देशों के बीच) हो सकते हैं. प्रमुख क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार समझौतों की सूची जो डब्ल्यूटीओ से अलग हैं और अभी लागू हैंः
1. यूरोपीय संघ (एरोपीयन यूनियन - ईयू) 27 सदस्य देशों का एक एकीकृत आर्थिक और व्यापारिक ब्लॉक है, जो एकल बाजार (सिंगल मार्केट) के रूप में कार्य करता है. इसमें माल, सेवाओं, पूंजी, और श्रम की स्वतंत्र आवाजाही शामिल है. ईयू के पास एक सामान्य सीमा शुल्क नीति है और यह अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करता है. जैसे ईयू-जापान आर्थिक भागीदारी समझौता (2019), ईयू-कनाडा व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA-2017).
2. उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता (USMCA), यह समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, और मैक्सिको के बीच 2020 में लागू हुआ. यह NAFTA (North American Free Trade Agreement) का अद्यतन संस्करण है. यह उत्तरी अमेरिका में टैरिफ-मुक्त व्यापार को बढ़ावा देता है और डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा, और श्रम मानकों को शामिल करता है.
3. व्यापक और प्रगतिशील ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी (CPTPP) यह 11 देशों (जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, ब्रुनेई, चिली, पेरू, और मैक्सिको) के बीच 2018 में लागू हुआ. यह मूल रूप से TPP (Trans & Pacific Partnership) था, जिसमें से अमेरिका 2017 में हट गया. यह प्रशांत क्षेत्र में व्यापार नियमों को मानकीकृत करता है, टैरिफ कम करता है, और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करता है. कुछ अन्य देश जैसे यूके, दक्षिण कोरिया इसमें शामिल होने की प्रक्रिया में हैं.
4. क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP), यह 15 एशिया-प्रशांत देशों (चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, और ASEAN के 10 देश – इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार, कंबोडिया) के बीच 2022 में लागू हुआ. यह विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता है, जो वैश्विक GDP का लगभग 30% कवर करता है. भारत ने 2019 में RCEP से बाहर होने का फैसला किया, लेकिन यह समझौता एशिया में व्यापार को आकार दे रहा है.
5. ASEAN मुक्त व्यापार क्षेत्र, यह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) के 10 सदस्य देशों के बीच 1992 में शुरू हुआ, जो क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देता है. यह ASEAN देशों के बीच टैरिफ को कम करता है और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देता है. ASEAN ने अन्य देशों के साथ FTAs भी किए हैं, जैसे ASEAN-चीन FTA, ASEAN-भारत FTA.
6. मर्कासुर (Mercosur), यह दक्षिण अमेरिकी देशों (ब्राजील, अर्जेंटीना, पराग्वे, उरुग्वे) के बीच 1991 में स्थापित. यह दक्षिण अमेरिका में एक सीमा शुल्क संघ के रूप में कार्य करता है और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देता है. मर्कासुर ने EU के साथ 2019 में एक व्यापार समझौता किया, जो 2025 तक लागू होने की प्रक्रिया में है.
7. अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AFCFTA), यह 54 अफ्रीकी देशों के बीच 2019 में लागू हुआ, जिसका उद्देश्य पूरे अफ्रीका में एकल बाजार बनाना है. AFCFTA कार्यान्वयन के शुरुआती चरण में है और इसे अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापार समझौता माना जाता है.
8. इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (IPEF), यह 2022 में अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुआ, जिसमें 14 देश (जैसे भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया) शामिल हैं. यह व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, स्वच्छ ऊर्जा, और कराधान जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर केंद्रित है, लेकिन यह पारंपरिक FTA नहीं है.
भारत कई क्षेत्रीय व्यापार समझौतों का हिस्सा है, जो WTO से अलग हैंः
1. भारत-ASEAN FTA, भारत और ASEAN देशों के बीच माल, सेवाओं, और निवेश पर समझौता.
2. भारत-जापान CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement), 2011 में लागू.
3. भारत-दक्षिण कोरिया CEPA, 2010 में लागू.
4. SAFTA (South Asian Free Trade Area), दक्षिण एशियाई देशों (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, आदि) के बीच व्यापार को बढ़ावा देता है.
5. भारत-यूएई ब्म्च्., 2022 में लागू, जो भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापार को बढ़ाता है.
6. भारत-ऑस्ट्रेलिया ECTA (Economic Cooperation and Trade Agreement), 2022 में लागू.
7. अभी हाल में यूके के साथ हुआ ट्रेड समझौता (FTA).
भारत को किसी भी व्यापार समझौते में शामिल होने के लिए अपनी सबसे बड़ी आबादी की आजीविका के हितों की रक्षा करनी होगी. देश की लगभग तीन चौथाई आबादी को प्रत्यक्ष आजीविका उपलब्ध कराने वाले भारत के कृषि क्षेत्र, लघु उद्योग और खुदरा व्यापार पर प्रतिकूल असर डालने वाले किसी भी समझौते में बंधना भारत के लिए विनाशकारी साबित होगा.