[ 20 जनवरी को खम्मम (आंध्र प्रदेश) में आयोजित सीपीआइ शताब्दी समापन सेमिनार में का. दीपंकर भट्टाचार्य का भाषण ]
कॉमरेड प्रेसिडेंट, कॉमरेड एम. ए. बेबी, कॉमरेड डी. राजा, कॉमरेड देवराजन, मंच पर मौजूद सभी साथी और यहां उपस्थित सीपीआई की नेशनल काउंसिल के तमाम साथियो! सबसे पहले, सीपीआई की सौवीं सालगिरह के इस ऐतिहासिक मौके पर मैं आप सबको इंकलाबी सलाम पेश करता हूं, और पूरे देशभर के सभी कॉमरेडों को भी मेरा गर्मजोशी भरा इंकलाबी सलाम!
और मैं आपको यह बताऊं कि जैसे आप लोगों ने 2025 में और अभी तक शताब्दी वर्ष मनाया है, हमारी पार्टी ने भी मनाया है. हमने भी पूरे देश में साल भर संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन के 100 साल इसी हिसाब से मनाने का काम किया.
दरअसल कल इसी समय मैं मऊ में था – कॉमरेड अतुल अंजान के जिला मऊ में. वहां भी इसी तरह की एक मीटिंग हो रही थी. हमारी पार्टी का पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश का पार्टी स्कूल भी वहीं चल रहा था, और वहीं से मैं यहां आ रहा हूं. इस शताब्दी के मौके पर पूरे देश के कम्युनिस्टों को, और एक संगठन के तौर पर सीपीआई को, बहुत-बहुत बधाई और क्रांतिकारी सलाम.
दूसरा, यह खम्मम है, यह तेलंगाना है, और भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के जो 100 साल हैं, जब भी हम इनकी चर्चा करेंगे, शायद सबसे पहले जो नाम आएगा वो तेलंगाना का आएगा. और नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह के बाद 1969 में जब हमारी भी पार्टी बनी, तब से लगातार जब भी हम देश में कम्युनिस्ट आंदोलन की चर्चा करते हैं, तीन नाम हम एक साथ लेते हैं – तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी. ये तीनों भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में, किसान आंदोलन में, क्रांतिकारी आंदोलन में पूरे शानदार, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के गौरवशाली अध्याय हैं.
और इसीलिए इस मौके पर तेलंगाना के तमाम शहीदों को, तेलंगाना के तमाम नेताओं को, खासतौर पर उस पूरी जनरेशन को मेरा लाल सलाम! चाहे बासवापुनैया हों या सुंदरैया हों. उनसे मिलने का मौका नहीं मिला, लेकिन कॉमरेड सी राजेश्वर राव से मिलने का और बात करने का मौका मिला. कॉमरेड सुधाकर रेड्डी से बात करने का मौका मिला. तेलंगाना के बहुत सारे नेताओं से मिलने का मौका मिला. तेलंगाना आंदोलन से जुड़े तमाम शहीदों को, साथियों को, उन तमाम लोगों को मेरा लाल सलाम!
जाहिर सी बात है कि हम लोग आज जो बात कर रहे हैं – आज का भारत, 100 साल का इतिहास हम पार करके आए हैं. आज का भारत और हमारे सामने क्या चुनौतियां हैं? आज के भारत की बात करें, तो हम आपको कुछ तस्वीरें टुकड़ों में दिखाना चाहते हैं.
अगर आप एक प्रवासी मजदूर हैं – खासतौर पर अगर आप बंगाली बोलने वाले प्रवासी मजदूर हैं, और अगर आप बंगाली बोलने वाले मुस्लिम प्रवासी मजदूर हैं, तो आज इस देश में आप बहुत बड़े खतरे में हैं. इस देश के किसी भी कोने में, कहीं भी, आपको पकड़कर आपकी हत्या कर दी जा सकती है. यही है आज का भारत.
आज के भारत का मतलब यह है कि कोई भी प्रवासी मजदूर मारा जा सकता है. और हमने केरल में देखा है आपको बंगाली बोलने वाला प्रवासी मजदूर होना जरूरी नहीं है, आपको मुस्लिम प्रवासी मजदूर होना जरूरी नहीं है, आप छत्तीसगढ़ के रामनारायण बघेल भी हो सकते हैं. रामनारायण बघेल को बांग्लादेशी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन केरल में उसकी हत्या कर दी जाती है. यही है आज का भारत.
आज अगर हमें देश की स्थिति पर सोचना है, तो त्रिपुरा के एक नौजवान – एंजेल चकमा – का जिक्र जरूरी है. त्रिपुरा का एक आदिवासी नौजवान, जो एमबीए की पढ़ाई कर रहा था, जिसका पिता बीएसएफ में है, और जो उत्तराखंड के देहरादून में पढ़ रहा था. उसकी हत्या कर दी जाती है यह कहकर कि तुम्हारा चेहरा चीनी जैसा लगता है. अगर आप पूर्वात्तर से हैं, तो आपको यह कहकर मारा जा सकता है कि आप असल में चीनी हैं.
अभी उत्तर प्रदेश के बरेली से खबर आई है – 12 लोगों को, जो अपने घर में नमाज अदा कर रहे थे, गिरफ्तार किया गया, हिरासत में लिया गया. क्यों? क्योंकि आपने अपने घर को धार्मिक पूजा के लिए इस्तेमाल किया है. यह तो हैरान करने वाली बात है. इस हिंदुस्तान में कितने हिंदू घर हैं, जहां घर में पूजा होती है, किसी न किसी देवी-देवता की फोटो या मूर्ति होती है. क्या कल यह भी शुरू हो जाएगा कि घर में आप पूजा नहीं कर सकते? जबकि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है.
इस बार के क्रिसमस में हमने देखा कि पूरे देश के हर कोने में आप क्रिसमस नहीं मना सकते. अगर आपको सांता क्लॉज का चेहरा दिख जाए, तो उससे आपको खतरा महसूस होता है, उसमें आपको नफरत दिखाई देती है. जबकि सांता क्लॉज को पूरी दुनिया में लोग, खासकर बच्चे शांति, खुशी और प्यार के लिए जानते हैं. यह जो पूरे देश की स्थिति बनी हुई है, उससे यह समझना कठिन नहीं है कि हम कहां जा रहे हैं.
संसद में कैसे-कैसे कानून पारित हो रहे हैं – कितनी चर्चा होती है, और फिर कैसे उन्हें पारित कर दिया जाता है. आपने देखा कि अभी परमाणु ऊर्जा का निजीकरण किया गया. क्यों? क्योंकि अडानी को अब परमाणु ऊर्जा में भी घुसना है. कोयला हो गया, सौर ऊर्जा हो गया, पवन ऊर्जा हो गया – अब शायद परमाणु ऊर्जा की बारी है. इसलिए परमाणु ऊर्जा का भी निजीकरण कर दो. कोई भी कानून बना दो.
अभी एक उच्च शिक्षा आयोग भारत का बनने वाला है. उसका नाम दिया गया है – विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान. पूरे देश की उच्च शिक्षा के लिए एक ही आयोग बनेगा, और उस एक आयोग के लिए कोई एक ज्ञानेश कुमार जैसा कोई मिल जाएगा. और फिर उस एक आयोग के जरिए पूरे हिंदुस्तान की उच्च शिक्षा पर कब्जा कर लिया जाएगा.
यह जो स्थिति है देश में, हमारे लिए यह बिल्कुल साफ है कि आज देश में हम जिसका सामना कर रहे हैं, वह है अर्थव्यवस्था पर कॉर्पारेट कब्जा और राजनीति व समाज पर फासीवादी कब्जा. कॉर्पारेट कब्जे की जब हम बात करते हैं, तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होती. सबको दिख रहा है. अडानी-अंबानी सबको दिख रहे हैं. लेकिन जब हम कहते हैं कि भारत में राजनीति और समाज पर भी फासीवादी कब्जा हो रहा है, तो बहुत सारे साथियों को अभी भी लगता है कि शायद आप कुछ ज्यादा बोल रहे हैं. अक्सर लोग पूछते हैं कि आप फासीवाद को लेकर भाषण दे रहे हैं. क्या फासीवाद के जमाने में फासीवाद पर भाषण दिया जा सकता है? आप इतना बोल पा रहे हैं, तो फासीवाद कहां से आ गया?
हम उन तमाम साथियों से कहते हैं – मान लीजिए, अगर हम आज बोल पा रहे हैं, अगर आपको यह दिखाई दे रहा है कि दीपंकर अभी भी बोल रहे हैं, कॉमरेड डी. राजा अभी भी बोल रहे हैं, कॉमरेड एम. ए. बेबी अभी भी बोल रहे हैं, तो आपको इतना ही नहीं देखना चाहिए. आपको यह भी दिखाई देना चाहिए कि हिडमा को जान से मार दिया गया. उसकी मां से वीडियो बनवाया गया कि वह बेटे से अपील करे कि बेटा घर लौट आए. वह मां वीडियो बनाकर अपील करती है कि घर लौट आओ, लेकिन बेटा लौटकर नहीं आता है, उसकी लाश आती है.
आपको यह भी देखना चाहिए कि अगर कॉमरेड एम. ए. बेबी बोल पा रहे हैं, तो वहीं उमर खालिद जेल में सड़ रहे हैं. आपको यह भी देखना चाहिए कि अगर डी. राजा बोल पा रहे हैं, तो सोनम वांगचुक को बोलने नहीं दिया जा रहा है, उन्हें जेल में सड़ाया जा रहा है. इसीलिए इंतजार मत कीजिए. उस दिन का इंतजार मत कीजिए, जब किसी के पास बोलने का कोई अधिकार नहीं होगा. अभी वक्त रहते इसको रोकने की कोशिश कीजिए.
कुछ लोग कह रहे हैं कि अभी संसद है, अभी चुनाव है. संसद है, लेकिन उस संसद में राहुल गांधी तक की संसद सदस्यता खत्म कर दी जाती है, एक मानहानि का मुकदमा लाकर. आपको संसद दिखाई दे रही है और कैसे आसानी से इस देश के किसी नेता की संसद की सदस्यता खत्म कर दी जा रही है, यह नहीं दिखाई दे रहा है. आपको चुनाव दिखाई देता है, लेकिन चुनाव आयोग नहीं दिखाई देता. आपको ईवीएम नहीं दिखाई देती. अभी 25 जनवरी को चुनाव आयोग ने कहा कि 25 जनवरी ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ है. हम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं, और उसी तरह 25 जनवरी को भारत के चुनाव आयोग का स्थापना दिवस, राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है. लेकिन आज स्थिति क्या है?
अभी एनआरसी चल रहा है. बिहार में एनआरसी हो चुका है. उस एनआरसी का क्या परिणाम निकला, आपने देखा है. और अभी 12 राज्यों में – नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में – एनआरसी चल रहा है. हिंदुस्तान का एक बहुत बड़ा हिस्सा बचा है. इन 12 राज्यों में 7 करोड़ लोगों का नाम सूची से चला गया है. पश्चिम बंगाल में ही करीब 60 लाख लोगों के नाम हटाए गए. डेढ़ करोड़ लोगों को सुनवाई के लिए बुलाया गया और कहा गया कि आपका नाम ठीक नहीं है, तार्किक विसंगति है. पूछा गया कि आपके परिवार में छह बच्चे कैसे हैं? छह बच्चों का एक पिता कैसे हो सकता है? तरह-तरह के सवाल किए गए. अमर्त्य सेन तक को एनआरसी की सुनवाई में बुलाया गया. सबको बुलाया जा रहा है.
यह मताधिकार छीनना है. मताधिकार छीना जा रहा है. हिटलर भी चुनाव के जरिए ही सत्ता में आया था. चुनाव जीतकर ही हिटलर बना, और चुनाव के बाद उन्होंने पूरे तंत्र को इस तरह बदला कि वहां एक राष्ट्र, एक पार्टी, एक नेता, एक राज्य बन गया. इसलिए हमें इसके लिए बहुत इंतजार नहीं करना चाहिए. अगर हमने अपने दिमाग में यह जर्मन पैमाना बैठा लिया कि जर्मनी में गैस चैंबर बने थे, 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई थी, और अभी हमारे यहां गैस चैंबर नहीं दिख रहे हैं, अभी 60 लाख का आंकड़ा नहीं आया है तो इसके लिए इंतजार मत कीजिए.
कम्युनिस्ट कभी इंतजार नहीं करते. कम्युनिस्टों का काम है वर्तमान में रहते हुए भविष्य का प्रतिनिधित्व करना और इतिहास से सबक लेना. इसीलिए मैं आज देश के तमाम वामपंथी साथियों से खास तौर पर अपील करता हूं कि यह जो फासीवादी कब्जे की पूरी प्रक्रिया चल रही है, अगर हम इसे अभी नहीं रोक पाए, तो जब यह कब्जा पूरा हो जाएगा, तब हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा. हम इस समय कब्जे की प्रक्रिया से जूझ रहे हैं, उसी से गुजर रहे हैं. इसके खिलाफ लड़ने का समय अभी है. समय रहते, जब तक थोड़ा-बहुत लोकतंत्र बचा है, थोड़ा-बहुत संविधान बचा है, और थोड़ी-बहुत बोलने की आजादी है – इन सबका सही इस्तेमाल करके हमें इसे रोकना चाहिए.
हम लोग अलग-अलग पार्टियों में हैं. बहुत सारे साथी कहते हैं कि हम एक पार्टी क्यों नहीं बन जाते? बिल्कुल बन सकते हैं. अगर 1925 में एक पार्टी बन सकती थी, तो 2030 में भी बन सकती है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि एक होकर क्या करना है. इस पर सोचिए. एक हो जाइए, एक हो जाइए – सिर्फ एक होने से बात नहीं बनेगी. एक होकर करना क्या है, यह ज्यादा जरूरी सवाल है. और अगर एक नहीं भी हैं, अगर चार अलग-अलग पार्टियां भी हैं, तब भी मिलकर बहुत कुछ किया जा सकता है. हमारी नजर इस पर होनी चाहिए कि करना क्या है?
मैं बस कुछ आंदोलनों की चर्चा करके अपनी बात खत्म करूंगा. अभी इस देश में पुराने इतिहास को याद करिए. 1925 में सीपीआई बनी, लेकिन 1920 में एआईटीयूसी का गठन हो चुका था. यानी सीपीआई बनने से पांच साल पहले ट्रेड यूनियन केंद्र का गठन हुआ था. पूरे आजादी के आंदोलन में ट्रेड यूनियन आंदोलनों का जबरदस्त दौर था. 1926 में इस देश में ट्रेड यूनियन एक्ट बना. यह कोई अंग्रेजों का तोहफा नहीं था. उस समय इस देश का जो मजदूर आंदोलन था, उसकी ताकत इतनी थी कि उसने अंग्रेजों को भी मजबूर कर दिया कि ट्रेड यूनियन के अधिकार के लिए कानून बनाया जाए.
आज जो चार श्रम संहिताएं थोप दी जा रही हैं, जो मनरेगा को खत्म करके नया कानून लाया गया है – हम अभी कॉमरेड बेबी से कह रहे थे कि हम इसे जी-राम-जी नहीं कहते. जी-राम-जी को कुछ लोग महात्मा गांधी बनाम राम के चक्कर में ले जाते हैं, हम उस बहस में नहीं जाते. जी-राम का मतलब है ग्राम. यह जो ‘विकसित भारत ग्राम’ का कानून आया है, सवाल यह है कि विकसित भारत जब बनेगा, तो उसमें ग्राम कहां रहेगा? ग्राम के बेरोजगार कहां रहेंगे? ग्राम के बेरोजगारों का क्या होगा? यह गांव का सवाल है, गांव के रोजगार का सवाल है.
और क्या यह सिर्फ गांव के रोजगार का ही सवाल है? आज जो उभरता हुआ हिंदुस्तान का मजदूर वर्ग है – इस साल के अंत में हमने देखा कि गिग वर्करों ने हड़ताल की. उस हड़ताल का कम से कम इतना असर तो हुआ कि जो ब्लिंकिट के मजदूरों पर 10 मिनट के भीतर डिलीवरी का दबाव था, उसमें उन्हें थोड़ा पीछे हटना पड़ा. सवाल यह है कि क्या हिंदुस्तान में फैलते और बदलते इस नए मजदूर वर्ग का कोई संगठित उभार हम पैदा कर सकते हैं – गांव से लेकर शहर तक? इस पर सोचना चाहिए, और इसी दिशा में कोशिश करनी चाहिए.
आज इस देश में समय-समय पर आप देखेंगे कि महिलाओं का जबरदस्त आंदोलन खड़ा हो रहा है. बलात्कारियों को खुली छूट है. बलात्कारियों को माला पहनाई जा रही है. ऑफेंडर को बेल दिया जा रहा है. राम रहीम को बार-बार पैरोल मिल रही है. लेकिन इसके बावजूद हम देखते हैं कि इस देश में कभी निर्भया, कभी अभया, कभी उत्तराखंड में अंकिता भंडारी – उसके बलात्कार और हत्या के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन खड़ा होता है. यह जो महिलाओं का आंदोलन है, उसमें कुछ लोग कह देते हैं कि यह एक घटना है, इसमें फांसी दे दो, इसमें सजा दे दो, और बस आंदोलन एक घटना बनकर रह जाता है.
क्या हम इस देश में इस समय एक बहुत बड़ा महिला आंदोलन खड़ा कर सकते हैं? क्योंकि अगर मनुस्मृति को संविधान बनाया गया, अगर वास्तविक फासीवादी कब्जा हुआ, जिसके बारे में बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि अगर भारत कभी हिंदू राज बना, अगर हिंदू राज भारत में वास्तविकता बना, तो वह सबसे बड़ी तबाही होगी – उस तबाही से सबसे ज्यादा टकराना इस देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं को पड़ेगा. और महिलाएं आज उसी टकराव में, आंदोलन में खड़ी हैं. सवाल यह है कि क्या महिला आंदोलन को हम एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में, एक ऊंचाई पर, एक बहुत बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में इस फासीवाद से निपटने के लिए विकसित कर सकते हैं? यह सवाल हमारे सामने है.
और क्या इस देश में इस समय दलित आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन, हम लोग, और ज्यादा नजदीक आ सकते हैं? आजादी के आंदोलन के दौर में 1930 और 1940 ऐसे दो दशक थे, जब बाबासाहेब अंबेडकर और कम्युनिस्ट पार्टी मिलकर काम कर रहे थे. बाबासाहेब अंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनी थी. उसी दौर में बाबासाहेब ने कहा था कि यह जो जाति है, वह श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है. अगर यह श्रमिकों का विभाजन है, तो श्रमिकों को एकजुट कैसे किया जाए?
जाहिर सी बात है कि एकजुट करने के लिए, एक तरफ आपको पूंजी से लड़ना पड़ेगा और दूसरी तरफ इस कास्ट सिस्टम से. और उसी दोहरी लड़ाई से बात बननी शुरू हो गई थी. अफसोस की बात है कि हमारे देश की यह एक बड़ी ट्रेजेडी रही है कि जो एकता बन सकती थी, जो बननी शुरू हो गई थी, वह बीच रास्ते में ही रुक गई. लोग अलग-अलग रास्तों पर चल पड़े. इसका नुकसान इस देश के दलित आंदोलन को भी हुआ और कम्युनिस्ट आंदोलन को भी. सवाल यह है कि आने वाले दिनों में, इस समय, क्या हम दलित आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन को और ज्यादा नजदीक ला सकते हैं?
आज इस देश में पर्यावरण एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है, और इसमें दम है. हिमालय के लोग जोशीमठ को बचाने के लिए लड़ रहे थे, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था. निकोबार तबाह हो रहा है, लेकिन निकोबार की आवाज हिंदुस्तान में नहीं गूंज रही है. लेकिन जब अरावली का सवाल उठा, तो पूरा राजस्थान, पूरा हरियाणा, पूरा एनसीआर, और पूरे मध्यम वर्ग के लोग भी आगे आए. सुप्रीम कोर्ट को भी पीछे हटना पड़ा. इसका मतलब क्या है? क्या हिंदुस्तान में जल, जंगल, जमीन का सवाल, पर्यावरण का सवाल, पीने के पानी का सवाल – जहां दूषित पानी से इंदौर में लोग मर रहे हैं, और जहरीली हवा का सवाल – जिससे दिल्ली में लोग मर रहे हैं. क्या इन सवालों को हम एक बहुत बड़े एजेंडे के रूप में खड़ा कर सकते हैं?
हमें लगता है कि हम लोगों को आंदोलनों पर ज्यादा चर्चा करनी चाहिए. आंदोलनों में कैसे नया जोश, नई ऊंचाई और नए आयाम जोड़े जाएं, इस पर सोचने की जरूरत है. निश्चित तौर पर, इसी रास्ते से बात बनेगी.
मैं अपनी बात खत्म करूंगा. जब 1925 में सीपीआई बन रही थी, तब हमारे सामने दो सवाल थे. एक सवाल था – देश में आजादी कैसे आएगी? उस समय लोग आजादी लाने के लिए लड़ रहे थे. दूसरा सवाल था – आजादी कैसी होगी? उस आजाद हिंदुस्तान में क्या जमींदारी और आजादी साथ-साथ चलेंगी?
कम्युनिस्टों ने नारा दिया कि जमींदारी का उन्मूलन हो. इस देश में जो छोटे-छोटे राज्य थे, जहां राजाओं का शासन चलता था, वहां कम्युनिस्टों ने नारा दिया और संघर्ष खड़ा किया – त्रावणकोर से लेकर हैदराबाद तक, और पूरे देश में. जो लोग कहते हैं कि सरदार पटेल ने आकर सबको एक कर दिया, वे यह भूल जाते हैं कि वह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि अंदर से हर ऐसे राज्य में लोग सामंतशाही और राजशाही के खिलाफ लड़ रहे थे.
आज की परिस्थिति भी कुछ उसी तरह की है. आज हमें फासीवाद से आजादी चाहिए. एक बार फिर साम्राज्यवाद से आजादी चाहिए. आज ट्रंप के आगे भारत सरकार घुटने टेक रही है, भारत का शासक वर्ग घुटना टेक रहा है. उस ट्रंप से, उस अमेरिकी साम्राज्यवाद से पूरी दुनिया को और हमें भी आजादी चाहिए. हमें कॉर्पारेट कब्जे से आजादी चाहिए, हमें फासीवाद से आजादी चाहिए. आज भी यह आजादी की ही लड़ाई है, और इस आजादी की लड़ाई में जाहिर सी बात है कि मजबूत लोकतंत्र चाहिए, और इस लोकतंत्र को समाजवाद की दिशा में ले जाना है.
हमें लगता है कि आज हमारे सामने ढेरों चुनौतियां हैं. लेकिन बड़ी तस्वीर यह है कि हम कॉर्पारेट कब्जा और फासीवादी कब्जा के एक खतरनाक दौर का सामना कर रहे हैं. इसमें बहुत सारी बहसें चल रही हैं – कुछ लोग पूछते हैं, “क्या भारत में राज्य फासीवादी बन गया?” मैं ईमानदारी से कहता हूँ, यह ध्यान भटकाने वाली बात है. अगर हम इसी तरह से राज्य को चलता रहने देंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ हो जाएगा. और इसलिए हमें अभी, यही और अभी हस्तक्षेप करना होगा. इसे रोकना है.
चुनौती हमारे सामने है – क्या हम फासीवाद को रोक सकते हैं? क्या हम इस फासीवादी कब्जा को रोक सकते हैं? क्या हम इस प्रक्रिया को पलट सकते हैं? और क्या हम एक बार फिर मेहनतकश लोगों के संघर्षों की शक्तिशाली लहरें, कम्युनिस्ट आंदोलन की शक्तिशाली लहरें, और इस देश में लोकतांत्रिक उभार की शक्तिशाली लहरें पैदा कर सकते हैं?
आज, सौ साल के इस ऐतिहासिक मौके पर, पिछले सौ वर्षों के सभी शहीदों और उन तमाम पीढ़ियों को, जिन्होंने हमें यह शानदार विरासत दी है, सबको सलाम करते हुए, और इसी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हुए, मैं अपनी बात खत्म करता हूं.
इंकलाब जिंदाबाद!