-- पार्थ कर्मकार
अप्रैल 2026 के त्रिपुरा आदिवासी क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल-TTAADC) चुनावों में टिपरा मोथा पार्टी की भारी जीत हुई. यह जीत केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों की आक्रामक राजनीति और सत्ता के बहुत ज्यादा केंद्रीकरण, और आदिवासियों के अधिकारों – शिक्षा, हेल्थकेयर, रोजगार, विकास – के साथ ही भाषा, लिपि और सांस्कृतिक पहचान पर बार-बार होने वाले हमलों, धोखा और विश्वासघात के खिलाफ टिपरासा और मूल निवासियों के भीतर जमा हुए गुस्से को दिखाती है. न केवल चुनाव बल्कि चुनाव के बाद हुई हिंसा में भी इस गुस्से को साफ देखा जा सकता है.
इस चुनाव के लिए 12 अप्रैल, 2026 को मतदान हुआ और मतों की गिनती 17 अप्रैल, 2026 को संपन्न हुई.
टिपरा मोथा पार्टी की इस जीत ने उसके पिछला रिकॉर्ड भी पार कर लिया है. वर्ष 2021 में हुए पिछले चुनाव में टिपरा मोथा पार्टी को कुल 2,74,565 मत मिले थे. 2026 में ये बढ़कर 4,57,943 हो गए – इसतरह उसके मतों में लगभग 20% की बढ़ोतरी हुई. कुल 57% मतों के साथ उसने 28 में से 24 सीटें जीत लीं. टिपरा मोथा पार्टी ने आदिवासी-बहुल इलाकों में अपना जनाधार और मजबूत किया है और उन्हें भाजपा के तेजी से बढ़ते फैलाव से भी आजाद किया है.
दूसरी ओर, अपना वोट शेयर 7.3% बढ़ाने के बावजूद, भाजपा सिर्फ 4 सीटें ही जीत पाई. वर्ष 2021 में, भाजपा को कुल 1,37,357 मत (18.72%) मिले, जबकि 2026 में इसे 2,18,072 मत (26.11%) मिले. लेकिन 2021 के मुकाबले उसकी 5 सीटें कम हो गईं.
माकपा को इस बार के चुनावों में 71,335 मत (8.83%) मिले, जो वर्ष 2021 में मिले 91,406 वोट (12.46%) से कम है. इसतरह उसके मतों में 3.39% की गिरावट आई है. आइपीएफ (त्रिपुरा) को 17,664 मत (2.23%) मिले, जो 2021 में मिले 77,946 मत (10.62%) से बहुत ही कम है. कांग्रेस के वोट लगभग वैसे ही रहे, 2021 में 16,425 से बढ़कर 2026 में 15,180 (लगभग 2%) हो गए. हमारी पार्टी भाकपा(माले) ने एक सीट पर चुनाव लड़ा और 85 वोट (0.41%) हासिल किए.
इसके अलावा, टिपरा मोथा पार्टी ने 5 सीटों पर 80% से 89% तक वोट हासिल किए और 10 सीटों पर वोट शेयर 70% से ज्यादा रहा. दफा (कम्युनिटी) और थांसा (एकता) की आवाज हर जगह दिखी, जिससे यह जीत पक्की और एकतरफा हो गई. 3 सीटों पर तो भाजपा उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई.
गौरतलब है कि 2021 में, टिपरा मोथा पार्टी ने टीएसपी (टिपरा लैंड स्टेट पार्टी) के चुनाव चिन्ह ‘अनानास’ के तहत चुनाव लड़ा था और 18 सीटें जीती थीं, जबकि आइपीएफटी और आइएनपीटी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. इसके उलट, इस बार आइएनपीटी टिपरा मोथा पार्टी में ही रही, जबकि आइपीएफटी ने अलग से चुनाव लड़ा. 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद, टीएसपी टिपरा मोथा पार्टी से अलग हो गई, हालांकि उसके प्रमुख चित्तरंजन देबबर्मा अभी भी तकनीकी रूप में टिपरा मोथा पार्टी के ही विधायक हैं. वे 3-4 अन्य विधायकों के साथ भाजपा के साथ रिश्ते बनाए हुए हैं.
भाजपा ने सभी 28 सीटें जीतने का दावा करके अपने गठबंधन के अन्य सहयोगियों के बीच चुनाव मुकाबले में अपना दबदबा बनाने की कोशिश की. लेकिन टिपरासा लोगों ने उसके इस घमंड को तोड़ दिया.
ऊपर दिए गए आंकड़ों से यह साफ है कि भाजपा के खिलाफ और टिपरा मोथा के पक्ष में मतों का बड़ी संख्या में ध्रुवीकरण हुआ. युवाओं और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, संगठन की ताकत और विरोध करने की क्षमता की वजह से मोथा भाजपा की आक्रामकता को शिकस्त देनेवाली अकेली ताकत बनकर उभरी. भाजपा द्वारा इस चुनाव को बहुध्रुवीय बनाने की तमाम कोशिशों को धत्ता बताते हुए टिपरासा लोगों ने टिपरा मोथा पार्टी पर अपना एकतरफा भरोसा दिखाया.
यह चुनाव त्रिपुरा राज्य की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. टिपरा मोथा पार्टी दूसरी बार स्वायत्त जिला परिषद में सत्ता में लौटी है. पिछले पांच सालों के कमजोर प्रदर्शन के बावजूद, यह अब एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है. इस चुनाव नतीजे से मतदाताओं का क्षेत्रीय नेतृत्व और पहचान पर आधारित राजनीति की तरफ बढ़ता झुकाव स्पष्ट रूप से दिखता है.
इस बड़े जनादेश के आधार पर, टिपरा मोथा पार्टी पूरे अधिकार के साथ नई काउंसिल और सरकार बनाएगी. हालांकि, राज करना और लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना उसके लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी. सेल्फ-डिटरमिनेशन, भाषा, स्क्रिप्ट और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों पर भाजपा के विश्वासघात के खिलाफ ऐतिहासिक फैसले का राज्य की राजनीति पर लंबे समय तक असर पड़ेगा.
लोगों ने इस जनादेश से आक्रामक और फासीवादी राजनीति से कुछ हद तक राहत महसूस की है. टिपरा मोथा समेत अन्य विपक्षी ताकतों से उनकी उम्मीदें और बढ़ेंगी. यह जनादेश पूरे उत्तर-पूर्व में भाजपा की आक्रामक राजनीति के खिलाफ उठ खड़े होनेवाले संघर्षों पर भी प्रभाव डालेगा.
वामपंथ के लिए, यह बेशक एक मुश्किल और बुरी स्थिति है. हालांकि, लोग खुद रास्ता दिखाते हैं. इस जनादेश में ही आगे की दिशा भी छुपी हुई है. जिन मुख्य मुद्दों के साथ बार-बार धोखा हुआ है, उनमें जमीन के अधिकार, अनुपातिक बजट बंटवारा, ग्राम परिषद स्तर के डॉक्यूमेंटेशन (जन्म प्रमाण पत्र, आधार, राशन कार्ड), स्कूल में एडमिशन, वजीफा, रोजगार, मनरेगा, पीने का पानी, शिक्षा, हेल्थकेयर, सामाजिक सुरक्षा और भाषा, लिपि व सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा शामिल हैं.
कॉर्पारेट-सांप्रदायिक फासीवादी भाजपा पूरे देश में आदिवासियों को जल, जंगल व जमीन से बेदखल कर रही है, स्वायत्तता और पहचान के अधिकारों पर हमला कर रही है तथा दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों को खतरे में डाल रही है.
टिपरा मोथा पार्टी अकेले इन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकती. इसलिए इस बात की संभावना बनी हुई है कि यह मांगों को पूरा कराने के नाम पर फिर से भाजपा के साथ हाथ मिला ले. अगर ऐसा हुआ तो इसका भी वही हश्र होगा जो 1990 के दशक में टीयूजीएस का हुआ या 2018 के गठबंधन के बाद आइएनपीटी और आइपीएफटी का हो रहा है – लगातार कमजोर होते जाना. ऐसे में वामपंथ को फिर से खड़ा करना ही एकमात्र विकल्प है जिसके लिए हमें लोगों की मांगों के इर्द-गिर्द संगठित होना होगा, लगातार संघर्ष छेड़ना होगा और इन संघर्षों में लोगों को जोड़ना होगा.