महिला आरक्षण कानून में संशोधन के लिए आज संसद का विशेष सत्र शुरू हो गया है. तीन दिनों तक चलने वाले इस सत्र पर हम महिलाओं और महिला संगठनों की नजर है कि संशोधन वास्तव में महिलाओं के अधिकारों की गारंटी के लिए होगा या महिला हितों को पर्दे के रूप में इस्तेमाल कर भाजपा सरकार अपने छुपे हुए मंसूबों को पूरा करने की कोशिश करेगी.
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की स्पष्ट मान्यता है कि देश के संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए. 2023 में जब सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया, उस समय भी हमलोगों ने कहा था कि महिला आरक्षण के लिए जनगणना की शर्त सही नहीं है और महिला आरक्षण 2024 के चुनाव से ही लागू किया जा सकता है. लेकिन, इस कानून में सरकार ने 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन की शर्त को जोड़ दिया था. अब सरकार अपने बनाए कानून में स्वयं संशोधन करना चाहती है और इसके लिए 131 वां संशोधन विधेयक लेकर आई है. इसके साथ ही सरकार ने परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश विधेयक को भी पेश किया है.
सरकार महिला आरक्षण के बहाने सभी राज्यों की सीटों में 50% बढ़ोतरी करना चाहती है इससे उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण और उत्तर-पूर्वी राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कम हो जायेगा, जो भारत के संघीय ढांचे को कमजोर करने वाला है. इसलिए दक्षिण भारत के लोगों का विरोध बिल्कुल वाजिब है.
परिसीमन एक जटिल प्रक्रिया है जिसे सबकी सहभागिता से विचार विमर्श के बाद और दक्षिण के राज्यों की सहमति और उनके हितों को ध्यान में रखकर ही लागू किया जाए. इसी तरह केन्द्र शासित प्रदेशों के बारे में जो प्रस्ताव लाया गया है उसके मुताबिक सरकार केन्द्र शासित क्षेत्रों का निर्धारण और नये केन्द्र शासित क्षेत्रों का निर्माण करना चाहती है. यह भी वाजिब चिंता का विषय है क्योंकि भाजपा अपने एजेंडे के मुताबिक इस कानून की आड़ में साम्प्रदायिक विभाजन का खेल करना चाहती है.
भाजपा सरकार की चतुराई यह भी है कि संसद और विधानसभाओं की सीटों में तो 50% वृद्धि होगी लेकिन महिलाओं को 33% आरक्षण मिलेगा!
देश के संघीय गणतंत्र के ढांचे को नुकसान पहुंचाने और साम्प्रदायिक विभाजनकारी राजनीति का विरोध करते हुए ऐपवा देश के सांसदों से अपील करती है कि है कि वे परिसीमन और जनगणना की शर्तों को महिला आरक्षण से अलग कर महिला आरक्षण कानून को लागू करवाएं. इस कानून के लिए देश की महिलाएं विगत 30 वर्षों से संघर्ष कर रही हैं. यह कानून इसलिए जरूरी है कि देश और राज्यों की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो.
मीना तिवारी – राष्ट्रीय महासचिव
ई रति राव – राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा)
16 अप्रैल 2026 को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ऐपवा समेत विभिन्न महिला संगठनों, महिला सांसदों और सामाजिक न्यायप्रिय तरक्कीपसंद लोगों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित हुआ. इसे संबोधित करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड श्वेता राज ने कहा कि मोदी सरकार अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को लागू करने के लिए महिला आरक्षण के साथ जिस तरह से परिसीमन लागू करना चाहती है, हम इसका कड़े शब्दों में विरोध करते हैं. 33% महिला रिजर्वेशन को बिना किसी संशोधन के लागू होना चाहिए. महिलाओं के कंधे पर बंदूक रखकर देश को साम्प्रदायिक एजेंडे के तहत बांटने की राजनीति नहीं चलेगी.
वर्तमान मोदी सरकार जिस तरह से देश के संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रावधानों को पीछे धकेलते हुए, अपना फासीवादी एजेंडा सामने लेकर आई है, उसको खारिज करने की जरूरत है. 33% रिजर्वेशन बिना किसी शर्त के लागू किया जाना चाहिए. साथ ही, हाशिए के तबके से आने वाली दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग की महिलाओं समेत जेंडर माइनोरिटी तबके से आने वाले साथियों को चुनाव में आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए. प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक स्वर से महिला शक्ति वंदन बिल को परिसीमन से जोड़ने की राजनीति की कड़ी निंदा की गई और 33% महिला आरक्षण को जल्द से जल्द बेशर्त लागू करने की मांग की गई.