आदिवासियों और गरीबों के बड़े पैमाने पर विस्थापन और पर्यावरण के विनाश का नुस्खा
तेजी से बढ़ती असमानता और बेरोजगारी, आय में कमी, लोगों की घटती क्रय शक्ति और लड़खड़ाते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता के बीच, मोदी सरकार द्वारा पेश बजट 2026-27, पिछले वर्षों में पेश किए गए जनविरोधी बजटों के मुकाबले सबसे खराब बजट है. बजट ‘विकसित भारत’ की खोखली बयानबाजी करता है, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था और लोगों का जीवन और आजीविका पर लगातार हमला जारी है.
यह बजट कृषि और किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं व आम जनता की लगातार उपेक्षा को रेखांकित करता है. अधिकांश आबादी कम आय, भारी बेरोजगारी और जीवन जीने की बढ़ती लागत के कारण तनावपूर्ण आर्थिक माहौल में रहने को मजबूर है. आम लोगों के लिए लंबे समय से ठहरी हुई आमदनी में बढ़ावा लाने के लिए कुछ घोषणायें होनी चाहिए थीं. लेकिन यह बजट इस मामले में बुरी तरह विफल है.
सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन योजनाओं के लिए आवंटन या तो कम कर दिया गया है या स्थिर रखा गया है, जो मुद्रास्फीति और बढ़ती जरूरतों के हिसाब से काफी नीचे है. वित्त वर्ष 2025-26 के लिए वास्तविक व्यय के संशोधित अनुमान भी यही रुझान दिखाते हैं, जिसमें कृषि और संबद्ध उद्योगों, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण और शहरी विकास जैसे प्रमुख क्षेत्रों में पिछले साल के बजट से कम आवंटन है.
प्रमुख योजनाओं में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए तय राशि से कम खर्च किया गया – प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) शहरी 7,500 करोड़ रुपये (BE 19,974 करोड़ रुपये), PMAY-ग्रामीण 32,500 करोड़ रुपये (BE 54,832 करोड़ रुपये), स्वच्छ भारत मिशन 2,000 करोड़ रुपये (BE 5,000 करोड़ रुपये), ग्राम सड़क योजना 11,000 करोड़ रुपये (BE19,000 करोड़ रुपये), और प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PMABHIM) 2,443 करोड़ रुपये (4,200 करोड़ रुपये). सरकार ने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से जानबूझकर अपने तय किए गए पैसे भी खर्च नहीं किये हैं, खासकर जनकल्याण की योजनाओं में.
स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बजट आवंटन में बढ़ोतरी असली जरूरतों से बहुत कम है, जबकि FY 2026-27 के बजट में उर्वरक और खाद्य सब्सिडी का आवंटन पिछले साल के संशोधित अनुमानों से कम है.
सरकारी हेल्थकेयर डॉक्टरों, नर्सों, दवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से जूझ रहा है, जबकि सरकार प्राइवेट सेक्टर के नेतृत्व वाले मॉडल को बढ़ावा दे रही है.
कृषि क्षेत्र देश आज भी बहुसंख्यक जनता का सहारा है, फिर भी बजट इसकी जरूरतों को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है. किसानों की आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य, जलवायु परिवर्तन का कृषि पर असर, स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग सुविधाओं को मजबूत करना आदि का बजट में कोई जिक्र नहीं है. ड्रोन के इस्तेमाल, कृषि में एआई और व्यावसायिक कृषि क्षेत्रों पर फोकस जैसी नई कृषि से जुड़ी स्कीमों को सरकार कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के नाम पर बेच रही है. कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के फंड आवंटन में कमी हुई है, जो भारत में कृषि क्षेत्र के कल्याण और मजबूती में सरकार की पूरी तरह से दिलचस्पी की कमी को दिखाता है.
इस बजट ने एक बार फिर मोदी सरकार की गलत सोच को दोहराया है, कि शिक्षा ज्ञान-अर्जन का माध्यम नहीं है, बल्कि उद्योगों और कॉर्पारेट को सस्ता श्रम पाने का एक जरिया है. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को, छात्रों को ऐसे स्किल सेट सिखाने के लिए तैयार किया जा रहा है जो उन्हें उद्योगों में सस्ता श्रम दिला सकें. औद्योगिक गलियारों में पांच नए एजुकेशनल टाउनशिप का प्रस्ताव, और 15,000 स्कूलों और 500 विश्वविद्यालयों में कंटेंट लैब, जहां छात्रों को कंटेंट बनाना सिखाया जाएगा, ताकि 2030 तक गेमिंग इंडस्ट्री के लिए जरूरी लेबर फोर्स के लिए स्किल सेट तैयार किए जा सके.
बजट को ट्रंप के टैरिफ युद्ध की गंभीरता को स्वीकार करना चाहिए था और भारतीय निर्यातकों को कुछ राहत देने के लिए उन्हें कुछ मौद्रिक राहत उपाय प्रदान करने की जरूरत थी. इसके अलावा, भारतीय उद्योगों पर ट्रंप के टैरिफ के कारण बड़े पैमाने पर नौकरियों के नुकसान से निपटने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया गया है. बजट में प्रस्तावित सीमा शुल्क में छूट देना दिखाता है कि आत्मनिर्भर भारत की बातें खोखली हैं और हमारी अर्थव्यवस्था घरेलू वास्तविकताओं और जरूरतों के अनुरूप नहीं है.
स्वयं सहायता समूहों के तहत करोड़ों महिलाएं माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट संस्थानों के गंभीर कर्ज के जाल में फंसी हुई हैं. यह बजट उसी नीतिगत ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है जो निजी कंपनियों को और ज्यादा शोषण करने के लिए प्रोत्साहित करता है.
बजट में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उन कंपनियों को बड़ी टैक्स राहत दी गई है जो 2047 तक भारत में क्लाउड डेटा सेंटर स्थापित करेंगी. दुनिया भर में, डेटा सेंटर बड़े पैमाने पर भूजल की कमी, वायु प्रदूषण और इन सेंटरों को चलाने के लिए भारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अत्यधिक खनन के कारण पर्यावरणीय खतरा पैदा कर रहे हैं, साथ ही इनके लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत होती है. हमें इस बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है. प्रस्तावित रेयर अर्थ कॉरिडोर और डेटा सेंटर पर्यावरण को और ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे और लोगों को उनकी जमीनों और रोजगार से विस्थापित करने का खतरा पैदा हो सकता है.
बजट अमीरों को बड़े टैक्स इंसेंटिव दे रहा है, जबकि रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं को नजरअंदाज किया गया है और उन्हें बड़ी राहत नहीं दी गई है. आर्थिक असमानता के मुख्य मुद्दे को हल किए बिना आर्थिक विकास सम्भव नहीं है. लेकिन बजट में इसको हल करने का विजन नहीं है. लगातार मांग के बाद भी कॉरपोरेट मुनाफे और ज्यादा नेटवर्थ वाले व्यक्तियों (सुपर रिच) की आय पर टैक्स नहीं बढ़ाया गया है.
बजट का कुल आकार 53.47 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाना सिर्फ 5.6% है, जो जीडीपी में बताए गए नॉमिनल ग्रोथ से भी कम है. कुल खर्च का एक चौथाई हिस्सा भारत सरकार के पिछले जमा कर्ज पर ब्याज भुगतान में चला जायेगा.
चूंकि बजट नवउदारवादी नीतियों के हिसाब से चल रहा है, इसलिए राजकोषीय घाटे को कृषि और ग्रामीण बुनियादी ढांचे, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास जैसे मुख्य क्षेत्रों में आवंटन और वास्तविक खर्च में कटौती जारी है. एक ओर कल्याणकारी खर्चों में कटौती की जा रही है, पर टैक्स चोरों और अपनी आय और संपत्ति घोषित नहीं करने वालों को मुकदमों से छूट देने की घोषणा की गई है. मोदी विदेशी काला धन देश में वापस लाने के दावे के साथ सत्ता में आए थे, लेकिन विडंबना यह है कि विदेशी आय और संपत्ति के स्वैच्छिक खुलासे के लिए छोटे टैक्सपेयर्स की सुविधा के नाम पर एक योजना की घोषणा की है, जिससे संदेह पैदा होता है!
यह पूरी तरह एक जन-विरोधी बजट है जबकि जनता को जनकल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करने वाला, ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश करने वाला, आवास और रोजगार की गारंटी देने वाला, और देश के श्रमिकों, किसानों और युवाओं की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने वाला बजट की जरूरत थी.
– केंद्रीय कमेटी, भाकपा(माले)-लिबरेशन
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केंद्रीय बजट किसान, मजदूर, पर्यावरण विरोधी : गांवों से पलायन को बढ़ाने वाला
अखिल भारतीय किसान महासभा ने संसद में पेश केंद्रीय बजट को पूरी तरह किसानों-मजदूरों, छोटे व्यवसायों को आर्थिक संकट की ओर धकेलने वाला और पर्यावरण के लिए विनसकारी बताया है. किसान महासभा के अनुसार यह बजट खेती-किसानी की तबाही को रोकने और गाँवों में रोजगार को बढ़ाने के विपरीत गाँवों से पलायन को और तेज करेगा. बजट प्रवधान की दिशा देश में आपदाओं के भूगोल को बढ़ाने वाली है.
किसान महासभा ने आज प्रेस को जारी विज्ञप्ति में कहा कि बजट से पहले ब्रिटेन तथा यूरोपीय यूनियन के साथ मोदी सरकार द्वारा किए गए व्यापारिक समझौतों और अमेरिका के साथ उससे भी खतरनाक समझौते की दिशा में बढ रही मोदी सरकार पहले ही देश की खेती-किसानी पर बड़े हमले की तैयारी कर चुकी है. ऐसे में इस बार के बजट में देश के किसानों को इस सरकार से कोई उम्मीद भी नहीं बची थी.
घाटे की खेती, कर्ज के जाल में फंस कर आत्महत्या को मजबूर देश के किसानों-ग्रामीण मजदूरों की बहुसंख्या की चिंता इन बारह वर्षों में कभी भी मोदी सरकार के एजेंडे में नहीं दिखी. इसी लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए C-2 + 50% के साथ एम एस पी की गारंटी का कानून, 200 दिन के काम और 700 रुपए प्रतिदिन मजदूरी की गारंटी के साथ मनरेगा कानून की वापसी, किसानों-ग्रामीण मजदूरों की सम्पूर्ण कर्ज माफी जैसे सवालों से मोदी सरकार आँखें मूंदे हुई है.
हाल के कुछ वर्षों में देश ने सरकार की कारपोरेट लूट पर आधारित नीतियों के कारण बहुत बड़ी प्राकृतिक आपदाओं को झेला है. इसके बावजूद बजट प्रवधान इस विकट समस्या के समाधान के लिए भी मौन हैं. उलटे बजट प्रावधान बता रहे हैं कि उत्तराखंड, हिमांचल को अपनी विनासकारी पर्यटन नीति से आपदाओं के प्रदेश में बदलने वाली मोदी सरकार की गिद्ध दृष्टि अब जम्मू कश्मीर और पूर्वात्तर की पहाड़ियों पर भी टिक गई है. पर्यटन विकास के नाम पर मोदी सरकार के यह विनासकारी कदम हिमालय और हिमालयी राज्यों के पर्यावरण और परिस्थितिकीय तंत्र को विनास की दिशा में धकेल रहे हैं. यही नहीं देश के समुद्री तटों पर बढ़ता कारपोरेट नियंत्रण भी पर्यावरण और तटीय लोगों की आजीविका पर संकट को बढ़ा रहा है.
बजट में किसानों और ग्रामीण मजदूरों की हर मांग पर सरकार द्वारा बरती गई खामोशी मोदी सरकार पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव को साफ दिखा रही है. अखिल भारतीय किसान महासभा देश के किसानों से मोदी सरकार के किसान, मजदूर, पर्यावरण विरोधी बजट की निंदा करते हुए 12 फरवरी की राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत से जुटने का आह्वान करती है.