वर्ष 35 / अंक - 43 / उत्तर प्रदेश डायरी : शिक्षा का हाल बेहाल

उत्तर प्रदेश डायरी : शिक्षा का हाल बेहाल

उत्तर प्रदेश डायरी : शिक्षा का हाल बेहाल

आज देश में 14.7 लाख स्कूलों में 24.7 करोड़ छात्र तथा एक करोड़ एक लाख अध्यापक हैं.

यह विराट संख्या  शिक्षा अधिकार कानून (RTE) और मिड डे मील योजना का परिणाम है, लेकिन इस शिक्षा से अर्जित ज्ञान की कसौटी पर स्थिति बेहद निराशाजनक है.

आजादी के 80 साल बाद भी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 24 करोड़ आबादी में मात्र 67% लोग साक्षर हैं अर्थात जो अपना नाम लिख सकते हैं और हस्ताक्षर कर सकते हैं. वे पढ़ सकने और सामान्य गणित के सवाल हल कर सकने में असमर्थ हैं.

आज भी बमुश्किल 23.4% कक्षा 3 के छात्र कक्षा 2 की किताब पढ़ सकते हैं और मात्र 27.6% छात्र सामान्य जोड़-घटाव का सवाल हल कर सकते हैं. कोढ़ में खाज यह कि उत्तर प्रदेश में नीति आयोग के तथा नई शिक्षा नीति (NEP) के निर्देशों के तहत 50 से कम छात्र वाले स्कूलों को बंद कर दिया गया है. जाहिर सी बात है इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र अब दूर के स्कूल में पढ़ने जाने में असमर्थ होकर पढ़ाई छोड़कर घर बैठ जाएंगे.

योगी सरकार की शब्दावली में यह स्कूलबंदी नहीं बल्कि विलयन है. कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का पड़ोस के स्कूलों में मर्जर कर दिया गया है. इसका असर 25000 से अधिक स्कूलों पर पड़ा है. उत्तर प्रदेश में 9508 स्कूलों में केवल एक अध्यापक है जिसके जिम्मे सभी कक्षाओं के छात्रों को एक साथ पढ़ाने का दायित्व है! स्कूल के नाम पर कहीं बिल्डिंग है तो अध्यापक नहीं है, कहीं अध्यापक हैं तो बिल्डिंग नहीं है. बच्चे खुले आसमान के नीचे पढ़ते है. बारिश होते ही छुट्टी हो जाती है. पिछले दिनों लखनऊ के फतेहपुर महोबा हमीरपुर के छात्रों ने सड़क पर उतर कर अपने स्कूलों की बदहाली को लेकर प्रदर्शन किया. इनमें सरकारी स्कूलों और आवासीय विद्यालयों के छात्र शामिल थे. दरअसल हजारों एडेड स्कूलों के लगभग 2000 तदर्थ शिक्षकों को हटाए जाने से संकट और बढ़ गया है. वैसे ऑपरेशन कायाकल्प के बाद सरकार ने दावा किया है कि 96% स्कूलों की स्थिति ठीक हो गई है. लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग चिंताजनक बनी हुई है. केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में स्कूलों में पढ़ने न जाने वाले छात्रों की सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश में ही है. सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता होने के कारण अभिभावक बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं. नतीजतन सरकारी स्कूलों में केवल लड़कियां या अत्यंत वंचित परिवारों के बच्चे ही पढ़ने जा रहे हैं.

सरकार के बजट का 2023 में 16% शिक्षा पर खर्च होता था. वह 2026 में घटकर 13% रह गया. उसमें भी पूरा बजट खर्च नहीं होता. 2023-24 के बजट में से 11 हजार करोड़ रूपया खर्च नहीं हुआ. नतीजतन दुनिया की बात छोड़ दीजिए, देश के अंदर भी टाॅप रैंकिंग संस्थानों में प्रदेश के संस्थान नहीं आ पाते. पूरे देश में जो 11.7 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं उसमें उत्तर प्रदेश के 7.84 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं. यहां प्रदेश में 16.19% विद्यालयों में बिजली नहीं है. आधे विद्यालयों में न लैब है, न कंप्यूटर है.

बेसिक शिक्षा के साथ ही माध्यमिक सरकारी स्कूलों में भी छात्रों की संख्या घट रही है. यह स्थिति बेहद चिंताजनक है. प्रदेश के 436 सरकारी हाई स्कूलों में छात्रों की संख्या 50 से कम हो गई है और 189 इंटर काॅलेजों में 100 से कम छात्रा हैं. सरकारी स्कूलों में यह खतरनाक ढंग से घटती संख्या इस बात का सबूत है कि इन विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता पर छात्रों व अभिभावकों का भरोसा कम हुआ है. इसका मुख्य कारण प्राइवेट स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में गिरावट है. सरकार स्मार्ट क्लास की शिगूफेबाजी खूब कर रही है लेकिन इन सरकारी विद्यालयों में आधुनिक लैब व लाइब्रेरी का घोर अभाव है, इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्किल्ड शिक्षा का अभाव है.

उच्च शिक्षा में प्रदेश में विश्वविद्यालयों का प्रशासनिक ढांचा समावेशी नहीं है जिसके अपने परिणाम और निहितार्थ हैं. प्रदेश के 30 राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों में 22 अर्थात 73% से अधिक में सवर्ण कुलपति हैं, पिछड़ा वर्ग से 6 अर्थात 20% तो दलित (अनुसूचित जाति) श्रेणी से एक अर्थात 3% कुलपति हैं. यही भाजपा की समरसता की राजनीति का फलितार्थ है. उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापक या कुलपति की नियुक्तियों में सबसे बड़ी योग्यता संघ से निकटता हो गई है. भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार चरम पर है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुलपति को सेवा विस्तार दिया गया है. उनके पति उच्चतम न्यायालय में देश के अगले मुख्य न्यायाधीश होने जा रहे हैं. ये सभी कुलपति भाजपा के कार्यकाल में नियुक्त हुए हैं. विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में छात्रसंघों को खत्म कर दिया गया है. अकादमिक स्वतंत्रता तथा शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता को कब की तिलांजलि दी जा चुकी है. फलस्वरूप विश्वविद्यालयों में प्रशासन की छात्रों के प्रति जवाबदेही का कोई मंच नहीं है.

जाहिर है कि मोदी-योगी राज में शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार होने वाला नहीं है क्योंकि न सिर्फ यह उनकी प्राथमिकता में नहीं है, बल्कि समाज को अशिक्षित और विवेकहीन व तर्कहीन बनाए रखने में उनका निहित स्वार्थ है, तभी वे जेन-जी और जेन अल्फा को अपना अंधभक्त और हिंदुत्व गिरोह का पैदल सिपाही बनाए रख सकते हैं. जरूरत इस बात की है कि छात्रा-युवा नागरिक समाज और विपक्ष के साथ मिलकर भाजपा सरकार को उखाड़ फेंके और सर्वसमावेशी लोकतांत्रिक वैज्ञानिक शिक्षा के लिए आगे बढ़ें.

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एसआइआर: 2 करोड़ से ज्यादा नाम कटे

उत्तर प्रदेश में एसआइआर द्वारा दो करोड़ से अधिक  मतदाताओं का नाम कट गया. यह कुल मतदाताओं का 13.21% है. प्रदेश के सभी 75 जिलों की 403 विधान सभा सीटों पर यह प्रक्रिया 27 अक्टूबर 2025 से 10 अप्रैल 2026 तक (166 दिन तक) चली. जनवरी में आई मसौदा रिपोर्ट में 2.88 करोड़ नाम कटे थे. उसमें 84 लाख नए नाम जुड़े. इस तरह 15.44 करोड़ मतदाताओं की जगह अब मतदाताओं की संख्या 13.39 करोड़ ही रह गई. हालांकि महिला मतदाताओं के अनुपात में सुधार हुआ है. अब प्रत्येक 1000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या 824 से बढ़कर 834 हो गई है. कुछ प्रमुख जिलों में कटौती इस प्रकार है – लखनऊ में 22.85%, गाजियाबाद में 20.84%, नोएडा में 19.33%, मेरठ में 18.75%, शाहजहांपुर में 17.9%, आगरा में 17.1%, प्रयागराज में 17.62%, हापुड़ में 17.59%, कन्नौज में 17.21%, बलरामपुर में 17.20%, बदायूं में 16.13%, बहराइच मे 16.12%, फर्रुखााबाद में 15.96%, सोनभद्र में 14.77%, इटावा में 14.57%, सम्भल में 14.47% और सिद्धार्थनगर में 14.32%.

बहरहाल विपक्ष की पार्टियों ने इसे वोट चोरी का उपक्रम बताया है और एसआइआर के दौरान बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO's) की मौत का मुद्दा भी उठाया है. विपक्ष का आरोप है कि ऊपर से दबाव के कारण उनकी मौत हुई है. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में भी वोट चोरी के तमाम हथकंडे अपनाए गए हैं. रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने उनका खुलासा किया है. उदाहरण के लिए 85854 लोगों के नाम बिना कोई कारण बताए काट दिए गए जो नियम विरुद्ध है. नियमानुसार हर मतदाता को उसका नाम काटने का कारण बताया जाना अनिवार्य है. इसके लिए केन्द्रीय चुनाव आयोग के साॅफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया. केन्द्रीय चुनाव आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश के अधिकारियों पर दबाव डालकर उनके हस्ताक्षर करवाए गए और यह सब वैध समय सीमा के बाद किया गया. 20% नाम चुनाव अधिकारियों द्वारा स्वयं काटे गए.

ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं जिनसे समझा जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर नाम काटने और जोड़ने के नाम पर धांधली की गई है. स्वाभाविक रूप से भाजपा को चुनावी लाभ दिलाने के लिए कुछ विशेष समुदायों के लोगों के नाम काटे गए होंगे और कुछ विशेष समुदायों के लोगों के नाम जोड़े गए होंगे. महिला मतदाताओं के नाम में वृद्धि का संबंध भी महिलाओं को लुभाने के लिए बांटी जा रही रेवड़ियों से हो सकता है. स्वच्छ मतदान के लिए जरूरी है कि एसआइआर के माध्यम से बनी मतदाता सूची को खारिज किया जाय और एसआइआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले की मतदाता सूची के आधार पर उत्तर प्रदेश का आसन्न विधानसभा चुनाव सम्पन्न कराया जाये.

– लाल बहादुर सिंह

24 October, 2026