वर्ष 35 / अंक - 08 / वैश्विक एआई सम्मेलनः मोदी जी, विश्वगुरु बनने का फर...

वैश्विक एआई सम्मेलनः मोदी जी, विश्वगुरु बनने का फरेब कब तक?

वैश्विक एआई सम्मेलनः मोदी जी, विश्वगुरु बनने का फरेब कब तक?

-- मनमोहन

भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित ‘ग्लोबल एआई समिट 2026’ को जिस भव्यता और दूरदर्शी विजन के साथ पेश किया गया था, उसका अंत निंदनीय फर्जीवाड़े के विवादों और राष्ट्रीय शर्मिंदगी में हुआ. यह शिखर सम्मेलन न सिर्फ प्रशासनिक कुप्रबंधन का गवाह बना, बल्कि इसने भारतीय उच्च शिक्षा और अनुसंधान की खोखली होती बुनियाद को भी दुनिया के सामने उजागर कर दिया. यूके, दक्षिण कोरिया और जापान के बाद इस सूची में शामिल होने वाला भारत चौथा देश बना, लेकिन जिस तरह की जग-हंसाई इस आयोजन में हुई, उसने ‘विश्वगुरु’ बनने के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चिंता पैदा करने वाला पहलू गलगोटिया यूनिवर्सिटी का कथित ‘नवाचार’ है. एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन में बने रोबोटिक कुत्ते को अपने संस्थान के ‘स्वदेशी आविष्कार’ के रूप में पेश करना सिर्फ किसी एक विश्वविद्यालय की अनैतिकता नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की नाकामी है जो बिना किसी गंभीर जांच-पड़ताल के दिखावे और प्रचार को बढ़ावा देती है. विडंबना यह है कि आईटी मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति ने भी बिना तकनीकी सत्यापन के इसे अपने सोशल मीडिया पर साझा कर दिया. यह उस ‘हाइप’ और पीआर-संस्कृति का नतीजा है, जहां जमीनी शोध, प्रयोग और ईमानदार मेहनत से ज्यादा अहमियत फोटो-अपॉर्चुनिटी और त्वरित वाहवाही को दी जाती है. समिट के दौरान सामने आई अव्यवस्थाएं – कैशलेस इंडिया के दावों के बीच नकद का बोलबाला, बुनियादी सुविधाओं की कमी – इस बात को साफ करती हैं कि हमारी प्राथमिकताएं तकनीक के इस्तेमाल से ज्यादा इवेंट मैनेजमेंट और चमक-दमक तक सिमट कर रह गई हैं.

मोदी को अपना प्रेरणास्रोत बताने वाले और निजी क्षेत्र में ‘सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय’ जैसे तमगे बटोरने वाले गलगोटिया जैसे संस्थानों का इतिहास खुद उनकी सड़ांध उजागर करता है. जहां ‘कोरोना और थाली’ जैसे अवैज्ञानिक विषयों पर शोधपत्रों को वैधता दी जाती है, वहां यह साफ है कि अकादमिक दुनिया में स्वतंत्र सोच की जगह अब वैचारिक चाटुकारिता ने ले ली है. इतिहास को मनमाफिक ढंग से बदलने, संस्थानों के भगवाकरण और तेजी से होते निजीकरण ने वैज्ञानिक चेतना को हाशिये पर धकेल दिया है. ऐसे संस्थान न सिर्फ शिक्षा का मजाक उड़ा रहे हैं, बल्कि भारत की बौद्धिक और अकादमिक साख को भी गहरी चोट पहुंचा रहे हैं.

इस एआई समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी का यह कांड मोदी और आरएसएस की तथाकथित ‘न्यू इंडिया’ से जरा भी अलग नहीं है. शुरू से आखिर तक – दिखावा, फरेब और प्रचार. इसी फरेब के सहारे ये लोग खुद को “विश्वगुरु” साबित करना चाहते हैं. इस विश्वविद्यालय की ढिठाई और बेशर्मी सीधे अपने कथित प्रेरणास्रोत मोदी से आती है. याद कीजिए, वही मोदी जिन्होंने शी जिनपिंग के सामने वाहवाही बटोरने के लिए साबरमती आश्रम में नकली रिवरफ्रंट खड़ा कर दिया था – जहां सच्चाई से ज्यादा अहमियत दिखावे को दी गई.

भारत की आज की यह बदहाली यूं ही नहीं पैदा हुई है – इसके पीछे मोदी सरकार की नीतियां सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं. देश की विश्वविद्यालयों, शिक्षा व्यवस्था, रिसर्च और पेटेंट कराने की पूरी प्रक्रिया को योजनाबद्ध ढंग से कमजोर किया गया है. बीते 10-12 वर्षों में उच्च शिक्षा का बजट लगातार काटा गया है और आज यह सिमटकर लगभग 52% पर आ गया है. यानी जहां पहले उच्च शिक्षा के लिए 100 रुपये दिए जाते थे, वहां अब मुश्किल से 52 रुपये ही मिल रहे हैं.

ऐसे हालात में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या किसी भी गंभीर शोध की बातें महज दिखावा बनकर रह जाती हैं. न तो इसके लिए जरूरी शिक्षा दी जा रही है, न ही बुनियादी ढांचा खड़ा किया जा रहा है. करीब 50 केंद्रीय विश्वविद्यालयों, 500 बड़े विश्वविद्यालयों और 400 से ज्यादा अन्य संस्थानों में शोध गतिविधियां या तो ठप हो चुकी हैं या सिर्फ कागजों तक सिमट गई हैं.

अगर तुलना करें तो चीन और अमेरिका एआई को वैश्विक दबदबे की दौड़ के तौर पर देखते हैं. यही वजह है कि एआई पर उनका शोध और विकास निवेश भारत से 100 से 400 गुना तक ज्यादा है. भारत में 2025-26 में इस पूरे सेक्टर के लिए महज 2,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जबकि चीन इस सेक्टर में लगभग 98 बिलियन डॉलर और अमेरिका में सरकारी व निजी सेक्टर मिलाकर करीब 159 बिलियन डॉलर का निवेश हो रहा है.

नतीजा यह है कि वैश्विक एआई पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.37% तक सिमटी रह गई है. इसके मुकाबले चीन 69.7% हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर है और अमेरिका 14.2% के साथ दूसरे स्थान पर. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि ‘विश्वगुरु’ के दावे जमीन पर कितने खोखले और वास्तविकता से कटे हुए हैं.

बात बिल्कुल साफ है. आरएसएस और उसका कुनबा फरेब और दिखावे के सहारे ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना देख रहा है, जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया इस तमाशे पर हंस रही है. आरएसएस-भाजपा का असर अकादमिक संस्थानों तक गहराई से फैल चुका है, जहां गैर-वैज्ञानिक एजेंडे थोपे जा रहे हैं और स्वतंत्र सोच को सुनियोजित तरीके से कुचला जा रहा है. ऐसे माहौल में ‘विकसित भारत’ का जो शोर मचाया जा रहा है, उसका जमीनी सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है. एआई समिट ने मोदी के तथाकथित ‘न्यू इंडिया’ की पोल एक बार फिर दुनिया के सामने खोल दी है.


21 February, 2026