(विकास अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज का कहना है कि मनरेगा और आरटीआई जैसे कानून सामाजिक कानून हैं. इनका मकसद राज्य को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है. लेकिन ये कानून तभी असरदार होते हैं, जब ये साफ तौर पर जनता के पक्ष में मजबूती से खड़े हों.)
केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल’, यानी VB-G RAM G बिल, के तहत एक नए कानूनी ढांचे में पुनर्गठित किया है. इस कदम की विकास अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने कड़ी आलोचना की है. उनका कहना है कि यह मनरेगा की पिछले दो दशकों की विरासत को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम है. इस नए बिल पर उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत की. साक्षात्कार के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं.
प्रश्न : आपके मुताबिक VB-G RAM G बिल की सबसे ज्यादा विवादित बात क्या है?
ज्यां द्रेज : मेरे हिसाब से सबसे खतरनाक बात यह है कि योजना कहां और कब लागू होगी, यह तय करने का पूरा अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा. मैं इसे “बंद करने वाला प्रावधान” कहता हूं. इससे रोजगार गारंटी का पूरा मकसद ही खत्म हो जाता है. यह ऐसा है जैसे काम की गारंटी तो दी जाए, लेकिन इस बात की कोई गारंटी न हो कि वह गारंटी सच में लागू भी है.
प्रश्न : आपने कहा कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जा सकता है?
ज्यां द्रेज : हां, ऐसा हो सकता है. मनरेगा और आरटीआई जैसे कानून सामाजिक कानून हैं. इनका मकसद राज्य को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है. लेकिन ये तभी काम करते हैं, जब इन्हें साफ तौर पर जनता के पक्ष में बनाया और लागू किया जाए.
प्रश्न : नए बिल में केंद्र और राज्यों के साझा वित्तपोषण का जो प्रस्ताव है, उसका राज्यों पर क्या असर पड़ेगा?
ज्यां द्रेज : जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की आर्थिक हालत पहले से ही अच्छी नहीं है. इसी वजह से हम इसका विरोध कर रहे हैं. इसका मतलब यह है कि कई राज्यों के लिए पर्याप्त फंड की कोई गारंटी नहीं रहेगी. केंद्र के पास पूरे अधिकार होंगे, लेकिन उसकी कोई ठोस जिम्मेदारी नहीं होगी. मजदूरी भुगतान में देरी होने पर मजदूरों को मुआवजा देने की सारी जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी गई है. “मानक आवंटन” फॉर्मूले के तहत केंद्र जितना तय करेगा, उससे ज्यादा पूरी राशि राज्यों को ही चुकानी होगी. कुल मिलाकर यह मनरेगा को एक साधारण केंद्र-प्रायोजित योजना में बदल देता है, जहां असली फैसला सरकार की मर्जी पर टिका होगा.
प्रश्न : 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन रोजगार देने की बात पर आप क्या कहेंगे?
ज्यां द्रेज : सिर्फ सीमा बढ़ा देने से कुछ भी नहीं बदलेगा. हकीकत यह है कि वैसे भी सिर्फ 2 फीसदी ग्रामीण परिवारों को ही 100 दिन का काम मिल पा रहा है. पिछले वित्तीय वर्ष में 12 करोड़ से ज्यादा सक्रिय मजदूरों में से सिर्फ 40.70 लाख परिवार ही 100 दिन का काम पूरा कर पाए. पूरे कानून में यही एकमात्र प्रावधान है जिसे रचनात्मक कहा जा सकता है. लेकिन इसे भी इस तरह रखा गया है कि लगे मानो कानून का दायरा बढ़ाया जा रहा है, जबकि असल में इसे खत्म किया जा रहा है.
प्रश्न : बुआई और कटाई के चरम मौसम में योजना को 60 दिनों तक रोकने को खेतों में मजदूरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने वाला कदम बताया जा रहा है?
ज्यां द्रेज : इसका सीधा मतलब मजदूरों के अधिकारों में कटौती है. मुझे लगता है कि कुछ किसान लॉबियों के दबाव में यह प्रावधान लाया गया है. लेकिन समूचा किसान आंदोलन मनरेगा के पक्ष में रहा है. मेरे हिसाब से इस प्रावधान की कोई जरूरत ही नहीं थी. एक और प्रावधान है, जो परेशानी पैदा कर सकता है और योजना के रास्ते में रुकावट बन सकता है. वह है हर तीन साल में जॉब कार्ड के नवीनीकरण की शर्त. यह बात ऊपर से ठीक लगती है, लेकिन जॉब कार्ड के लिए लोगों से तरह-तरह की जानकारियां मांगी जाएंगी – जैसे आधार कार्ड, बीमा कार्ड वगैरह.
प्रश्न : सालों के दौरान मनरेगा की मजदूरी का क्या हाल हुआ है? क्या इसके इस्तेमाल में कमी की एक वजह यह भी है?
ज्यां द्रेज : मनरेगा की मजदूरी केंद्र सरकार तय करती है. 2009 के बाद से वास्तविक मजदूरी को ज्यों का त्यों जमा कर दिया गया है. शुरुआत में मनरेगा की मजदूरी बाजार की मजदूरी से ज्यादा हुआ करती थी. लेकिन इतने सालों से मजदूरी नहीं बढ़ी, इसलिए अब यह बाजार की मजदूरी से भी कम हो गई है. यह लोगों के लिए हतोत्साहित करने वाली बात है.
इसी वजह से अब बुजुर्ग और महिलाएं मनरेगा के तहत ज्यादा काम कर रही हैं, क्योंकि उन्हें बाजार में काम के अवसर नहीं मिल पाते.
(द इंडियन एक्सप्रेस, 17 दिसंबर 2025 से साभार)