वर्ष 35 / अंक - 03 / वेनेजुएला : साम्राज्यवाद की खुली लूट, वैश्विक पतन...

वेनेजुएला : साम्राज्यवाद की खुली लूट, वैश्विक पतन और बोलिवेरियन क्रांति के सबक

वेनेजुएला : साम्राज्यवाद की खुली लूट, वैश्विक पतन और बोलिवेरियन क्रांति के सबक

-- मनमोहन

सालों पहले, 2005 में, शावेज ने जिस साजिश की चेतावनी दी थी, वह आज शब्दशः सच साबित हो चुकी है. शावेज ने कहा थाः

“कई साल पहले किसी ने मुझसे कहा था – आखिर में वे आप पर नशीले पदार्थों की तस्करी का आरोप लगाएंगे. आप पर, शावेज, व्यक्तिगत रूप से. यह नहीं कहेंगे कि सरकार इसकी इजाजत देती है....नहीं. वे ‘नोरिएगा फॉर्मूला’ आजमाएंगे. शावेज को सीधे नशे के कारोबार से जोड़ने की कोशिश होगी. और फिर, एक ‘नशा तस्कर राष्ट्रपति’ के खिलाफ कुछ भी जायज हो जाएगा.... है न?” [1]

अमेरिकी साम्राज्यवाद का नंगा चेहरा : अपहरण और हमला

आज वही पटकथा ट्रम्प के हाथों खुलकर अंजाम दी जा रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति के सीधे आदेश पर वेनेजुएला पर हमला और एक संप्रभु देश के मौजूदा राष्ट्रपति का अपहरण – यह किसी तरह की ‘कानून व्यवस्था’ की कार्रवाई नहीं, बल्कि बिना उकसावे की नग्न साम्राज्यवादी जंग है. यह अंतरराष्ट्रीय कानून, मर्यादा और उसूलों की खुली अवहेलना है, जिसका साफ मकसद सिर्फ वेनेजुएला नहीं, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका पर दोबारा औपनिवेशिक कब्जा थोपना है.

21वीं सदी में ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्य का अति-राष्ट्रवादी, नव-औपनिवेशिक नजरिया अब किसी पर्दे में नहीं रहा. पूरी दुनिया को या तो अपने मातहत झुकाने या पूरी तरह तबाह कर देने की यह नीति अब कराकस में सत्ता पलट तक खुलकर पहुंच चुकी है. और इसके बावजूद, दुनिया घुटनों के बल इस भ्रम में पड़ी है कि शायद इन जनसंहारी दरिंदों को रियायत देकर टाला जा सकता है.

वेनेजुएला से लेकर फिलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, ईरान और यमन तक – इस बदनाम अमेरिकी-इजराइली धुरी की वर्चस्व की जंग में बहाया गया लोगों का खून पूरी मानवता के लिए चेतावनी है. दुनिया के तमाम देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और आम लोगों के सामने अब सिर्फ दो ही रास्ते हैं : या तो इस खतरे के खिलाफ एकजुट हो, या फिर ऐसे संसार को स्वीकार कर ले जहां न कानून बचेगा, न इंसाफ, न उम्मीद.

डोनाल्ड ट्रम्प के आदेश पर अमेरिकी डेल्टा फोर्स की एक टुकड़ी कराकस के राष्ट्रपति भवन में घुसी, और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को उनके ही बेडरूम से उठा कर न्यूयॉर्क के एक अमेरिकी फौजी अड्डे पर ले जाया गया, ताकि उन पर अमेरिकी अदालत में मुकदमा चलाया जा सके. इस हमले में 110 से ज्यादा लोग मारे गए.[2] यह कोई छोटी घटना नहीं, बल्कि इतिहास में दर्ज होने वाला खुला युद्ध अपराध है.

शावेज की भविष्यवाणी और अमेरिकी जंगों का पैटर्न

पिछले कुछ महीनों से अमेरिका वेनेजुएला के खिलाफ अपनी आक्रामकता लगातार बढ़ा रहा था, लेकिन यह अपहरण उस बीस साल से ज्यादा समय से जारी साम्राज्यवादी जंग का चरम बिंदु है. ठीक बीस साल पहले, 2006 में, वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा थाः[3]

“संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार शांति नहीं चाहती. वह शोषण, लूट और वर्चस्व की अपनी व्यवस्था को जंग के जरिये चलाना चाहती है. वह शांति की बात करती है – लेकिन इराक में क्या हो रहा है? लेबनान में क्या हुआ? फिलिस्तीन में क्या हो रहा है? पिछले सौ सालों में लैटिन अमेरिका और पूरी दुनिया में क्या होता रहा है? और अब वेनेजुएला को धमकियां दी जा रही हैं – वेनेजुएला के खिलाफ नई धमकियां, ईरान के खिलाफ भी?”

शावेज के शब्द आज भी सच साबित हो रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी साम्राज्यवाद हिंसा के जरिये अपने वर्चस्व और जानलेवा शोषण की व्यवस्था को न सिर्फ कायम रखे हुए है, बल्कि उसे और भी हमलावर बना चुका है.

आज हम यही सब देख रहे हैं : गाजा में इस्राइल का जनसंहार, लेबनान और यमन पर हमले, सीरिया में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों में कत्लेआम करना, ईरान को धमकियां और हमले, क्यूबा की नाकेबंदी कर गला घोंटना, चीन के खिलाफ उकसावे और जंग की तैयारियां, यूक्रेन में छद्म युद्ध, और वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सत्ता पलट की साजिशें.

जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है – और जैसा कि शावेज यूएन में अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के बाद सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि अभी-अभी शैतान आया था...और यह कि जब तक उसकी मौजूदगी की “गंधक की बदबू” हवा में बनी रहेगी, तब तक दुनिया को न युद्ध से राहत मिलेगी, न अन्याय से मुक्ति. शावेज ने इसी बिंब के जरिये अमेरिकी साम्राज्यवाद को मानवता के खिलाफ खड़ी सबसे विध्वंसक शक्ति के रूप में चिन्हित किया था.

पश्चिमी मीडिया का दोहरा चेहरा और तेल-खनिज की लूट

आज पश्चिमी मीडिया ने राष्ट्रपति मादुरो के अपहरण को “अपराध” या “संप्रभुता का उल्लंघन” कहने के बजाय उसे “कैप्चर” जैसे शब्दों से पेश किया – मानो यह कोई जायज कानूनी कार्रवाई हो.[4] शब्दों का यह चयन अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला मजाक है और एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष को अपराधी बनाने की कोशिश है, ताकि इस नग्न साम्राज्यवादी जंग और इस राजनीतिक अपहरण को नैतिक और वैध ठहराया जा सके.

विडंबना यह है कि जहां खुद डोनाल्ड ट्रम्प “अपहरण” कहने से नहीं हिचकते, वहीं पश्चिमी मीडिया सच्चाई को ढकने के लिए भाषाई पर्दा तान देता है. जरा सोचिए, अगर हमास ने नेतान्याहू को “कैप्चर” कर लिया होता? अगर व्लादिमीर पुतिन ने वोलोदिमीर जेलेंस्की को “कैप्चर” कर लिया होता या अगर चीन ताइवान के नेतृत्व को, या पूरे द्वीप को ही “कैप्चर” कर लेता?

इन तमाम हालात में पश्चिमी मीडिया की सुखियां “अपहरण”, “गैरकानूनी गिरफ्तारीय”, “संप्रभुता का घोर उल्लंघन” और “खुला हमला” जैसे शब्दों से भरी होगी, जैसा कि यूक्रेन के मामले में आज भी देखा जा सकता है. लेकिन जब बात वेनेजुएला की आती है, तो वही मीडिया भाषा को हथियार बनाकर सच्चाई को उल्टा खड़ा कर देता है. ये एकतरफा मीडिया कवरेज युद्ध का ही एक रूप हैं, जिनका मकसद वेनेजुएला की जनता को गरीब बनाना, उनकी तकलीफों का ठीकरा बोलिवेरियन क्रांति पर फोड़ना, और बेहिसाब पीड़ा के जरिये सत्ता परिवर्तन को उकसाना है.

यह शर्मनाक है, हालांकि हैरानी की बात नहीं, क्योंकि यही वही मीडिया संस्थान हैं जो अमेरिका-इस्राइल के जनसंहार को जायज ठहराते रहे हैं, और नवउदारवादी वेनेजुएला के असली इतिहास को मिटा देने के लिए वे जानबूझकर इस झूठ को फैलाते हैं.

लेकिन सबसे ज्यादा बेनकाब करने वाली बात यह है कि ट्रम्प ने इस जंग को खुल्लमुखुल्ला वेनेजुएला के तेल और खनिज दौलत से जोड़ दिया. उन्होंने बेधड़क कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को “चलाएगा”, ताकि वह वह तेल “वापस” ले सके जिसे उन्होंने “अमेरिकी हुनर, मेहनत और काबिलियत” से खड़ा बताया और जिसे वेनेजुएला ने कथित तौर पर “चुरा लिया” है. ट्रम्प ने इसे “अमेरिकी इतिहास में अमेरिकी संपत्ति की सबसे बड़ी चोरी” करार दिया.[5] उनके मुताबिक वेनेजुएला, तेल से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल सिर्फ अमेरिका में बने उत्पाद खरीदने में करेगा, जिससे वॉशिंगटन उसका मुख्य और निर्णायक साझेदार बन जाएगा.

तेल उत्पादक संगठन ओपेक के मुताबिक वेनेजुएला के पास 300 अरब बैरल से ज्यादा तेल है, यानी दुनिया का सबसे बड़ा साबित कच्चा तेल भंडार. लेकिन मामला सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है. वेनेजुएला का ओरिनोको माइनिंग बेल्ट सोने और दूसरी कीमती धातुओं से लबालब है. 8,000 टन से ज्यादा सोने के साथ यह इलाका दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण भंडारों में शामिल है.

इसके अलावा अमेरिकी ‘एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन’ की रिपोर्ट के मुताबिक वेनेजुएला के पास अरबों टन लौह अयस्क है, साथ ही रेयर अर्थ तत्व, निकल, तांबा और फॉस्फेट के बड़े भंडार भी मौजूद हैं.[6] ये संसाधान आधुनिक तकनीक और औद्योगिक उत्पादन के लिए बेहद जरूरी हैं, खास तौर पर इस्पात के लिए, जो फौजी हथियारों और युद्ध मशीनरी की रीढ़ है. साम्राज्यवादी टकरावों में तेल सहित इन संसाधनों पर कब्जा ही अक्सर यह तय करता है कि ताकत का पलड़ा किस तरफ झुकेगा.

कैरेबियन में महीनों से चली आ रही अमेरिकी फौजी नाकेबंदी के बाद हुआ यह हमला साफ दिखाता है कि अब अमेरिका इस पूरे इलाके में मुल्कों की संप्रभुता को अपनी रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों के आगे कोई अहमियत नहीं देता.

पश्चिमी मीडिया इस नग्न साम्राज्यवादी हमले को “नशा-विरोधी” या “भ्रष्टाचार-विरोधी” अभियान के तौर पर पेश कर रहा है, और मादुरो पर चुनाव में धांधली कर सत्ता में टिके रहने का आरोप उछालता है. लेकिन इस पर्दे के पीछे असली सवाल कुछ और हैं – खनन के ठेके किसे मिलेंगे, व्यापार के रास्तों पर किसका कब्जा होगा, और जमीन के नीचे दबी दौलत से मुनाफा कौन समेटेगा. पूरा खेल सत्ता को फासिस्ट ट्रम्प और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले  करने की तैयारी का है. निकोलास मादुरो पर चुनावी धांधली का आरोप अमेरिकी साम्राज्यवाद का वही पुराना “बड़ा झूठ” है, जैसा इराक पर हमले से पहले फैलाया गया था कि सद्दाम हुसैन के पास “वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन” हैं.

और अगर चुनावी ईमानदारी की बात सचमुच करनी हो, तो अति-पूंजीवादी अमेरिका में पैसे की खुली तानाशाही है. वहां राजनीति पर कब्जा अभिजात धनिक वर्ग का है, वही राजनीतिक जमात को खरीदता है, उसे नियंत्रित करता है, और आम आदमी की जिंदगी की दिशा तय करता है.

ट्रम्प प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति अपनी अवमानना कभी छुपाई नहीं. फासीवादी हुकूमतें हमेशा यही दावा करती हैं कि कानून वही है जो वे अपनी मर्जी से तय कर दें. और अब सबूत लगातार सामने आ रहे हैं कि – मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और जायोनिस्ट राज्य इस्राइल ऐसे तंत्रा बनते जा रहे हैं, जहां सत्ता अपराधी मानसिकता को वैधता का जामा पहना रही है, और उसे “राष्ट्र” कहकर पेश किया जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पतन और दोहरे मापदंड

इस हमले ने अंतरराष्ट्रीय कानून के हर उसूल को, मुल्कों की संप्रभुता की हर समझ को, और दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के जो थोड़े-बहुत स्तंभ बचे थे, उन्हें पूरी दुनिया के सामने बेरहमी से रौंद दिया है. आज यह साफ है कि मामला सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का नहीं, बल्कि उस पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सुनियोजित ध्वंस का है. लेकिन यह ध्वंस किसी एक रात का नतीजा नहीं है. इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का क्षरण दशकों से किया जा रहा था – कदम-दर-कदम, परत-दर-परत.

इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के पतन का सबसे नंगा और वहशी चेहरा गाजा में जारी जनसंहार के दौरान सामने आया. आपराधिक जवाबदेही के मामले में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी अदालत के फैसलों को खुलेआम ठुकराया गया. अदालत को बदनाम करने के लिए एंटी-सेमेटिज्म का आरोप लगाया गया, और जजों पर प्रतिबंध थोपकर सजा देने की धमकी दी गई. जनसंहार के मुख्य अपराधी नेतन्याहू को अमेरिकी संसद में बुलाकर गाजा जनसंहार को जायज ठहराने का मंच दिया गया, जबकि वह आज तक बिना सजा घूम रहा है. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के रखवाले तमाशबीन बने रहे – जनसंहार को ‘सामान्य’ बना दिया गया, जवाबदेही और इंसाफ को खोखले बयानों की कब्र में दफन कर दिया गया.

वेनेजुएला और इस्राइल के बीच अमेरिका का दोहरा मापदंड 

यह कानून के लागू होने के मामले में साफ दिखता है. ट्रम्प के जरिए वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को ‘नशा तस्कर’ करार देकर उनके अपहरण को जायज ठहराया गया, जबकि नेतन्याहू को एक रणनीतिक साझेदार की तरह बरता गया. इसी अमेरिका ने होंडुरास के पूर्व राष्ट्रपति जुआन ऑरलैंडो हर्नान्डेज को भी खुली दोषमुक्ति दे दी, उसी हर्नान्डेज को, जिसे अमेरिकी अदालतें कोकीन तस्करी का सरगना मानती हैं और जिसके राज में सैकड़ों टन नशा अमेरिका भेजा गया.

[7] सवाल बिल्कुल साफ है : क्या हर्नान्डेज इसलिए बच निकला क्योंकि वह इस्राइल का वफादार मोहरा था, और मादुरो निशाने पर आया क्योंकि वे गाजा में इस्राइली जनसंहार की खुलकर निंदा किए और वेस्ट बैंक पर इजरायली कब्जे को चुनौती दी.

यूक्रेन के मामले में पश्चिम जोर देकर कहता है कि सीमाएं अटल हैं और हमला अपराध है. लेकिन गाजा और वेनेजुएला में ठीक इसका उलटा जायज ठहराया जाता है. यहां सिद्धांत नहीं, बल्कि ताकत तय करती है कि संप्रभुता कब मायने रखेगी और कब नहीं.

पिछले पच्चीस सालों में इराक, लीबिया और सीरिया की अमेरिका द्वारा की गई तबाही इस्राइल की भी जंगें थीं

इराक की जंग पेंटागन के भीतर बैठे ‘इस्राइल-फर्स्ट’ नियो-कॉन्स ने गढ़ी – ‘विनाशकारी हथियारों’ का बड़ा झूठ रचकर. लीबिया को ‘मानवीय हस्तक्षेप’ के नाम पर मिट्टी में मिला दिया गया. सीरिया को जानबूझकर एक अंतहीन छद्म युद्ध का मैदान बनाया गया. आज ईरान के खिलाफ जंग की गूंज उसी खूनी स्क्रिप्ट की अगली कड़ी है. यह जंग भी बेहद सोच-समझकर और बेशर्मी से तैयार की जा रही है – ‘इस्राइल-फर्स्ट’ अरबपतियों जैसे मिरियम एडेलसन और लैरी एलिसन के पाले हुए मीडिया प्रचारकों द्वारा जिन्होंने फिलस्तीन के वेस्ट बैंक पर कब्जे के लिए ट्रंप के चुनाव प्रचार में 100 मिलियन डॉलर का चंदा दिया था. [8] इन ताकतों ने ट्रम्प को इस हद तक जकड़ लिया है कि अब खुलेआम अमेरिकी संविधान को रौंदते हुए तीसरे कार्यकाल की बातें उछाली जा रही हैं, सिर्फ इस्राइली रणनीतिक हितों की खातिर.

आज अमेरिका का तथाकथित ‘कानून’ और ‘न्याय’ इसी दोहरे पैमाने पर चलता है – जो इस्राइल के साथ खड़ा है, वह बेगुनाह घोषित कर दिया जाता है. जो उसके खिलाफ खड़ा होता है, उसे अपराधी बना दिया जाता है. आज कानून की जगह ताकत ने ले ली है, उसूलों की जगह मनमानी ने ले ली है, और हिंसा को नैतिकता का जामा पहनाया जा रहा है.

सड़ांध यहीं नहीं रुकती. वॉशिंगटन बार-बार संयुक्त राष्ट्र चार्टर और यूएन मुख्यालय समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों का उल्लंघन करता रहा है. जिन अधिकारियों को वह नापसंद करता है, उन्हें प्रवेश देने से उसने इनकार किया. पिछले साल फिलिस्तीनी राष्ट्रपति को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने से रोकना दुनिया की सबसे अहम बहुपक्षीय संस्था के मेजबान देश द्वारा किया गया एक खुला संधि-उल्लंघन था. संदेश बिल्कुल साफ था. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तक पहुंच और यूएन चार्टर का पालन अब अमेरिकी मंजूरी पर निर्भर है.

किसी संप्रभु देश के मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष का जोर-जबरदस्ती अपहरण, जैसा कि अमेरिका ने किया, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कहीं से भी जायज नहीं है. न यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा की श्रेणी में आता है, न ही इसे सुरक्षा परिषद की कोई मंजूरी हासिल है. संयुक्त राष्ट्र की रचना निरंकुश सत्ता को सीमित करने के लिए की गई थी. लेकिन आज वह अंतरराष्ट्रीय कानून का कथित रक्षक, उसके गंभीर उल्लंघनों पर लगाम लगाने में लगातार नाकाम रहता हुआ, उसके क्षरण का एक मंचीय प्रॉप बनता जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय कानून महाशक्तियों को अपहरण, तख्तापलट और जबरन सत्ता परिवर्तन का कोई खुला लाइसेंस नहीं देता. यह रवैया द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के ताबूत में ठोकी जाने वाली आखिरी कील साबित हो सकता है.

वेनेजुएला पर हमले के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक मेमोरेंडम पर दस्तखत किए, जिसके जरिये अमेरिका को 66 ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का फैसला किया गया जिन्हें अब कथित तौर पर ‘अमेरिकी हितों’ की सेवा में उपयोगी नहीं माना जाता. इनमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय संगठन और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े 31 संस्थान शामिल हैं.[9]

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्का रूबियो ने एक बयान में कहा कि, “ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि ये संस्थाएं अपने दायरे में फिजूल हैं, बदइंतजामी का शिकार हैं, गैर-जरूरी हैं, पैसों की बर्बादी करती हैं, ठीक से चलाई नहीं जा रही हैं, ऐसे तत्वों के कब्जे में हैं जो हमारे हितों के खिलाफ अपने एजेंडे आगे बढ़ा रहे हैं, या फिर हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता, आजादियों और समग्र समृद्ध के लिए खतरा हैं.”

दरअसल यह कदम किसी प्रशासनिक सुधार से ज्यादा, उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से औपचारिक रूप से पीछे हटने का ऐलान है, जिसे अमेरिका ने खुद दूसरे विश्व युद्ध के बाद गढ़ा था और दशकों तक अपने हितों के मुताबिक चलाया.

लैटिन अमेरिका का पिछवाड़ा और बोलिवेरियन क्रांति का उदय

वॉशिंगटन ने लंबे समय से पूरे लैटिन अमेरिका को अपना ‘पिछवाड़ा’ मानते हुए, जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को गिराने, प्रतिक्रियावादी तानाशाहियां थोपने और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सीआईए की गुप्त कार्रवाइयों, षड्यंत्रों, सीमित सैन्य हस्तक्षेपों और कठपुतली ताकतों का सहारा लिया. इन कार्रवाइयों को हमेशा ‘लोकतंत्र’, ‘स्थिरता’ और ‘स्वतंत्रता’ के जुमलों से ढंकने की कोशिश की गई.

1964 में ब्राजील का सैन्य कू, 1971 में बोलिविया में सत्ता पलट, और 1973 में चिली में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई समाजोन्मुखी सरकार का खून में डूबा तख्तापलट – ये सभी उसी साम्राज्यवादी सिलसिले की कड़ियां थीं. 1954 में ग्वाटेमाला, 1960-63 के बीच इक्वाडोर में सीआईए की साजिशें, 1961 में क्यूबा पर बे ऑफ पिग्स का हमला, और 1983 में ग्रेनाडा पर सीधा सैन्य आक्रमण – हर बार संदेश साफ था : जहां जनता का फैसला अमेरिकी हितों से टकराए, वहां लोकतंत्र को कुचल दिया जाएगा.

वेनेजुएला में ट्रम्प की कार्रवाई को समझने के लिए इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के लंबे और खूनी पैटर्न में देखना जरूरी है. 1823 में अमेरिका के पांचवें राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने मुनरो सिद्धांत पेश किया था, जिसका घोषित मकसद पूरे पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी प्रभाव और नियंत्रण का इलाका बनाना था. समय के साथ यह सिद्धांत पूरे महाद्वीप पर अमेरिकी निगरानी, दखल और दबदबे का औजार बन गया.

अमेरिका ने अपना अधिकार मान लिया कि वह तय करेगा – कौन-सी सरकार “वैध” है, कौन “खतरनाक” है और इसलिए प्रतिबंध या तख्तापलट की हकदार है, और कौन-से प्राकृतिक संसाधन “रणनीतिक” हैं जिन्हें किसी भी कीमत पर, किसी भी तरीके से हासिल किया जा सकता है. इस साम्राज्यवादी परियोजना में संप्रभुता, आत्मनिर्णय, लोकतंत्र और इंसानियत रास्ते की रुकावटें हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर कू, नाकेबंदी, जनसंहार और फासीवाद के जरिये बेरहमी से कुचल दिया जाता है. वेनेजुएला आज उसी पुरानी साम्राज्यवादी पटकथा का नया, और अधिक नग्न संस्करण है.

वॉशिंगटन की असली चिंता सिर्फ यह नहीं कि वेनेजुएला का तेल दुनिया के किस बाजार में जाता है. असली सवाल यह है कि उस तेल से देश के अंदर क्या किया जाता है – जनता की भलाई या साम्राज्य की तिजोरी भरने के लिए.

बोलिवेरियन क्रांति की विरासत और मौजूदा संकट

1998 में ह्यूगो शावेज के राष्ट्रपति बनने के बाद, वेनेजुएला ने तेल से होने वाली आमदनी को दशकों से कायम सामाजिक असमानता के खिलाफ मोड़ दिया. तेल का पैसा मुनाफाखोरों की जेब में नहीं गया, बल्कि सीधे जनता के लिए इस्तेमाल हुआ. गरीबी आधी से भी ज्यादा घट गई, चरम गरीबी और कुपोषण में तेज गिरावट आई, और स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और सस्ती राशन जैसी बुनियादी जरूरतें करोड़ों लोगों तक पहुंचीं.[10]

नवउदारवादी पूंजीवादी नीतियों के खिलाफ इस मॉडल की लोकप्रियता अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ा अपराध बन गई. इसलिए इसे खत्म करने की मुहिम चुपचाप नहीं, बल्कि सुनियोजित और खुली आर्थिक नाकेबंदी के जरिये शुरू हुई. 2000 के दशक में वित्तीय प्रतिबंधें से और 2015 के बाद तेल, बैंकिंग और व्यापार पर व्यापक घेराबंदी तक. जनवरी 2017 से दिसंबर 2024 के बीच इन प्रतिबंधें से वेनेजुएला की तेल आमदनी 213 प्रतिशत तक घट गई. इसका मतलब है कि हर दिन 7.7 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ.[11]

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में एक छोटे ऐतिहासिक दौर के लिए, वेनेजुएला की बोलिवेरियन क्रांति ने वैश्विक नवउदारवादी सहमति में दरार डाल दी, जो लंबे समय से लैटिन अमेरिका को अपने चंगुल में जकड़े थी. 1998 में ह्यूगो शावेज के राष्ट्रपति चुने जाने के साथ – जब कटौती की सख्त नीतियों की वजह से तंगहाली और तेल की दौलत पर अभिजात वर्ग का कब्जा समाज के लिए गहरी परेशानी बन चुका था – वेनेजुएला ने एक ऐसा प्रयोग शुरू किया, जिसका वादा था आय का पुनर्वितरण, सामाजिक अधिकारों का विस्तार और घरेलू कुलीन तबकों तथा साम्राज्यवादी दबाव दोनों के खिलाफ जन-संप्रभुता की फिर से स्थापना.

यह परियोजना कभी पूरी तरह साकार समाजवादी रूपांतरण नहीं बन सकी. लेकिन एक दौर तक इसने लाखों गरीब वेनेजुएलावासियों की जिंदगियों में ठोस सुधर किया और उन राजनीतिक संभावनाओं को फिर से खोला, जिन्हें दशकों से बंद कर दिया गया था. बाद में निकोलस मादुरो के दौर में इसका विनाशकारी ढंग से ढह जाना इन उपलब्धियों को कम नहीं करता.

बोलिवेरियन दौर के शुरुआती साल ठोस, दिखाई देने वाली और जनता की जिंदगी में सीधे असर डालने वाली उपलब्धियों से चिह्नित थे. 2000 के दशक में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उछाल से पैदा हुई आमदनी को शावेज सरकार ने ऊपर से बहने नहीं दिया. बल्कि इसे योजनाबद्ध ढंग से बड़े पैमाने के सामाजिक कार्यक्रमों में लगाया और दशकों से हाशिए पर धकेली गई आबादी को कम्युनल काउंसिलों और भागीदारी आधारित संस्थाओं के जरिए राजनीतिक जीवन में सक्रिय रूप से शामिल किया.

निरक्षरता घटी, कुपोषण में कमी आई, और लाखों लोगों को पहली बार सस्ती राशन व्यवस्था, बुनियादी इलाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच मिली. ये जनता के भौतिक हालात में हुए वास्तविक सुधर थे. यही वजह है कि शावेज को अपने राष्ट्रपति काल के आखिरी सालों तक भी व्यापक जनसमर्थन हासिल रहा.

किसी भी गंभीर और ईमानदार विश्लेषण की शुरुआत इसी सच्चाई को स्वीकार करने से होनी चाहिए कि बोलिवेरियन क्रांति  ने वास्तविक सामाजिक पीड़ा को हल करने की कोशिश में एक हद तक शानदार कामयाबी हासिल की – उन मोर्चों पर, जहां वेनेजुएला की पारंपरिक उदारवादी और नवउदारवादी शासन-व्यवस्थायें  बार-बार और बुरी तरह नाकाम साबित हुई थीं.

इन उपलब्धियों के भीतर कुछ ढांचागत कमजोरियां भी मौजूद थीं, जिन्हें कभी पूरी तरह दूर नहीं किया गया, और जैसे ही अनुकूल बाहरी हालात समाप्त हुए, वही कमजोरियां निर्णायक बन गईं. वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था ‘लगान-आधारित (रेंटियर) अर्थव्यवस्था’ बनी रही, जिसमें विदेशी आमदनी और राज्य के राजस्व का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर टिका था. आय का पुनर्वितरण किसी बदले हुए उत्पादक आधार पर नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की अस्थिर आमदनी पर निर्भर था, जिससे सामाजिक उपलब्धियों अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव के सामने बेहद नाजुक बनी रहीं.

राष्ट्रीयकरण राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थे, लेकिन ज्यादातर मामलों में न तो मजदूरों का लोकतांत्रिक नियंत्रण कायम हो सका और न ही कोई ठोस, समन्वित योजना तंत्र विकसित हो पाया. इसके बजाय, राज्य स्वामित्व के भीतर वही नौकरशाही पदानुक्रम दोबारा उभर आए. घरेलू उत्पादन ठहरा रहा, आयात बढ़ता चला गया, और महंगाई व पूंजी पलायन को काबू में करने के लिए लागू किए गए मूल्य और मुद्रा नियंत्रण धीरे-धीरे प्रोत्साहनों को विकृत करने लगे और उत्पादक क्षमता को पुनर्निर्मित करने के बजाय उसे कमजोर करते चले गए.

ये अंतर्विरोध निकोलस मादुरो के साथ शुरू नहीं हुए, लेकिन उनके राष्ट्रपति काल में पूरी तरह उजागर हुए और तीखे हो गए. जब मादुरो ने 2013 में सत्ता संभाली, तब वैश्विक वस्तुओं – खासकर तेल – की कीमतें गिर रही थीं, और वेनेजुएला का राजकोषीय मॉडल पहले से ही गहरे संकट में था. पूंजीवादी अस्थिरता के इस दौर में सरकार ने नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने के बजाय नियंत्रणों को और सख्त किया, हड़बड़ी में मुद्रा छापी, और राज्य की उत्पादन तथा प्रशासनिक क्षमता के लगातार कमजोर होते जाने को नजरअंदाज किया.

तेल उत्पादन पुरानी पूंजीगत निवेश की कमी, प्रबंधकीय गड़बड़ी, और पीडीवीएसए में विशेषज्ञों को हटाकर राजनीतिक निष्ठा के आधार पर नियुक्तियां किए जाने के कारण और तेजी से गिरा. तेल से होने वाली आय घटती चली गई, और राज्य ने घाटा पाटने के लिए बेलगाम तरीके से नोट छापे, जिससे तेज होती महंगाई (हाइपरइन्फ्रलेशन) आसमान छूने लगी.[12]

नतीजतन, सामाजिक जीवन की नींव हिल गई : जरूरी सामान की किल्लत बढ़ी, आधारभूत ढांचा चरमराया, और वास्तविक मजदूरी बुरी तरह गिर गई. घरेलू उत्पादन ठहर गया, आयात पर निर्भरता बढ़ी, और महंगाई व मुद्रा नियंत्रणों ने उत्पादन को पुनर्जीवित करने के बजाय लगभग तबाह कर दिया. सबसे कठोर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए जाने से बहुत पहले ही वेनेजुएला एक गहरी और विनाशकारी आर्थिक गिरावट के दौर में प्रवेश कर चुका था. इसी दौरान राजनीतिक सत्ता तेजी से केंद्रित होती गई, संस्थान राष्ट्रपति के अधीन होते चले गए, और हर असहमति को खतरे के रूप में देखा जाने लगा.

साथ ही, संकट के जवाब में अपनाई गई राजनीतिक रणनीति भी उतनी ही विनाशकारी साबित हुई. आर्थिक बिखराव का सामना करने के लिए लोकतांत्रिक भागीदारी को और गहरा करने के बजाय, मादुरो सरकार ने सत्ता बचाए रखने के लिए धीरे-धीरे दमन, कानूनी जोड़-तोड़ और संस्थागत प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का रास्ता अपनाया. नेशनल असेंबली को हाशिये पर धकेलना, चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर करना, और असहमति को अपराध की तरह पेश करना – इन सबने समाज के बड़े हिस्से को सरकार से दूर कर दिया, जिनमें वे लोग भी शामिल थे जो कभी बोलिवेरियन क्रांति के मजबूत समर्थक रहे थे.

शावेज के दौर में जिस जनसमर्थन और वैधता के सहारे यह क्रांति खड़ी थी, उसकी जगह धीरे-धीरे जोर-जबरदस्ती और संरक्षणवादी नेटवर्क ने ले ली. नतीजा यह हुआ कि क्रांति के जनाधार की नींव भीतर से खोखली होती चली गई.  इसका अंजाम सिर्फ आर्थिक ध्वंस नहीं था, बल्कि गहरा सामाजिक बिखराव था, जिसका सबसे बड़ा संकेत लाखों वेनेजुएलाइयों का देश छोड़कर जाना है. इस बड़े पैमाने के पलायन ने न सिर्फ उत्पादन को और कमजोर किया, बल्कि नागरिक जीवन और पूरे सामाजिक ताने-बाने को भी गंभीर चोट पहुंचाई.

वेनेजुएला के अनुभव को समाजवाद की नाकामी के तौर पर नहीं, बल्कि राज्य-केंद्रित और लगान-निर्भर समाजवादी परियोजना की विफलता के रूप में समझना ज्यादा सटीक है – एक ऐसी परियोजना जो पूंजीवाद की संरचनात्मक सीमाओं से कभी बाहर नहीं निकल पाई. बोलिवेरियन क्रांति ने अधिशेष का पुनर्वितरण तो किया, लेकिन उन उत्पादन संबंधों को बुनियादी तौर पर नहीं बदला जिनसे यह अधिशेष पैदा होता था. मजदूर राज्य के खर्च के लाभार्थी तो बने, लेकिन आर्थिक सत्ता के लोकतांत्रिक कर्ता नहीं.

योजना-निर्माण सामूहिक नियंत्रण की बजाय नौकरशाही हाथों में रहा, और जन संस्थानों में वह स्वायत्तता नहीं थी जिससे वे राज्य को जवाबदेह ठहरा सकें. जब संकट आया, तो ऐसे मजबूत ढांचे मौजूद ही नहीं थे जिनके जरिये मजदूर वर्ग नीतियों में दखल दे सके, उत्पादन को नए सिरे से संगठित कर सके या नेतृत्व से हिसाब मांग सके. क्रांति ने जनता को चुनावी और भाषणों के स्तर पर तो सक्रिय किया, लेकिन अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के संचालन और निर्णायक फैसलों में उन्हें गहराई से शामिल नहीं कर पाई. यही वह बुनियादी कमजोरी थी, जिसने संकट के वक्त पूरी परियोजना को असहाय बना दिया?

खनन आधारित लगान पर निर्भरता, ऊपर से केंद्रीकृत सत्ता और निचले स्तर पर मजदूर नियंत्रण की कमी ने मिलकर एक ऐसा नाजुक संतुलन पैदा किया, जो लंबे झटकों को सह नहीं पाया. ऐसी परिस्थितियों में नौकरशाही कोई तटस्थ प्रशासनिक औजार नहीं रहती, बल्कि एक रूढ़िवादी ताकत में बदल जाती है, जिसका पहला लक्ष्य सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि अपने संस्थागत वजूद को बचाए रखना होता है. इस ढांंचे में भ्रष्टाचार और अक्षमता कोई नैतिक भटकाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध और जवाबदेही के बिना सिमटी हुई सत्ता के स्वाभाविक नतीजे होते हैं. और जब किसी क्रांतिकारी परियोजना की वैधता मौजूदा भौतिक हालात में सुधर के बजाय ज्यादातर अतीत की गाथाओं और बाहरी दुश्मनों के खिलाफ खड़े होने पर टिकी हो, तो जीवन स्तर गिरते ही वह वैधता तेजी से बिखरने लगती है.

वेनेजुएला का अनुभव यह भी साफ करता है कि जब साम्राज्यवाद-विरोध को आंतरिक लोकतंत्र से काट दिया जाता है, तो उसकी भी एक ठोस सीमा सामने आ जाती है. विदेशी दखलअंदाजी और प्रतिबंधों का विरोध न सिर्फ जायज है, बल्कि जरूरी भी है, लेकिन यह न तो जवाबदेह शासन की जगह ले सकता है और न ही देश के भीतर दमन को सही ठहराने का बहाना बन सकता है. जो राजनीति जनता की तकलीफों को भू-राजनीतिक टकराव का “साइड इफेक्ट” मानकर नजरअंदाज करती है, वह आखिरकार उसी वर्ग का भरोसा खो देती है, जिसके नाम पर वह बोलने का दावा करती है. अंतरराष्ट्रीय एकजुटता सिर्फ नारों से कायम नहीं रहती. उसकी बुनियाद उस परियोजना की विश्वसनीयता पर टिकी होती है, जो सचमुच इंसानी जिंदगी को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाती हुई दिखाई दे.

यहाँ से निकलने वाले सबक वाम के लिए असहज जरूर हैं, लेकिन उनसे बचा नहीं जा सकता. संरचनात्मक बदलाव के बिना किया गया पुनर्वितरण हमेशा पलटा जा सकता है. लोकतांत्रिक नियंत्रण के बिना राज्य स्वामित्व खोखला और नाजुक बन जाता है. टिकाऊ संस्थाओं के बिना करिश्माई नेतृत्व, नेता के जाते ही ढहने की जमीन तैयार करता है. और एक ही जिंस पर टिकी तथाकथित ‘आर्थिक संप्रभुता’ दरअसल संप्रभुता नहीं, बल्कि निर्भरता का ही दूसरा नाम है. वेनेजुएला ने साम्राज्यवाद  को चुनौती दी, लेकिन यह चुनौती अधूरी, असंगत और उन भौतिक व संस्थागत बुनियादों के बिना दी गई, जो किसी भी सामाजिक परियोजना को संकट के दौर में टिकाए रख सकती थीं.

आज दुनिया एक बारूद के ढेर पर खड़ी है, और उसके ऊपर मुट्टीभर अमीर तबका बैठा है, जो अपनी सत्ता और मुनाफे को बचाने के लिए पूरी मानवता को युद्ध, विनाश और अस्थिरता की ओर धकेल रहा है. यही प्रवृत्तियां आज पूरी दुनिया में साफ दिखाई दे रही हैं. साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया के नए बंटवारे में जुटी हैं. यूरोप में बड़े पूंजीवादी देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े हथियारबंदी अभियानों में शामिल हैं. एक तरफ वे युद्ध की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी तरफ सामाजिक कल्याण की व्यवस्थाओं को खत्म किया जा रहा है. जर्मनी का शासक वर्ग चौथे राइख के ख्वाब पाल रहा है और पूरे यूरोप में, बल्कि उससे आगे भी, अपनी सैन्य ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है, और ट्रंप के ग्रीनलैंड को हथियाने की धमकी पूरे यूरोप को धीरे-धीरे एक युद्ध अर्थव्यवस्था की ओर धकेल रहा है.

भारत की शर्मनाक चुप्पी और वैश्विक प्रतिरोध

इस हालात में भारत की स्थिति विशेष रूप से शर्मनाक है. मोदी दौर में भारत की विदेश नीति ने न सिर्फ अपनी स्वतंत्र आवाज खो दी है, बल्कि खुले तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के पीछे खड़ी होती जा रही है. किसी संप्रभु देश के चुने हुए राष्ट्रपति के अपहरण और हमले जैसी कार्रवाई की बिना किसी हिचक के, सबसे कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए थी. लेकिन इसके बजाय चुप्पी साध ली गई. यह तब है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ रखा है – 2025 में मनमाने ढंग से 50 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाए गए और 2026 में 500 प्रतिशत तक की धमकी दी गई – और प्रधनमंत्री मोदी का सार्वजनिक रूप से अपमान किया गया. मोदी सरकार  की विदेश नीति  गुट-निरपेक्षता की परंपरा का पूर्ण परित्याग है, जो भारत को अमेरिका-इस्राइली धुरी का पिछलग्गू बना रही है और देश की संप्रभुता को भी खतरे में डाल रही है.

इसके उलट भारत के भाकपा(माले) सहित अन्य वाम दलों ने इस अमेरिकी हमले को स्पष्ट रूप से साम्राज्यवादी युद्ध करार दिया और वेनेजुएला के लोगों की संप्रभुता के पक्ष में खड़े होने का ऐलान किया. देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन और रूस ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया, जबकि यूरोपीय देशों ने हल्की असहमति जताकर खुद को बचाने की कोशिश की. संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने इसे साफ तौर पर “हमला” कहा.

लेकिन सत्ता की चुप्पी के बावजूद, दुनिया की जनता खामोश नहीं है. वेनेजुएला से लेकर अमेरिका महाद्वीप, यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक “यांकी गो होम” के नारे गूंज रहे हैं. वेनेजुएला में लोग रोज सड़कों पर उतर रहे हैं और नारा दे रहे हैं – “मादुरो, डटे रहो, जनता उठ खड़ी हुई है.”

यह प्रतिरोध बताता है कि इतिहास अभी खत्म नहीं हुआ है. अमेरिकी साम्राज्यवाद का यह वैश्विक उभार अंततः पूरी दुनिया में वर्ग संघर्ष को तेज करेगा. इस संघर्ष की अगुवाई मजदूर वर्ग को करनी होगी, क्योंकि वही एकमात्र सामाजिक ताकत है जो साम्राज्यवादी हिंसा को जड़ से खत्म कर सकती है और लोकतंत्र, बराबरी और इंसानी गरिमा पर टिका हुआ समाज खड़ा कर सकती है.

शासक वर्ग ने साफ कर दिया है कि वह 2026 को बेलगाम सैन्य हिंसा और युद्ध का साल बनाना चाहता है. इसका जवाब यही हो सकता है कि 2026 को वर्ग संघर्ष का साल बनाया जाए और समाजवाद के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को आगे बढ़ाया जाए.

अंत में फिर ह्यूगो शावेज की उन बातों की ओर लौटना जरूरी है, जो उन्होंने बीस साल पहले संयुक्त राष्ट्र के मंच से कही थीं. वे सिर्फ 2006 की दुनिया या बुश से मुखातिब नहीं थे. वे आज हमसे, आज उठ खड़े हो रहे लोगों से भी बात कर रहे थे : “जो हो रहा है, वह यह है कि दुनिया जाग रही है और हर जगह लोग उठ खड़े हो रहे हैं. मैं दुनिया के तानाशाह से कहता हूं – मुझे लगता है कि तुम्हारे बचे हुए दिन एक जिंदा डरावना सपना बनेंगे, क्योंकि जहां भी तुम देखोगे, हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ उठते हुए पाओगे – आजादी, लोगों की बराबरी और देशों की संप्रभुता के सम्मान की आवाज उठाते हुए. हां, हमें आतंकवादी कहा जा सकता है, लेकिन हम साम्राज्य के खिलाफ उठ रहे हैं, वर्चस्व के इस पूरे मॉडल के खिलाफ.”

संदर्भः

1.https://www.counterpunch.org/2026/01/09/hugo-chavez-predicted-this/ Nuvpreet Kalra
2. https://globalnews.ca/ 9 Jan 2026
3. Statement by Hugo Chávez, United Nations https://www.un.org/webcast/ga/61/pdfs/venezuela-e.pdf
4. Spies, drones and blowtorches: How the US captured Maduro, BBC English News, 3 Jan 2026
5.https://www.cbsnews.com/news/trump-venezuela-oil-assets-theft-explainer/
6.https://www.opec.org/assets/assetdb/asb-2025.pdf
7.https://www.congress.gov/crs-product/IN12621
8.https://nymag.com/intelligencer/article/miriam-adelson-trump-2024-campaign-donor-israel.html
9.https://www.dw.com/en/trump-withdraws-us-from-66-international-organizations/a-75427108
10.https://venezuelanalysis-com.
11.https://antipodeonline-org.translate.goog/2018/08/10/venezuela-its-all-about-the-oil/
12.https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0301420724004112

17 January, 2026