(सीपीआइ के 25वें राष्ट्रीय महाधिवेशन में कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य का संबोधन)
अध्यक्ष मंडल के साथियो! कॉमरेड डी राजा और वामपंथी दलों के अन्य नेतागण, भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के सदस्यगण और सुधाकर रेड्डी नगर स्थित कॉमरेड अतुल अंजान हॉल में उपस्थित सभी साथियों और मित्रों! भाकपा के 25वें अधिवेशन के लिए आप सभी का हार्दिक अभिनंदन! विशेष रूप से यह अधिवेशन भाकपा के शताब्दी वर्ष की पृष्ठभूमि में हो रहा है, इसलिए इस अवसर पर आपका अभिवादन कर पाना मेरे लिए दोहरे आनंद और दोहरे सम्मान की बात है.
साथियों! कम्युनिस्ट पार्टी स्थापना के 100 साल मेरे लिए हिंदुस्तान में संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन के 100 साल हैं. जाहिर सी बात है, इतना शानदार इतिहास जिसको लेकर हम लोग आगे बढ़ रहे हैं, उससे हमेशा प्रेरणा मिलती है, ऊर्जा मिलती है. पिछले करीब 45 सालों से मैं भी कम्युनिस्ट आंदोलन में हूं. मैं खुशकिस्मत रहा कि चाहे बंगाल हो या बिहार हो, झारखंड हो – देश के करीब-करीब हर हिस्से में मुझे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी के बहुत सारे नेता मिले हैं. वे सब याद आते हैं, जिन लोगों से बहुत सीखने को मिला. जिनसे बहुत प्यार मिला. इसलिए वे तमाम यादें हैं. आपके पिछले ही पार्टी कांग्रेस में कॉमरेड सुधाकर रेड्डी थे, वे आज हमारे बीच में नहीं हैं. कॉमरेड अतुल अंजान थे और वे भी आज हमारे बीच में नहीं हैं. कामरेड सीताराम ऐचुरी कल तक थे और आज हमारे बीच में नहीं हैं. तो उन तमाम कम्युनिस्ट आंदोलन के शहीदों को, उन तमाम हमारे बिछड़े हुए साथियों को, आज आपके इस पार्टी महाधिवेशन के मंच से मैं सलाम करता हूं. इस अवसर पर मैं यह संकल्प लेता हूं कि उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए, उनके मिशन को पूरा करने के लिए, जितनी भी ताकत है वो ताकत लगा दूंगा और इस देश में शहीदों के अरमानों को जरूर मंजिल तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा.
यह पंजाब है. हम हमेशा करतार सिंह सराभा का नाम लेते हैं, भगत सिंह का नाम लेते हैं, अशफाक उल्लाह का नाम लेते हैं. वे उस दौर के हैं जब यहां कम्युनिस्ट पार्टी नहीं बनी थी. ये हमारे बहुत सारे साथी शायद औपचारिक रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर नहीं थे. लेकिन अपने विचारों में, अपनी कुर्बानी में, अपने लक्ष्यों में वो बिल्कुल कम्युनिस्ट थे. मैं मानता हूं कि हमारे देश के कम्युनिस्ट आंदोलन के वो पथ प्रदर्शक थे. भगत सिंह की रचनाओं में आपको कम्युनिस्ट आन्दोलन का एक कार्यक्रम मिल जाएगा. कोई फॉर्मल नहीं, लेकिन बिल्कुल, एक बाकायदा कम्युनिस्ट कार्यक्रम जिसकी भगतसिंह अपने नौजवान साथियों से अपील कर रहे थे, मैं मानता हूं कि हिंदुस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए सबसे पहला कोई प्रोग्राम का अगर मसविदा है वो हमें भगत सिंह से मिलता है. तो उन तमाम नेताओं, शहीदों को भी सलाम!
हम यह भूल नहीं सकते कि अगर हम हमने 100 साल पूरे किए हैं, हम अपना शताब्दी वर्ष मना रहे हैं तो इस देश में और एक शताब्दी वर्ष भी कुछ लोग मना रहे हैं. पिछले 100 साल से ये जो दो अलग-अलग धाराएं हैं वे एक दूसरे के खिलाफ हैं, एक तरह से आमने सामने की ताकतें हैं और आज हमारे सामने बिल्कुल आरपार की लड़ाई है. जिस दौर में कम्युनिस्ट पार्टी बनी चाहे आप कानपुर की बात करें या ताशकंद की बात करें, दुनिया में उस दौर में कम्युनिस्ट पार्टियां बनी हैं – रूस के इंकलाब से प्रेरणा लेकर के, ऊर्जा लेकर के, यह 1917 की बात है. उस समय दुनिया ने सोचा था कि शायद रूस के इंकलाब के बाद पूरे यूरोप में और भी कई देशों में इंकलाब होंगे. जर्मनी में रोजा लुक्जेमबर्ग ने और बहुत सारे साथियों ने एक क्रांति को सफल बनाने की कोशिश में शहादत दे दी, लेकिन क्रांति नहीं हो पाई. हम सब लोग जानते हैं कि 1917 में रूस के इंकलाब के ठीक 5 साल बाद इटली में मुसोलिनी आ जाते हैं. ये जो आज हम फासीवाद कह रहे हैं, उस दौर में दुनिया भर में सर उठाता है और तब से उसका जो नजारा है, हम देख रहे हैं.
इसीलिए अगर रूस के इंकलाब से ऊर्जा लेकर और आजादी के आंदोलन से अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए कम्युनिस्ट आंदोलन ने अपने को संगठित किया. और ये जो आरएसएस है उसने उसी मुसोलिनी से, हिटलर से, उसी दौर के फासीवाद से ताकत लेकर उसकी नकल करते हुए, उससे प्रेरणा लेकर, हिंदुस्तान में अपना विस्तार किया. हमारे सामने था आजादी का आंदोलन और उनके सामने था उस आजादी के आंदोलन के खिलाफ अंग्रेजों के पक्ष में खड़े होकर के मुखबिरी करना. हिंदुस्तान में जो कुछ भी पुराना और सड़ा-गला था, उसको मजबूत करने का कार्यभार उसके पास था. संविधान तो लिखा गया 1949 में, देश को आजादी मिली 1947 में लेकिन बाबा साहब अंबेडकर 1927 में ही मनुस्मृति को पब्लिकली जला देते हैं. वे कहते हैं ये गुलामी का दस्तावेज है और हिंदुस्तान को अगर आगे बढ़ना है. तो इस गुलामी के दस्तावेज को जलाते हुए, इसको तोड़ते हुए ही आगे बढ़ना है.
और ये आरएसएस के लोग, 1949 में जब संविधान पारित हो रहा था, तब वो खुल के कह रहे थे कि इस देश के संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है. भारत का असली संविधान तो मनुस्मृति है. जाहिर सी बात है कि आज अगर उस आरएसएस के हाथ में राज सत्ता है. तो वह आज देश में क्या कर रहा है? क्या करेगा? इसके लिए हमें मोहन भागवत का भाषण सुनने की जरूरत नहीं है. 100 साल से जो लोग इतिहास को देख रहे हैं वो सब लोग जानते हैं कि आरएसएस हिंदुस्तान में फासीवाद का वाहक बन कर अब उस विचार को पूरे योजनाबद्ध तरीके से हमारे ऊपर थोपने का काम कर रहा है. पूरे देश के लोकतंत्र को खत्म करने का, इस संविधान को खत्म करने का उनको मौका मिल रहा है और निश्चित तौर पर जो भी मौका, जब भी उनको मिला है, हर मौके का इस्तेमाल उन्होंने इसी काम के लिए, इसी मकसद के लिए किया है और आज भी वो कर रहे हैं.
इसीलिए हम सबके सामने बहुत बड़ी चुनौती है. बहुत बड़ी लड़ाई है जिसको हम टाल नहीं सकते. यह लड़ाई आज नहीं तो हम कल या परसों नहीं लड़ सकते हैं. यह लड़ाई यहीं और अभी के लिए होनी चाहिए. हिंदुस्तान में आज ये जो फासीवाद हमारे सामने है, इससे निपटने के लिए हम किसी अगली पीढ़ी के लिए इंतजार नहीं कर सकते हैं. और इसके लिए सिर्फ पुराने इतिहास को याद करने से भी काम नहीं चलेगा. यह लड़ाई हम सबको लड़नी है. जाहिर सी बात है कि हम सब लोग इसे लड़ रहे हैं.
अगर हम फासीवाद के बहुत सारे पहलू पर बात करें, अगर हम सांप्रदायिकता की बात करें, तो उस समय 1857 के बाद अंग्रेजों को लगा कि इस देश में बिना फूट डाले, हम राज नहीं कर सकते. तब 1857 में अजीमुल्ला खान ने जो उस दौर के शायर थे, लिख दिया कि “हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा.” यह हिन्दुस्तान हमारी मिल्कियत है. ये हिंदू, मुस्लिम, सिख सब का प्यारा है. तो जब 1857 में उन्होंने ये कह दिया कि हिंदू-मुस्लिम की एकता बन सकती है और ये एकता अगर बन जाए तो इस देश में कहीं भी अंग्रेजों का राज चल नहीं सकता है. जब अंग्रेजों की समझ में यह बात आ गई तब से उन्होंने लगातार कोशिश की “फूट डालो, राज करो” की और इस देश में जाकर अंततः विभाजन भी हुआ.
सांप्रदायिकता के खिलाफ हम 100 सालों से, तब से, लड़ रहे हैं और आज भी लड़ेंगे. पूंजीवाद के खिलाफ भी हमारी लड़ाई पुरानी है. जब से पूंजीवाद हिंदुस्तान में बनना शुरू हुआ, तब से हम पूंजीवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं. लेकिन आज की जो सांप्रदायिकता है वो पुराने किसी भी दौर की सांप्रदायिकता से बिल्कुल एक अलग कैटेगरी, अलग स्तर की है. अलग किस्म का जहर है उसमें, अलग किस्म की नफरत है उसमें. तो वो सारे जहर जो उसके हैं, नफरत है, आज वही पूरे हिंदुस्तान में नफरती भाषण है. आपको इसको अलग से चिन्हित नहीं करना है, वो नफरती भाषण ही अभी इस समय भाषण है. वो हेट क्राइम (पूर्वाग्रह से जुड़ा घृणा अपराध) जिसमें उस समय महात्मा गांधी की हत्या हुई, वो आजादी के बाद का सबसे पहला बड़ा हेट क्राइम था. सबसे बड़ी आतंकी कार्यवाही थी. लेकिन आज वो सामान्य बन चुका है. आज वही सामान्य है.
हम जो पूंजीवाद से लड़ रहे थे, उस दौर में भी जब टाटा, बिड़ला, गोयनका, अंबानी की हम बात किया करते थे. तब छोटे-छोटे कुछ पूंजीपतियों से भी हम लड़ते थे. लेकिन आज इस अडानी-अंबानी का दौर है, जहां अडानी को सब कुछ चाहिए, इस देश के पूरे बंदरगाह चाहिए, हर हवाई अड्डा चाहिए, हर सड़क चाहिए. अभी बिहार में चुनाव सामने हैं. जब-जब हम लोगों ने बिहार में भूमि सुधार के लिए संघर्ष किया, जब-जब हमारे विधायकों ने विधानसभा के अंदर भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट की चर्चा की, जब-जब लोगों ने कहा कि भैया आपने खुद वादा किया था बिहार के गरीबों से कि एक एकड़ नहीं तो 20 डिसमिल-10 डिसमिल जमीन हम गरीब को देंगे. जब-जब हमने गरीब की जमीन के लिए बात की तो हमारे नीतीश कुमार जी बड़ा स्टैंडर्ड जवाब देते थे. “जमीन तो है ही नहीं. कहां से जमीन लाएंगे? क्या आसमान से जमीन लाएंगे?” और आज उसी बिहार के भागलपुर में 1050 एकड़ जमीन पावर प्लांट के नाम पर अडानी को दी जा रही है. हमारे मोदी जी कहते हैं – ‘एक पेड़ मां के नाम’ और मां के सम्मान को लेकर के वे इस समय बड़े परेशान है, पूरे देश में बोल रहे हैं. और वहां पूरे 10 लाख पेड़ काट दिए जा रहे हैं, अदानी के लिए. तो आज इस तरह का जो पूंजीवाद है, इतना आक्रामक, इतना क्रूर, इतना खूंखार, इस तरीके का जो हमलावर पूंजीवाद है, इससे लड़ना है.
इसीलिए हमें लगता है कि हम लोग तमाम लड़ाईयां लड़ रहे हैं. वर्षों से लड़ रहे हैं. लेकिन जिन खतरों से हम लड़ रहे थे वो सभी खतरे मिलकर के, एकत्र और एकाग्र हो कर के, एक बड़ा खतरा बनकर हमारे सामने खड़े हैं. तो हमें भी, उन खतरों के खिलाफ, जो हमारी लड़ाई का इतिहास है, अलग-अलग लड़ाइयां रही हैं, उन तमाम लड़ाइयों को एकत्र और एकाग्र करके, एक बड़ा प्रतिरोध पैदा करना है. मैं कहता हूं कि यह इस देश के लिए दूसरी आजादी से कम कुछ भी नहीं है. आजादी लंबी लड़ाई से मिली. आजादी से हमें संविधान मिला. आजादी से जब संविधान मिला तो बाबा साहब आंबेडकर ने कहा कि संविधान तो हमने लिख दिया. संविधान को लेकर बातें हो सकती है कि अच्छा है, बुरा है, कितना अच्छा है, क्या है, क्या नहीं है. लेकिन पता नहीं संविधान किसके हाथ में जाएगा. संविधान किसके हाथ में जाएगा, कौन चलाएगा संविधान को? यह महत्वपूर्ण है. आज हमें पता है कि संविधान किनके हाथ में गया है और वो संविधान के साथ क्या कर रहे हैं.
बाबा साहब अंबेडकर ने कहा कि भाई इस देश में ये एक ऊपर से दिखने वाला लोकतंत्र है. ऊपर से हमने संविधान तो लिख दिया. लेकिन नीचे जो जमीन है वो जमीन लोकतांत्रिक नहीं है. वो अलोकतांत्रिक जमीन है और उस अलोकतांत्रिक जमीन पर दिखावे का लोकतंत्र है, अगर उस जमीन को हम लोकतांत्रिक नहीं बनाएंगे तो वो ऊपर से दिखने वाला लोकतंत्र लंबे समय तक चलने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि हमने जो एक वोट की बराबरी आपको दे दी – सबके लिए एक वोट, गरीब से गरीब के लिए भी एक वोट, अमीर से अमीर के लिए भी एक वोट – वो तब तक ही कुछ चल सकती है. अगर समाज में पूरी तरह से सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी हावी हो जाए तब ये चुनाव में एक वोट की बराबरी का कोई खास मतलब नहीं रहेगा. और आज ये सब कुछ हमारे सामने हो रहा है.
इसीलिए साथियो! हमारे साथियो ने, कॉमरेड राजा ने, कॉमरेड एमए बेबी ने जैसा कहा – हम लोगों को निश्चित तौर पर एक मजबूत वाम एकता चाहिए. इस देश में आज के इस फासीवाद से निपटने के लिए, दूसरी आजादी की लड़ाई की जंग को जीतने के लिए. ठीक जैसे आजादी के आंदोलन के दौर में बहुत बड़ा परिषर था. लड़ाई के रास्ते अलग-अलग थे. भगत सिंह का रास्ता अलग था, गांधी का रास्ता अलग था, सुभाष बोस का रास्ता अलग था, नेहरू का रास्ता अलग था और उसमें अंबेडकर का रास्ता भी था. कुछ लोग कहते हैं कि डॉ अंबेडकर तो कभी जेल गए नहीं. अंबेडकर तो बैठ के सिर्फ संविधान लिख रहे थे. हां, संविधान लिख रहे थे. पर सिर्फ संविधान नहीं लिख रहे थे. उस पूरे आजादी के आंदोलन से निकलने वाला जो सबसे रेडिकल नारा था वो था कि ‘जमींदारी को खत्म करो!’ भूमि सुधार का नारा था. पर उतना ही रेडिकल नारा था ‘जाति का उन्मूलन.’ बिल्कुल वही 1936, जिस 1936 में एक तरफ किसान घोषणापत्र आता है, जमींदारी विनाश का नारा आता है, कार्यक्रम बनता है, उसी 1936 में अंबेडकर वो बात भी कहते हैं – जाति का उन्मूलन. तो पूरे देश में जो बिल्कुल हो सकता है कि अंग्रेजों के खिलाफ जेल नहीं जा रहे थे लेकिन बैठकर पूरे समाज को बदलने के लिए योजना बना रहे थे, संघर्ष कर रहे थे, इन तमाम संघर्षों को मिलाकर आजादी का एक बहुत बड़ा फलक बना था.
आज भी हमें उतनी ही बड़ी व्यापक एकता चाहिए. सबको साथ लेकर के चलना होगा. इस देश में अलग-अलग मुद्दे हैं. कहीं भाषा का सवाल है, कहीं संघीय ढांचे का सवाल है, कहीं संस्कृति का सवाल है, कहीं रोजगार का सवाल है, कहीं किसान अपनी खेती बचाने के लिए लड़ रहे हैं. कहीं मजदूर वो जो गुलामी के चार लेबर कोड मजदूरों पर थोपने की कोशिश हो रही है, वो जो निजीकरण का हमला है, वो जो पुरानी पेंशन स्कीम को छीन करके, पेंशन चुरा करके, एक नई पेंशन स्कीम थोप दी गई, वो जो सारे नौजवान आउटसोर्सिंग को झेल रहे हैं, बेरोजगारी और ठेकेदारी को झेल रहे हैं – उन तमाम लोगों की लड़ाईयां हैं. लेकिन इन सभी लड़ाईयों को एक बड़ी एकता बना करके और बड़े मकसद के साथ, बड़ी ताकत बनाकर एक साथ लड़ना है. उसमें ऊर्जा भरनी है. ये काम हम कम्युनिस्टों को जरूर करना है.
हम अक्सर अफसोस करते हैं कि 1960 के दशक तक हिंदुस्तान में एक ही कम्युनिस्ट पार्टी थी. और यह 60 का ही दशक है जब दो और पार्टी बनी – सीपीएम 1964 में, 1969 में हमारी पार्टी सीपीआई एमएल. कुछ लोग सोचते हैं अगर ये तीन पार्टी नहीं बनी होती, अगर इस देश में एक ही पार्टी रह गई होती तो शायद तब देश कुछ और होता. मैं समझता हूं कि ये इतिहास में जाकर खोना है. ये सोचने से कोई फायदा भी नहीं है. और मैं इसे इस रूप में देखता भी नहीं हूं. अगर इतने बड़े देश में विविधता में एकता का प्रिंसिपल है, तो कम्युनिस्ट आंदोलन में जो विविधता का विकास हुआ है, अलग-अलग धाराएं हैं, हमें लगता है कि उससे कम्युनिस्ट आंदोलन में विस्तार भी हुआ है.
कम्युनिस्ट आंदोलन सिर्फ अलग-अलग धारा बन जाने से, अलग-अलग पार्टियां बन जाने से कमजोर हो गया – मुझे नहीं लगता है कि ये द्वंद्वात्मक विश्लेषण है. द्वंद्वात्मक विश्लेषण यह है कि हम लोग अलग-अलग हैं तो कोई बात नहीं. ‘एकता और विविधता’ अगर यह देश के लिए प्रिंसिपल है तो कम्युनिस्ट आंदोलन में भी विविधता जरूरी है, बिना बिखराव के विविधता. हां, बिखराव नहीं. एकता के लिए हम लोग बिल्कुल हर संभव कोशिश करेंगे. हो सकता है इतिहास ने अगर एक मोड़ पर कम्युनिस्टों को अलग-अलग धारा में कर दिया है, तो इतिहास में ही आगे चलकर कोई एक समय भी आएगा जब हो सकता है कि सभी धाराएं मिलकर के इस देश में फिर एक कम्युनिस्ट पार्टी बन जाएंगी. उसके लिए भी हम लोग काम करेंगे. लेकिन ये हमारे काम का परिणाम होगा. इसको पूर्व शर्त बना करके सोचने से मेरे ख्याल से कोई फायदा नहीं है. लड़ाई बड़ी है.
तीन बात कह करके मैं खत्म करूंगा. अभी पंजाब में बाढ़ को हमने देखा. साथी लोग कहते हैं कि 1988 के बाद इतनी बड़ी तबाही शायद पहली बार देखने को मिली. इस बाढ़ ने हमारे सामने बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया. उसमें रिलीफ की बात है. आज के दिन में कहीं केरल में बाढ़ हो जाए, तमिलनाडु में हो जाए, पंजाब में हो जाए तो ये डबल इंजन वाली जो सरकार है वो पहले ये देखती है कि वहां किस इंजन की सरकार है. उसको कभी भी राष्ट्रीय आपदा के रूप में नहीं देखा जाता है. तो निश्चित तौर पर केंद्र सरकार की ओर से जो काम करना चाहिए था उन्होंने नहीं किया. लेकिन मुझे लगता है कि इससे हटकर के भी बड़ा सवाल है, हिमाचल में, उत्तराखंड में पंजाब में ये क्या हो रहा है? हिमालय के साथ हमने जो छेड़छाड़ किया, विकास के नाम पर हमने जिस तरह से प्रकृति को नुकसान पहुंचाया, तो आज विकास की जो कारपोरेट रणनीति है जो विनाशकारी रणनीति है, शायद वो हमारे सामने बड़ा नुकसान लेकर के आ रही है. तो आज हमारे सामने हिमालय को बचाने का सवाल है. प्रकृति को बचाने का सवाल है.
हमने देखा कि पंजाब में होशियारपुर में एक घटना घटी. आप उसकी बहुत ही निंदा कीजिए. निश्चित तौर पर इतना बड़ा अपराध कहीं अगर हो जाए तो या किसी भी अपराध के लिए निश्चित तौर पर सजा चाहिए. लेकिन कुछ लोग ऐसी-वैसी बात करने लगे हैं. पंजाब में बिहार के एक समूह को अगर आप जिम्मेदार ठहरा देंगे तब क्या होता है? इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का कत्लेआम हुआ. आज इतना बड़ा किसान आंदोलन खड़ा हुआ उसको खालिस्तान से जोड़ के कहा गया. तो पंजाब जिसने ये झेला है, मुझे नहीं लगता है कि पंजाब में ऐसी विभाजनकारी बातें जो हैं, इसको लोग समर्थन देंगे. आज जो पंजाब बना है, जो भी पंजाब में खेती का भी विकास हुआ है, उन तमाम विकास में हम नहीं भूल सकते कि हमारे बिहार और यूपी से आने वाले मजदूर साथियों की भी मेहनत है. उनका भी पसीना इस पंजाब को बनाने में लगा है.
निश्चित तौर पर हम कहेंगे कि आज पंजाब में फिर एक बार किसानों की जो एकता है, गरीबों की एकता है, मेहनतकशों की एकता है, वो किसी धर्म के आधार पर, भाषा के आधार पर, संकीर्णता के आधार पर टूटेगी नहीं. आज का दौर तो अलग है. आज का दौर है कि पंजाब के हमारे नौजवान जो अमेरिका गए हुए हैं, अगर उनके पास कहीं डॉक्यूमेंट की कमी है. उनको घुसपैठी कह के अपराधी के रूप में गुलाम की तरह अमृतसर में भेजा जा रहा है – हथकड़ी और बेड़ी लगा कर, हम अपने इलाके में जो बिहार से आए हैं, यूपी से आए हैं, बहुत मजबूर होकर के आए हैं काम करने के लिए, निश्चित तौर पर हम उनके साथ ऐसा नहीं करेंगे. हम बिल्कुल लड़ेंगे.
तीसरी बात बिहार में जो एसआईआर चल रहा है, पूरे देश में चलेगा. इस एसआईआर के खिलाफ जो हमारी लड़ाई है, आप सब समझ सकते हैं कि यह मामला कोई तात्कालिक नहीं ए सिर्फ एक चुनाव का नहीं है. ये मामला सिर्फ ये नहीं है कि 65 लाख लोगों के नाम चले गए तो चलो 8 करोड़ में 65 लाख होता क्या है? 65 लाख में तो 30 लाख तो हो सकता है सही हो. उनका नाम कटने वाला भी था. 35 लाख लोगों का तो गलत तरीके से काटा गया वे 4-5% है, 90% 95% तो अभी भी मतदाता सूची में हैं. लेकिन वो बात नहीं है.
अक्सर जब हम फासीवाद की चर्चा करते हैं तो हमने सुना कि बहुत सारे साथी कहते हैं कि भारत में फासीवाद कहां है? अभी तो चुनाव हो रहा है. तो हमारे बहुत सारे साथियों को ये लगता है कि अगर चुनाव हो रहा है तो इसका मतलब चुनाव और फासीवाद एक साथ नहीं चल सकता है. हम भूल जाते हैं कि हिटलर और मुसोलिनी भी चुनाव के रास्ते से ही आए थे. चुनाव के रास्ते से आकर के उस तंत्र को इस तरह से कब्जा किया कि देखते-देखते वो बहुपार्टी इटली, वो बहुपार्टी जर्मनी – एक पार्टी स्टेट में तब्दील हो गया था.
ये भी चुनाव के रास्ते से आए हैं और चुनाव के रास्ते से आने के बाद चुनाव आयोग से लेकर, मतदाता सूची से लेकर, पूरे चुनाव की प्रणाली, चुनाव की मशीनरी, चुनाव की प्रक्रिया में किस तरह से हेराफेरी हो रही है. किस तरह से उसको बदला जा रहा है, ये हमारे सामने है. जो महाराष्ट्र में हुआ है अगर वो चोरी थी, तो बिहार में जो कुछ हो रहा है, वह दिन दहाड़े डाका डाला जा रहा है. फर्क इतना है कि बिहार के लोग जगे हुए हैं. कोशिश कर रहे हैं लड़ने की और तो बिल्कुल इसीलिए इस लड़ाई में हम सब लोगों को बिहार के साथ खड़े होना चाहिए. उस एसआईआर के खिलाफ जो एसआईआर अब पूरे देश में होने वाला है. बंगाल में, पंजाब में भी इस पर काम शुरू हो गया है. एसआईआर का मतलब कि जब, जहां, एसआईआर होगा, नाम काटे जाएंगे – गरीबों के, कमजोर लोगों के, मजदूरों के, महिलाओं के, किसानों के, जिनको सबसे ज्यादा लोकतंत्र की जरूरत है, सिर्फ उन्हीं लोगों के नाम सबसे ज्यादा काट दिए जाएंगे.
इसीलिए इस पूरे एसआईआर का जो हमला है, इसके खिलाफ पूरे देश में लड़ना होगा. इसी चंडीगढ़ में दो हफ्ता पहले भी मैं आया था. यहां साथियों से बात हुई. कोलकाता में अभी हम सभी लेफ्ट के लोगों ने मिलकर एक अच्छा कन्वेंशन किया कि पूरे देश में इस एसआईआर को हल्के ढंग से नहीं ले सकते. एसआईआर अगर चल पड़ेगा (सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन मोटे तौर पर इशारा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसको रोका नहीं है) तो हिंदुस्तान में, जिस लोकतंत्र को पहले ही संसदीय निरंकुशता कहा जा चुका है (आप बीडीएम की रिपोर्ट देखिए). ये संसदीय निरंकुशता एक तरह से लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म करने की साजिश है.
इसलिए हम सब लोगों को मिलकर लड़ना होगा. मिलकर लड़ेंगे, जमकर लड़ेंगे, पूरी ताकत लगा के लड़ेंगे. 100 साल का हमारा इतिहास है जो आजादी के आंदोलन का इतिहास है, हमेशा-हमेशा फासिस्टों के खिलाफ कम्युनिस्टों की लड़ाई का इतिहास है. ये सवाल सामने आ गया है क्या यह देश फासिज्म के रास्ते पर बर्बाद हो जाएगा? क्या इस देश में फासिस्टों को हर तरह से इस देश को नुकसान पहुंचाने की छूट मिल जाएगी? या हिंदुस्तान के कम्युनिस्ट सबसे आगे बढ़कर, एक होकर फासिस्टों को शिकस्त देने के लिए आगे आएंगे. वे सभी लोगों को, लड़ने वाले सभी विचारों को, सभी ताकतों को लेकर के आएंगे. ये इम्तिहान की घड़ी हमारे सामने है और मुझे लगता है कि जो इतिहास लेकर के हम चले हैं, आज के इस दौर में हम चूकेंगे नहीं! हम सब लोग झुकेंगे नहीं! लड़ेंगे और जीतेंगे!
बहुत-बहुत शुक्रिया सभी साथियों का! आपका 25वां महाधिवेशन सफल हो! इसके लिए हमारी पूरी पार्टी की ओर से और इस देश के तमाम वामपंथी प्रगतिशील विचार के लोगों की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं! इंकलाब जिंदाबाद! सीपीआई जिंदाबाद! वामपंथी एकता जिंदाबाद!