20 जुलाई को, शाम करीब साढ़े पांच बजे, दिल्ली का मशहूर कनाॅट प्लेस, जो आमतौर पर खरीददारों और दफ्तर जाने वालों की भीड़ से गुलजार रहता है, आंसू गैस के गोलों के कान फाड़ देने वाले धमाकों से गूंज उठा. एक नहीं, दो नहीं, बल्कि बेशुमार धमाके राजधानी के दिल में गूंजे, जब दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने उन हजारों-हजार जेन-जी नौजवानों पर आंसू गैस बरसाई, जो इंसाफ, जवाबदेही और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग लेकर दिल्ली आए थे.
कनाॅट प्लेस में जो कुछ हुआ, वह उस दिन की घटनाओं की महज शुरुआत नहीं बल्कि उसका बेहद बर्बर और खौफनाक अंजाम था. यह सुबह से शुरू हुए भीषण पुलिसिया दमन के सिलसिले की चरम सीमा थी. जब हमारे संवाददाता ने दिल्ली के दिल में हो रहे इस सरकारी जुल्म को कैमरे में कैद करने के लिए कैमरा निकाला, तो उसमें कैद हुई धुंधली ब्लैक-एंड-व्हाइट फुटेज अंग्रेजों की गुलामी के दौर के भारत छोड़ो आंदोलन के दमन की यादगार तस्वीरों की सिहरन पैदा करने वाली याद दिलाती हैं. मगर इस बार यह आंदोलन था, ‘शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, गद्दी छोड़ो’ का आंदोलन.
20 जुलाई को जो कुछ हुआ, उसे शायद सबसे बेहतर तरीके से आइसा की अध्यक्ष नेहा ने 21 जुलाई को जंतर मंतर पर अपने भाषण में बयां किया. “यहां मौजूद छात्रों के बदन पर पड़े निशान गवाही देंगे कि ‘आतंकवादी’ लफ्ज के मायने क्या होते हैं. जब भी डिक्शनरी में ‘आतंकवादी’, ‘आतंक’, ‘खौफ’ और ‘हिंसा’ जैसे लफ्जों के मायने लिखे जाएंगे, दिल्ली पुलिस का नाम बार-बार दर्ज होगा. हम तुम्हें याद रखेंगे.”
पुलिस के हमले के दौरान अपनी चप्पलें, सैंडल और जूते छोड़ भाग खड़े हुए प्रदर्शनकारियों के जूतों की सैकड़ों जोड़ियां अब जंतर मंतर पर पड़ी हैं, जो 20 जुलाई को बरपा किए गए आतंक की खामोश गवाही दे रही हैं. हर जोड़ी उन छात्रों और नौजवानों पर ढाए गए जुल्म की गवाह है, जो अपने लोकतांत्रिक अधिकार के तहत विरोध जताने जमा हुए थे.
भूख हड़ताल और जंतर मंतर पर दमन
काॅकरोच जनता पार्टी ने आइसा समेत दूसरे छात्र संगठनों के साथ मिलकर 20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान किया था. यह आंदोलन जंतर मंतर पर अपने अनिश्चितकालीन धरने का एक महीना पूरा कर चुका था, जबकि आइसा कार्यकर्ताओं और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की एकजुटता भूख हड़ताल अपने 23वें दिन में दाखिल हो चुकी थी. मार्च शुरू होते ही यह अनशन खत्म हुआ.
काॅमरेड नेहा, मनीष और अमीन ने भाकपा(माले) के सांसद राजा राम सिंह, राजद सांसद मनोज झा, माकपा नेता अमरा राम, डाॅ. योगेंद्र यादव, वकील प्रशांत भूषण, प्रोफेसर अतुल सूद और अभिनेता प्रकाश राज व शबाना आजमी वाले एक प्रतिनिधिमंडल की अपील पर अपनी भूख हड़ताल खत्म की. बाकी तीन भूख हड़ताली काॅमरेड दानिश अली, दीपक और ऋृषिकेश को गंभीर सेहत खराबी के चलते पहले ही अपना अनशन तोड़ना पड़ा था.
ये सारी घटनाएं उस वक्त सामने आईं जब 18 जुलाई को सादे कपड़ों में मौजूद पुलिस वालों ने धरना स्थल से सोनम वांगचुक को अगवा कर लिया था, जिसने सबको हिला कर रख दिया. आइसा कार्यकर्ताओं को भी अगवा करने की कोशिश की गई, मगर काॅमरेडों ने पुलिस की इस कोशिश को नाकाम कर दिया. आंदोलन की अगुवाई के इस अपहरण के बाद, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी कई दूसरे साथियों समेत अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी.
सफेद चादरें राज्य की उस कोशिश का नया निशान बनकर उभरीं, जिसके जरिए जवाबदेही को छुपाने और दमन को आसान बनाने की साजिश रची गई. सोनम वांगचुक को जबरदस्ती सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, मगर उन्होंने तब तक अपना अनशन खत्म करने से इनकार कर दिया जब तक नौजवानों की मांगें पूरी नहीं होतीं, जिनमें पेपर लीक की जवाबदेही और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शामिल था.
पुलिस यह समझने में नाकाम रही कि पिछले एक महीने में जंतर मंतर सिर्फ दिल्ली का एक लैंडमार्क भर नहीं रह गया था, बल्कि असहमति, अवज्ञा और रचनात्मक प्रतिरोध की एक जीती-जागती जगह बन चुका था. यह औरतों, बच्चों, छात्रों, नौजवानों और बदलाव का ख्वाब देखने वाले हर शख्स के लिए एक महफूज और स्वागत करने वाली जगह बन गया था. जिंदगी के हर क्षेत्र और समाज के हर तबके के लोग इस आंदोलन को खड़ा करने और आगे बढ़ाने के लिए एक साथ जमा हुए. आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ और दूसरे काॅमरेडों के राजनीतिक पोस्टरों, इंकलाबी आर्ट और गीतों से लेकर जेन-जी के क्रिएटिव मीम्स, रील्स और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक, जंतर मंतर प्रतिरोध के जीवंत जश्न में तब्दील हो चुका था.
20 जुलाई: जब दिल्ली हिल उठी
20 जुलाई को, जब सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में हिरासत में रखा गया था और संसद मार्च की तैयारियां आइसा की भूख हड़ताल के खत्म होने के साथ-साथ चल रही थीं, जंतर मंतर के इर्द-गिर्द दो-मंजिला बड़े-बड़े बैरिकेड वेल्ड किए जा रहे थे, ताकि इस आंदोलन को पिंजरे में कैद किया जा सके. ठीक उसी वक्त, पुलिस का एक बड़ा दस्ता जंतर मंतर धरना स्थल के पिछवाड़े से दाखिल हुआ और आंदोलन के अगुवाओं पर बर्बर हमला बोल दिया. सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को उठा लिया गया और आइसा के कई अगुवा बुरी तरह जख्मी हुए. संसद मार्च शुरू होने से पहले ही, भाजपा-शासित कई राज्यों में पुलिस ने पहले से ही दमन शुरू कर दिया था, उत्तराखंड में आइसा के अगुवाओं समेत छात्रों और नौजवान लीडरों को हिरासत में ले लिया, ताकि वे दिल्ली के मार्च में शामिल न हो सकें.
राज्य और उसकी दमनकारी मशीनरी यह भूल गई कि उनका बनाया कोई भी पिंजरा अपने भविष्य के लिए लड़ रही एक पूरी पीढ़ी के हौसले को कैद नहीं कर सकता. बैरिकेडों के परे, भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी. दिल्ली के हर कोने-कोने में नाकाबंदी के बावजूद और पूरे शहर को छावनी में तब्दील किए जाने के बावजूद, छात्र, नौजवान, मां-बाप और समाज के हर तबके के लोग लगातार आते रहे. जंतर मंतर की तरफ जाने वाली हर सड़क अमन के साथ मार्च करने पर आमादा लोगों से भर गई थी. फिजा इंकलाब जिंदाबाद, जय भीम और वंदे मातरम के नारों से गूंज उठी. शहीद भगत सिंह, डाॅ. बी. आर. अंबेडकर, महात्मा गांधी और दूसरे रहनुमाओं की तस्वीरें प्रदर्शनकारियों के सैलाब के ऊपर लहरा रही थीं.
अचानक, सुबह करीब साढ़े नौ बजे, तकरीबन दो किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बंद कर दी गईं, जो देर शाम तक जारी रहीं. पुलिस लाउडस्पीकरों पर बार-बार एलान करती रही कि निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है, लोगों को जमा न होने की हिदायत दी, और बैरिकेडों के अंदर ही रहने का हुक्म सुनाया. मगर उमड़ता हुआ हुजूम टस से मस नहीं हुआ. एक नौजवान औरत ने पुलिस के बार-बार दोहराए जा रहे इन एलानों का एक वायरल स्पंजबाॅब मीम के अंदाज में मजाक उड़ाया, और राज्य की चेतावनियों को सामूहिक प्रतिरोध के एक लम्हे में बदल दिया.
पुलिस ने बार-बार लाठीचार्ज करके जवाब दिया, मगर भीड़ को तितर-बितर करने में नाकाम रही. जल्द ही, जंतर मंतर के इर्द-गिर्द खड़े किए गए ऊंचे दो-मंजिला बैरिकेड तोड़ दिए गए और जेन-जी नौजवानों, छात्रों, मां-बाप और सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं का एक जबरदस्त सैलाब संसद मार्ग की तरफ उमड़ पड़ा.
उसी लम्हे से पुलिसिया हिंसा और दमन का वह सिलसिला शुरू हुआ, जो हाल के बरसों में देखे गए सबसे बर्बर वाकयों में शुमार होगा. महिला प्रदर्शनकारियों के साथ छेड़छाड़ की गई. सीनियर पुलिस अफसरों को औरतों और यहां तक कि बच्चों को थप्पड़ मारते और पीटते देखा गया. लाठियां तब तक इस्तेमाल की गईं जब तक वे टूट नहीं गईं. शाॅक बैटन इस्तेमाल किए गए. प्रदर्शनकारियों पर कीलों जड़ी लाठियां बरसाई गईं. सिर, गर्दन, पीठ, पेट, टांगें और यहां तक कि जिस्म के प्राइवेट पाट्र्स भी निशाना बनाए गए. इंसानी बदन का कोई हिस्सा नहीं बख्शा गया. सीनियर पुलिस अफसरों को अपने जवानों को ‘कूट-कूट कर मारो’ कहते और इसे ‘एक तजुर्बा’ बताते सुना गया. सबसे ज्यादा हिंसा सादे कपड़ों वाले उन कर्मियों ने बरपाया, जिनके बारे में पुलिस ने बाद में दावा किया कि वे किसी खास दस्ते से ताल्लुक रखते हैं. वर्दी में मौजूद ज्यादातर पुलिस वालों ने भी अपने नाम की तख्तियां उतार दी थीं या छुपा ली थीं.
बार-बार होते लाठीचार्ज के बावजूद, अमनपसंद प्रदर्शनकारी आगे बढ़ते रहे और संसद मार्ग गोलचक्कर तक जा पहुंचे. जख्मी लोगों की गिनती नामुमकिन थी. कई लोग सिर और चेहरे से खून बहाते जमीन पर पड़े थे. यहां तक कि इलाके में मौजूद दफ्तर जाने वाले और राहगीर भी बेरहमी से पीटे गए, मानो पुलिस बर्बरता की किसी घिनौनी होड़ में शामिल हो.
एक मौके पर, प्रदर्शनकारियों का एक छोटा जत्था संसद मार्ग के बैरिकेड के दूसरी तरफ जमा था. एक सीनियर पुलिस अफसर ने खुद उनसे बैरिकेड पार कर मुख्य प्रदर्शन में शामिल होने को कहा. बैरिकेड खोले गए और छात्र आगे बढ़ने लगे. मुश्किल से कुछ ही सेकंड बाद, पुलिस ने बेरहमी से इन बेखबर नौजवानों पर एक और लाठीचार्ज कर दिया.
तब तक यह खबरें भी आ चुकी थीं कि दिन में पहले ही प्रदर्शनकारियों का एक और बड़ा जत्था नए संसद परिसर तक पहुंचने में कामयाब हो गया था, जहां उनका सामना आंसू गैस और बर्बर लाठीचार्ज से हुआ. इलाके की तस्वीरों में सीआरपीएफ के जवान संसद परिसर के अंदर हथियारों और वाटर कैनन के साथ मोर्चा संभाले नजर आए.
लाठियां जितनी जोर से नौजवानों की हड्डियों पर पड़ीं, उनका इरादा उतना ही मजबूत होता गया. दोपहर करीब तीन बजे तक, संसद मार्ग तक जाने वाला हर बैरिकेड टूट चुका था. पुराने संसद परिसर की तरफ जाने वाला संसद मार्ग का पूरा हिस्सा प्रदर्शनकारियों से भर गया था. कुछ नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे, कुछ प्रतिरोध के गीत गा रहे थे, जबकि बाकी कुछ ऐसे अजनबियों से मिले जो देखते ही देखते एक साझी लड़ाई के काॅमरेड बन गए.
इसके फौरन बाद, पुलिस ने एक और बड़ा हमला बोला, बेतहाशा आंसू गैस के गोले दागते हुए और पूरे पैमाने पर लाठीचार्ज करते हुए, जिसने प्रदर्शनकारियों को संसद मार्ग से संसद मार्ग स्ट्रीट होते हुए आखिरकार कनाॅट प्लेस तक धकेल दिया. हजारों-हजार नौजवान कनाॅट प्लेस और इर्द-गिर्द के इलाकों में भर गए. यहीं पर दमन अपनी सबसे वहशियाना शक्ल में पहुंचा. आंसू गैस के गोले लगातार फटते रहे, जबकि पुलिस के जवान सड़कों और तंग गलियों में प्रदर्शनकारियों का पीछा करते रहे, न सिर्फ आंदोलनकारियों को बल्कि घर लौट रहे आम दफ्तर जाने वालों को भी पीटते रहे.
कनाॅट प्लेस की हर सड़क और हर गली इस हिंसा की गवाही दे रही थी. पूरा इलाका आंसू गैस की दम घोंटू बू में डूब गया था. यह भी साफ होता गया कि पुलिस पेलेट-टाइप गोलियों का इस्तेमाल कर रही थी, जिनसे कई लोग छेदने वाले जख्मों का शिकार हुए.
पफिर भी पक्के इरादे वाले नौजवानों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया. उन्होंने आंसू गैस के गोलों पर पानी डालकर बेअसर किया, पीने का पानी बांटा, एक-दूसरे के जख्मों का इलाज किया और जलन, सांस लेने में तकलीफ और आंसू गैस के असर से जूझ रहे लोगों की मदद की. इस बेमिसाल बर्बरता के बीच, हमने एकजुटता का एक असाधारण जज्बा देखा. मर्द, औरतें, बच्चे, बुजुर्ग, दोस्त और अजनबी, सब एक साथ खड़े रहे, हर मुमकिन तरीके से एक-दूसरे की मदद करते हुए.
प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने में पूरी तरह नाकाम रहने के बाद, मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस बस यह देखते रह गए कि किस तरह हजारों लोग जंतर मंतर पर दोबारा जमा हुए और आंदोलन में नई जान फूंक दी. इस बार, विरोध प्रदर्शन अपनी असल जगह से कहीं आगे फैल गया और इर्द-गिर्द के इलाकों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया, जब इंसाफ, जवाबदेही और एक सम्मानजनक भविष्य के अधिकार की मांग लेकर लगातार बढ़ती तादाद में लोग जमा होते गए.
देश-दुनिया से उठती निंदा की आवाजें
छात्रों और नौजवानों पर बरपाए गए इस बेमिसाल दमन ने पूरे मुल्क के जमीर को झिंझोड़ दिया. मध्य दिल्ली में लागू पूरी इंटरनेट बंदी की वजह से, पुलिसिया हमले की खौफनाक तस्वीरें आम जनता तक शाम ढलने के बाद ही पहुंच पाईं, जब वे सोशल मीडिया पर छा गईं. जब तक बर्बरता की खबरें सामने आनी शुरू हुईं, सैकड़ों लोग अस्पतालों में दाखिल हो चुके थे. एक नौजवान औरत खोपड़ी की हड्डी टूटने की वजह से आईसीयू में भर्ती थी, जबकि कई और लोग पेलेट लगने से जख्मी हुए थे, जिनमें आंख की चोट के मामले भी शामिल बताए गए.
छात्रों और नौजवानों पर बरपाए गए इस जुल्म की निंदा करते हुए, भाकपा(माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि 20 जुलाई की घटनाओं ने दिल्ली पुलिस को एक लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने के लिए गुंडों की तरह काम करती एक फोर्स के तौर पर बेनकाब कर दिया. उन्होंने कहा कि यह दमन इस आंदोलन को दबाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा था, ठीक वैसे ही जैसे मोदी सरकार ने किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन के दौरान करने की कोशिश की थी. मगर उन्होंने जोर देकर कहा कि 20 जुलाई ने हिंदुस्तान के नौजवानों का हौसला भी दिखा दिया. उन्हें डराने के बजाय, इस बर्बरता ने बेहतर शिक्षा, जवाबदेही और इंसाफ की लड़ाई को और भी बड़े इरादे के साथ आगे बढ़ाने का उनका इरादा और मजबूत कर दिया.
21 और 22 जुलाई को, छात्र-युवा आंदोलन के साथ एकजुटता में मुल्क भर में प्रदर्शन तेजी से फैल गए. मुंबई में, भारी पुलिसिया दमन के बावजूद, बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और विरोध के जज्बे का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. पटना में, आइसा ने 22 जुलाई को राजभवन की तरफ एक बड़े प्रदर्शन मार्च में हिस्सा लिया. इस मार्च का सामना पुलिस के लाठीचार्ज और वाटर कैनन से हुआ, मगर पक्के इरादे वाले छात्रों ने बैरिकेड तोड़ते हुए आगे कदम बढ़ाए. भाकपा(माले) के विधायक संदीप सौरभ और एमएलसी शशि यादव इस प्रदर्शन में शामिल हुए और भाजपा सरकार के उन छात्रों पर हमले की सख्त निंदा की, जिनकी इकलौती मांग इंसाफ और जवाबदेही थी.
पश्चिम बंगाल में, 20 जुलाई को पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ कई जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें 21 जुलाई को वामपंथी छात्रा संगठनों की तरफ से कोलकाता में एक बड़ा मार्च भी शामिल था.
दिल्ली पुलिस के दमन की निंदा करते हुए और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, एनटीए को भंग किए जाने, एनईपी को रद्द किए जाने और सबके लिए किफायती, बेहतर और समावेशी शिक्षा की मांग करते हुए उत्तराखंड, झारखंड, बेंगलुरु, चंडीगढ़, सूरत, हैदराबाद, केरल, लखनऊ, आंध्र प्रदेश और मुल्क के कई और हिस्सों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए.
जैसे ही यह लेख छपने जा रहा है, बिहार के जहानाबाद से 23 जुलाई को नौजवानों पर पुलिस की भारी फायरिंग की परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं, जहां वे पेपर लीक की जवाबदेही की मांग कर रहे थे.
विदेशों में रहने वाले हिंदुस्तानी डायस्पोरा ने भी छात्रों और नौजवानों पर हुई इस हिंसा की सख्त निंदा की. लंदन, एम्सटर्डम और दुनिया भर के कई और शहरों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए. 20 जुलाई को, हिंदुस्तानी डायस्पोरा के सदस्यों, हिंदुस्तानी छात्रों और एकजुटता कार्यकर्ताओं ने लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर दिल्ली में दमन के खिलाफ विरोध कर रहे छात्रों और नौजवानों के साथ एकजुटता में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया.
अपने बयान में, साउथ एशिया साॅलिडेरिटी ग्रुप ने उन छात्रों और नौजवानों के साथ अपनी बेशर्त एकजुटता का ऐलान किया, जो लाखों की तादाद में दिल्ली की सड़कों पर उतरे थे, भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सतत लड़ाई के हिस्से के तौर पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए. बयान में कहा गया: ‘हमें कोई हैरानी नहीं कि मोदी सरकार ने छात्रों के आंदोलन का जवाब पहले बेरुखी से और अब हिंसा से दिया है. दिल्ली के मुख्य रास्तों को बैरिकेड करने और मुल्क भर के कस्बों में समर्थकों को नजरबंद करने से लेकर, लाठीचार्ज, बर्बर पिटाई और आंसू गैस बरसाने तक, इनकी हर कोशिश ने साबित कर दिया है कि यह मामला अब सिर्फ शिक्षा का नहीं रहा. इसने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि मोदी सरकार और आरएसएस लोकतांत्रिक विरोध को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.’
23 जुलाई को, भाकपा(माले) के सांसद राजा राम सिंह और सुदामा प्रसाद ने इंडिया गठबंधन के अन्य सांसदों के साथ मिलकर दिल्ली में गांधी स्मृति जाकर छात्र-युवा आंदोलन के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की. भाकपा(माले) के सांसदों ने 20 जुलाई के बर्बर पुलिसिया दमन की बेलाग कड़ी निंदा की और अमन के साथ अपने लोकतांत्रिक अधिकार के तहत विरोध जता रहे छात्रों और नौजवानों पर हिंसा बरपाने के जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की.
खामोशी और खोखले वादे
22 जुलाई को, छात्रों और नौजवानों पर हुई पुलिसिया बर्बरता का मसला सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया. मगर, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस मामले को फौरन सुनने से इनकार करते हुए कहा, ‘हमारा वक्त बर्बाद मत करो.’ ठीक वैसे ही जैसे काॅकरोच आंदोलन खुद चीफ जस्टिस की पहले की टिप्पणियों से भड़का था, 22 जुलाई के ये लफ्ज भी इतिहास में याद रखे जाएंगे.
जैसे-जैसे जंतर मंतर और उसके इर्द-गिर्द का इलाका विरोध और बगावत की एक मुकम्मल जगह में तब्दील होता गया, मोदी-शाह हुकूमत ने नौजवानों की मांगों और बढ़ते गुस्से को सुलझाने के बजाय अपने दमन के हथकंडे और तेज कर दिए. जंतर मंतर के इर्द-गिर्द तकरीबन सोलह मेट्रो स्टेशन हर रोज बंद कर दिए जाते थे. इलाके में इंटरनेट सेवाएं बंद रहीं, जबकि पुलिस के जवान धरना स्थल तक पहुंचने की कोशिश कर रहे नौजवानों को रोक-रोक कर पूछताछ करते और डराते-धमकाते रहे.
एक लंबी खामोशी के बाद, आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान जारी किया. मगर, छात्रों और नौजवानों की तरफ से उठाई गई चिंताओं और मांगों का जवाब देने के बजाय, उन्होंने एक और ऐलान से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की, एक फास्ट-ट्रैक अदालत का, जो पंद्रह लाख रुपए वाले जुमले की याद दिलाता है. जहां गोदी मीडिया ने फास्ट-ट्रैक अदालत के इस ऐलान को पेपर लीक संकट का सरकारी जवाब बताकर खूब प्रचारित किया, वहीं एक और घटनाक्रम ने इन वादों की खोखली हकीकत बेनकाब कर दी. सीबीआई ने संजीव मुखिया को क्लीन चिट दे दी, जिन्हें जांच अफसरों ने पहले नीट-यूजी 2024 पेपर लीक का मास्टरमाइंड बताया था.
मगर नौजवान अपनी मांगों पर अडिग और अपने इरादे पर मजबूत बने रहे. उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, छात्रों और नौजवानों पर बर्बर हमला करने के जिम्मेदार दिल्ली पुलिस अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को वापस लिए जाने की मांग की.
आंदोलन की मांगों को पुरजोर आवाज देते हुए और मोदी सरकार के ध्यान भटकाने वाले हथकंडों को खारिज करते हुए, भाकपा(माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने प्रधानमंत्री के बयान पर कड़ा पलटवार किया: ‘अगर आप चाहते हैं कि नौजवान आपके पद की गरिमा समझे और आपको गंभीरता से लें, तो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से शुरुआत कीजिए. लगातार पेपर लीक और लगातार क्लीन चिट के बाद, जिम्मेदारी सरकार पर आकर टिकती है. जवाबदेही तय कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करनी ही होगी, चाहे किसी का सर कलम हो. यह मत भूलिए कि जुलाई के बाद हमेशा अगस्त आता है, हिंदुस्तान की आजादी का वह ऐतिहासिक महीना, जब 1942 में हिंदुस्तान के अवाम ने अंग्रेज हुक्मरानों से ‘भारत छोड़ो’ कहा था, और पांच साल बाद अंग्रेज हुक्मरानों को बोरिया-बिस्तर समेटकर वाकई मुल्क से भागना ही पड़ा था.’