वर्ष 34 / अंक-28 / नेपाल किधर ?

नेपाल किधर ?

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एक अचानक युवा क्रांति, जिसका श्रेय जेनरेशन जी यानी कि 1997 और 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी को दिया जा रहा है, ने हिमालयी गणतंत्र नेपाल में आपवादिक रूप से तीव्र शासन परिवर्तन को अंजाम दिया है. सत्तर वर्ष पार के प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और सेना की मध्यस्थता के साथ एक दूसरी सत्तर वर्ष पार की नेता नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्रीमती सुशीला कार्की ने अंतरिम प्रधान मंत्री का पदभार ग्रहण किया. यह अंतरिम अवस्था छह महीनों के लिए निर्धारित है और अगला चुनाव 5 मार्च 2026 को होना घोषित किया गया है.

इस विस्फोट की फौरी वजह ओली सरकार का वह फैसला था जिसके जरिये व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, लिंकेडिन जैसे 26 सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. यह फैसला अचानक और कठोर लग सकता है, लेकिन चूंकि इन कंपनियों ने विदेशी कंपनियों के लिए अनिवार्य राष्ट्रीय पंजीकरण के नेपाली सरकार के आदेश की अवहेलना की थी, इसीलिए उनपर यह प्रतिबंध लगाया गया था. लोकप्रिय चीनी सोशल मीडिया मंच टिकटॉक इस प्रतिबंध से बच गया, क्योंकि उसने नेपाली पंजीकरण की शर्त मान ली थी. बहरहाल, इस व्यापक प्रतिबंध से न केवल सोशल मीडिया की आजादी खत्म हो गई, बल्कि इससे नेपाली जनता की विशाल बहुसंख्या के रोजाना संपर्कों व उनके आर्थिक क्रियाकलापों में भारी व्यवधान का भी खतरा पैदा हो गया था. और जब सरकार ने प्रतिवादकारियों की हत्या कर व उन्हें घायल बनाकर इन शांतिपूर्ण प्रतिवादों का दमन करने का प्रयास किया तो यह विद्रोह भारी विस्फोट में बदल गया.

जेन जी प्रतिवादकारियों ने बड़े पैमाने की तोड़फोड़ और आगजनी के लिए ‘बाहरी आन्दोलनकारियों’ को जिम्मेदार ठहराया है. वस्तुतः, जेलों को तोड़ना और संसद भवन, सर्वोच्च न्यायालय और अन्य अनेक सरकारी संस्थाओं पर हमले सुनियाकजित हरकतें ही लग रही हैं. प्रतिवाद के बाद हुए हिंसक हमलों के सम्मुख राज्य और संपूर्ण राजनीतिक, सैन्य व संस्थागत प्रतिष्ठानों का पीछे हट जाना भी उतनी ही हैरान करने वाली बात है. जहां नेपाली नौजवानों में मोहभंग और उच्चपदस्थ लोगों के भ्रष्टाचार तथा सर्वव्याप्त भाई-भतीजावाद के खिलाफ उबलता आक्रोश तथा मंत्रियों व नेताओं के बच्चों की विलासतापूर्ण जीवन शैली – जो ‘नेपोकिड्स’ के नाम से सोशल मीडिया में वाइरल हो रहा था – मौजूदा विद्रोह की पृष्ठभूमि बन रहे थे, वहीं हिंसापूर्ण अराजक रास्ता और विद्रोह की भर्त्सना एक पहेली बनी हुई है.

2008 में राजशाही के अंत के बाद से इस नवोदित हिमालयी नेपाल गणतंत्र में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता बनी रही. पिछले 17 वर्षों में नेपाल ने 14 प्रधान मंत्री और विभिन्न किस्म के जोड़-तोड़ के साथ राजनीतिक संयोजनों की अदला-बदली देख लिए. हाल के वर्षों में राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए भी स्पष्ट चीख-पुकार बढ़ती जा रही थी. आरएसएस, जो नेपाल में ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के अपने विदेश-स्थित बैनर तले काम कर रहा है, नेपाल को एक बार फिर से हिंदू राज्य बना देने के लिए लगातार कोशिश करता रहा है. और इसके अलावा वैश्विक प्रभुत्व की सर्वव्यापी अमेरिकी मुहिम तो चल ही रही है – वह चीन पर अंकुश लगाने और पूरे दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव फैलाने की अपनी योजना में नेपाल का इस्तेमाल करना चाहता है.

बहरहाल, नेपाल में संघ-भाजपा प्रतिष्ठान का ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ उसके ‘अखंड भारत’ विस्तारवाद के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है जिसमें नेपाल को एक स्वतंत्र देश के बतौर नहीं, बल्कि वृहत्तर भारत के घटक के बतौर देखा जाता है. दरअसल, नेपाल में युवा विद्रोह पर टिप्पणी करते हुए बिहार के भाजपा उप मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी खुलेआम कहते हैं कि अगर नेपाल भारत का अभिन्न अंग होता तो वहां अराजकता, हिंसा और बेरोजगारी की यह स्थिति पैदा नहीं होती. गोदी मीडिया के अनेक रिपोर्टरों को उस वक्त नेपाली जनता का आक्रोश झेलना पड़ा जब वे रिपोर्टर मौजूदा विक्षोभ को नेपाल में राजतंत्र की पुनस्थार्पना के लिए आन्दोलन बताने की कोशिश कर रहे थे.

स्पष्ट हे कि लोकतांत्रिक नेपाली गणतंत्र को इन तमाम अंदरूनी व बाहरी खिंचाओं-दबाओं से निपटना पड़ेगा. नेपाल के कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए, जिसने राजतंत्र से गणतांत्रिक लोकतंत्र में नेपाल के संक्रमण की अगुवाई की थी, मौजूदा हालात गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं. नेपाल में लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के लिए जनता के साथ गहरे रिश्ते और ऐसे सामाजिक आर्थिक मॉडल की जरूरत है जिसमें जनता के कल्याण तथा नेपाल की आर्थिक संप्रभुता को प्राथमिकता मिले. विभिन्न बुर्जुआ पार्टियों की तरह अगर कम्युनिस्टों पर भी भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप लगें, तो यह निश्चय ही भारी चिंता का विषय है. नेपाल के कम्युनिस्टों को जनता का विश्वास पुनः हासिल करने के साथ-साथ एक ऐसा जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए कठिन मेहनत करनी होगी जो राजतंत्र की वापस लाने, लोकतंत्र को कमजोर करने और नेपाल की संप्रभुता को खत्म करने की हर योजना को ध्वस्त कर सके.

आरएसएस, जो नेपाल में ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के अपने विदेश-स्थित बैनर तले काम कर रहा है, नेपाल को एक बार फिर से हिंदू राज्य बना देने के लिए लगातार कोशिश करता रहा है. और इसके अलावा वैश्विक प्रभुत्व की सर्वव्यापी अमेरिकी मुहिम तो चल ही रही है – वह चीन पर अंकुश लगाने और पूरे दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव फैलाने की अपनी योजना में नेपाल का इस्तेमाल करना चाहता है.

20 September, 2025