वर्ष 35 / अंक - 10-11 / पानीपत रिफाइनरी में मोदी सरकार का ‘श्रमेव जयते’ एक...

पानीपत रिफाइनरी में मोदी सरकार का ‘श्रमेव जयते’ एक छलावा क्यों है?

पानीपत रिफाइनरी में मोदी सरकार का ‘श्रमेव जयते’ एक छलावा क्यों है?

-- आदित्य कृष्ण

8 मार्च 2026 को भाकपा(माले) की एक तथ्यान्वेषी टीम ने हरियाणा के पानीपत में इंडियन ऑयल कॉर्पारेशन लिमिटेड (आईओसीएल) रिफाइनरी का दौरा किया. टीम में आरा के सांसद सुदामा प्रसाद, प्रेम सिंह गहलावत, उमा राग, अभिषेक, विनोद धारौली, आकाश भट्टाचार्य, बृजेश गुप्ता और आदित्य कृष्णा शामिल थे.

टीम ने जो देखा, वह महज एक श्रमिक विवाद नहीं था. यह दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी एकीकृत रिफाइनरियों में से एक में प्रवासी मजदूरों का एक व्यवस्थित और राज्य-प्रायोजित शोषण था. पानीपत रिफाइनरी एक सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है, जिसने वर्षों से अपने श्रमिक दायित्वों को ठेकेदारों की एक लंबी कतार पर डाल दिया है. यह व्यवस्था लगभग पचास हजार मजदूरों को कार्यस्थल पर सुरक्षा, कानूनी संरक्षण और गरिमा से वंचित कर देती है. इन मजदूरों को साफ पानी पीने या शौचालय जैसे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है.

हालिया विवाद की वजह 20 या 21 फरवरी 2026 (प्रबंधन द्वारा सूचना दबाने के कारण मजदूर भी सही तारीख नहीं बता सके) को हुआ एक औद्योगिक हादसा था, जिसमें दो मजदूरों की मौत हो गई और एक मजदूर का पैर काटना पड़ा. यह हादसा कार्यस्थल पर बुनियादी सुरक्षा की कमी और सावधानी के उपायों के अभाव के कारण हुआ. प्रबंधन का रवैया बेहद बर्बरतापूर्ण था. न तो कोई जवाबदेही तय की गई और न ही अब तक कोई मुआवजा दिया गया है. रिफाइनरी का कामकाज बिना किसी रोक-टोक के जारी रहा. वर्षों से चुपचाप शोषण सह रहे मजदूरों का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया. हजारों मजदूर सड़क पर उतर आए, रिफाइनरी रोड जाम कर दी और स्वतःस्फूर्त हड़ताल पर चले गए.

राज्य की प्रतिक्रिया शर्मनाक थी, लेकिन फिर भी इसका पहले से अनुमान था. सीआईएसएफ ने हवाई फायरिंग तक की. पुलिस ने मजदूरों पर लाठीचार्ज किया और रिफाइनरी परिसर में मोबाइल नेटवर्क जाम करने की बात सामने आई ताकि विरोध की खबर बाहर न फैले. मोदी सरकार की मजदूर-विरोधी मानसिकता का परिचय देते हुए 2,500 अज्ञात मजदूरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जबकि वर्षों से श्रम कानूनों का उल्लंघन करने वाले प्रबंधन और ठेकेदारों के खिलाफ एक भी केस दर्ज नहीं हुआ, जिनकी लापरवाही से दो मजदूरों की जान गई और एक का पैर कटा, उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

हमारी टीम ने मजदूरों से बात की और ऐसी स्थितियों का दस्तावेजीकरण किया, जिससे किसी भी सरकार को शर्म आनी चाहिए जो अब भी जनता के नाम पर शासन करने का दावा करती है. संक्षेप में निष्कर्ष इस प्रकार हैंः

मजदूर 8 घंटे की जगह 12 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं, लेकिन उन्हें 8 घंटे वाला वेतन दिया जाता है. यह सीधा 50% वेतन की चोरी है (4 घंटे के ओवरटाइम के लिए दोगुनी मजदूरी देनी होती है, यानी 12 घंटे के काम का भुगतान निर्धारित मजदूरी का दोगुना होना चाहिए). इसके अलावा, उन्हें महीने में 28 दिन काम करना पड़ता है और सरकारी छुट्टियों पर भी अवकाश नहीं मिलता.

किसी भी मजदूर को बोनस नहीं दिया जाता. साथ ही, लगभग किसी भी मजदूर का ईएसआईसी कार्ड नहीं बना है, जिससे किसी भी दुर्घटना की स्थिति में वे असुरक्षित रह जाते हैं.

न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जा रही है. जो भी थोड़ा बहुत पैसा आता है, वह भी कभी-कभी महीने की 25 तारीख तक आता है, यानी मजदूर हफ्तों बिना वेतन के रहते हैं और प्रभावी रूप से बड़े ठेकेदारों के कामकाज का वित्तपोषण करते हैं, जिन्हें संयंत्र में विभिन्न अनुबंध दिए गए हैं.

संयंत्र के अंदर पीने का साफ पानी नहीं है. शौचालय नहीं हैं. कैंटीन नहीं है. यदि कोई मजदूर पानी लेने या शौचालय जाने के लिए बाहर निकलता है – जो कि बुनियादी जैविक आवश्यकताएं हैं, विलासिता नहीं – तो उस दिन के लिए उसे बाहर निकाल दिया जाता है और पूरे दिन की मजदूरी काट ली जाती है. यह साफ तौर से कोई उपेक्षा नहीं है, बल्कि सरकार की सोची समझी नीतिगत विकल्प है.

कार्यस्थल सुरक्षा व्यावहारिक रूप से अस्तित्वहीन है. दो मजदूरों की मौत किसी भी अर्थ में दुर्घटना नहीं थी. यह ठेकेदारों द्वारा हर संभव लागत काटने का पूर्वानुमानित परिणाम था, और ऊपर आईओसीएल प्रबंधन से कोई जवाबदेही नहीं थी.

संयंत्र के बाहर रहने की स्थिति भी बेहतर नहीं है. अधिकतर मजदूर बिहार, यूपी और अन्य ‘मजदूर-आधिक्य वाले राज्यों’ से आते हैं. ठेकेदार और उप-ठेकेदार उन्हें यहां लाते हैं, जो सस्ते और बंधुआ मजदूरों के इस पाइपलाइन से पैसा कमाते हैं. इन मजदूरों को 10 गुना 10 फुट के कमरों में, चार-पांच लोग प्रति कमरा रहने को मजबूर होना पड़ता है. इन कमरों का किराया 3,000 से 5,000 रुपये प्रति माह के बीच है. ये मजदूर पहले से ही न्यूनतम मजदूरी से कम वेतन का एक बड़ा हिस्सा सिर पर एस्बेस्टस की छत होने के लिए दे रहे हैं.

सीआईएसएफ कर्मियों ने गेट पास प्रणाली को जबरन वसूली का साधन बना लिया है. पुलिस सत्यापन, नवीनीकरण, गेट पास – प्रत्येक चरण में मजदूर से पैसे खर्च करवाए जाते हैं, जो ठेकेदारों, उप-ठेकेदारों और राज्य तंत्र के बीच संस्थागत गठजोड़ के माध्यम से वसूला जाता है. इसकी कीमत, हमेशा की तरह, पूरी तरह से प्रवासी मजदूर को चुकानी पड़ती है, जो यहां कुछ लेकर आया था और उससे भी वंचित किया जा रहा है.

‘मजदूरों ने जो मांगें उठाई हैं, वे क्रांतिकारी नहीं हैं. वे कानूनी न्यूनतम मांगें हैं. वे कई मामलों में अधिकार हैं जो कागजों पर पहले से मौजूद हैं. यह तथ्य कि इनकी बिल्कुल मांग करनी पड़ रही है – और लाठीचार्ज और हवाई फायरिंग के बीच मांग करनी पड़ रही है – यह देश में श्रम कानून प्रवर्तन की वास्तविक स्थिति के बारे में सब कुछ बताता हैः

मांगें हैं कि कानून जो कहता है उसे लागू किया जाए – 8 घंटे के कार्यदिवस का सख्त कार्यान्वयन. आठ घंटे से अधिक के किसी भी काम के लिए दोगुनी दर से ओवरटाइम. प्रत्येक माह की 1 से 7 तारीख के बीच वेतन का भुगतान. आईओसीएल बोर्ड दरों पर वेतन निर्धारण, पीएफ योगदान नियमित और पूर्ण रूप से जमा किया जाना. ड्यूटी प्रति माह 26 दिनों तक सीमित, सभी राष्ट्रीय अवकाशों का पालन. सभी मजदूरों के लिए ईएसआई कार्ड. कार्यस्थल पर शौचालय, पीने का साफ पानी और कैंटीन की व्यवस्था.गेट पास को लेकर सीआईएसएफ कर्मियों द्वारा भ्रष्टाचार और उत्पीड़न का अंत. कार्यस्थल दुर्घटनाओं के मामलों में पूर्ण जवाबदेही और उचित मुआवजा – मौतों और विकलांगता के लिए जिम्मेदार प्रबंधन और ठेकेदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई. 2,500 मजदूरों के खिलाफ दर्ज एफआईआर तत्काल वापस ली जाए और किसी भी विरोध करने वाले मजदूर के खिलाफ कोई और कानूनी कार्रवाई न हो.

अंत में, बड़ी तस्वीर देखनी होगी. पानीपत रिफाइनरी में जो हो रहा है, वह कोई अपवाद नहीं है. यह मॉडल है. अनुबंधित रोजगार न केवल निजी क्षेत्र में बल्कि सरकारी सार्वजनिक उपक्रमों के भीतर भी प्रमुख व्यवस्था बन गया है – आईओसीएल के पास अपने पेरोल पर मुश्किल से 1,000 मजदूर हैं, जबकि हजारों अनुबंधित मजदूर इसके संचालन चलाते हैं. नवंबर 2025 में लागू हुए नए श्रम संहिताओं ने इस व्यवस्था को और गहरा कर दिया है, सभी क्षेत्रों में निश्चित अवधि के रोजगार का विस्तार किया है और प्रभावी रूप से 8 घंटे के कार्यदिवस, सार्थक पीएफ और ईएसआई सुरक्षा और संगठित होने के अधिकार को समाप्त कर दिया है.

पानीपत रिफाइनरी में हड़ताल शांत हो गई है, और मजदूरों को झूठे वादों, राज्य तंत्र और प्रबंधन से मिले स्थानीय गुंडों द्वारा बल प्रयोग और अंतर-राज्यीय प्रवासी मजदूरों की सामान्य असुरक्षा के कारण काम पर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा है. भाकपा(माले), ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू) और भाकपा(माले) के सभी अन्य जन संगठन हड़ताली मजदूरों के साथ पूर्ण एकजुटता में हैं. हम मांग करते हैं कि राज्य तुरंत विरोध करने वाले मजदूरों के खिलाफ सभी एफआईआर वापस ले, दो मजदूरों की मौत और एक की स्थायी विकलांगता के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों और प्रबंधन के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू करे, और सुनिश्चित करे कि मजदूरों की मांगें पूरी तरह से पूरी हों. पानीपत के मजदूरों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जब उत्पीड़न अपनी सीमा पार करता है, तो प्रतिरोध अपरिहार्य है. अब व्यापक श्रम आंदोलन को यह सुनिश्चित करना है कि उनका यह प्रतिरोध अकेला न खड़ा हो.

07 March, 2026