21 नवंबर 2025 को मोदी सरकार ने आखिरकार चारों श्रम संहिताओं को लागू करने का ऐलान कर दिया. 2019 और 2020 में संसद में बिना किसी बहस के इन्हें जबरदस्ती पास कराने के बावजूद, ट्रेड यूनियनों के जबरदस्त विरोध के चलते सरकार को इन्हें लागू करने से पीछे हटना पड़ा था. लेकिन अब, बिहार विधानसभा चुनाव में आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनावी धांधली को अंजाम देने के बाद, और चुनावी तंत्रा पर अपनी पूरी पकड़ से उत्साहित होकर, मोदी सरकार ने ऐलान कर दिया है कि चारों श्रम संहिताएं तुरंत लागू होंगी.
जिस तरह आईपीसी हटाकर ‘भारतीय न्याय संहिता’ लाई गई, उसी तरह मोदी सरकार नई श्रम संहिताओं को भी ‘औपनिवेशिक विरासत’ से मुक्ति और ‘डिकॉलोनाइजेशन’ बता पेश कर रही है. यह दावा सरासर झूठा है. औपनिवेशिक दौर में बने फैक्ट्री एक्ट 1881, ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट 1929 जैसे कानून अंग्रेजी राज की देन नहीं थे, बल्कि ये भारतीय जनता के महान औपनिवेशिक-विरोधी चेतना और संघर्षों की उपज थे. और मजदूरों के अधिकारों के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक थे बाबासाहेब अंबेडकर, जो आगे चलकर संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने. नई श्रम संहिताएं औपनिवेशिक विरासत पर हमला नहीं करतीं, बल्कि वे भारत के औपनिवेशिक-विरोधी संघर्षों और हमारे संवैधानिक इतिहास को ही कमजोर करती हैं.
1920 के दशक के अंत में मिल हड़तालों में अंबेडकर की भागीदारी और 1936 में ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ की स्थापना ने मजदूरों को शोषण से आजाद करने के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता को साफ दिखाया. उन्होंने मजदूर तबके की एकता में जाति को सबसे बड़ी बाधा बताते हुए उसे सीधी चुनौती दी. आईएलपी को उन्होंने मजदूरों की लड़ाकू पार्टी कहा, जिसने सुरक्षित रोजगार, उचित मजदूरी, तय काम के घंटे, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक अधिकारों के लिए एक ठोस विधायी कार्यक्रम पेश किया. भारत की कम्युनिस्ट नेतृत्व की संस्थापक पीढ़ी, अंबेडकर और कांग्रेस के कई अग्रणी नेता – सभी एक आजाद देश में मजदूरों के लिए गरिमामय जिंदगी और न्यायपूर्ण समाज की इस लड़ाई से गहरे जुड़े हुए थे.
नई श्रम संहिताएं मजदूरों के अधिकारों को कॉरपोरेट लालच के आगे गिरवी रखने का काम करती हैं. ‘इंस्पेक्टर राज’ खत्म करने के नाम पर ये संहिताएं कार्यस्थलों पर सुरक्षा, न्याय, बराबरी और कानून पालन की न्यूनतम व्यवस्था लागू करने की राज्य की जिम्मेदारी से ही पीछे हटती हैं. मजदूर तबके पर कम मजदूरी में ज्यादा काम, कम सुरक्षा और कम आजादी थोपना ही इन संहिताओं का असली मकसद है – बावजूद इसके कि इन्हें मजदूरों के लिए किसी ‘नई सौगात’ की तरह पेश किया जा रहा है. इसके जरिये जहां राज्य ‘श्रमिक कल्याण’ की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है, वहीं ये नई संहिताएं मजदूरों को संगठित होने, यूनियन बनाने और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने से रोकने के लिए बनाई गई हैं. ये संहिताएं स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की संवैधानिक बुनियाद के खिलाफ जाती हैं और अंबेडकर के उस बुलंद आह्वान को भी नकारती हैं – “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित बनो.”
चारों श्रम संहिताएं भी उसी कॉरपोरेट कब्जे के एजेंडे की उपज हैं, जिसने पहले तीन कृषि कानून थोपे थे, और जिन्हें ऐतिहासिक किसान आंदोलन के उठ खड़े होने पर वापस लेना पड़ा. किसान संगठनों ने अपनी शानदार एकता, हौसले और लंबी लड़ाई के अडिग संकल्प के बल पर मोदी सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया. इस ऐतिहासिक आंदोलन की ताकत ने पूरे देश का ध्यान और समर्थन खींचा, जिससे मजदूर-किसान एकता और व्यापक सामाजिक समर्थन की नई लहर पैदा हुई. मजदूर आंदोलन को भी अब चारों श्रम संहिताओं के हमले के खिलाफ व्यापक तबकाई एकता कायम करते हुए लगातार संघर्ष छेड़ते हुए उसी राह पर बढ़ना होगा. नए कानून दावे तो करते हैं कि वे मजदूरों के अलग-अलग तबकों के मुद्दों का समाधान लाएंगे, लेकिन हकीकत यह है कि वे मजदूरों के संगठित होने और संघर्ष करने के मौलिक अधिकार को ही कुचल देते हैं.
अब जरूरत है कि हम इस गुलामी की संहिताओं के खिलाफ लड़ाई को उन तबकों तक ले जाएं – कैजुअल, कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्स मजदूरों से लेकर तेजी से बढ़ रहे गिग वर्करों और आईटी कर्मचारियों तक, और भारत की सबसे दमित-शोषित महिला मजदूरों तक – जिन्हें इस नए सिस्टम का सबसे ज्यादा नुकसान होगा. चारों श्रम संहिताएं मूलतः भारत के मजदूरों को निजी मालिकों की तानाशाही और कॉरपोरेट नियंत्रण की जंजीरों में जकड़ने की परियोजना हैं. इन संहिताओं के खिलाफ यह लड़ाई भारत में मजदूर तबके की चेतना और उनके आंदोलन की आगे बढ़ने के इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगी.