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भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के 100 साल: विरासत, लोकतंत्र की चुनौती और आगे की लड़ाई

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के 100 साल: विरासत, लोकतंत्र की चुनौती और आगे की लड़ाई

(कामरेड विनोद मिश्र की स्मृति में, भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के सौ साल पर दिल्ली के काॅन्स्टिट्यूशन क्लब में दिया गया भाषण)


साथियो, जैसा कि आप देख रहे हैं, आज का यह कार्यक्रम एक तरह से थ्री-इन-वन कार्यक्रम है. कल, 18 दिसंबर को, कामरेड विनोद मिश्र की बरसी है. उनके संदर्भ में भी हम जरूर चर्चा करेंगे. दूसरी बात यह है कि आज अरिंदम सेन जी की किताब का लोकार्पण हो रहा है. बहुत पहले हमने यह सोचा था कि कम्युनिस्ट आंदोलन के पूरे इतिहास पर एक सीरीज निकाली जाए. वह काम तो पूरा नहीं हो सका, लेकिन शुरुआत से लेकर 1950 तक के दौर का एक दस्तावेजीकरण इस किताब में हुआ है. जैसा कि साथियों ने कहा, यह काम सीपीआई ने भी किया है, सीपीएम ने भी किया है. कम्युनिस्ट आंदोलन किसी एक पार्टी की बपौती नहीं है. वह सबका साझा आंदोलन है. उसे किसी एक पार्टी के नजरिये से देखने की जरूरत नहीं है. आज हम पूरे देश के संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन के सौ साल पूरे होने के मौके पर खड़े हैं. तीसरी बात यह है कि सौ साल के इस मौके पर, और जाहिर है कि आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां लोग यह सवाल पूछते हैं कि आखिर हम कहां से चले थे और आज कहां पहुंच गए हैं. उधर आरएसएस ने भी अपने सौ साल पूरे कर लिए हैं, और वे लोग कहां पहुंच गए हैं. यह तुलना तो हर रोज, हर पल हमारे सामने खड़ी रहती है. इस पूरे दौर पर कुछ चर्चा जरूरी है.

कामरेड विनोद मिश्र के संदर्भ में एक बात बार-बार याद आती है. 1998 में हमारी सेंट्रल कमेटी की बैठक लखनऊ में चल रही थी. बैठक अपने अंतिम चरण में थी. 18-19 दिसंबर को उसके समाप्त होने की योजना थी. 17 दिसंबर की रात उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और 18 दिसंबर की शाम होते-होते वे हमारे बीच से, वहीं लखनऊ में, हमेशा के लिए चले गए. अगर संक्षेप में उस दौर को समझने की कोशिश करें, तो उनके पास लगभग तीस वर्षों की एक कम्युनिस्ट यात्रा थी – नक्सलबाड़ी से लेकर 1998 तक. यानी 1967-68 से लेकर 1998 तक. उस समय कामरेड विनोद मिश्र दुर्गापुर रीजनल इंजीनियरिंग काॅलेज के छात्र थे. वह दौर ऐसा था कि आज उसके बारे में सोचते हुए भी हैरानी होती है कि नक्सलबाड़ी का असर कितना व्यापक और गहरा था. उसका प्रभाव लगभग वैसा ही था, जैसा आजादी के आंदोलन के दिनों में महसूस किया जाता था. लोगों को लगता था कि अगले पांच-दस साल बस आजादी के लिए हैं, और कुछ और सोचने की जरूरत नहीं है. नक्सलबाड़ी ने भी देश में कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया था.

उस दौर के बहुत-से लोगों को यह लगने लगा था कि अब और कुछ सोचने की जरूरत नहीं है – अगला पांच-दस साल नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी क्रांति के लिए है. आज कोई कह सकता है कि यह बहुत बड़ा आकलन था, बहुत बड़ा अनुमान था, और देश में ऐसा कोई माहौल वास्तव में मौजूद नहीं था. इस पर बहस हो सकती है. लेकिन यह तथ्य है कि 1967 में, जब नक्सलबाड़ी की घटना हुई, उसी साल देश में पहली बार नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनी थीं. पूरे देश में, खासकर नौजवानों के बीच, एक गहरा मोहभंग पैदा हो रहा था. देश कुछ नया तलाश रहा था. हवा में बड़े बदलाव की बात थी. ऐसे समय में कम्युनिस्ट आंदोलन के एक हिस्से ने यह सोचा कि क्यों न क्रांति को ही अपना केंद्रीय एजेंडा बना लिया जाए.

और लोग क्रांति के लिए निकल पड़े. बहुत बड़े पैमाने पर यह एक जन आंदोलन था. यह दो-चार या दस लोगों का, कहीं अलग-थलग पड़ा हुआ आंदोलन नहीं था. नक्सलबाड़ी के इलाके में, खासकर चाय बागानों में, यह आम लोगों का आंदोलन था. हजारों की तादाद में दिल्ली, कोलकाता और देश भर के विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग और मेडिकल काॅलेजों से नौजवान अपना पूरा करियर छोड़कर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने निकल पड़े. यह यूं ही नहीं हो सकता. अगर कुछ भी नहीं था, तो यह ‘पागलपन’ लोगों के भीतर कहां से आया. जरूर कुछ बहुत बड़ा था – और उसी ऐतिहासिक उभार से सीपीआई(एमएल) पार्टी का गठन हुआ.

इस आंदोलन को कुचल देने के लिए, जैसे आज हम ऑपरेशन कगार देख रहे हैं, बिल्कुल वैसा ही अभियान तब भी चलाया गया था – मार दो, खत्म कर दो, सबको पकड़ो और मार दो. लोगों को जेल के भीतर भी मारा गया, जेल के बाहर भी मारा गया. बंगाल में, खासकर कोलकाता शहर के बाहरी इलाकों – काशीपुर, बेलनाघाटा जैसे क्षेत्रों में – बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ. पूरे-पूरे इलाकों को दो-दो दिनों तक घेर लिया गया. आज जिसे हम भीड़ द्वारा हत्या कहते हैं, उसी तरह के अभियान तब चलाए गए. जैसा इंडोनेशिया में हुआ था, वैसा ही. कम से कम ढाई सौ नौजवानों को केवल दो दिनों के भीतर चुन-चुनकर मार डाला गया.

इस तरह एक पूरे आंदोलन को उसकी शुरुआत में ही कुचल देने की कोशिश की गई, ताकि उसके नाम पर देश में कुछ भी जिंदा न रह जाए, ताकि उसे पूरी तरह मिटा दिया जाए. इतनी बड़ी और सुनियोजित कोशिशों की इस पृष्ठभूमि में कामरेड विनोद मिश्र और हमारे दूसरे साथियों ने पार्टी को फिर से खड़ा करने का बीड़ा उठाया.

इसीलिए हम कहते हैं कि उस माहौल को समझना बहुत जरूरी है – कि महज तीन लोगों ने मिलकर सेंट्रल कमेटी बनाई. तीन लोगों की सेंट्रल कमेटी, और यह स्पष्ट फैसला कि पार्टी को फिर से जिंदा रखना है, पूरे देश में उसे दोबारा संगठित करना है. वही यात्रा वहां से शुरू होती है और 1998 तक आते-आते, एक तरह से, उनके जीवन की यात्रा के साथ समाप्त होती है.

इस पूरे दौर में एक बात है, जो मेरे ख्याल में कामरेड वीएम को सचमुच कामरेड वीएम बनाती है. उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि हमारा काम बस एक छोटा संगठन या कोई सीमित समूह खड़ा कर देना है. नहीं. उनका लक्ष्य था पूरे देश के कम्युनिस्ट आंदोलन का क्रांतिकारीकरण करना – पूरे देश में कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर वह क्रांतिकारी गति, वह तेवर, एक बार फिर पैदा करना.

इसीलिए हमारे सामने कभी कोई छोटा एजेंडा नहीं रहा. एजेंडा हमेशा बड़ा रहा. और जब लक्ष्य इतना बड़ा हो, तो आप देख सकते हैं कि जहां से हमारा आंदोलन शुरू हुआ – नक्सलबाड़ी से – वही चिंगारी आकर भोजपुर के एक गांव, एकवारी, में गिरती है. वहां यह कहानी खत्म भी हो सकती थी. एकवारी में कुछ हुआ, एक बड़ा स्थानीय आंदोलन खड़ा हुआ, और बात वहीं पर रुक सकती थी. आम तौर पर ऐसा ही होता है – कहीं एक स्थानीय विस्फोट, एक आंदोलन, और वहीं उसकी सीमा तय हो जाती है. लेकिन यहां एक सपना देखा गया था – पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प खड़ा करने का सपना.

यह सब एक ऐसे ऐतिहासिक दौर में हो रहा था, जब एक तरफ नक्सलबाड़ी का अनुभव हमारे सामने था, और दूसरी तरफ 1977 के बाद का वह समय, जिसके बारे में उमा चक्रवर्ती जी ने बताया कि आपातकाल के दौरान कितना जबरदस्त दमन हुआ था. उस दमन के बाद देश में लोकतंत्र की वापसी हुई, और उसके साथ एक नई आकांक्षा ने जन्म लिया – कि भारत में एक मजबूत, सशक्त लोकतंत्र बने.

ऐसा लोकतंत्र, जो सिर्फ चुनावों तक सीमित न हो, जो पांच साल में एक दिन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया न हो, बल्कि रोजमर्रा का लोकतंत्र हो – सबके लिए हो. इसी लोकतांत्रिक कोशिश को आगे बढ़ाने के लिए एक अलग मंच भी बनाया गया – इंडियन पीपुल्स फ्रंट.

इसके बाद सोवियत संघ का पतन हुआ, और फिर हमारे सामने भाजपा और आरएसएस का तेज उभार दिखाई देने लगा. आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कई लोग यह सवाल पूछते हैं कि भारत में फासीवाद के इस दौर की खास तिथि तय की जा सकती है या नहीं. अगर कोई एक तारीख चुननी हो, तो वह निस्संदेह 6 दिसंबर 1992 है. वह सिर्फ एक मस्जिद को गिराने की घटना नहीं थी. वह एक तरह से सार्वजनिक घोषणा थी – ‘वी हैव अराइव्ड’. यानी भारत में अब हम खुलकर आ गए हैं. यह एक ऐलान था. उसके बाद स्वाभाविक तौर पर यह समझ बनी कि जो पार्टी तब तक भूमिगत अवस्था में थी, उसे अब खुलकर सामने आना चाहिए, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए खुले राजनीतिक संघर्ष में उतरना चाहिए.

यह पूरी यात्रा लगभग तीस वर्षों की यात्रा है. और हमें यह लगता है कि आज सीपीआई(एमएल) लिबरेशन जो कुछ भी बनने और करने की कोशिश कर रही है, उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान कामरेड विनोद मिश्र का है. जरूर, शुरुआती प्रेरणा कामरेड चारु मजूमदार से मिली थी, लेकिन अवधारणा के स्तर पर, प्रयोग के स्तर पर, पहल के स्तर पर, सोच के स्तर पर – संगठन निर्माण और आंदोलन निर्माण से जुड़े तमाम मामलों में – कामरेड वीएम का योगदान बेहद महत्वपूर्ण और व्यापक है.

इसीलिए आज हमने यह सोचा कि कामरेड विनोद मिश्र को केवल सीपीआई(एमएल) के महासचिव के रूप में नहीं, बल्कि भारत के पिछले सौ वर्षों के संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर एक विशिष्ट प्रयोग के रूप में याद किया जाए.

एक ऐसा प्रयोग, जहां सिद्धांत और व्यवहार का गहरा एकीकरण देखने को मिलता है. जैसा कि साथियों ने पहले भी कहा – जनता के बीच जाओ, वहां प्रयोग करो, उनके अनुभवों से सीखो और फिर उन अनुभवों को विचार  में ढालो. सिद्धांत और व्यवहार के इस जीवंत मेल के बिना कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी सार्थकता खो देता है. इसकी गहराई और व्यापकता ही इसकी जान है.

इसी पूरी कोशिश के कारण हम यह मानते हैं कि कामरेड विनोद मिश्र को पिछले सौ वर्षों के कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर एक अलग, विशिष्ट और सतत प्रयोग के रूप में देखा जाना चाहिए – एक ऐसा प्रयोग, जो आज भी जारी है. इसलिए कम्युनिस्ट आंदोलन को आज छोटे-छोटे, अलग-थलग खांचों में देखने की कोई जरूरत नहीं है.

आज के इस मोड़ पर, अगर हम पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन पर नजर डालें, तो हमें बार-बार उस अनुभव की ओर लौटना होगा. वहां से बहुत-सी चीजें उठानी होंगी, जो शायद अधूरी रह गई थीं. जिस प्रयोग की शुरुआत कामरेड वीएम ने की थी, उसे आगे बढ़ाना आज भी हमारे सामने एक जरूरी कार्य है. उसी सूत्र को थामकर हमें आगे बढ़ना चाहिए.

हम यहां बात अपने देश के संदर्भ में कर रहे हैं, लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन तो मूलतः अंतरराष्ट्रीय है. पिछले सौ साल के इतिहास में दुनिया भर के कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक सोवियत संघ था – एक पूरी क्रांति, एक पूरा समाज. लेकिन वह सोवियत संघ ढह गया. इस सच्चाई से हमें आंखें नहीं चुरानी चाहिए. जहां एक चीज खड़ी की गई थी, वह सत्तर साल बाद टिक नहीं पाई. क्यों नहीं टिक पाई, क्यों वह चल नहीं सकी – इन सवालों पर गंभीरता से सोचना होगा और उनसे सबक लेना होगा कि मामला कहां जाकर फंसा.

इस पर कामरेड वीएम ने भी गंभीरता से विचार किया था, और हमें लगता है कि आज दुनिया भर के कम्युनिस्ट इस पर सोच रहे हैं. इससे एक बड़ा सवाल निकलकर सामने आया. सोवियत संघ के भीतर जो ठहराव आया, उसका एक बड़ा कारण यह था कि वह एक महाशक्ति बन गया और अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गया. यह रास्ता सोवियत संघ के लिए टिकाऊ नहीं था.

लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह था कि धीरे-धीरे वहां लोगों की भागीदारी और जुड़ाव उस पूरी परियोजना से कमजोर होता गया. यानी लोकतंत्र का सवाल. यही सवाल दुनिया भर में कम्युनिस्टों के सामने आ खड़ा हुआ. कम्युनिस्टों के खिलाफ यह प्रचार किया गया कि वे अच्छे लोग हैं, गरीबी मिटा सकते हैं, बेरोजगारी कम कर सकते हैं, कमजोरों को खड़ा कर सकते हैं – लेकिन लोकतंत्र के मामले में उन्होंने कुछ नहीं किया. इस आरोप का जवाब देना होगा. और हमें नहीं लगता कि इस सवाल का जवाब सोवियत संघ से भी बेहतर, ज्यादा गहरे और ज्यादा लोकतांत्रिक माॅडल खड़े किए बिना दिया जा सकता है.

हमें एक ऐसी कम्युनिस्ट पार्टी और एक ऐसी कम्युनिज्म की अवधारणा विकसित करनी होगी, जहां हम साफ कह सकें कि ‘कंसिस्टेंट डेमोक्रेसी ही कम्युनिज्म है’. मतलब, लोकतंत्र को सुसंगत बना दो. उसे सबके लिए उपलब्ध करा दो. उसे हर जगह, हर रोज की जिंदगी में ले जाओ. यही कम्युनिज्म है. इसके लिए हमें किसी बहुत दूर के ‘यूटोपिया’ (आदर्शलोक) की जरूरत नहीं है.

बेशक, हमारा लक्ष्य शोषण-मुक्त और वर्गविहीन समाज है, लेकिन यदि उस समाज की कल्पना अगर इस रूप में न हो कि वह सबसे  सबसे गहरा, सबसे व्यापक और सबसे सुसंगत लोकतंत्र (द डीपेस्ट, ब्राॅडेस्ट एंड मोस्ट कंसिस्टेंट डेमोक्रेसी) हो – तो फिर बहुत कुछ बचता ही नहीं.

‘बाद की समझ’ में हम सभी बहुत समझदार हो जाते हैं; बीते हुए समय पर टिप्पणी करना और कमियां निकालना हमेशा आसान होता है. और अगर हम केवल ‘लंबे समय’ (लांग रन) की ही बात करते रहेंगे, तो जैसा कि कहा गया है  – लंबे  समय में तो हम सब मर चुके होंगे. अतः आज की असली जरूरत यह है कि कम्युनिस्ट आंदोलन को वर्तमान के तात्कालिक संदर्भ में किस प्रकार पुनर्जीवित किया जाए. इस पुनरुत्थान का केंद्र-बिंदु है – लोकतंत्र की चुनौती. हमारे देश में यह चुनौती आज किसी भविष्य के खतरे के रूप में नहीं, बल्कि बिल्कुल सामने साक्षात खड़ी है.

आज जो फासीवाद भारत में उभरा है, उसने आजादी के साथ मिली लोकतांत्रिक व्यवस्था को धीरे-धीरे खोखला किया है. आजादी के साथ हमें संविधान मिला, संसदीय लोकतंत्र मिला, और सबके लिए वोट का अधिकार मिला. लेकिन जो कुछ भी मिला था, उसे हर रोज थोड़ा-थोड़ा करके, और कभी-कभी बहुत बड़े झटकों के साथ, खत्म किया जा रहा है.

आज भारत में कम्युनिस्टों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है – उस लोकतंत्र को कैसे बचाया जाए, जिसकी आज यह देश तरसकर देख रहा है, और उसे कैसे मजबूत किया जाए.

अगर हम लोकतंत्र के सबसे मजबूत चैंपियन के रूप में उभर पाते हैं, तो वही कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी. वही कम्युनिस्ट आंदोलन का सबसे सटीक परिचय होगा, और वही उसकी सबसे बड़ी प्रगति भी होगी. क्योंकि आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मौजूदा दौर में लोकतंत्र की इस लड़ाई को आगे कैसे बढ़ाया जाए. आजादी के आंदोलन के दौर में हम कम्युनिस्ट यह कह सकते हैं कि बहुत-से मामलों में पहल कम्युनिस्टों ने की थी. कम्युनिस्टों के दबाव से ही बहुत कुछ बना. यह बिल्कुल सही है. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि आजादी के आंदोलन में कम्युनिस्ट अग्रणी धारा के रूप में उभर नहीं पाए. उस पूरे आंदोलन का नेतृत्व अंततः कांग्रेस के हाथ में चला गया – और वर्ग के नजरिये से देखें, तो भारत के पूंजीपति वर्ग के हाथ में. भारत के मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों के हाथ में वह नेतृत्व नहीं जा सका, जैसा सपना भगत सिंह ने देखा था. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है.

उसी दौर में आजादी के आंदोलन के भीतर कई धाराएं मौजूद थीं. अलग-अलग ताकतें अलग-अलग तरीकों से लड़ रही थीं. और उन्हीं में एक धारा हिंदुत्व की भी थी – आरएसएस और हिंदू महासभा की – जिसका आजादी के आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था. आज वही धारा, जिसका आजादी के आंदोलन से कोई रिश्ता नहीं था, बल्कि जो उसके खिलाफ खड़ी थी, आज डी-काॅलोनाइजेशन (उपनिवेश-मुक्ति)  के नाम पर अपना एजेंडा चला रही है. आज देश की औपनिवेशिक-विरोधी विरासत को मिटाने को ही उन्होंने डी-काॅलोनाइजेशन का नाम दे दिया है. आप ‘वंदे मातरम्’ की बहस को ही देख लीजिए.

आज जो ‘बंदे मातरम्’ गाया जाता है, उसकी मूल रचना उतनी ही थी, जितनी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखी थी. उससे ज्यादा कुछ था ही नहीं. किसी बड़ी रचना को छोटा कर दिया गया – यह दावा सरासर बकवास और झूठ है. यही वह मूल रचना थी, जिसे रविंद्रनाथ ठाकुर और दूसरे लोगों ने स्वीकार किया. आनंदमठ में उसके विस्तार के बावजूद, वस्तुगत रूप से वह रचना उस दौर में औपनिवेशिक शासन-विरोधी के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकती थी. उसमें हिंदुत्व की कोई अवधारणा हो ही नहीं सकती थी. इसीलिए ‘बंदे मातरम्’ इस देश के क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों का नारा बना. उसी नारे के साथ लोग फांसी पर चढ़े. इसी संदर्भ में रविंद्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ में एक जबरदस्त काव्यात्मक शक्ति है. लेकिन अगर उसे राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया, तो इसलिए कि असंख्य लोगों ने अपने खून, पसीने और शहादत से उसे वह दर्जा दिया. ‘बंदे मातरम्’ वस्तुगत रूप से जनता के संघर्ष से उभरकर सामने आया, और उसी को मान्यता देते हुए उसे राष्ट्रीय गीत बनाया गया. आज देखिए – जिनका उस आंदोलन से, उस परंपरा से, उस विरासत से कोई लेना-देना नहीं था, वही लोग संसद में दस-दस घंटे की बहस कराकर उसके सबसे बड़े चैंपियन बनने की कोशिश कर रहे हैं.

अभी हमारे साथियों ने लेबर कोड पर बताया कि कैसे-कैसे कानून बदले गए. उनका तर्क है कि ये सब अंग्रेजों के जमाने के कानून हैं, जिन्हें खत्म किया जाना चाहिए. चाहे वह भारतीय दंड संहिता को खत्म करने की बात हो, या फिर ट्रेड यूनियन अधिनियम, फैक्ट्री अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम – सबको. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कानून हमें अंग्रेजों से तोहफे में मिले थे. क्या ये कोई औपनिवेशिक उपहार थे. बिल्कुल नहीं. अगर अंग्रेजों के जमाने में मजदूरों के लिए फैक्ट्री निरीक्षण व्यवस्था बनी, मजदूरी से जुड़े कानून बने, या कोई भी श्रम कानून अस्तित्व में आया, तो वह कम्युनिस्टों और गैर-कम्युनिस्टों – दोनों के संघर्षों का नतीजा था. और इसमें बाबासाहेब अंबेडकर की भूमिका कितनी बड़ी थी, यह किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं है.

अभी मैं तमिलनाडु में अपनी पार्टी के सम्मेलन के लिए तूतीकोरिन गया था. पूरा शहर वी. ओ. चिदंबरम नगर के नाम से जाना जाता है. उनका इतिहास देखिए – एक तरफ वे एक स्वदेशी शिपिंग कंपनी खड़ी कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कताई मिल के मजदूरों को संगठित कर रहे हैं. कताई मिल के मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए उन्हें चार साल जेल में रहना पड़ा. जिस तरह की यातनाएं उन्होंने झेली, वह किसी से छिपी नहीं हैं. कभी वे कांग्रेस में शामिल होते हैं, कभी कांग्रेस से अलग होते हैं. ऐसे ही ढेरों लोग रहे हैं. पश्चिम बंगाल में संतोष कुमारी देवी थीं – जूट मिल मजदूरों की पहली अध्यक्ष और सबसे बड़ी नेताओं में से एक. वे कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं थीं, लेकिन आजादी के आंदोलन में मजदूरों, किसानों और आदिवासियों के लिए संघर्ष करने वालों में उनकी भूमिका बेहद अहम थी.

इस देश में आजादी के आंदोलन के दौरान ऐसे अनगिनत लोग थे. उन्हीं आंदोलनों के दबाव में कुछ कानून बने. कुछ वकील भी थे – और आज भी हैं – जो मजदूरों के बारे में सोचते हैं, न्याय के बारे में सोचते हैं, और मानते हैं कि मजदूर को भी इंसाफ मिलना चाहिए, कि उस पर असीमित शोषण न हो. इन तमाम लोगों के प्रयासों से जो कानून बने थे, आज उन्हें खत्म किया जा रहा है, और उनकी जगह नई गुलामी के कानून लाए जा रहे हैं. उन्हीं कानूनों के बारे में अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा हुआ, तो यह डिक्टेटरशिप ऑफ द एंप्लाॅयर (नियोक्ताओं की तानाशाही) होगी, और मजदूरों को गुलाम बना दिया जाएगा. और इस पूरे काम को आज नाम दिया जा रहा है – डी-काॅलोनाइजेशन (उपनिवेश-मुक्ति).



इतनी बड़ी साजिश के सामने सवाल यह है कि हम पलटवार कैसे करें. आजादी के आंदोलन की उन तमाम धाराओं को एक दूसरी आजादी की लड़ाई में फिर से कैसे लाया जाए – यह कम्युनिस्टों के सामने एक बड़ी चुनौती है. आज यह काम हम कैसे कर पाएंगे.

इसीलिए जब हम संविधान की रक्षा की बात करते हैं, जब हम कहते हैं कि यह कानून नहीं, वह कानून नहीं, तो यह सब अलग-अलग, छोटे-छोटे मुद्दे लग सकते हैं. लेकिन इन्हें जोड़कर देखिए, तो आपके सामने एक बहुत बड़ी तस्वीर उभरती है. जो ताकतें आजादी के आंदोलन में कहीं थीं ही नहीं, वे आज उसमें कूद पड़ी हैं और हर चीज पर कब्जा कर रही हैं.

देश के राष्ट्रवाद की नई परिभाषा अब हिंदुत्व है – हिंदू राष्ट्रवाद. भारत की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही है. राज्य का एक तरह से पूरा पुनर्गठन किया जा रहा है. सारे संस्थानों को बदला जा रहा है. यह इतना बड़ा विध्वंस चल रहा है, और उसे बताया जा रहा है पुनर्निर्माण. औपनिवेशिक-विरोधी विरासत को नष्ट करके, साम्राज्यवाद के दलाल बनने को डी-काॅलोनाइजेशन (उपनिवेश-मुक्ति) कहा जा रहा है. देश में जो यह प्रतिक्रांति चल रही है, अगर आज किसी क्रांति की बात होगी, तो वह इसी प्रतिक्रांति को रोकने और समाप्त करने से होकर ही आगे बढ़ेगी.

एक तरफ यह बड़ी लड़ाई है. और दूसरी तरफ, संक्षेप में एक और बात कहना जरूरी है. कम्युनिस्टों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि कम्युनिस्ट आंदोलन इसलिए नहीं चल पा रहा है क्योंकि कम्युनिस्ट ‘वर्ग संघर्ष’ की बात करते हैं, और हिंदुस्तान में ‘वर्ग’ नहीं चलता. यह धारणा बहुत गहराई तक बैठी हुई है, और इसे फिर से देखने की जरूरत है. इसमें कहीं-न-कहीं कम्युनिस्टों की भी कमी रही है. वर्ग संघर्ष को जिस रूप में हमने समझा और जिस तरह से उसे प्रैक्टिस किया, उसमें एक संकीर्णता रही है. उसे अक्सर सिर्फ आर्थिक दायरे तक सीमित कर दिया गया, जबकि ‘वर्ग’ और ‘वर्ग संघर्ष’ को उसकी समग्रता में समझना एक बुनियादी सवाल है.

अगर आप ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पढ़ें, तो उसकी शुरुआती पंक्तियां ही कहती हैं कि अब तक के समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है. इसका मतलब यह है कि ‘वर्ग’ एक -‘सामाजिक श्रेणी’  है. अगर वर्ग एक ‘सामाजिक श्रेणी’ है, तो उसमें समाज की तमाम विविधताएं और जटिलताएं शामिल हैं. लेकिन हम अक्सर वर्ग को एक ‘अमूर्त’ (एब्सट्रैक्ट) या काल्पनिक रूप में सोच लेते हैं, जो वास्तविक समाज में कहीं दिखाई ही नहीं देता. जबकि वर्ग संघर्ष का असली मतलब है – समाज को उसके ठोस, वास्तविक रूप में समझना और उसे बदलना. ‘वर्ग’ कोई अमूर्त विचार नहीं है, बल्कि एक ‘ठोस’ सामाजिक अस्तित्व है.

इसी तरह, लेनिन की रचनाओं में बार-बार यह बात आती है कि ‘वर्ग संघर्ष’  सिर्फ ‘पूंजी’ और ‘श्रम’ के बीच की आर्थिक लड़ाई नहीं है. हम अक्सर मजदूरी की लड़ाई को तो ‘वर्ग संघर्ष’ मान लेते हैं, लेकिन ‘सामाजिक उत्पीड़न’ के खिलाफ संघर्ष को ‘वर्ग संघर्ष’ के रूप में पहचान नहीं पाते.

अगर किसान जमीन बचाने के लिए या न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए लड़ता है, तो हम कहते हैं – यह ‘वर्ग संघर्ष’ है. अगर मजदूर लड़ता है, तो यह ‘वर्ग संघर्ष’ है. लेकिन सत्ता जिस तरह से काम कर रही है, जिस तरह वह दमन और उत्पीड़न कर रही है– पावर जिस-जिस तरीके से ‘ऑपरेट’ कर रही है – हर स्तर पर उस सत्ता के खिलाफ खड़ा होना, यही तो ‘वर्ग संघर्ष’ है.

‘वर्ग संघर्ष’ की हर अभिव्यक्ति के अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक और विचारधारात्मक आयाम होते हैं. इनके बगैर कोई  ‘वर्ग संघर्ष’ होता ही नहीं है. और हमें यह स्वीकार करना होगा कि कहीं-न-कहीं हमारी समझ और व्यवहार में एक तरह की ‘यांत्रिक’ और सीमित सोच हावी रही है, जिसे अब बदलने की जरूरत है.

और अगर इसे बदलना है, तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ‘वर्ग’ कोई संकीर्ण आर्थिक श्रेणी नहीं है, बल्कि वह एक सामाजिक श्रेणी है – और एक व्यापक श्रेणी है. वर्ग की इस व्यापकता को अगर सही मायनों में समझना है, तो उस बड़े ‘सी’ के साथ दो और ‘सी’ और दो ‘जी’ को जोड़ना होगा, जिनके बिना वर्ग की कोई ठोस समझ बन ही नहीं सकती. जो दो और ‘सी’ हैं, उनमें एक है ‘कास्ट’ (जाति) और दूसरा है ‘कल्चर’ (संस्कृति़). और जो दो ‘जी’ हैं, वे हैं ‘जेंडर’ (लिंग) और ‘जेनरेशन’ (पीढ़ी). इनके बिना आप समाज की वास्तविक संरचना में प्रवेश ही नहीं कर सकते.

बाबासाहेब अंबेडकर जब कहते हैं कि जाति श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रम करने वालों – यानी श्रमिकों – का विभाजन है, तो उनका मतलब बिल्कुल साफ है. वे यह कह रहे थे कि अगर हमें श्रमिकों को एकजुट करना है, तो श्रेणीबद्ध जाति-व्यवस्था को तोड़ना होगा. इसी समझ के आधार पर उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया था.

अब सवाल यह है कि श्रमिकों को एकजुट कैसे किया जाए, जब वही श्रमिक जाति के आधार पर बंटे हुए हों. अगर जाति-व्यवस्था से पैदा हुए पूर्वाग्रह, विशेषाधिकार और अहंकार को हम अपने भीतर ही आत्मसात कर लें, तो श्रमिकों की एकजुटता कभी बन ही नहीं सकती. इसका सीधा मतलब यह है कि जाति-विरोधी संघर्ष के आधार पर ही श्रमिक एकजुटता संभव है. इसलिए जाति-विरोधी संघर्ष कोई अलग या गौण मुद्दा नहीं है, बल्कि वर्ग संघर्ष का ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है.

अब अगर हम संस्कृति की बात करें, तो भारत जैसे देश में – जहां इतनी भाषाएं हैं, अलग-अलग धर्म हैं, और जो विविध परंपराएं हैं – यह और भी अहम हो जाता है. आज अगर फासीवाद के सामने कहीं कोई वास्तविक रुकावट मौजूद है, तो वह मुख्यतः दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में दिखाई देती है, जहां अब तक सांस्कृतिक प्रभुत्व पूरी तरह उसके हाथ में नहीं गया है. उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर उसने लगभग कब्जा कर लिया है. इसमें सांस्कृतिक स्तर पर लोगों को बहुत फर्क नहीं दिखता है. असम में कभी एक मजबूत असमिया राष्ट्रवाद हुआ करता था. आज उसे लगभग पूरी तरह हिंदूकरण के भीतर समाहित कर दिया गया है. असमिया राष्ट्रवाद को उसने अपने हिंदू राष्ट्रवाद के ढांचे में समेट लिया है. बंगाल में बंगाली राष्ट्रवाद अब भी प्रतिरोध कर रहा है, लेकिन वहां भी उसका तीव्र हिंदूकरण किया जा रहा है. बंदे मातरम् को लेकर जो फिजूल और बनावटी बहस खड़ी की गई है, वह इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. जो काम श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं कर सके, उसे बंकिमचंद्र को सामने लाकर पूरा करने की कोशिश की जा रही है.

दक्षिण भारत में देखिए – तमिल राष्ट्रवाद आज भी संघर्षरत है. द्रविड़ विचारधारा आज भी जीवित है और प्रतिरोध कर रही है. लेकिन उसके भीतर भी घुसपैठ की पूरी कोशिश लगातार जारी है. हमें यह समझना होगा कि यह सिर्फ किसी एक राज्य या क्षेत्र का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे देश में संस्कृति का सवाल है. और सवाल यह है कि क्या हम इसे वर्ग संघर्ष से अलग करके देखेंगे?

एक समय था जब इप्टा के साथियों ने संस्कृति के मोर्चे पर असाधारण काम किया था. हिंदी फिल्मों के शुरुआती दौर की पूरी कल्पना, उसकी भाषा, उसकी संवेदना, उसके गीत – यह सब बड़े पैमाने पर कम्युनिस्ट आंदोलन से निकला था. जब तब इतना शक्तिशाली सांस्कृतिक हस्तक्षेप संभव हुआ था, तो आज क्यों नहीं? आज इस व्यापक हिंदूकरण और हिंदुत्व के खिलाफ वह वैकल्पिक संस्कृति, वह कल्पनाशीलता, वह आवेग – अपने वर्ग संघर्ष का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता?

अब उन दो ‘जी’ की बात करें – जेंडर (लिंग) और जेनरेशन (पीढ़ी). इनके बिना हमारा पूरा वर्ग संघर्ष अंततः ‘पुरुषों का वर्ग संघर्ष’ बनकर रह जाता है. जब हम श्रमिकों की बात करते हैं, तो अलग से कहते हैं – ‘कामकाजी महिलाएं’. लेकिन सवाल यह है कि काम न करने वाली महिलाएं आखिर कौन हैं? हर महिला कामकाजी है. इसलिए वे श्रमिक हैं. आज के समय में हमारे सामने श्रमिक वर्ग आंदोलन को एक व्यापक और नए नजरिए से देखने और गढ़ने का एक बड़ा अवसर मौजूद है.

लेबर कोड और कुछ नहीं है. लेबर कोड का सीधा मतलब यही है कि जो पहले था, वह अब नहीं रहेगा. अब हमें नया चाहिए. मनरेगा चला गया, या अभी आया क्या? इसे ‘जी-राम-जी’ (GRAM-G) कहने की क्या जरूरत है? यह तो ग्रामीण मजदूरों के लिए ही है. फिर इसमें यह “ग्राम जी” क्यों जोड़ा गया?

असल में मनरेगा का जो मूल विचार था, वह क्या था? वह था – मांग आधारित रोजगार. यानी जितना काम आपको चाहिए, उतना काम आपको मिलेगा. लेकिन इसे शुरू से ही सीमित कर दिया गया. पहले कहा गया – सिर्फ 100 दिन मिलेगा. जबकि हम लोग चाहते थे कि कम से कम 200 दिन का रोजगार मिले. उसमें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती थी. कई जगहों पर न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया गया. हमारी मांग यह थी कि मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित हो, मजदूरी दर बढ़े, और एक मजबूत, सार्वभौमिक मनरेगा लागू किया जाए. लेकिन इसके बजाय आप क्या कर रहे हैं? आप मनरेगा को पूरी तरह खत्म करके एक नया कानून थमा रहे हैं – यह लो, “ग्राम जी”, और इसी से काम चला लो.

हमें लगता है कि अगर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान एक साल तक इतना बड़ा ऐतिहासिक आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, अपनी ताकत दिखा सकते हैं, और सरकार को वे कानून वापस लेने पर मजबूर कर सकते हैं, तो क्या हम यह नहीं सोच सकते कि लेबर कोड और “ग्राम जी” के खिलाफ भी पूरे देश में ग्रामीण श्रमिक, असंगठित श्रमिक, महिला श्रमिक एकजुट नहीं हो सकते?

लेबर कोड में उनकी पूरी कोशिश यही दिखाने की है कि देखो, अब कवरेज बढ़ा दिया गया है, सबको शामिल कर लिया गया है. वे कहते हैं कि इसमें गिग वर्कर भी आ गए हैं. वे यह भी प्रचार करते हैं कि देखो, पहले 100 दिन थे, हमने उसे 125 दिन कर दिया. इस तरह वे उसी चीज को एक नए, बेहतर पैकेज की तरह पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन अगर हम इस सवाल को सही ढंग से उठाएं, सही तरीके से आगे ले जाएं, तो मेरे खयाल से आज पूरे देश में मेहनतकशों का एक बड़ा उभार खड़ा किया जा सकता है. एक व्यापक प्रतिरोध पैदा किया जा सकता है. उसके सारे मुद्दे हमारे सामने मौजूद हैं – और उन्हीं मुद्दों पर हमें लड़ना चाहिए. इसलिए इसमें हताश होने, मनोबल टूटने की कोई वजह नहीं है.

इसके उलट, कुछ लोग यह कहना शुरू कर चुके हैं कि अब बचा ही क्या है? अब तो थिरुवनंतपुरम भी शशि थरूर ने ले लिया. कल अगर केरल में चुनाव हुआ, तो जो आखिरी सरकार लेफ्ट के नाम पर बची हुई है, शायद वह भी नहीं रहेगी. तब लेफ्ट के पास कोई सरकार नहीं बचेगी. माले ने कभी 12 विधायक जीते थे, अब 12 से सीधे 2 पर आ गए – जैसे सांप-सीढ़ी के खेल में एक झटके में नीचे गिर जाना. इसी आधार पर सवाल उठाया जा रहा है – अब बचा क्या? कुछ लोग मानने लगे हैं कि भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के पास अब कुछ भी नहीं बचा है.

उधर आरएसएस का जोर-शोर से महिमामंडन किया जा रहा है – कि देखो, कितना बड़ा नेटवर्क बना लिया है, कितनी सेवा करते हैं, जनता से कितने जुड़े हुए हैं. इसमें थोड़ा-बहुत सच हो सकता है, लेकिन बड़ा हिस्सा सरासर झूठ है. आरएसएस में ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा बताया जा रहा है. सत्ता, नफरत और झूठ के सहारे उन्होंने एक बड़ा ढांचा खड़ा कर दिया है – और इस सच्चाई का सामना सीधे तौर पर करना आज बेहद जरूरी है.

हमें लगता है कि इस पूरे दौर में, सौ साल के कम्युनिस्ट आंदोलन ने जो कुछ भी रचा है, जो कुछ भी दिया है, उसका एक बेहद मजबूत और समृद्ध उत्तराधिकार आज हमारे पास मौजूद है. इस आंदोलन ने बहुत कुछ दिया है – आजादी के आंदोलन के दौरान भी, और आजादी के बाद भी, हर स्तर पर.

अगर आज हम देश में संघीय ढांचे की बात करते हैं, अगर हम यह कहते हैं कि आजादी सिर्फ अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि रियासतों का अंत करना, सामंती राजतंत्र को खत्म करना और पूरे देश में राष्ट्रीय एकता की नींव रखना भी उसका हिस्सा था – तो इस पूरी प्रक्रिया में तेलंगाना का संघर्ष सामने आता है. और तेलंगाना की बात करना, दरअसल कम्युनिस्ट आंदोलन की बात करना है.

लेकिन अगर कम्युनिस्ट खुद तेलंगाना की इस विरासत को ठीक तरह से सामने नहीं रखेंगे, उसे अपने राजनीतिक संदर्भ में नहीं समझाएंगे, तो इसमें कोई देर नहीं लगेगी कि उसी संघर्ष को एक हिंदू व्याख्या देकर, निजाम के खिलाफ और रजाकारों के खिलाफ हुए आंदोलन को ‘हिंदू जागरण’ के रूप में पेश कर दिया जाए. यह काम शुरू भी हो चुका है.

इसीलिए, जैसा उमा चक्रवर्ती जी ने जोर देकर कहा था, तेलंगाना के इतिहास को सिर्फ इतिहास के तौर पर जानना काफी नहीं है, बल्कि उसे आज के सवालों के साथ जोड़कर समझना जरूरी है. आज इतिहास का जिस पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है, जिस तरह उसे हथियार बनाकर समाज में जहर घोला जा रहा है और विध्वंस को जायज ठहराया जा रहा है – उसके सामने चुप रहना कोई विकल्प नहीं है.

वे ताकतें जो चारों ओर नफरत और तबाही फैलाना चाहती हैं, इतिहास को अपने हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. इसलिए हमें भी अपने इतिहास को हथियार की तरह इस्तेमाल करना होगा – सच के लिए, जनपक्षधर राजनीति के लिए, और फासीवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए.

सौ साल का इतिहास पूरा हो रहा है. आज हम एक मजबूत विरासत और उत्तराधिकार के साथ नई सदी की दहलीज पर खड़े हैं. और यह नई सदी हमारे सामने चीजों को पलट देने की चुनौती लेकर आई है. मैं सौ साल और इंतजार करने की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात इसी नई सदी की है, जो हमारे सामने अभी शुरू हुई है – और शायद यह हमारे लिए एक बड़ा अवसर भी है.

क्योंकि जो कुछ भी हमें मिला था, वह एक तरह से आजादी के साथ ही मिल गया था. हमें संविधान मिला, हमें वोट का अधिकार मिला. उसके लिए अलग से लंबी और कठिन लड़ाइयां नहीं लड़नी पड़ीं. जबकि दुनिया के कई हिस्सों में लोगों को इसके लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ा. अमेरिका में ही देख लीजिए – अश्वेत लोगों को वोट का अधिकार 1960 के दशक में जाकर मिला.

हमारे यहां तो यह सब शुरू से मौजूद था. और शायद इसी वजह से हम लंबे समय तक इसे स्वाभाविक मानकर चलते रहे. हमने मान लिया कि यह तो रहेगा ही. लेकिन आज की परिस्थितियां हमें हर रोज यह सिखा रही हैं कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं है और किसी भी अधिकार को सुरक्षित मान लेने की भूल नहीं की जा सकती. आज हमारे पास जो कुछ भी है – चाहे उसे बचाना हो या नए अधिकारों को पाना हो – उसके लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा. इसके अलावा किसी के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है.

एक ही रास्ता है – सीधे संघर्ष का रास्ता. और इसी वजह से हमें लगता है कि इस दौर में असली सवाल यह नहीं है कि उस लड़ाई का एकमात्र तरीका क्या होगा. इस तरह के चक्करों में पड़ने के बजाय हमें संघर्ष के सभी संभव रास्तों को अपनाना होगा, संविधान के भीतर मौजूद तमाम तरीकों और साधनों का पूरा इस्तेमाल करना होगा.

क्योंकि संविधान कोई स्थिर या जड़ दस्तावेज नहीं है. वह कोई मनुस्मृति नहीं है. संविधान देश की जरूरतों और जनता की आकांक्षाओं के मुताबिक बदलता है. अगर संविधान के नाम पर तमाम गलत काम किए जा सकते हैं, अगर संशोधनों के जरिये फासीवाद थोपा जा सकता है, अगर संविधान का सहारा लेकर आपातकाल तक लगाया गया, तो यह भी सच है कि उसी संविधान के रास्ते इस देश में क्रांति भी आ सकती है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है.

जब हमारे संविधान की प्रस्तावना साफ-साफ कहती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है, तो फिर हमारे सामने सवाल नहीं, बल्कि एक स्पष्ट कार्यभार है. हमें इसके लिए संघर्ष करना है. हमें संपूर्ण न्याय के लिए लड़ना है. हमें समानता के लिए लड़ना है – सिर्फ चुनावी समानता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में पूर्ण समानता के लिए.

इसलिए हमें लगता है कि अगर हम संविधान को गंभीरता से लें, उसकी आत्मा और उसके दृष्टिकोण को सचमुच अपनाएं, तो वह अपने आप में एक क्रांतिकारी दस्तावेज है – उससे कम नहीं. उसी आधार पर हम आगे बढ़ सकते हैं. नए दौर में हमारे सामने चुनौतियां बेहद गहरी और व्यापक हैं. और मैं पूरी तरह सहमत हूं कि आज के समय में यह लड़ाई अकेले नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर, व्यापक एकता के साथ ही आगे बढ़ाई जा सकती है.

कुछ लोग कहते हैं कि अलग-अलग पार्टियां क्यों हैं? एक ही पार्टी क्यों नहीं बन जाती? यह बात अपनी जगह सही है. जैसे ही परिस्थितियां बनेंगी, एक पार्टी भी बन सकती है. पहले भी एक पार्टी थी, तो फिर से एक पार्टी बन सकती है. लेकिन इसे कोई पूर्वशर्त नहीं बनाया जाना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक कुछ भी नहीं होगा. जरूरी यह है कि हम साथ काम करना शुरू करें, साथ चलना शुरू करें, साथ सोचना शुरू करें और साथ लड़ना शुरू करें. चलते-चलते ही यह सवाल भी हल हो जाएगा.

मैं कामरेड विनोद मिश्र की एक बात के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं. हम लोग अक्सर बहुत सोचते रहे हैं – चीन का रास्ता क्या था, रूस का रास्ता क्या था, भारत का रास्ता क्या होगा, और क्रांति का रास्ता आखिर कैसा होगा? इस पर कामरेड वीएम बार-बार कहते थे कि देखिए, रास्ता पहले से पता नहीं होता. कोई रास्ता पहले से तय नहीं रहता कि आपको सब कुछ मालूम है और बस उसी पर चलना है. ऐसा कभी नहीं होता.

अक्सर जहां भी कोई सफल क्रांति हुई है, वहां बाद में पीछे मुड़कर देखकर कहा गया – “अच्छा, तो हम इस रास्ते से आए थे.” रास्ता हमेशा पीछे से दिखता है. चलते समय यह साफ नहीं होता कि हम कहां तक जाएंगे, किस मोड़ से गुजरेंगे. इसीलिए रास्ते के नाम पर किसी तरह की अंध-भक्ति या कट्टरता की कोई जरूरत नहीं है. भारत का रास्ता वही है, जिस ऊबड़-खाबड़, कठिन और संघर्षों से भरे रास्ते पर हम आज चल रहे हैं. इसी चलते हुए रास्ते से रास्ता बन रहा है. रास्ता बनेगा. और हमें लगता है कि आज फासीवाद ने सबको इस रास्ते पर आने के लिए मजबूर कर दिया है.

हम लोग आज इस मजबूरी में हैं, और इसी मजबूरी को हमें अपनी मजबूती में बदलना है. हमारे साथी जिस भी तरीके से लड़ रहे हैं, वही आज का संघर्ष है. कितने ही साथी भीमा-कोरेगांव मामले में आज भी जेल में बंद हैं. जो बाहर आए भी हैं, उन पर इतनी पाबंदियां हैं कि वे खुलकर बोल तक नहीं सकते.

दिल्ली दंगों के मामलों में कितने लोगों पर यूएपीए थोप दिया गया है. अब तो हाल यह है कि दिल्ली में अगर कोई साफ हवा मांगता है, तो उस पर भी यूएपीए लगाने की तैयारी हो जाती है. बिहार में हमारे 14 साथियों को टाडा में सजा दी गई थी – एकदम फर्जी टाडा केस. 2003 में यह सजा सुनाई गई थी. आज उन 14 में से सात-आठ साथी वही सजा काटते-काटते जेल के भीतर ही इस दुनिया से चले गए. वे आज हमारे बीच नहीं हैं.

तो आज कितने ही साथी जेल में हैं. कोई लिखकर लड़ रहा है, कोई वीडियो बनाकर, कोई जेल के भीतर रहकर, कोई सड़कों पर लोगों को संगठित करके. जो जैसे लड़ सकता है, जिस हथियार से लड़ सकता है, उसी से लड़ रहा है.

लेकिन बात बस एक ही है – आज के दौर में खामोशी की कोई इजाजत नहीं है. आज के दौर में तटस्थ रहने की कोई इजाजत नहीं है. आज के दौर में निष्क्रिय रहने की भी कोई जगह नहीं है. यह दौर हम सब से यह मांग कर रहा है कि जितनी आपकी ऊर्जा है, जितनी आपकी क्षमता है, जितना आप सोच सकते हैं, जितना आप लड़ सकते हैं – सब कुछ झोंक दीजिए.

यही तो दौर है. ठीक वैसे ही, जैसे बहुत कम उम्र में भगत सिंह ने कितना कुछ दे दिया था. इसी तरह हमें याद रखना चाहिए कि काॅमरेड विनोद मिश्र की जिंदगी भी सिर्फ पचास साल की थी – 1947 में जन्म और 1998 में विदाई. लेकिन उन पचास सालों में उन्होंने संघर्ष, सपने और दिशा – सब कुछ छोड़ दिया, जिसे हम आज आगे बढ़ा रहे हैं.

आज जरूरत है कि हम सब पूरी ताकत के साथ इस लड़ाई में उतरें और इस देश को एक बेहतर, न्यायपूर्ण और समाजवादी लोकतंत्र के रास्ते पर वापस ले जाएं. इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई देशों में अलग-अलग दौर में लोगों ने फासीवाद का मुकाबला किया है और उसे शिकस्त दी है. हम यह भी जानते हैं कि फासीवाद अक्सर चुनाव के रास्ते सत्ता में आता है, लेकिन चुनाव के रास्ते सत्ता से जाता नहीं है. इसी वजह से आज इतना एसआईआर है, इतनी वोट-चोरी है, और लोकतंत्र को भीतर से खोखला करने की इतनी साजिशें चल रही हैं.

यदि हमें इस फासीवादी दौर को पीछे धकेलना है, तो एक बड़े जन-उभार की जरूरत होगी. केवल छोटे-छोटे और तथाकथित शांतिपूर्ण चुनावों के भरोसे यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती. बदलाव तब आएगा, जब एक व्यापक और संगठित जन-आंदोलन खड़ा होगा. उस जन-उभार के गर्भ से जो चुनाव निकलेगा, वह खुद में एक क्रांतिकारी चुनाव होगा.

जो लोग आज सत्ता में हैं, वे चुपके से नहीं आए हैं. उन्होंने खुले तौर पर आकर लोकतंत्र, संविधान और जनता पर हमला किया है. इसलिए उन्हें हटाने का रास्ता भी उतना ही खुला, साहसिक और जन-आधारित होगा.

अंत में, कम्युनिस्ट आंदोलन की इस सौ साल की यात्रा के तमाम शहीदों को, हमारे महान नेताओं को, और उन अनगिनत स्त्री-पुरुषों को जिन्होंने अपनी भागीदारी, संघर्ष और कुर्बानी से इस आंदोलन का इतिहास रचा है – उन सबको और इस महान जनता को लाल सलाम!


ठवग
अक्सर जहां भी कोई सफल क्रांति हुई है, वहां बाद में पीछे मुड़कर देखकर कहा गया – “अच्छा, तो हम इस रास्ते से आए थे.” रास्ता हमेशा पीछे से दिखता है. चलते समय यह साफ नहीं होता कि हम कहां तक जाएंगे, किस मोड़ से गुजरेंगे. इसीलिए रास्ते के नाम पर किसी तरह की अंध-भक्ति या कट्टरता की कोई जरूरत नहीं है. भारत का रास्ता वही है, जिस ऊबड़-खाबड़, कठिन और संघर्षों से भरे रास्ते पर हम आज चल रहे हैं. इसी चलते हुए रास्ते से रास्ता बन रहा है. रास्ता बनेगा. और हमें लगता है कि आज फासीवाद ने सबको इस रास्ते पर आने के लिए मजबूर कर दिया है.

03 January, 2026