-- थाॅमस पिकेटी
पारंपरिक तीन-स्तरीय समाजों में यह माना जाता था कि योद्धा वर्ग पर ब्राह्मणों यानी बुद्धिजीवियों की सलाह और मार्गदर्शन का असर रहेगा. शासक वर्ग की इन दो ताकतों – योद्धाओं और बुद्धिजीवियों – के बीच इस गठजोड़ को सत्ता में संतुलन लाने और समाज में सामंजस्य कायम करने वाला माना जाता था. ऐसा माना जाता था कि ‘स्वाभाविक अभिजात वर्ग’ मेहनतकश तबके की प्रभावी ढंग से देखरेख कर सकता है, उसे व्यवस्था और दिशा दे सकता है, और साथ ही अपने बीच प्रतिष्ठा और विशेषाधिकार भी बांट सकता है. योद्धा, पुरोहित, मेहनतकश: मानवविज्ञानी जाॅर्ज डुमेजिल का मानना था कि भारत से लेकर यूरोप तक की सभ्यताओं में यही एक साझा और मजबूत कड़ी रही है.
लेकिन हकीकत में यह माॅडल एक तयशुदा सामाजिक सच्चाई से ज्यादा एक मानकवादी विचार जैसा दिखता है, जिसे समाज को कुछ नियमों और ढांचों में बांधने के लिए गढ़ा गया था. आम तौर पर इसे पुरोहितों ने विकसित किया था – जैसे ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के हिंदू ग्रंथ मनुस्मृति में ब्राह्मणों ने, या लगभग 1000 ईस्वी के आसपास ईसाई यूरोप के बिशपों ने. इसका मुख्य उद्देश्य योद्धाओं को अनुशासन में रखना था, ताकि वे बुद्धिजीवियों के विशाल ज्ञान और लिखित संस्कृति का सम्मान करें, क्योंकि यह कोई अपने-आप होने वाली बात नहीं थी. फिर भी कई बार योद्धाओं ने खुद भी इस विचार को अपनाया, क्योंकि उन्होंने इसे समाज में व्यवस्था बनाए रखने और जिन लोगों पर वे शासन करते थे उनकी सहमति हासिल करने के एक उपयोगी जरिये के रूप में देखा.
ऐसा लगता है मानो इतिहास अभिजात वर्गों की इसी पुरानी और समस्याग्रस्त प्रतिद्वंद्विता को फिर दोहरा रहा है. एक तरफ व्यापारी और योद्धा जैसी प्रवृत्ति वाली राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी राजनीति है, जो खुद को बुद्धिजीवियों के विरोधी के रूप में पेश करना पसंद करती है. अमेरिका में इसकी नुमाइंदगी डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन करते हैं. दूसरी तरफ एक ‘ब्राह्मण’ वाम है – जो पढ़ा-लिखा, उदारवादी और अंतरराष्ट्रीय नजरिया रखने वाला है – और जिसकी नुमाइंदगी अटलांटिक के उस पार डेमोक्रेट करते हैं.
जैसे तीन-स्तरीय समाजों के दौर में था, वैसे ही व्यापारी दक्षिणपंथ और ‘ब्राह्मण’ वाम के बीच यह टकराव भी काफी हद तक बनावटी है. यह राष्ट्रवादी और उदारवादी दोनों तरह के अभिजात वर्गों को सत्ता में साझेदारी करने और मेहनतकश वर्ग पर अपना प्रभुत्व मजबूत करने में मदद करता है, जबकि किसी वास्तविक जनवादी विकल्प को उभरने से रोकता है.
दोनों पक्ष चाहे जो भी दावा करें, हकीकत यह है कि ट्रंपवाद भी सैकड़ों विशेषज्ञों और शिक्षाविदों पर निर्भर करता है, जो हेरिटेज फाउंडेशन जैसे ताकतवर थिंक टैंकों में संगठित हैं. वे जिस अति-पूंजीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं – सामाजिक गैर-बराबरी और ऊंच-नीच का अंध समर्थन, सत्ता और दौलत के चरम केंद्रीकरण का महिमामंडन, और अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली टैक्स नीतियां – वह उदारवादी अर्थशास्त्रियों की नीतियों से बहुत अलग नहीं है. उदारवादी व्यवस्था के तथाकथित सुनहरे दौर में भी, जब 2003 में जाॅर्ज डब्ल्यू. बुश ने इराक पर हमला किया था, तब सैन्य बर्बरता का स्तर आज दिखाई देने वाली स्थितियों से बहुत अलग नहीं था.
दिखावे की बयानबाजी और वैचारिक टकरावों से परे, अभिजात वर्गों के भीतर हमेशा अलग-अलग तरह की महत्वाकांक्षाएं, राजनीतिक शैलियां और पहचान मौजूद रही हैं; ठीक वैसे ही जैसे सीमित मताधिकार वाले राजतंत्रों के दौर में रूढ़िवादी और उदारवादी धाराएं साथ-साथ मौजूद थीं. लेकिन सच यह है कि सत्ता में बारी-बारी से बने रहने के लिए इन अलग-अलग अभिजात वर्गों का अपने मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने में पूरा फायदा रहा है, जबकि उनकी बुनियादी नीतियों में बहुत कम अंतर होता है.
हम यहां तक कैसे पहुंचे, और आगे का रास्ता क्या है? दुनिया पर हमेशा अभिजात वर्गों का शासन नहीं रहा. 19वीं सदी की सामाजिक क्रांतियों और 20वीं सदी में सार्वभौमिक मताधिकार के उभार के बाद मेहनतकश वर्ग और उनके ट्रेड यूनियनों तथा राजनीतिक संगठनों ने गहरे सामाजिक बदलाव हासिल किए. कई बार उन्होंने सीधे सत्ता हासिल करके ऐसा किया – जैसे 1932 से 1976 तक स्वीडन के सोशल डेमोक्रेट्स, 1945 में ब्रिटिश लेबर पार्टी, 1936 और 1945 में फ्रांस के सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट, या 1932 में रूजवेल्ट के डेमोक्रेट्स – तो कभी व्यापक स्तर पर श्रम और पूंजी के बीच के शक्ति-संतुलन को पलटकर भी ऐसा संभव बनाया.
वाम-दक्षिण चुनावी टकराव के चरम दौर में, जो लगभग 1910 से 1990 तक चला, राजनीतिक संघर्ष संपन्न वर्गों और मेहनतकश वर्गों के बीच केंद्रित था. संपन्न वर्गों की पहचान उनकी दौलत, आय या शिक्षा से होती थी, जबकि दूसरी तरफ मेहनतकश तबके थे. लगभग हर देश और हर चुनाव में पहला तबका बड़े पैमाने पर दक्षिणपंथ के साथ खड़ा होता था और दूसरा वामपंथ के साथ. अभिजात वर्ग राजनीतिक रूप से एकजुट थे, और वंचित तबके भी. गांवों के मेहनतकश वर्ग भी शहरों के मेहनतकशों की तरह ही मजबूती से वामपंथ के पक्ष में वोट देते थे. वर्गों पर आधारित इस विभाजन ने सामाजिक असमानता को कम करने के सवाल को राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बना दिया.
1980 और 1990 के दशक से लेकर 2010 और 2020 के दशकों के बीच वर्ग-आधारित यह व्यवस्था बिखरने लगी. सभी पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में, मतदान के रुझानों पर आय और शिक्षा का असर अलग-अलग दिशाओं में जाने लगा. आज के समय में, यदि शिक्षा का स्तर एक समान हो, तो अधिक आय वाले व्यक्ति के दक्षिणपंथ की ओर झुकने की संभावना ज्यादा होती है. लेकिन इसके उलट, यदि आय एक समान हो, तो उच्च शिक्षा स्तर वाले लोगों के वामपंथ की ओर जाने की संभावना बढ़ जाती है.
इस बदलाव के पीछे कई बुनियादी कारण हैं, जिनमें सबसे पहला है समाज की संरचना का लगातार जटिल होना. उच्च शिक्षा तक लोगों की पहुंच तो बढ़ी है, लेकिन अब एक जैसी डिग्री होने के बावजूद लोगों की आय में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है – चाहे यह उनकी अपनी पसंद की वजह से हो या परिस्थितियों के कारण. दूसरा बड़ा कारण क्षेत्रीय असमानताओं का तेजी से उभरना है, क्योंकि छोटे कस्बों और शहरों में बड़े महानगरों की तुलना में विश्वविद्यालयों और अस्पतालों तक कम पहुंच होती है और वे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के असर के प्रति ज्यादा असुरक्षित भी होते हैं.
लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह सोशल डेमोक्रेटिक और उनसे मिलती-जुलती पार्टियों द्वारा अपनाई गई राजनीतिक राह है, जिन्होंने धीरे-धीरे संपत्ति और संसाधनों के पुनर्वितरण की अपनी महत्वाकांक्षा छोड़ दी. नतीजतन, सबसे वंचित तबकों के मतदाताओं का एक बढ़ता हिस्सा, खासकर छोटे शहरों और कस्बों के कम शिक्षित लोग, राष्ट्रवादी राजनीति और मतदान से दूरी की ओर मुड़ गया. मौजूदा संकट और अभिजात वर्गों के इस बनावटी टकराव से बाहर निकलने के लिए वामपंथ को अतीत की समानतावादी आकांक्षा से फिर जुड़ना होगा और अलग-अलग क्षेत्रों के मेहनतकश लोगों को एकजुट करना होगा, साथ ही इस हकीकत को भी स्वीकार करना होगा कि अभिजात वर्ग उसके खिलाफ हाथ मिला लेंगे. वास्तविक राजनीतिक विकल्पों की संभावना को फिर से जीवित करने और लोकतंत्र के लगातार कमजोर पड़ने का मुकाबला करने का यही एक रास्ता है.