वर्ष 35 / अंक - 45 / अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का जंग के खिलाफ जनादेश

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का जंग के खिलाफ जनादेश

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का जंग के खिलाफ जनादेश

- मनमोहन

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के नतीजे एक बड़े राजनीतिक भूचाल की तरह सामने आए हैं. इनका इजरायल की राजनीति और अमेरिका के साथ उसके रिश्तों पर दूरगामी असर पड़ना तय है. इन नतीजों को गंभीरता से समझने की जरूरत है.

3 नवंबर को डेमोक्रेटिक पार्टी ने ऐसी जीत हासिल की, जिसकी सबसे आशावादी चुनावी भविष्यवाणियों में भी कल्पना नहीं की गई थी. पार्टी ने कांग्रेस में करीब 250 सीटों के साथ पिछले दो दशकों का अपना सबसे बड़ा बहुमत हासिल किया. सीनेट में भी उसे टेक्सास, कंसास और दक्षिण कैरोलाइना जैसे राज्यों में अप्रत्याशित जीत मिली, जहां दशकों से उसकी सफलता की कोई संभावना नहीं मानी जाती थी. डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को ऐतिहासिक शिकस्त का सामना करना पड़ा है. अब राष्ट्रपति पद के शेष दो वर्षों में डेमोक्रेटिक नियंत्रण वाली कांग्रेस की समितियां ट्रंप, उनके परिवार, सलाहकारों और प्रशासनिक सहयोगियों के खिलाफ लगातार जांच-पड़ताल करेंगी.

नौ महीने पहले इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया ने डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग में यह बात बैठाई कि ईरान में सत्ता परिवर्तन मुमकिन है. आज सत्ता परिवर्तन हुआ है, पर तेहरान में नहीं. वह टेक्सास, मिशिगन, कंसास, जाॅर्जिया, फ्लोरिडा और अमेरिकी कांग्रेस में हुआ है.

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक यह 1974 के बाद किसी मौजूदा राष्ट्रपति की पार्टी की सबसे तीखी हार है. तब रिचर्ड निक्सन के इस्तीफे के बाद चुनाव हुए थे. डेमोक्रेट्स ने हाउस के राष्ट्रीय वोट में लगभग 13 अंकों की बढ़त ली और सीनेट में कम से कम सात सीटें जोड़ीं. इनमें से 6 उन राज्यों में हैं जिन्हें ट्रंप तीन बार जीत चुके थे. बदलाव की लहर हर इलाके और हर तबके में दिखी. यह सबसे तेज उन्हीं के बीच थी जिन्हें ट्रंप अपना आधार बताते थे: ग्रामीण काउंटियां, नौजवान और बिना काॅलेज डिग्री वाले मजदूर.

इस नतीजे पर आम राय यह है कि अर्थव्यवस्था और रोजी-रोटी का संकट सबसे बड़ा कारण रहा. ईरान की जंग दूसरे नंबर पर रही, जिसने रिपब्लिकनों की मुश्किलें बढ़ाईं और आम अमेरिकी की जेब पर सीधी चोट की. गाजा जनसंहार और फिलिस्तीन का सवाल तीसरे नंबर पर आता है. फिर भी गाजा जनसंहार ने नैतिक और राजनीतिक तौर पर वह दरार पैदा की, जिसके बिना बाकी दो मुद्दे इतने विस्फोटक नहीं बन पाते. ट्रंप खुद भी इस नतीजे की एक बड़ी वजह थे. चुनाव से पहले के सर्वेक्षण बता रहे थे कि वे अपनी पार्टी के लिए बोझ बन चुके हैं. बहुत से वोट सीधे उन्हीं के नाम भेजा गया संदेश थे.

दशकों तक अमेरिकी जनता को बताया गया कि पश्चिम एशिया में हर नया सैन्य हस्तक्षेप उन्हें ज्यादा सुरक्षित बनाएगा. हर बार रणनीतिक जरूरत, सीमित लक्ष्य और अंत में स्थिरता का भरोसा दिया गया. जनता ने हर बार वही चक्र देखा: सैन्य हमला, आम लोगों की तबाही, इलाके की अस्थिरता, अरबों डाॅलर का सार्वजनिक खर्च और यह वादा कि अगली बार की ताकत आखिरकार सुरक्षा ले आएगी.

गाजा जनसंहार रियल टाइम में दर्ज होता रहा. युद्ध अपराधों की तस्वीरें अक्सर उन्हीं लोगों ने बनाईं जो उन्हें अंजाम दे रहे थे. ये तस्वीरें उस सरकारी रट को झुठलाती थीं कि इजरायल ‘अपनी रक्षा’ कर रहा है. 

लोगों ने अस्पताल मलबे में बदलते देखे, बच्चों को मलबे से निकाला जाता देखा, पत्रकारों की हत्याएं देखीं और परिवारों को बार-बार उजड़ते देखा. इसी बीच उनकी अपनी सरकार हथियार भेजती रही और दावा करती रही कि वह शांति के लिए दिन-रात लगी है.

जो बाइडन के दौर में डेमोक्रेटिक सरकार ने इजरायली सैन्य अभियान को खड़ा रखा. जनसंहार के सबसे खूनी शुरुआती दिनों की देखरेख, समर्थन और हथियारों की आपूर्ति उन्हीं के हाथों हुई. ट्रंप के दौर में रिपब्लिकन सरकार ने सैन्य तनाव को और बढ़ाया और इलाके की त्रासदी को गहरा किया. बहुतों को यही लगा: कचरा वही है, ढेर अलग है.

इसी वजह से डेमोक्रेटिक नेतृत्व जनता के आक्रोश का मासूम लाभार्थी होने का दावा नहीं कर सकता. उस आक्रोश को पैदा करने में उसका अपना हाथ रहा है. और यह बदलाव चुनाव की रात से बहुत पहले दिखने लगा था. अगस्त में अल जजीरा द्वारा रिपोर्ट किए गए सर्वेक्षण में शुरुआती प्राइमरी वाले राज्यों के डेमोक्रेटिक मतदाताओं में इजरायल को सैन्य मदद जारी रखने का भारी विरोध दिखा. पार्टी के नेतृत्व और उसके अपने वोटरों के बीच की दूरी अब अनदेखी नहीं की जा सकती.

अमेरिकी इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी, यानी ऐपैक, एक जमाने में ऐसी ताकत थी जिससे टकराने की हिम्मत कोई महत्वाकांक्षी नेता नहीं करता था. गाजा ने उसे ऐसे जहर में बदल दिया है जिससे नजदीकी अब नुकसान की गारंटी है. इस बार उसके असीम पैसे के बावजूद उसके विरोधी उम्मीदवार जीते. ऐपैक और उसके जैसे इजरायल-समर्थक लाॅबी समूहों से जुड़ाव आज एक बोझ है.

दशकों तक अमेरिकी नेताओं को इजरायल पर एक तंग शब्दावली में बोलना सिखाया गया. इजरायल की ‘सुरक्षा’ जायज थी और फिलिस्तीनियों की आजादी ‘विवादित’. गाजा के जनसंहार ने इस ढांचे का बड़ा हिस्सा तोड़ दिया है. अब इजरायली सैन्य विस्तारवादी नीति का बिना शर्त समर्थन राजनीतिक कामयाबी की अनिवार्य शर्त नहीं रहा, जैसा वाॅशिंगटन लंबे समय तक मानता आया था. मेन के सीनेट चुनाव में ट्राॅय जैक्सन ने इजरायल के आचरण और बिना शर्त सैन्य मदद की खुली आलोचना की और दिग्गज रिपब्लिकन सूजन काॅलिन्स को हरा दिया. टेक्सास में जेम्स टैलारिको ने एक ईसाई और पूर्व शिक्षक की हैसियत से गाजा के कत्लेआम का विरोध किया और वह सीनेट सीट जीती जो डेमोक्रेट्स तीन दशक से ज्यादा समय से नहीं जीत पाए थे.

यहां एक बात साफ कह देनी जरूरी है. इनमें से कोई भी उम्मीदवार इजरायल के अपराधों को उतनी खुलकर कहने तक नहीं पहुंचा जितना उसे पहुंचना चाहिए था. पार्टी की कतारों में बैठे उदारवादी जायनवादियों को खुश रखने की मजबूरी साफ दिखती है. ये उम्मीदवार वैचारिक तौर पर एक जैसे नहीं हैं, और हर विजेता ने ऐपैक के खिलाफ प्रचार भी नहीं किया. फिर भी वे उस सीमा से आगे गए जिसे अब तक स्वीकार्य माना जाता था. जिन उम्मीदवारों से कहा गया था कि पुरानी विदेश नीति के आगे झुके बिना वे जीत नहीं सकते, उन्होंने उलटा साबित किया. जिन समुदायों को राजनीतिक तौर पर बेमानी मान लिया गया था, उन्होंने अपनी चुनावी ताकत दिखाई.

इजरायल लाॅबी की समस्या कुछ चुनावी हारों से कहीं बड़ी है. उसका ब्रांड अब उस विदेश नीति से जुड़ गया है जिसका बचाव करने को बहुत से अमेरिकी तैयार नहीं. इसका मतलब यह नहीं कि उसका पैसा, पहुंच या असर खत्म हो गया. मतलब यह है कि ये साधन अब राजनीतिक आज्ञाकारिता की गारंटी नहीं रहे. गाजा ने नैतिक दरार डाली और ईरान की जंग ने राजनीतिक हिसाब-किताब को और चौड़ा कर दिया.

इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण मिशिगन है. अब्दुल अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुसलमान होंगे. उन्होंने रिपब्लिकन माइक राॅजर्स को हराया, और वह भी हाल की याद में सबसे आक्रामक अभियानों में से एक झेलने के बाद. ट्रंप ने उन्हें ‘सौ फीसदी मुस्लिम ब्रदरहुड वाला’ कहा और अमेरिकी मीडिया का बड़ा हिस्सा इस झूठे दावे को ज्यों का त्यों छापता रहा. एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक ऐपैक ने डेमोक्रेटिक प्राइमरी में उन्हें हराने के लिए लगभग तीन करोड़ डाॅलर झोंके. अल-सैयद की जीत इस बात का सबूत है कि गाजा ने अमेरिकी राजनीति में किस तरह बदलाव लाया है.

ईरान की जंग ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की निर्णायक भूल है, और नेतन्याहू के आखिरी कार्यकाल की भी. जिस राष्ट्रपति को ईरान के बारे में कुछ पता ही नहीं था, उसके लिए यह सिर्फ एक जुआ नहीं था जो उलटा पड़ा. यह पूरी तरह नेतन्याहू का विचार था, और ‘अमेरिका फर्स्ट’ आंदोलन के नेता के लिए यह नाकामी और भी भारी है. ईरान ठीक वही ‘विदेशी जंग’ है जिसके खिलाफ ट्रंप ने खुद चुनाव लड़ा था. 28 फरवरी को इजरायल ने जिस जंग में अमेरिका को घसीट लिया, उसने ‘अमेरिका फर्स्ट’ वालों को सबसे ज्यादा ठगा हुआ महसूस कराया.

लेकिन ईरान पर जंग से खाड़ी के दोनों किनारों पर और उससे परे जो आर्थिक तबाही फैली, गैस स्टेशनों पर रिकाॅर्ड कीमतें जिसकी सबसे रोजाना झलक थीं, वह अमेरिकी राजनीति के भूकंप की अकेली वजह नहीं है. जो वोटर महंगाई और अनिश्चितता से जूझ रहे थे, उनसे एक और विदेशी जंग का खर्च उठाने को कहा जा रहा था. ‘अमेरिका को पहले रखने’ का वादा करने वाली सरकार खुद दूर की जंग में डूबी थी. रिपब्लिकनों का सबसे सटीक आकलन इजरायल के ही अखबार से मिला: जेरूसलम पोस्ट के विश्लेषण के मुताबिक चुनाव अभियान का सबसे साफ सबक ईरान युद्ध की वह राजनीतिक कीमत है जो रिपब्लिकन पार्टी ने चुकाई.

यह नतीजा अमेरिकी जनता की उस मुहिम का हिस्सा भी है जो पिछले एक साल की बड़ी लामबंदियों में दिखी. पिछले साल ‘नो किंग्स’ के प्रदर्शनों में लाखों लोग निकले और 2026 की शुरुआत में मिनियापोलिस समेत कई शहरों में आईसीई द्वारा की गई हत्याओं के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए. चुनाव उसी विरोध का अगला पड़ाव है, भले वह दो पार्टियों वाले उस ढांचे के भीतर हो जिसमें काॅरपोरेट पूंजी के अलावा कोई विकल्प नहीं. इस सबके साथ फ्रांस, इटली, यूनान, बेल्जियम, स्पेन और जर्मनी में नौजवानों और मजदूरों के प्रदर्शनों की लहर चल रही है. ट्रंप की हार ब्राजील में बोल्सोनारो की हार के सिर्फ दो हफ्ते बाद आई है.

अब सवाल यह है कि क्या डेमोक्रेटिक पार्टी इस बदलाव को पहचानेगी, या जंग-विरोधी आंदोलन की ऊर्जा को अपने भीतर समेटकर उन्हीं नीतियों को बचाए रखेगी जिन्होंने इस आंदोलन को जन्म दिया. पार्टी के इतिहास को देखते हुए ज्यादा उम्मीद पालने की वजह नहीं है. सत्ता-प्रतिष्ठान का पुराना तरीका यही है. वह जनता की बगावत की भाषा अपना लेता है, उसकी जीत का जश्न मनाता है और फिर चुपचाप वही नीतियां बहाल कर देता है जिनसे बगावत हुई थी.

गौर करें कि ट्रंप के दोनों कार्यकालों में डेमोक्रेट्स विरोधी कम और सहयोगी ज्यादा रहे. वही ‘साझा जमीन’ और ‘राष्ट्रपति के साथ काम करने’ की मुद्रा तब भी रही जब ट्रंप ने अमेरिकी शहरों में फौज भेजी, प्रवासियों के लिए हिरासत शिविर बनाए और ईरान पर जंग छेड़ी.

इसलिए एक बात बिना लाग-लपेट के कहनी होगी. ट्रंप के आपराधिक सत्ता-दुरुपयोग पर, देश के भीतर और बाहर, रोक लगाना जरूरी है. पर यह भ्रम न पालें कि डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने से कोई बड़ा बदलाव होगा. दोनों पार्टियां उन्हीं चंदादाताओं, काॅरपोरेशनों, लाॅबियों और धन्नासेठों की हैं. वे जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. मध्यावधि का नतीजा जो भी हो, घाटा आम जनता का है, और जीत काॅरपोरेशनों, बैंकरों, अरबपतियों, इजरायली सत्ता की लाॅबियों, जंग के सौदागरों और टेक-सम्राटों की है. जब तक यह व्यवस्था है, पतन का यह सिलसिला चलता रहेगा. कोई चुनाव अकेले इसे नहीं बदलेगा.

इस जनादेश के तीन संदेश साफ हैं. रिपब्लिकनों के लिए: ट्रंप का समर्थन जीत की गारंटी नहीं, खासकर जब आर्थिक और सैन्य बोझ काफी बढ़ रहे हों. डेमोक्रेट्स के लिए: जीत ने उन्हें ताकत और मौका दिया है, पर साथ ही फिलिस्तीन समेत नतीजे देने का दबाव भी. और जंग-विरोधी आंदोलन के लिए: अब उसे उम्मीदवारों को परखना होगा, उनके साथ खड़ा होना होगा जो प्रतिबद्धताएं निभाएं, और उनसे भिड़ना होगा जो मुकर जाएं, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों.

इस नतीजे का भू-राजनीतिक असर अमेरिका की सरहदों तक सीमित नहीं रहेगा. इजरायल के लिए अमेरिकी समर्थन की ‘बिना शर्त’ वाली छत दरकी है. यह अभी ढही नहीं है, पर वाॅशिंगटन में अब यह सवाल उठाना राजनीतिक आत्महत्या नहीं रहा. खाड़ी और पश्चिम एशिया में अमेरिकी जंगखोरी की साख गिरी है. यूरोप से लैटिन अमेरिका तक चल रही जनता की लामबंदियों को यह जीत हौसला देगी. भारत को भी ट्रेड डील और टैरिफ में कुछ रियायतें मिल सकती हैं. पर खतरनाक बात यह है कि ट्रंप अब भी गद्दी पर हैं और अपने फासीवादी एजेंडे पर कायम हैं. न्यूयाॅर्क टाइम्स के डेविड सैंगर ने लिखा है कि अपनी हैसियत सिद्ध करने के लिए ‘लंगड़ी बत्तख’ बने राष्ट्रपति अक्सर सैन्य विकल्पों की तरफ हाथ बढ़ाते हैं. ईरान पर जंग और भड़कने की आशंका इसी वजह से जायज है.

पर अमेरिकी जनता ने दिखा दिया है कि बेहिसाब दौलत और संस्थागत दबदबे वाली ताकत को भी चुनौती दी जा सकती है. वोटरों ने वह रास्ता खोल दिया है जिसे सत्ता-प्रतिष्ठान ने दशकों तक बंद रखने की कोशिश की. अब जरूरत एक ऐसे जंग-विरोधी आंदोलन की है जो इतना मजबूत हो कि यह रास्ता फिर कभी बंद न हो सके. गाजा आज भी लहूलुहान है और फिलिस्तीन की आजादी तक यह लड़ाई खत्म नहीं होती.


07 November, 2026