-- अरिंदम सेन
आज भारत में कोई भी राजनीतिक बहस उस विनाशकारी ‘एसआइआर’ का जिक्र किए बिना शुरू ही नहीं हो सकती. इसके व्यवहारिक-राजनीतिक पहलुओं पर हम पहले चर्चा कर चुके हैं. यहां हम इसे एक बड़े ऐतिहासिक नजरिया से देख रहे हैं, ताकि इसके भीतर छुपी फासिस्ट सोच को साफ-साफ समझा जा सके.
I
एसआइआर : सिर्फ चुनाव चोरी का मामला नहीं
देशव्यापी एसआइआर, जो कुख्यात एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) की तरफ बढ़ने का पहला कदम है और ईवीएम तथा मतदाता सूची में हेराफेरी जैसी संबद्ध कार्रवाइयों से सीधे तौर पर जुड़ा है, दरअसल नागरिकों के सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार पर अब तक का सबसे खतरनाक हमला है. इसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का अधिकार, मतदान का अधिकार, राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी का अधिकार, और सरकारों को चुनने और हटाने का अधिकार शामिल है. यह पूरी तरह सोची-समझी साजिश है, जिसे इस तरह रचा गया है कि संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद ही ध्वस्त कर दी जाए, भारतीय संविधान की मूल भावना को ही कुचल दिया जाए. इस भयावह खेल में भगवाधारी फासिस्ट अपने उन आकाओं के रास्ते पर चल रहे हैं जिन्होंने 1930 के दशक में जर्मनी पर राज किया था.
नाजी नागरिकता कानूनों का हिंदुस्तानी संस्करण
हिटलर 1933 में चांसलर बना और उसने अपने देश का ऐसा पुनर्निर्माण शुरू किया जिसे आरएसएस ‘आर्य राष्ट्र कहता था. 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों [1] ने कानूनी रूप से लोगों को ‘आर्य’ और ‘यहूदी’ में विभाजित कर दिया. नागरिकों से ‘आर्य वंश’ साबित करने के लिए दस्तावेज मांगे गए, जैसे पुरखों का पासपोर्ट (आहनेनपास) और आर्य वंश का सबूत (आरियनाखवाइस), जिनमें दादा-दादी या परदादा-परदादी तक का खानदान दिखाना पड़ता था. 1938-39 तक, जनगणना और पंजीकरण अभियानों के जरिए यहूदियों को खास तरीके से चिन्हित किया गया. उनके पहचान पत्रों पर ‘श्र’ की मुहर लगाई गई और जबरन नाम “इस्राएल” या “सारा” बदलवाकर उनकी पहचान को सार्वजनिक बना दिया गया. जो लोग आर्य होने का सबूत नहीं दे पाए, उन्हें नौकरियों, विश्वविद्यालयों और पेशों से निकाल दिया गया. आखिरकार, इसी जानकारी के आधार पर उन लोगों की सूचियां बनाई गईं जिन्हें यातना शिविरों और गैस चैंबरों में डाला जाना था. यानी जो कार्यक्रम शुरू में एक साधारण-सा “जनसंख्या पंजीकरण” बताया जा रहा था, वही जल्दी ही नस्लीय अलगाव, देश निकाला, जुल्म और जनसंहार की मशीनरी में बदल गया.
हमारे देश में भी यही प्रक्रिया धीरे-धीरे, रुक-रुक कर, लेकिन लगातार आगे बढ़ रही है. याद कीजिए, एनडीए सरकार ने 2003 में सत्ता में आते ही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने का आदेश दिया था. 2014 में फिर मौका मिलते ही इस काम को दोबारा शुरू किया गया और एनपीआर को एनआरसी की तरफ पहला कदम बताया गया. इसके बाद तीन तरह की कार्रवाइयों का एक पूरा पैकेज पेश किया गया, जिसकी “कालक्रम” को कभी भी बदल देने लायक रखा गया, और आज उसी का नतीजा है यह देशव्यापी भयावह एसआइआर. उन्हें यह सब इस तरह करना पड़ रहा है क्योंकि संघी मशीनरी के पास तानाशाही की वह पूरी ताकत नहीं है जो फ्रयूहरर के पास थी, और उन्हें कम-से-कम लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक दिखावा तो बनाए रखना ही पड़ता है. इस कमी को दूर करने के लिए वे कई तरीकों से जुटे हुए हैं, तकनीकी भी और राजनीतिक तौर पर भी. उन्हें आधुनिक कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी, एआई समेत, सब उपलब्ध है, जिसके जरिए वे मतदाता सूचियों, ईवीएम मशीनों, वोट-गिनती और चुनावी प्रक्रिया के हर हिस्से को अपनी मर्जी के मुताबिक तैयार और संचालित कर सकें. उनकी राजनीतिक पूंजी में एक आज्ञाकारी चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, गोदी मीडिया, उनका विशाल “आईटी सेल” नेटवर्क, और स्थानीय अफवाह फैलाने वाली मशीनरी शामिल है. ये तो बस कुछ उदाहरण हैं.
नाजी और संघी नागरिकता कानूनों की समानता बिल्कुल साफ दिखती है. यह बात कई और मामलों में भी लागू होती है. लेकिन यह कहना गलत होगा कि ये सिर्फ नकलची हैं. इनके पीछे प्राचीन भारत की धार्मिक-दर्शन परंपराओं की गहरी जड़ें हैं, जिन्हें जब आधुनिक अंदाज में नई पैकेजिंग के साथ परोसा जाता है, तो बहुसंख्यक समुदाय के बड़े हिस्से, पढ़े-लिखे तबके और पेशेवरों को भी भाने लगती हैं. साथ ही, आरएसएस दरअसल उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के प्रगतिशील सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों [2] के खिलाफ एक रूढ़िवादी, कट्टर प्रतिक्रियावादी धारा के रूप में पैदा हुआ था. उसने हमेशा प्रभुत्वशाली जातियों और पूंजीपति वर्ग के हितों की ही सेवा की. इन वैचारिक जड़ों और शासक वर्गों तथा प्रभावशाली जातियों के समर्थन के बिना, आरएसएस इतने उतार-चढ़ाव और असफलताओं के बावजूद कभी इतनी बड़ी ताकत नहीं बन सकता था. यह बात और साफ हो जाएगी अगर हम देखें कि यह तथाकथित “एनजीओ” दरअसल कैसे विकसित हुआ.
II
आरएसएस से पहले का इतिहास
आरएसएस के पैदा होने से बहुत पहले ही भारत का राष्ट्रवाद गहरे तौर पर हिंदू धार्मिक भावनाओं में डूबा हुआ था, भले ही उसके भीतर एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष धारा भी मौजूद थी. उन्नीसवीं सदी में ऊंची जातियों के हिंदू अभिजात तबकों ने पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों की रक्षा करने और ईसाई मिशनरियों, मुस्लिम सुधारकों, और यहां तक कि ब्रह्मो समाज या आर्य समाज जैसे हिंदू सुधार आंदोलनों का मुकाबला करने के लिए “धर्म सभा” जैसी संस्थाएं बनानी शुरू कीं. पहली धर्म सभा 1830 में कलकत्ता में राधाकांत देब ने स्थापित की थी, जो एक रूढ़िवादी बंगाली जमींदार थे.
पंजाब हिंदू सभा से हिंदू महासभा तक
सबसे पहला खुलेआम राजनीतिक हिंदू संगठन पंजाब हिंदू सभा था, जो 1909 में कराची में बना. इसके मुख्य नेता लाल चंद का कहना था कि हिंदुओं को इतिहास में इसलिए नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि उनमें एकजुट होकर अपनी सामूहिक ताकत जताने की आदत नहीं रही, और “राष्ट्रीय एकता” के नाम पर कांग्रेस के “आत्म-त्याग” के आदर्श ने हिंदुओं को मुसलमानों की मांगों के अधीन कर दिया. अपनी 1917 की किताब Self-Abnegation in Politics’ (राजनीति में आत्म-त्याग) में लाल चंद लिखते हैंः
“राजनीति में आत्म-रक्षा से ऊंची कोई नैतिकता नहीं होती. जो नस्ल अस्तित्व की लड़ाई में ‘आत्म-त्याग’ करती है, वह अपनी ही ‘नेकी’ से मिट जाती है.”
और आगे लिखते हैं :
“कांग्रेस का ‘आत्म-त्याग’ का सिद्धांत एक पाखंड है. यह हिंदुओं को निहत्था करता है, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वियों को ताकतवर बनाता है.”
सावरकर ने इसी स्पष्ट मुस्लिम-विरोधी राष्ट्रवाद को तराशकर एक नए, ज्यादा विकसित दर्जे तक पहुंचाया. 1923 में अंडमान की सेल्युलर जेल में कैद रहते हुए उन्होंने Essentials of Hindutva (हिंदी में ‘हिन्दुत्व’) लिखी और बाद में कई भाषणों और लेखों के जरिये इसके विचारों को फैलाया. संक्षेप में, उनका कहना था कि जो लोग सिंध घाटी से लेकर समुद्र तट तक भारत को अपनी पितृभूमि और पवित्र भूमि दोनों मानते हैं, और गर्व से इसे अपनी मातृभूमि के रूप में इसकी आराधना करते हैं, वही असल मायनों में Essentials of Hindutva “हिंदू” हैं और एक अविभाज्य राष्ट्र बनाते हैं. मुसलमान और ईसाई, जिनकी पवित्र भूमि मक्का या फिलिस्तीन है, भले यहां कई पुश्तों से रहते हों, मगर इस मुल्क को पितृभूमि नहीं मानते. इसलिए, सावरकर के मुताबिक, वे दरअसल दूसरी कौमों से ताल्लुक रखते हैं.
यह सोच “हिंदू धर्म” को दर्जनों संप्रदायों-मतों की विविधता से ऊपर उठाकर एक एकजुट समुदाय बना देती थी – एक ऐसा समुदाय जिसे दिवाली जैसे त्योहार, यात्राएं और राम का व्यक्तित्व जोड़ता था, जिन्हें देश के लगभग हर हिंदू पंथ में सम्मान और प्रेम से पूजा जाता है. इसी नए फॉर्मूले पर सावरकर ने 1915 में हिंदू महासभा की बुनियाद रखी.
साम्प्रदायिक दंगों की आग में जन्मा संगठन
सावरकर से प्रेरित होकर एक दूसरे महाराष्ट्रीय ब्राह्मण, डॉ. केबी हेडगेवार ने 1925 में नागपुर में आरएसएस की स्थापना की. उन्होंने जान-बूझकर विजयादशमी का दिन चुना, यानी वह दिन जो राम की रावण पर जीत की कथा से जुड़ा है. संगठन का झंडा रामचंद्र का भगवा ध्वज रखा गया, जिसे शिवाजी द्वारा इस्तेमाल किया गया माना जाता है.
आरएसएस के जन्म की यह सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि बेहद अहम है. एक तरफ गांधी की अगुवाई में असहयोग आंदोलन, और दूसरी तरफ शौकत अली, मोहम्मद अली, अबुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खान और हसरत मोहानी की अगुवाई में खिलाफत आंदोलन – यह दोनों धाराएं 1920 के आसपास अंग्रेजी राज पर जोरदार दबाव बना रही थीं. हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल सामने थी, जहां दोनों मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे.
लेकिन 1922 की शुरुआत में चौरी-चौरा की घटना के बाद जब गांधी ने अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो यह कौमी एकता टूट गई और खुली सांप्रदायिक राजनीति सर उठा कर सामने आ गई. हेडगेवार ने इस माहौल को मुस्लिम-विरोधी नफरत भरी भाषा में यूं बयान किया :
“महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के नतीजे में....जो सामाजिक बुराइयां पैदा हुई थीं, वे खतरनाक रूप से सिर उठाने लगी थीं. जैसे-जैसे राष्ट्रीय संघर्ष की लहर नीचे आई, वैसे-वैसे आपसी दुश्मनी और ईर्ष्या सतह पर आने लगी.... समुदायों के बीच टकराव शुरू हो गए.... ब्राह्मण-गैर-ब्राह्मण संघर्ष खुलकर सामने था.... और असहयोग के दूध पर पले ये ‘यवन-सांप’ यानी मुसलमान अपनी जहरीली फुफकार से पूरे देश में दंगे भड़का रहे थे.”
(स्रोतः श्री गुरुजी समग्र प्रशिक्षण, खंड 4, सुरूचि पब्लिकेशन, नई दिल्ली)
आरएसएस इसी माहौल का फायदा उठाकर पैदा हुआ और बढ़ता गया. 1927 में नागपुर के एक दंगे के दौरान आरएसएस ने खुले तौर पर हिस्सा लिया, और उसके बाद इसकी बढ़ोतरी तेज हो गई. इसी तर्ज पर यह धीरे-धीरे दूसरे इलाकों में भी फैलता चला गया.
यह कोई संयोग नहीं था कि महाराष्ट्र उग्र हिंदुत्व की पैदाइश और उसका गढ़ बना. जैसा कि आनंद तेलतुंबड़े बताते हैं [3], 1870 के दशक में ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज ने जो ब्राह्मण-विरोधी चिंगारी भड़काई, उसने शिक्षा, तर्कवाद और सामाजिक बराबरी के उनके कार्यक्रम को मजबूती से आगे बढ़ाया. 1911 की जनगणना ने जब हिंदू आबादी को तीन हिस्सों में बांट दिया – हिंदू, दबी-कुचली जातियां (डिप्रेस्ड क्लासेज), और प्रकृतिपूजक हिंदू (आदिवासी) – तो इसने पहली बार तथाकथित हिंदू समाज के भीतर मौजूद विभाजनों को संस्थागत रूप दे दिया. यह घटनाक्रम ब्राह्मणवादी नेतृत्व को भीतर तक विचलित कर देने वाला था, जो यह मानकर चल रहा था कि अंग्रेजों के जाते ही सत्ता की बागडोर स्वाभाविक रूप से उनके हाथ में आ जाएगी. लेकिन 1920 के दशक तक आते-आते नागपुर के ऊंची जाति वाले अभिजात तबके में बेचैनी खुलकर दिखने लगी थी. शिक्षा, धार्मिक वर्चस्व और राष्ट्रवादी राजनीति पर उनका ऐतिहासिक एकाधिकार पर एक साथ नीचे से दलित-शूद्र आंदोलनों और बाहर से मुसलमानों की राजनीतिक दावेदारी से चुनौती मिल रही थी.
ऊंची जाति के हिंदुओं ने एक ‘अविभाज्य हिंदू समाज’, जिसमें दलित भी शामिल हों – की अवधारणा के इर्द-गिर्द संगठित होकर जवाब दिया. तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने इस परियोजना को अंग्रेज-विरोधी आंदोलन से जोड़ा, लेकिन प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी धड़ों ने मुसलमानों को “राष्ट्रीय दुश्मन” घोषित कर दिया और सबसे आसान व असरदार रास्ते के तौर पर मुस्लिम-विरोधी हिंदू एकता को चुना. जैसा ऊपर बताया गया है, सावरकर और हेडगेवार इसी धारा के प्रतिनिधि थे.
III
आरएसएस की वैचारिक जड़ें
आरएसएस की विचारधारा और उसकी राजनीति की नींव योद्धा-राजा राम की गाथाओं और कुरुक्षेत्र के रण में कृष्ण द्वारा दिए गए उपदेशों पर टिकी है. इन्हीं से उसका आक्रामक, बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद ताकत पाता है. महाकाव्यों की उनकी यही व्याख्या अल्पसंख्यकों, दलितों, ‘शहरी नक्सलियों’, ‘विदेशी एजेंटों’ और कथित घुसपैठियों के खिलाफ लगातार चलने वाले उनके युद्ध को नैतिक वैधता देती है – एक ऐसा युद्ध, जो उनकी नजर में राम या शिवाजी जैसे किसी शासक, और अब शायद ‘दिव्य-जन्मे’ हिंदूहृदयसम्राट के नेतृत्व में, एक आधुनिक रामराज की राह खोल सकता है.
युद्ध एक पवित्र फर्ज : रामायण और गीता की सीख
सावरकर और आरएसएस के प्रमुख नेताओं ने राम को भारत के नैतिक-राजनीतिक आदर्श के रूप में बड़े उत्साह से पेश किया. सावरकर ने 1937 में हिंदू महासभा के अध्यक्षीय भाषण में कहा था (समग्र सावरकर वांग्मय, खंड 4) :
“हमारे पुरखों ने रामराज्य की बात की थी. उसका मतलब किसी कमजोर राज्य से नहीं, बल्कि शक्ति, राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि की निडर रक्षा पर टिका हुआ राज था.” उन्होंने आगे कहा (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ वी.डी. सावरकर, वॉल्यूम 3) :
“श्रीराम राष्ट्रीय नायक का आदर्श हैं, जिन्होंने अपनी प्रजा की हिफाजत की, दुष्टों को सजा दी और शक्ति और धर्म पर टिका राज्य खड़ा किया.” 1950 में नागपुर में विजयदशमी के भाषण में गोलवलकर ने कहा (श्री गुरुजी समग्र दर्शन, खंड 3) : “श्रीराम में हमें धर्म और राष्ट्रीय कर्तव्य का मेल दिखाई देता है.”
गीता की दिव्य युद्धप्रियता
जैसा कि हम जानते हैं, भागवत गीता उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में तिलक, गांधी और सुभाष बोस जैसे कांग्रेस नेताओं से लेकर बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब के क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों तक – लगभग हर धड़े के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत रही है. अलग-अलग नेताओं ने अपनी-अपनी राजनीति और नजरिए के हिसाब से गीता की व्याख्या की. यहां तक कि बाबा साहेब अंबेडकर ने भी गांधी और तिलक से बिल्कुल अलग सोच रखते हुए कई मौकों पर गीता के कुछ अंशों का जिक्र किया, मसलन महाड़ सत्याग्रह के असली मकसद को समझाने के लिए. लेकिन बाद के वर्षों में गहरे अध्ययन के बाद उन्होंने अपनी राय पूरी तरह बदल दी.[4]
आरएसएस ने इस श्रद्धा को एक बिल्कुल अलग, अतिवादी रूप दे दिया. उसने गीता को अपनी हिंसक हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की आधारशिला बना लिया – एक ऐसी किताब के रूप में, जिसे वे नैतिक अनुशासन, चरित्र-निर्माण और “हिंदू राष्ट्र” हासिल करने के संघर्ष की मार्गदर्शिका मानते हैं. आरएसएस की रोजाना चलने वाली शाखाओं में गीता का पाठ, चर्चा और उससे जुड़े प्रशिक्षण लगातार कराए जाते हैं, ताकि निष्काम कर्म, सत्ता के प्रति आज्ञाकारिता और “राष्ट्रीय कर्तव्य” जैसे मूल्य गहरे बैठाए जा सकें. बीते दौर के भी और आज के भी आरएसएस के नेता बार-बार गीता का हवाला देकर जाति-आधारित ऊंच-नीच, अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति और अनुशासित सशस्त्र अभियानों को जायज ठहराते रहे हैं. उनका दावा है कि हिंदू समाज एक “घेराबंदी” में है और उसकी रक्षा करना एक पवित्र फर्ज है.
हिंदुत्व के बड़े नेताओं में सबसे आगे रहे सावरकर ने गीता का इस्तेमाल मुख्य तौर पर “कर्म”, साहस और हिंसा को कर्तव्य साबित करने के लिए लिया – खासकर उस सीख के लिए कि स्वधर्म की रक्षा में अगर अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ना पड़े, तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए. गोलवलकर और बाद के आरएसएस नेताओं ने गीता को कर्मयोग का ग्रंथ मानकर उसे “अनुशासित, निस्वार्थ सेवा” और हिंदू राष्ट्र के लिए समर्पण का संदेश बताया. उनकी बातों से साफ दिखता है कि उनके लिए गीता कोई रहस्यवाद की किताब नहीं, बल्कि संगठित और लड़ाकू राजनीतिक कार्रवाई की मार्गदर्शिका थी.
सावरकर ने साफ लिखा कि उनकी नजर में इस “पवित्र पुस्तक” की सबसे बुनियादी शिक्षा क्या हैः “गीता हर व्यक्ति को आदेश देती है कि वह राष्ट्र की रक्षा में अपना कर्तव्य निभाए – चाहे इसके लिए उसे अपने ही लोगों को क्यों न मारना पड़े. अर्जुन को यही बताया गया था कि राष्ट्रीय हित से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है.”
(सिक्स ग्लोरियस एपॉक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री, 1963)
‘हिंदुत्व : हू इज ए हिंदू?’ (1923) में वह लिखते हैंः
“श्रीकृष्ण राष्ट्रीय नायक के दिव्य रूप हैं, जो हमें स्वधर्म के लिए लड़ना सिखाते हैं.”
एक सिद्धांतकार से ज्यादा एक कार्यकर्ता रहे हेडगेवार कहा करते थे कि “गीता हमें कर्म में स्थिरता – यानी कर्मयोग – की सीख देती है. संघ कार्यकर्ता को हिंदू समाज की सेवा में यही गुण विकसित करना चाहिए.” (डॉ. हेडगेवारः द ईपॉक मेकर, आरएसएस प्रकाशनों के भाषणों का संकलन)
आरएसएस के सबसे लंबे समय तक रहने वाले और सबसे पूजित सरसंघचालक, गोलवलकर ने ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में लिखा :
“भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में राष्ट्र-निर्माण का नियम दिया है – एकता, निस्वार्थ कर्म और धर्म के प्रति समर्पण.”
उग्र भक्ति का यह पंथ आज भी उसी ताकत से जारी है. फरवरी 2019 में मोदी ने दिल्ली के इस्कॉन मंदिर में तीन मीटर लंबी, 800 किलो वजन की गीता की प्रति का विमोचन किया. इसे “ज्ञान का स्रोत” और “हमारी संस्कृति का मूल प्रतीक” बताते हुए उन्होंने गीता की वह पंक्ति उद्धृत की जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते हैंः
“धर्म की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, और धरती पर धर्म की स्थापना के लिए, मैं युग-युग में जन्म लेता हूं.” प्रधानमंत्री ने इसका अर्थ समझाते हुए कहा, “हमें, ईश्वर की ओर से, हमारी भूमि के दुराचारियों और असुरों से रक्षा करने की शक्ति मिली है.”
इशारा साफ था – भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार दलित कार्यकर्ताओं और दूसरे ‘राज्य के दुश्मनों’ की ओर. और कृष्ण का अवतार कौन? यह भी स्पष्ट था – मोदी खुद. “हम” कहना दरअसल “मैं” कहने का शिष्ट तरीका था. बाद में, 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार में उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह “साधारण, जैविक रूप से पैदा हुआ इंसान नहीं” हैं और जोड़ा, “ईश्वर ने मुझे एक मकसद से भेजा है.” इसी दौर में, एनडीए सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि “भारतीय ज्ञान परंपरा” और भाजपा-शासित राज्यों के स्कूल पाठ्यक्रमों में गीता को विशेष स्थान दिया जाए.
भारत में फासीवाद की दार्शनिक जड़ें : एमएन रॉय का विश्लेषण
सावरकर और गोलवलकर के समकालीन एमएन रॉय ने भारत में फासीवाद की वैचारिक बुनियादों का दूरदर्शी विश्लेषण रखा. उन्होंने दिखाया कि भारतीय संदर्भ में फासीवाद कोई बाहर से थोप दिया गया विचार नहीं था, बल्कि हमारी अपनी दार्शनिक परंपराओं, जैसे भाग्यवाद, कर्म का सिद्धांत, और दैवी अधिकार के प्रति बिना सवाल किए आज्ञापालन के भीतर दबा हुआ एक संभावित खतरा था. यूरोप की तरह यहां कोई ज्ञानोदय (एनलाइटनमेंट), यानी तर्कवादी उथल-पुथल नहीं हुई. इसी वजह से हमारे शास्त्रीय मिथक, जिन्हें ज्यादातर राष्ट्रवादी “वैदिक आदर्श” बताकर महिमामंडित करते थे, जनता में एक ऐसी मानसिकता गढ़ते थे जो दैवी अधीनता और ब्रह्मांडीय आज्ञाकारिता पर आधारित थी. यह समझ जनसमूह को अधिनायकवादी लामबंदी के पीछे खड़े होने के लिए प्रेरित करती थी, यहां तक कि गांधी जैसे नेताओं के पीछे भी.
रॉय की आलोचना के केंद्र में ‘भागवत गीता’ थी, जिसे वे भारत में तानाशाही के चरम रूप सर्वसत्तावाद की दार्शनिक रूपरेखा मानते थे. गीता में कृष्ण का अर्जुन को दिया गया उपदेश युद्ध, हिंसा और विनाश को “दैवी कर्तव्य” के रूप में जायज ठहराता है, तथा तर्क और अंतरात्मा को दैवीय व्यवस्था के अधीन कर देता है. रॉय अपनी पुस्तक ‘रीजन, रोमांटिसिजम एंड रिवोल्यूशन’(1952) में लिखते हैं :
“गीता का दर्शन सत्ता के प्रति बिना सवाल किए आज्ञाकारिता, कर्तव्य के नाम पर तर्क का दमन, और युद्ध को दैवी इच्छा की पूर्ति बताते हुए उसका नैतिक औचित्य पेश करता है.”
वे आगे स्पष्ट करते हैंः
“गीता में कृष्ण अर्जुन को अपना कर्तव्य निभाने यानी मारने और विनाश करने के लिए प्रेरित करते हैं, बिना नैतिक औचित्य पर सवाल उठाए, क्योंकि कर्तव्य-पालन में किया गया कर्म निष्क्रियता से श्रेष्ठ माना गया है. इस तरह व्यक्ति के विवेक को एक रहस्यमय दैवी व्यवस्था के अधीन कर दिया जाता है.”
रॉय ने गीता की इस सोच और फासीवाद द्वारा राज्य की महिमा-गान के बीच सीधी समानताएं खींचते हुए लिखाः
“फासीवाद राज्य को दैवी सत्ता बनाकर पेश करता है; और भारतीय धर्मशास्त्र जाति व्यवस्था को दैवी ठहराते हैं. दोनों ही जगह इंसान एक ‘ऊपर’ की रहस्यमय सत्ता के आगे मिटा दिया जाता है.”
उन्होंने भारतीय फासीवाद के चार मुख्य आधार बताए – धार्मिक दर्शन का तर्कहीन रहस्यवाद, गीता में मौजूद भाग्यवाद और आज्ञाकारिता का महिमामंडन, जाति व्यवस्था की कठोर श्रेणीबद्धता, और राजनीति में ‘आध्यात्मिकता’ का बिना सवाल किए अंधानुकरण. रॉय का कहना था कि ऐसे ढांचे में सत्ता खुद “दैवी आदेश” के बराबर बना दी जाती हैः
“..... फासीवाद के दर्शन की जड़ें गीता की उस दैवी सोच में मिलती हैं, जिसके मुताबिक धरती पर हर शक्ति (विभूति) ईश्वर की शक्ति है.”
इस कम्युनिस्ट नेता और मार्क्सवादी चिंतक ने चेताया कि अगर राष्ट्रवाद धार्मिक पुनरुत्थानवाद पर खड़ा होगा, तो भारत भी यूरोप की तरह फासीवाद की तरफ धकेला जा सकता है :
“अगर भारत अपनी राह और पहचान खोजने के लिए मिथकीय अतीत की ओर मुड़ेगा, तो वहां उसे आजादी की भावना नहीं, बल्कि सिर्फ आज्ञाकारिता की वैधता मिलेगी.”
टिप्पणियां :
1. इनमें मुख्य थे – “Law for the Protection of German Blood and Honour”, जिसने यहूदियों और “आर्यों” के बीच शादी या यौन संबंध पूरी तरह बैन कर दिए और “Reich Citizenship Law”, जिसमें साफ लिखा था कि सिर्फ “जर्मन या उसी तरह के रक्त” वाले लोग ही जर्मनी के नागरिक हो सकते हैं.
2. इन आंदोलनों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम एकजुट लड़ाई के अलावा कम्युनिस्ट आंदोलन और कई दूसरी धाराएं भी शामिल थे. आरएसएस ने हमेशा पुरानी हिंदू प्रथाओं की हिफाजत की, इसलिए ब्राह्मो समाज और आर्य समाज जैसे हिंदू-ब-हू हिंदू सुधार आंदोलनों का भी जोरदार विरोध किया, गैर-ब्राह्मण आंदोलन की तो बात ही छोड़ दी जाये. गोलवलकर के मुताबिक –
“हमारे राष्ट्र की असली हिंदू अवधारणा को क्षेत्रीय राष्ट्रवाद और साझा खतरे की थ्योरी ने खोखला कर दिया. इससे आजादी की कई लड़ाइयां महज एंटी-ब्रिटिश आंदोलन बन कर रह गईं. एंटी-ब्रिटिश होना ही देशभक्ति और राष्ट्रवाद मान लिया गया. इस प्रतिक्रियावादी सोच ने पूरी आजादी की लड़ाई, उसके नेताओं और आम जनता पर बहुत बुरा असर डाला.”
गोलवलकर का मानना था कि क्षेत्र के आधार पर राष्ट्र बनाना (यानी एक ही बॉर्डर में रहने वाले लोग) “निर्जीव”, “अप्राकृतिक” और “अवैज्ञानिक” है. उनके लिए राष्ट्र को जोड़ती है सिर्फ सांस्कृतिक एकता – धर्म, भाषा, साझा इतिहास – भूगोल नहीं.
3. “आरएसएस दलितों के शुरुआती संगठन के खिलाफ भी एक प्रतिक्रिया था” – द वायर, 25 अक्टूबर 2025
4. अंबेडकर ने गीता को सीधे फासीवाद से नहीं जोड़ा, लेकिन गीता और दूसरे शास्त्रों की कड़ी आलोचना जरूर की. उनका कहना था कि इन्हें डायनामाइट से उड़ा देना चाहिए क्योंकि ये जड़ पाखंड और दमनकारी जाति-व्यवस्था को सही ठहराते हैं, तर्क और विवेक को कुचलते हैं. कई किताबों में उन्होंने दिखाया कि गीता असल में बौद्ध क्रांति और तर्कवाद के खिलाफ ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया थी. वे लिखते हैंः
“गीता जोर देकर कहती है कि हर व्यक्ति को अपना स्वधर्म निभाना चाहिए. और स्वधर्म क्या है? बस अपनी जाति का काम. यानी गीता का पूरा सार है – हर कोई अपनी जाति के अनुसार काम करे.”
(रिडल्स इन हिंदूइज्म)
(हंड्रेड्स प्लस इयर्स ऑफ एग्रेसिव हिंदुत्व : एन ओवरव्यू , भाग एक - लेखक : अरिंदम सेन, लिबरेशन, दिसंबर 2025,)
(हिदी अनुवाद - मनमोहन)