वर्ष 35 / अंक - 01 / आक्रामक हिंदुत्व के सौ से ज्यादा साल: एक नजर (भाग-...

आक्रामक हिंदुत्व के सौ से ज्यादा साल: एक नजर (भाग-2)

आक्रामक हिंदुत्व के सौ से ज्यादा साल: एक नजर

-- अरिंदम सेन

शताब्दी साल संघ परिवार के लिए जश्न का साल रहा है. और इसकी ठोस वजहें भी है. अपने खेमे में सांसदों की कम संख्या और कई चुनौतियों के बावजूद, आरएसएस-भाजपा गठजोड़ ने राज्य के सभी अंगों तथा न्यायपालिका, सशस्त्र बलों, शिक्षा और संस्कृति जैसे गैर-राज्य/गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व वैचारिक प्रभुत्व कायम कर लिया है. वरिष्ठ पत्रकार दिनेश नारायण इस खुशी के पल को बिल्कुल सटीक ढंग से चित्रित करते हैंः

“आरएसएस ने अपने अल्पकालिक एजेंडे की अधिकांश मांगें पूरी कर ली हैं – राम मंदिर बन चुका है, अनुच्छेद 370 समाप्त हो चुका है, शिक्षा नीति अब उसकी इच्छानुसार ढाल दी गई है, नया दंड संहिता लागू हो चुका है और कम से कम एक राज्य में समान नागरिक संहिता पारित कर दी गई है. हिंदुत्व का यह झंडाबरदार अब अपनी वार्षिक रिपोर्ट में ‘घर वापसी’ के आंकड़े भी दर्ज करता है, यानी उन लोगों की संख्या जो अन्य धर्मों, मुख्यतः इस्लाम, से हिंदू धर्म में परिवर्तित हुए. अब सरकारी अधिकारी खुलेआम स्वीकार कर सकते हैं कि वे स्वयंसेवक हैं. पहले की पाबंदी केवल इतनी थी कि उनका आरएसएस से जुड़ाव औपचारिक रूप से गुप्त रहे, जबकि वास्तविकता यह थी कि सैकड़ों सरकारी अधिकारी पहले से ही संघ से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे. इसमें न्यायपालिका भी शामिल है. कलकत्ता हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश ने अपने सेवानिवृत्ति भाषण में आरएसएस से अपने आजीवन संबंध का खुलासा किया.

“रूपक के रूप में, मोदी युग में आरएसएस के विस्तार और परिवर्तन की सबसे स्पष्ट तस्वीर उसका नई दिल्ली स्थित मुख्यालय केशव कुंज प्रस्तुत करता है. 1960 के दशक में बना पुराना परिसर अब दो ऊंची इमारतों से बदल दिया गया है, जिनमें से प्रत्येक बारह मंजिला है और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है – बैठक कक्ष, सम्मेलन हाॅल, पुस्तकालय और आवास व्यवस्था सहित. सरसंघचालक का कार्यालय और निवास भी ऊपरी मंजिलों पर है.” [1]

इन आश्चर्यजनक उपलब्धियों के पीछे राजनीतिक विकास की चरणबद्ध प्रक्रिया का एक लंबा इतिहास छिपा है. यह यात्रा किसी भी तरह आसान नहीं रही – यह एक लंबी, कष्टदायक और टेढ़ी-मेढ़ी राह रही है, जिसमें तीन प्रतिबंधों जैसी प्रमुख चुनौतियां भी शामिल हैं.

IV

सत्ता की लंबी यात्राः नेताओं की विविध विरासत

इस विशालकाय संगठन के विकास को समझने का एक दिलचस्प तरीका यह है कि पहले सरसंघचालक से लेकर मौजूदा सरसंघचालक तक की नेतृत्व परंपरा पर नजर डाली जाए. वाल्टर के. एंडरसन और श्रीधर डी. दामले ने अपनी शोधपूर्ण किताब ‘द आरएसएसः अ व्यू टु द इनसाइड’ में ठीक यही किया है. इसी का सहारा लेते हुए हम यहां एक संक्षिप्त विवरण पेश कर रहे हैं.

डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार (डाॅक्टरजी)
पेशाः चिकित्सक  
जन्मः नागपुर  
आरएसएस प्रमुखः 1925-1940


संघ के संस्थापक नेता के पास लालचंद और वीर सावरकर के लेखन के रूप में वैचारिक सामग्री पहले से उपलब्ध थी, और नागपुर में हिंदू महासभा भी सक्रिय थी. लेकिन उनके मन में कुछ खास और अलग था. उनका दृढ़ विश्वास था कि सबसे पहले गहरे विभाजित हिंदू समाज को एकजुट करना जरूरी है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने एक ऐसा प्रशिक्षण ढांचा विकसित किया, जिसमें पुरुष कैडर तैयार किए जाते थे जो हिंदू एकता स्थापित कर सकें. वे विचारक या प्रचारक से कहीं अधिक एक सक्रिय कार्यकर्ता और जमीनी संगठनकर्ता थे, जिन्हें ‘केशव संघनिर्माता’ के रूप में सम्मान दिया गया.

आरएसएस के वैचारिक और सांगठनिक ढांचे को गढ़ने में हेडगेवार का सबसे मौलिक और टिकाऊ योगदान ‘शाखा’ रहा. यही शाखा संगठन की बुनियादी नींव है, जिस पर संघ की पूरी भव्य इमारत खड़ी है. यह नीचे से ऊपर की ओर संगठन खड़ा करने की रणनीति थी, जिसका मकसद ऐसे अनुशासित और संगठित समुदाय तैयार करना था, जो खुली राजनीतिक गोलबंदी के बिना ‘राष्ट्रीय पुनर्जागरण’ कर सकें. हेडगेवार शाखा को रोज होने वाली ऐसी बैठक के रूप में देखते थे, जिसमें शारीरिक फिटनेस, अनुशासन, देशभक्ति और समाज-सेवा पर जोर दिया जाता था. यही आरएसएस के तथाकथित ‘संघ मंत्र’ का मूल आधार है.

खुद पूर्व कांग्रेसी होने के बावजूद वे अपने संगठन को राजनीति से पूरी तरह अलग रखने पर अडिग थे. उनका सारा ध्यान एक लड़ाकू और अनुशासित संगठन बनाने पर था, जो मुसलमानों के खिलाफ व्यापक हिंदू समुदाय को एकजुट करने की बुनियाद बन सके. साथ ही, उन्हें यह अंदेशा भी था कि स्वयंसेवकों का एक बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे बड़े आंदोलनों से ही आएगा. इसलिए अनुयायियों को एकजुट रखने के लिए व्यावहारिकता से उन्होंने सदस्यों को व्यक्तिगत हैसियत से इन आंदोलनों में भाग लेने की छूट दी.

एम. एस. गोलवलकर (गुरुजी)
पेशा: जीवविज्ञानी, प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर  
जन्म: नागपुर के पास रामटेक  
आरएसएस प्रमुख: 1940-1973


हेडगेवार के चुने हुए उत्तराधिकारी और सबसे लंबे समय तक सरसंघचालक रहने वाले गोलवलकर ने आजादी और विभाजन के उथल-पुथल के दौर में आरएसएस का नेतृत्व किया. महात्मा गांधी की हत्या के बाद फरवरी 1948 से जुलाई 1949 तक संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया और गोलवलकर को, कई अन्य लोगों के साथ, गिरफ्तार किया गया. उनकी देखरेख में ही भाजपा सहित कई सहयोगी संगठनों का गठन किया गया.

मधुकर दत्तात्रोय देवरस (बालासाहेब)
शिक्षा: कानून स्नातक  
जन्म: नागपुर  
आरएसएस प्रमुख: 1973-1994


देवरस ने राजनीति और सामाजिक सुधारों में शामिल होने पर जोर दिया, जिससे संगठन के भीतर गंभीर मतभेद पैदा हुए. सरसंघचालक बनने के बाद अपने शुरुआती भाषणों में उन्होंने आरएसएस की गरीबों और वंचितों की ओर से सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत पर बात की. जातिगत भेदभाव की उनकी निंदा आरएसएस के भीतर एक महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव था. जनता पार्टी के गठन के दौरान उन्होंने आरएसएस नेताओं को मुस्लिम समूहों से संपर्क शुरू करने और साझा भोजन आदि के जरिए मित्रता बढ़ाने के लिए प्रेरित भी किया. लेकिन यह पहल वैचारिक परिवर्तन की बजाय मुख्य रूप से एक व्यावहारिक कदम था, जो इंदिरा कांग्रेस के खिलाफ व्यापक एकता बनाने की जरूरत से प्रेरित था. यही वजह है कि व्यावहारिक स्तर पर इसका कोई खास असर नहीं हुआ.

प्रो. राजेंद्र सिंह (राज्जू भैय्या)
जन्म: शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश  
शिक्षा: भौतिकी में डाॅक्टरेट  
आरएसएस प्रमुख: 1994-2000


आरएसएस के पहले गैर-ब्राह्मण और महाराष्ट्र से बाहर के सरसंघचालक राज्जू भैय्या ने देवरस द्वारा शुरू की गई सक्रियता को आगे बढ़ाया और जाति व संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर व्यापक हिंदू एकता गढ़ने में विशेष रूप से उभरे. उत्तर प्रदेश में और राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के महासचिव के रूप में काम करने के चलते वे भाजपा के तमाम नेताओं के साथ सीधे संपर्क में रहने की बेहतर स्थिति में थे. 1990 के दशक के मध्य तक आरएसएस प्रमुख और भाजपा के बीच रिश्ता कहीं ज्यादा गहरा हो चुका था. इसी वजह से राजेंद्र सिंह अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा सार्वजनिक शख्सियत बनकर उभरे. मीडिया से संवाद हो या भाजपा के कामकाज में सीधी दिलचस्पी, दोनों मामलों में वे पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय दिखाई दिए. आरएसएस के सहयोगी संगठनों के तेजी से विस्तार के साथ, उनके बीच नीतिगत मतभेदों को सुलझाने के लिए उन्होंने एक मध्यस्थता की व्यवस्था भी खड़ी की.

के. एस. सुदर्शन
जन्म: रायपुर, छत्तीसगढ़  
शिक्षा: इलेक्ट्राॅनिक्स और दूरसंचार इंजीनियर
आरएसएस प्रमुख: 2000-2009


सुदर्शन के कार्यकाल में वाजपेयी सरकार का उदय और पतन दोनों हुए. इसी दौरान आरएसएस के सहयोगी संगठनों, विशेषकर भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ का अभूतपूर्व विस्तार हुआ. वे आर्थिक सहयोगी संगठनों की आत्मनिर्भरता की मांग के प्रति सहानुभूति रखते थे और निजीकरण, उदारीकरण व वैश्वीकरण के प्रति भाजपा के बढ़ते झुकाव के आलोचक थे. भारत के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के साथ संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से, उन्होंने दिसंबर 2002 में (गुजरात दंगों के ठीक बाद) ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ के गठन का मार्गदर्शन किया. साथ ही, वैश्वीकरण विरोधी ‘स्वदेशी जागरण मंच’ की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. सुदर्शन जरूरत पड़ने पर भाजपा की खुलकर आलोचना करने के लिए जाने जाते थे. 2004 के चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए की हार के बाद, उन्होंने दो-टूक शब्दों में यह सुझाव दिया था कि आडवाणी और वाजपेयी द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले पुराने नेतृत्व को अब हट जाना चाहिए और कमान युवा पीढ़ी के हाथों में सौंप देनी चाहिए.

मोहन भागवत
जन्म: चंद्रपुर, महाराष्ट्र  
शिक्षा: पशु-चिकित्सा विज्ञान में प्रशिक्षण  
आरएसएस प्रमुख: मार्च 2009 से अब तक

भागवत का मुख्य जोर आरएसएस को एक ऐसे बड़े मंच के रूप में ढालने पर दिखता है, जिसमें विविध और कभी-कभी परस्पर विरोधी नजरियों को भी समेटा जा सके. वे एक व्यवहारिक व्यक्ति हैं और सुदर्शन के विपरीत एक चतुर कूटनीतिज्ञ भी. इसी वजह से उन्होंने आरएसएस के विभिन्न सहयोगी संगठनों के बीच, जिनमें कुछ मतभेद काफी गंभीर भी रहे हैं, नीतिगत टकराव सुलझाने के लिए मध्यस्थता की व्यवस्था का इस्तेमाल और तेज किया. उन्होंने आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोगी संगठनों के नजरियों को समाहित करते हुए, भाजपा सरकार की नीतिगत दिशा को अधिक जनोन्मुख बनाने की भी कोशिश की है. मोदी के संदर्भ में भागवत ने आरएसएस सदस्यों को व्यक्तित्व-पूजा से सावधान रहने की चेतावनी दी और यह याद दिलाया कि उनकी पहली निष्ठा आरएसएस के प्रति होनी चाहिए. उनके कामकाज की शैली पर इस लेख में आगे कुछ और टिप्पणियां की गई हैं.

ऊपर दिया गया यह विवरण साफ दिखाता है कि अभी की आरएसएस को उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुंचाने में सभी छह सरसंघचालकों में से प्रत्येक की अपनी एक अलग और विशिष्ट भूमिका रही है. इन सभी ने अपने मूल लक्ष्य से रत्ती भर भी समझौता किए बिना, बदलते समय के साथ ढलने की गजब की क्षमता, लचीलापन और रचनात्मकता का परिचय दिया. उनके सपने भले ही आसमान छूने वाले थे, लेकिन उन्होंने संगठन की नींव जमीन पर धीरे-धीरे और ठोस ढंग से निर्माण किया.

नागपुर की एक शाखा में सिर्फ सत्रह स्वयंसेवकों से शुरू होकर, उन्होंने पूरे देश में संगठन का जाल फैला दिया. पांचजन्य और अन्य आधिकारिक स्रोतों के मुताबिक, 2024 तक आरएसएस के 40 लाख से ज्यादा सदस्य और 73 हजार से अधिक शाखाएं थीं. उन्होंने दशकों तक एकाग्रता के साथ मूल संगठन को खड़ा किया और उसके बाद जरूरत के मुताबिक एक-एक कर सहयोगी संगठनों का विस्तार किया.

ऐसा नहीं था कि यह सब कुछ पहले से तय था, बल्कि नए कदम या नीतियों में बदलाव दरअसल उस समय की जरूरत को देखते हुए किए गए थे.

V

प्रभाव से सत्ता के शिखर तक

नरेंद्र मोदी का 2014 में उदय भाजपा के साथ-साथ आरएसएस का भी राजनीतिक शिखर है. सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों के बीच का फर्क अब काफी हद तक मिट चुका है. आरएसएस के कैडर शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों और तरह-तरह की सरकारी व अर्ध-सरकारी संस्थाओं में नियुक्त किए जा रहे हैं. आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रकाशित किताबें स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल की जा रही हैं. इसी के साथ राज्य की संस्थाओं, मीडिया और शिक्षा व्यवस्था को इस तरह बदला जा रहा है कि वे हिंदू सभ्यता के आख्यान को ही पेश करें. आरएसएस ने उस नव-उदारवादी आर्थिक सोच को पूरी तरह से अपना लिया है, जिसे मोदी सरकार जोर-शोर से लागू कर रही है. इसमें अमीरों पर टैक्स घटाना, समाज कल्याण के खर्चों में कटौती, विदेशी पूंजी के लिए रास्ते खोलना, अर्थव्यवस्था को नियंत्रण-मुक्त करना और सरकारी कंपनियों का निजीकरण शामिल है. इसका नतीजा यह हुआ है कि आम जनता लगातार आर्थिक संकट में फंसती जा रही है, जबकि काॅरपोरेट अभिजात वर्ग को बेशुमार मुनाफा सौंप दिया गया है.

धर्म और राष्ट्रवाद को एक-दूसरे में मिलाकर आरएसएस भारत की ‘असल पहचान’ को बहाल करने का दावा करता है. बीते सौ वर्षों में उसकी विचारधारा और राजनीति बुनियादी तौर पर वही रही है, लेकिन अभिव्यक्ति के तरीके (जैसे कभी आक्रामकता तो कभी संयम) छोटी अवधि में भी काफी बदलते रहे हैं. संघ की राजनीति सिर्फ समय-समय पर आंदोलन/अभियान चलाने, संसदीय संघर्ष या सरकार चलाने तक सीमित नहीं है. वह सिर्फ भारत पर शासन करना नहीं चाहता. उसका असली मिशन जमीनी स्तर से लेकर सत्ता के शिखर तक भारत के सामाजिक ताने-बाने और इसकी पूरी सोच को बदलना है.

आज की उनकी राजनीति सिर्फ उदार संसदीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि वे लोकतंत्र की परिभाषा को ही बहुसंख्यकवादी धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं, जिसमें फासीवाद के स्पष्ट लक्षण हैं. लेकिन उनका यह पूरा प्रोजेक्ट विरोधाभासों से भरा है – जैसे जातिगत पदानुक्रम और हिंदू एकता के बीच का टकराव, पुरानी परंपराओं और आधुनिक शासन के बीच की खींचतान, और नैतिक अनुशासन के दावों और लोकलुभावन राजनीति के बीच का अंतर्विरोध.

VI

मोदी-शाह शासन: फासीवाद अब खुलकर सामने

वैचारिक दिशा, राजनीतिक चरित्र और संगठनात्मक ढांचे के लिहाज से आरएसएस हमेशा से ही विशिष्ट भारतीय लक्षणों वाला एक साम्प्रदायिक फासीवादी संगठन रहा है. हालांकि, भारतीय फासीवाद के इस खास ब्रांड की वास्तविक रूपरेखा केवल एनडीए सरकार के निरंतर शासनकाल में ही धीरे-धीरे हमारे सामने उजागर हो रही है.

सबसे पहले, मौजूदा शासन के वर्गीय चरित्र को देखें. सत्ता में आते ही इस सरकार ने खुलेआम जन-विरोधी, बड़ी पूंजी के पक्षधर और राष्ट्र-विरोधी, साम्राज्यवाद-परस्त नीतियां, योजनाएं और कानून लागू किए हैं – जैसे मौजूदा परमाणु विधेयक. नोटबंदी और अचानक लगाए गए लाॅकडाउन जैसे गैर-जिम्मेदार फैसलों की तो बात ही छोड़ दीजिए. इन सबका नतीजा यह है कि आम आदमी की जिंदगी लगातार और ज्यादा बदहाल होती जा रही है. आर्थिक असमानता, स्वास्थ्य और शिक्षा पर बजटीय खर्च, लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे तमाम वैश्विक सूचकांकों में भारत की लगातार गिरावट इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि यह सरकार बड़े पूंजीपतियों की है, बड़े पूंजीपतियों द्वारा चलाई जा रही है और बड़े पूंजीपतियों के लिए ही काम कर रही है. यह सरकार सामंती ताकतों और भू-माफिया जैसे अनुत्पादक और परजीवी वर्गों/उपवर्गों के साथ भी गहरे तालमेल में है.

दूसरे, फासीवाद का एक बुनियादी लक्षण सत्ता का चरम केंद्रीकरण है. मोदी-शाह शासन में यह प्रवृत्ति कई रूपों में सामने आती है. हम देख रहे हैं कि केंद्र सरकार अलग-अलग योजनाओं और कानूनों के जरिए राज्यों के संघीय अधिकारों को हड़प रही है. राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपालों के जरिए रोका जा रहा है और दूसरे तरीकों से भी राज्यों को कमजोर किया जा रहा है. संसदीय व्यवस्था में शक्तियों के बंटवारे को लगातार बिगाड़ते हुए कार्यपालिका संसद को दरकिनार करने में लगी रहती है और न्यायपालिका से टकराव मोल लेती है. साथ ही आरएसएस से जुड़े लोगों को ऊंचे पदों पर बैठाने की कोशिशें तेजी से की जा रही हैं. खुद भाजपा के भीतर मोदी-शाह की जोड़ी ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि पार्टी में उनके अलावा कोई दूसरा सत्ता-केंद्र न उभरे. यही वजह है कि जिस पार्टी अध्यक्ष पद पर कभी राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अमित शाह जैसे दिग्गज नेता रहे, वहां अब जे.पी. नड्डा और उसके बाद नितिन नवीन जैसे नगण्य हैसियत वाले लोग बैठाए गए हैं.

तीसरे, फासीवाद का मतलब है स्वतंत्रता का अभाव और भय का माहौल. भारत में हमारे लोकतंत्र की बुनियाद – अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र सोच और पारदर्शी शासन – सब पर निरंतर आघात हो रहा है. हम ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगहों में स्वतंत्रताओं का चुपचाप व लगातार क्षरण देख रहे हैं. “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर पेगासस जैसे उपकरणों का अवैध उपयोग और असहमति जताने वालों को लंबे समय तक कैद में रखना जायज ठहराया जा रहा है.

फासीवाद की अन्य सामान्य विशेषताओं  – जैसे व्यापक जन-निगरानी के साथ-साथ कथित “शहरी नक्सल” और अन्य असंतुष्टों पर विशेष गहन निगरानी – का जिक्र भी जरूरी है. फासीवादियों को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से डर लगता है. सत्ता मजबूत करने के बाद हिटलर ने सीधे चुनाव ही खत्म कर दिए थे. भारत के फासीवादी भी यही चाहते हैं, ताकि वे 40-50 साल तक सत्ता में जमे रह सकें, जैसा कि अमित शाह ने खुले तौर पर कहा है. चूंकि उनके पास अभी चुनाव खत्म करने की ताकत नहीं है, इसलिए वे ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ जैसे प्रस्तावों के जरिये खेल के नियम बदलना चाहते हैं. यह भी फिलहाल तुरंत संभव नहीं है, इसलिए वे एसआईआर, मतदाता सूचियों में हेराफेरी, संभवतः ईवीएम में हेराफेरी और अन्य गुप्त, अनैतिक तरीकों का सहारा ले रहे हैं.

इन स्पष्ट फासीवादी तकनीकों के अलावा भाजपा ने संसद और विधानसभाओं में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए कई और शातिर तरीके अपनाए हैं, जिनमें ब्लैकमेलिंग जैसे सत्तावादी हथकंडे भी शामिल हैं. 2014 के बाद से उसने योजनाबद्ध ढंग से राजनीतिक दलबदल को बढ़ावा दिया और भारत की सबसे सफल ‘राजनीतिक शिकारी’ पार्टी के रूप में उभरी. इस रणनीति के जरिये उसने खासकर दक्षिण, पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत में अपना विस्तार किया, जहां विपक्षी नेताओं को – अक्सर केंद्रीय एजेंसियों के दबाव या चुनावी लालच के तहत – अपनी पार्टी में शामिल किया गया. हालांकि दलबदल करने वालों की सफलता हर जगह एक जैसी नहीं रही है. हाल के वर्षों में पार्टी में शामिल हुए कई नेताओं को मतदाताओं ने सिरे से नकार भी दिया है.

VII

दोनों की जुगलबंदी

ऐतिहासिक रूप से, वैचारिक जनक होने के नाते आरएसएस को अपने तमाम सहयोगी संगठनों के बीच एक विशेष सम्मान हासिल रहा है. इसकी एक अहम वजह यह भी है कि सामने दिखने वाले संगठनों के ज्यादातर वरिष्ठ पदाधिकारी आरएसएस के ही पैदाइश हैं. यह आज भी बरकरार है.

हालाँकि, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनका लगातार सत्ता में बने रहना – कम से कम सार्वजनिक धारणा में – मातृ संगठन (आरएसएस) और उसके सबसे अहम राजनीतिक मोर्चे भाजपा के बीच के नाजुक संतुलन को भाजपा के पक्ष में झुका चुका है. दोनों संगठनों के ताकतवर मुखियाओं के बीच कभी-कभार के मतभेद भी कोई छिपा हुआ राज नहीं है. इसके बावजूद, वस्तुगत रूप से देखें तो दोनों एक-दूसरे पर गहराई से निर्भर हैं और आपसी सहजीवन के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं. व्यक्तिपरक रूप से भी, दोनों नेता एक ही पीढ़ी से आते हैं और दशकों तक आरएसएस प्रचारक रहे हैं. इसीलिए सफलता के शिखर पर वे ऐसा कोई कदम उठाने से बचते हैं जो पूरी गाड़ी को पलट दे. इसलिए, राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, यह मानते हुए भी, ऐसा लगता है कि कभी-कभार की छोटी-मोटी असहमतियों के बावजूद यह जुगलबंदी तब तक चलती रहेगी, जब तक हालात अनुकूल रहें.

इसका एक साफ संकेत पिछले साल नवंबर के आखिर में देखने को मिला, जब मोदी और भागवत ने अयोध्या में राम मंदिर के ऊपर औपचारिक रूप से धर्म ध्वज फहराया. प्रधानमंत्री ने इस मौके को भारत की सांस्कृतिक चेतना का ‘निर्णायक मोड़’ बताया, जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने केसरिया झंडे को भारत के राष्ट्रीय धर्म का प्रतीक करार दिया.

‘द हिंदू’ (25 नवंबर 2025) के मुताबिक, दोनों नेताओं का एकसाथ दुर्लभ सार्वजनिक मंच साझा करना पुराने घावों के भरने और एकता के सुनियोजित प्रदर्शन के रूप में देखा गया.

कमजोर कड़ी

इस संक्षिप्त विवरण में हमने पिछले सौ वर्षों के दौरान आरएसएस और उसके विकास को यथासंभव निष्पक्ष ढंग से समझने की कोशिश की है. हाल ही में कोलकाता में दिए एक भाषण में मोहन भागवत ने एक बार फिर कहा कि आरएसएस का काम कोई एक और हिंदू संगठन बनना नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज को संगठित करना है. भागवत ने यहां तक जोड़ा कि आरएसएस को भाजपा के चश्मे से देखना एक बड़ी भूल होगी. दूसरे शब्दों में, वे हमें यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि जहां आरएसएस समाज को संगठित करने में माहिर है, वहीं भाजपा का सरोकार केवल राजनीतिक सत्ता और राज्य व्यवस्था से है; इसलिए इन दोनों को एक-दूसरे का हिस्सा मानने के बजाय अलग-अलग देखा जाना चाहिए.

सतही स्तर पर यह दलील ठीक लग सकती है, क्योंकि आरएसएस पिछले सौ साल से अधिक समय से काम कर रहा है, जबकि भाजपा की स्थापना 1980 में हुई. लेकिन इससे आरएसएस और भाजपा का रिश्ता अलग नहीं हो जाता. भाजपा, ठीक वैसे ही जैसे उसका पूर्ववर्ती जनसंघ था, आरएसएस का राजनीतिक अंग ही है.

जिस तरह ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ आरएसएस का एक जुमला है, उसी तरह यह ‘सामाजिक बनाम राजनीतिक’ का भेद भी आरएसएस की एक और शातिर कोशिश है, ताकि आरएसएस और भाजपा के अटूट रिश्ते को छुपाया जा सके. सच्चाई यह है कि आरएसएस न सिर्फ अपने राजनीतिक अंग के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है, बल्कि उसे नियंत्रित भी करता रहा है और जब-जब जनसंघ या भाजपा सत्ता में आए हैं, तब-तब उसने राज्य सत्ता से भरपूर फायदा उठाया है. यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि 1977 में जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ था, तब विवाद का केंद्रीय मुद्दा यही था कि जनता पार्टी के भीतर पूर्व-जनसंघी नेताओं की आरएसएस के प्रति निरंतर निष्ठा बनी हुई थी. इसी टकराव ने जनता पार्टी सरकार को गिराया और आगे चलकर उसी आधार पर भाजपा का गठन हुआ – एक ऐसी पार्टी के रूप में, जो खुलकर आरएसएस की पहचान और उसके प्रति वफादारी के साथ खड़ी हुई.

आज आरएसएस का असाधारण विस्तार, उसकी गतिविधियों का व्यापक फैलाव और देश के सरकारी संस्थानों, शासन तंत्र, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नीति-निर्माण के ढांचों पर उसका बढ़ता कब्जा – यह सब सीधे तौर पर 2014 से चली आ रही मोदी सरकार के लंबे और निर्बाध शासन का नतीजा है. यह बड़ी विडंबना है कि जिस संगठन पर गांधीजी की हत्या के बाद राज्य द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था, उसी संगठन का शताब्दी वर्ष 2025 में खुद राज्य सत्ता द्वारा खुलेआम मनाया गया.

सवाल यह है कि आरएसएस का यह ‘सामाजिक’ और ‘सांस्कृतिक’ मुखौटा कब तक भाजपा के लिए सुरक्षा-कवच या बचाव का रास्ता बना रहेगा, जबकि भाजपा का लगातार सत्ता में बने रहना आर्थिक हालात और शासन के स्तर पर आम जनता के लिए दिन-ब-दिन विनाशकारी साबित हो रहा है – सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों की तो बात ही अलग, जिन्हें आरएसएस अपने लिए खास तौर से आरक्षित रखना पसंद करता है.

संघ की ताकत का अनूठा स्रोत

हर सरसंघचालक ने अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से शाखाओं की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया है. इसके कुछ उदाहरण यहां दिए जा रहे हैं.

संस्थापक नेता डाॅ. हेडगेवार ने शाखाओं की कल्पना हिंदू समाज में ‘सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) या सामूहिक सामर्थ्य की कमी को दूर करने के लिए की थी. उनके अनुसार हिंदू समाज जाति, क्षेत्र और संप्रदायों में बंटा हुआ था, जहां विभिन्न वर्गों के बीच आपसी भरोसे, सौहार्द और सामूहिक सहयोग की भारी कमी है, जिसे शाखाओं के जरिए ही भरा जा सकता है.

उन्होंने शाखाओं को ऐसे बराबरी के मंच के रूप में गढ़ा, जहां जाति का भेद न हो और अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए युवा पुरुष साझा गतिविधियों के जरिए आपसी रिश्ते बना सकें. इसके जरिए धीरे-धीरे उनमें ‘सभ्यतागत जिम्मेदारी’ का भाव भरा जाना था. देवरस ने कहा था, ‘शाखा सिर्फ एक रस्म नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग समझते हैं. यह सामाजिक समानता के लिए हमारे काम का मूल केंद्र है.’ उन्होंने शाखाओं को अस्पृश्यता मिटाने से जोड़ा और स्वयंसेवकों से अपील की कि रोज की बैठकों में बराबरी का व्यवहार करें. जहां देवरस की यह अपील ईमानदार थी, वहीं मौजूदा सरसंघचालक अपनी तरह की चतुर राजनीति के लिए विख्यात हैं. वाराणसी में एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि सभी भारतीय, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं, शाखाओं में आ सकते हैं, बशर्ते वे ‘भारत माता के बेटे, हिंदू समाज के सदस्य’ के रूप में आएं, ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाएं और भगवा झंडे का सम्मान करें.
(टाइम्स ऑफ इंडिया, 7 अप्रैल 2025).

आरएसएस पर हुए शोध भी शाखाओं को संघ परिवार की जीवनरेखा मानते हैं. 9 अक्तूबर 2025 को द फेडरल के लिए नीलांजन मुखोपाध्याय को दिए एक इंटरव्यू में इतिहासकार तनिका सरकार ने कहा, ‘मार्च करना और तालमेल के साथ किए जाने वाले प्रदर्शन, परंपरा से जुड़े हुए हैं. ये लोगों में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामूहिक भागीदारी का भाव पैदा करते हैं.’

बहस का दायरा आगे बढ़ाते हुए वह शाखाओं में जमीनी स्तर की गतिविधियों के महत्व पर जोर देती हैं: ‘युवा महिलाओं के लिए आठ भुजाओं वाली दुर्गा की पूजा जैसे रीति-रिवाजों के साथ कदमताल करना राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रतीकात्मक रूप से तैयार रहने की भावना को मजबूत करता है, भले ही असली जंग कभी न हो. फिर वे यह भी रेखांकित करती हैं कि शाखाओं की भूमिका में कुछ गिरावट आई है. उनके शब्दों में, ‘हालांकि इसकी संख्या और सामाजिक पहुंच बढ़ी है, लेकिन शुरुआती दशकों और राम जन्मभूमि आंदोलन तक के दौर जैसी केंद्रीय भूमिका अब नहीं रही.

इसका मतलब साफ है – शारीरिक मौजूदगी और जमीनी स्तर की लामबंदी वाला पुराना पारंपरिक तरीका आज भी आरएसएस की जीवनरेखा और बुनियाद है, लेकिन स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में इसकी प्रासंगिकता कम होने लगी.

(लिबरेशन जनवरी 2026 में प्रकाशित)

नोट

1. द आरएसएस एंड द मेकिंग ऑफ द डीप नेशनः पेंगुइन वाइकिंग, 2018, च 261 अपेंडिक्स IV आरएसएस लीडरशीप

03 January, 2026