वर्ष 35 / अंक - 39 / भारत में अकादमिक स्वतंत्रता खतरे में

भारत में अकादमिक स्वतंत्रता खतरे में

भारत में अकादमिक स्वतंत्रता खतरे में

-- कुमार दिव्यम

भारत की आधुनिक बौद्धिक परंपरा का इतिहास केवल विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों का इतिहास नहीं है. यह उन विचारों, बहसों और असहमतियों का इतिहास भी है, जिन्होंने देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक विकास को दिशा दी है. भारत ने अपने अनेक बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और सामाजिक वैज्ञानिकों को दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों तक पहुंचाया है. सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय विद्वानों ने वैश्विक बहसों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है और कई मौकों पर नई दिशाएं भी दिखाई हैं.

लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की स्वायत्तता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. विश्वविद्यालयों में सरकारी हस्तक्षेप, छात्र आंदोलनों पर कार्रवाई, शिक्षकों और शोधकर्ताओं के खिलाफ मुकदमे तथा असहमति के लिए सिकुड़ती जगह – इन सबने अकादमिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया है.

विश्वविद्यालयों पर हमले और अकादमिक स्वतंत्रता के दमन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के शासनकाल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हुई और देखते-देखते यह सिलसिला देश के कई विश्वविद्यालयों तक पहुंच गया. अब यह हमला पश्चिम बंगाल की प्रतिष्ठित जादवपुर यूनिवर्सिटी तक पहुंच चुका है.

पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता हासिल करने के बाद राज्य सरकार ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के खिलाफ जैसे युद्ध का ऐलान कर दिया है. यह युद्ध जादवपुर के अकादमिक स्वतंत्रता के खिलाफ है. इस युद्ध की कमान स्वयं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने संभाल रखी है और उनके पैदल सैनिक के रूप में आरएसएस का छात्रा संगठन एबीवीपी है. एक ऐसे शिक्षा केंद्र को, जिसने देश की अकादमिक और बौद्धिक परंपरा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, राज्य के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है.

‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ का नेतृत्व करते हुए शुभेन्दु अधिकारी ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों को संबोधित किया और कहा कि वे उन्हें ‘सबक सिखाना’ चाहते हैं. उन्होंने घोषणा की कि वे जल्द ही दो बार जादवपुर आएंगे – एक बार हनुमान चालीसा पढ़ने और दूसरी बार गीता पढ़ने के लिए.

इसी ‘सबक सिखाने’ की मंशा के तहत पश्चिम बंगाल में अंतर-विश्वविद्यालय शिक्षक स्थानांतरण कानून, 2026 लाया गया है. इस कानून के लागू होने के बाद राज्य के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के व्यापक स्थानांतरण का रास्ता खुल जाएगा.

विधानसभा में इस कानून को पेश करने के बाद बहस के दौरान मुख्यमंत्री ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के शिक्षकों को भी निशाना बनाया और स्पष्ट संकेत दिया कि इस कानून का इस्तेमाल दंडात्मक तबादलों के लिए किया जा सकता है. उन्होंने हाल ही में एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी के तबादले का उदाहरण देते हुए अपने तर्क को सही ठहराने की कोशिश की.

एकेडेमिक फ्रीडम इंडेक्स (AFI) और स्काॅलर्स ऐट रिस्क नेटवर्क का ऐकेडेमिक फ्रीडम माॅनिटरिंग प्रोजेक्ट (AFMP) की रिपोर्ट पर नजर डाले तो तस्वीर चिंताजनक है.

स्काॅलर्स ऐट रिस्क नेटवर्क का ऐकेडेमिक फ्रीडम माॅनिटरिंग प्रोजेक्ट हर वर्ष अकादमिक स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों के मामलों का दस्तावेजीकरण करता है. इनमें केंद्र सरकार द्वारा उन विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण करना शामिल है जो सिद्धांततः संघीय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. वैज्ञानिक समुदाय पर राज्य के अधिकार का विस्तार करने के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल; परिसरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर प्रतिबंध; तथा शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस द्वारा बल प्रयोग आदि शामिल हैं. इसके अलावा सरकारों की आलोचना करने वाले विचारों का दमन भी इसका हिस्सा है.

2014 और 2024 के बीच भारत का ऐकेडेमिक फ्रीडम इंडेक्स स्कोर आधे से अधिक गिर गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत उन देशों की श्रेणी में आ गया है जहां अकादमिक स्वतंत्रता को ‘पूरी तरह प्रतिबंधित’ माना जाता है.

देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों की स्वायत्तता पर सरकार ने 2014 के बाद से लगातार हमले किए हैं. इन हमलों का असर केवल संस्थानों के प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी अकादमिक स्वतंत्रता, शोध की स्वायत्तता और स्वतंत्र विचार की परंपरा पर भी पड़ा है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस), जो सरकार और यूजीसी द्वारा पूरी तरह वित्तपोषित एक संस्थान है, में प्रमुखों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किए गए और यह बदलाव ‘टिस’ की अकादमिक स्वतंत्रता की कीमत पर हुआ.

‘टिस’ में सभी छात्रों के लिए एक ‘आचार संहिता’ पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य कर दिया गया. इस संहिता के तहत छात्रों को राजनीतिक बहसों, धरनों तथा ‘अदेशभक्तिपूर्ण (Unpatriotic)’ या ‘सत्ता-विरोधी’ गतिविधियों में भाग लेने से रोकने के प्रावधान किए गए. इसके उल्लंघन पर छात्रों को संस्थान से निष्कासित किए जाने का आदेश भी जारी किया गया. इसी के तहत संसद के बाहर एक प्रदर्शन में भाग लेने के कारण एक शोध छात्र को दो वर्ष के निलंबन की सजा दी गई.

कुछ ऐसे ही वैचारिक दबाव के आरोप दिल्ली स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय को लेकर भी सामने आए. शिक्षकों ने वैचारिक हस्तक्षेप और दबाव का हवाला देते हुए बड़े पैमाने पर इस्तीफे दिए. वर्ष 2005 में भी एक दलित और एक मुस्लिम छात्र को केवल इसलिए निष्कासित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने एक ऐसे मामले में प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ प्रदर्शन किया था, जिसमें एक छात्रा को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा था.

आइआइएम यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के संस्थान भी लंबे समय से अपनी अकादमिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए जाने जाते रहे हैं. वर्ष 2023 में सरकार ने निदेशकों और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की नियुक्तियों के लिए नए नियम लागू किए. इन नियमों के तहत राष्ट्रपति प्रत्येक आइआइएम की चांसलर हो गईं जिन्हें ‘विजिटर’ कहा जाने लगा और केंद्र सरकार को निदेशक तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की नियुक्ति की शक्ति दी गई. इसी व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को निदेशक और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को हटाने की शक्ति भी दी गई.

इसके बाद तीन आइआइएम के निदेशकों ने इस्तीफे दे दिये. ये इस्तीफे निदेशकों और बोर्ड के बीच विवादों के बीच सामने आए. आइआइएम रायपुर के निदेशक प्रो. राम कुमार काकानी ने अपने इस्तीफे के कारणों में ‘संस्थागत एवं पेशेवर स्वायत्तता का हनन’ का हवाला दिया.

उनसे पहले आइआइएम कलकत्ता के दो निदेशक – प्रो. अंजु सेठ और उनके उत्तराधिकारी प्रो. उत्तम कुमार सरकार – ने भी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के साथ गंभीर मतभेदों और संस्थान के कामकाज पर नियंत्रण करने के प्रयासों के बाद अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था.

सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च (CPR) की स्थापना वर्ष 1973 में हुई थी. इसे लोक नीति के क्षेत्र में एक प्रमुख थिंक टैंक के रूप में जाना जाता रहा है. इसकी स्वतंत्रता और शोध की विश्वसनीयता ने शहरी शासन, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर इसे एक मजबूत प्रतिष्ठा दिलाई थी.

लेकिन वर्ष 2022 में इस संस्थान को भी मोदी सरकार के हमले का सामना करना पड़ा. संस्थान पर टैक्स फ्रॉड के आरोप लगाए गए और इसके बाद उसे मिलने वाले विदेशी फंड पर रोक लगा दी गई. सरकारी शोध संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आइसीएसएसआर) की ओर से मिलने वाली फंडिंग भी रोक दी गई.

सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च के अनेक प्रोजेक्ट वैश्विक संस्थाओं द्वारा वित्तपोषित किए जाते थे, जिनमें जाॅर्जटाउन और ब्राउन विश्वविद्यालय भी शामिल थे. सरकार ने सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च के खिलाफ FCRA कानून का इस्तेमाल किया. इसके बाद संस्थान की अध्यक्ष यामिनी अय्यर के सामने इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

बाद में मोदी सरकार ने सीपीआर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का पुनर्गठन किया और उसमें सरकार समर्थक विचारधारा से जुड़े लोगों को शामिल किया गया. कुछ ऐसा ही ICSSR के साथ भी हुआ. एक ओर इस संस्थान से सत्ताधारी दल की विचारधारा और एजेंडे के समर्थन में शोध करवाए जाने के आरोप लगे, तो दूसरी ओर सरकार ने इसके फंड में कटौती कर दी. इसके कारण ICSSR के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के अनुरूप वेतन मिलने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इसका असर सेंटर फाॅर डेवलपमेंट स्टडीज (केरल) और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज जैसी संस्थाओं पर भी पड़ा.

फंडिंग को लेकर आरोपों का हथियार सीएसडीएस (CSDS) के खिलाफ भी मोदी सरकार ने इस्तेमाल किया. सीएसडीएस जैसी प्रतिष्ठित संस्था की स्थापना वर्ष 1963 में भारतीय राजनीति विज्ञान के जनक कहे जाने वाले रजनी कोठारी ने की थी. वर्ष 1965 के बाद से इस संस्थान के पास एक डेटा यूनिट रही है, जो चुनावी आंकड़ों को एकत्रा करने और उन्हें वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का काम करती रही है.

लेकिन जब वर्ष 2028 में वोट चोरी, एसआइआर और मतों में गड़बड़ी को लेकर चर्चाएं तेज हो रही थीं और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कथित गड़बड़ियां सामने आ रही थीं, तब इसे वित्तपोषित करने वाली संस्था आइसीएसएसआर के एक शोधकर्ता पर ‘झूठी जानकारी’ प्रसारित करने के आरोप लगाए गए. इन आरोपों का इस्तेमाल पूरे संस्थान को कटघरे में खड़ा करने और उसे जांच की एक लंबी प्रक्रिया में उलझाने के लिए किया गया. अब पिछले वर्ष की गर्मियों से ही वेतन के लिए सीएसडीएस की फंडिंग रोक दी गई है.

आइएसआइ (ISI) जैसी प्रतिष्ठित संस्था को भी मोदी सरकार के हमलों का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उसकी स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठे. आइएसआइ की स्थापना वर्ष 1931 में हुई थी और यह दुनिया के प्रतिष्ठित सांख्यिकी संस्थानों में गिना जाता है.

वर्ष 2025 में केंद्र सरकार ने एक कानून के माध्यम से 32 सदस्यीय बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को, जिसका चुनाव आंतरिक प्रक्रिया के तहत होता था, 11 सदस्यीय बोर्ड से बदल दिया. इसके बाद राष्ट्रपति इसकी चांसलर हो गईं. नए प्रावधानों के तहत निदेशक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा केंद्र सरकार की सिफारिश पर की जानी थी. 11 सदस्यीय बोर्ड में तीन मंत्रालयों – वित्त मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय – के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रावधान किया गया.

इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त चार अन्य लोगों को भी बोर्ड में शामिल किया गया. नए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में न तो कोई अकादमिक प्रतिनिधित्व रखा गया और न ही छात्रों की ओर से कोई प्रतिनिधि शामिल किया गया.

आइएसआइ में सुधार के नाम पर किया गया यह फेरबदल आंकड़ों पर नियंत्रण की व्यापक नीति का हिस्सा माना गया. इसका असर आइआइपीएस, मुंबई की स्वायत्तता पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया. आइआइपीएस अखिल भारतीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षण करता है.

एनएफएचएस (NFHS) यानी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे भारत में स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का एक प्रमुख प्राथमिक स्रोत है. वर्ष 2023 में NFHS-5 (2019-21) के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन ने कुछ स्वास्थ्य और पोषण संकेतकों के खराब प्रदर्शन की ओर ध्यान दिलाया. साथ ही, इस अध्ययन में बच्चों और किशोरों में एनीमिया की तेज वृद्धि को भी उजागर किया गया.

यह रिपोर्ट भारत सरकार और उसके विभिन्न मंत्रालयों के उन आधिकारिक दावों के विपरीत थी, जिनमें उनके पोषण कार्यक्रमों की सफलता का उल्लेख किया जाता रहा था. रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारत में प्रत्येक पांच परिवारों में से एक परिवार खुले में शौच करने को मजबूर है.

इस अध्ययन ने सरकार के उन दावों पर भी सवाल खड़े किए, जिनमें कहा गया था कि ‘हर घर शौचालय’ योजना के तहत बड़े पैमाने पर शौचालयों के निर्माण के कारण खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या 60 करोड़ से घटकर नगण्य रह गई है.

अब नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे भी सरकार की नजरों में आ गया और संस्थान को सत्ता के दबाव का सामना करना पड़ा. आइआइपीएस के निदेशक के. टी. जेम्स को कथित रूप से असंबंधित कारणों से उनके पद से निलंबित कर दिया गया और कुछ महीनों बाद उन्होंने अंततः इस्तीफा दे दिया. इसके बाद यह घोषणा की गई कि NFHS की छठी रिपोर्ट में एनीमिया से संबंधित आंकड़े प्रकाशित नहीं किए जाएंगे.

इस तरह देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की स्वायत्तता पर बढ़ते हस्तक्षेप का सवाल केवल किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है. यह उस व्यापक अकादमिक वातावरण का प्रश्न है, जिसमें संस्थानों की स्वतंत्रता, शोध की निष्पक्षता, आंकड़ों की विश्वसनीयता और असहमति के लिए उपलब्ध लोकतांत्रिक स्पेस लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.

26 September, 2026