जमीन, खेती और आजादी बचाने को देश के किसान एक हों!
अखिल भारतीय किसान महासभा (एआइकेएम) ने देश के किसानों और किसान संगठनों का आह्वान किया है कि ‘जमीन, खेती और आजादी’ बचाने के लिए अब एक होने का समय आ गया है. किसान महासभा ने कहा है कि बिखरी ताकत और गैर राजनीति का विचार, खेती, किसानी और आजादी पर सत्ता के संगठित हमलों का मुकाबला नहीं कर सकता है. किसान महासभा ने यह आह्वान 20-21 सितंबर को जालंधर (पंजाब) में आयोजित अपने 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन से किया है. 20 सितम्बर को एआइकेएम के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के अवसर पर जालंधर के ‘देशभक्त यादगार’ स्थित ‘शहीद भगत सिंह ऑडिटोरियम’ में आयोजित विशाल ‘किसान-मजदूर एकता रैली’ पंजाब के कोने-कोने से आए दस हजार से ज्यादा किसानों-मजदूरों ने में हिस्सा लिया. रैली में उमड़ी भीड़ को खपाने की क्षमता अकेले आडिटोरिम में नहीं थी, इसलिए आडिटोरियम से लगे पार्क और भवन के हाॅल में भी स्क्रीन लगाकर रैली को लाइव दिखाने की व्यवस्था थी. इसके बावजूद हजारों लोगों को देशभक्त यादगार परिसर के बाहर सड़क पर ही अपने नेताओं के भाषण सुनने पड़े.
सम्मेलन का मुख्य नारा था: ‘खेत, खेती, आजादी बचाओ; काॅरपोरेट लूट का राज मिटाओ!’ खुले सत्र की इस सभा की शुरुआत अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और चर्चित किसान नेता रुल्दू सिंह मानसा ने शहीदों को श्रद्धांजलि देकर व शहीद वेदी के पास संगठन का झंडा फहरा कर की. इस मौके पर भाकपा(माले) लिबरेशन के महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य, आरएमपीआइ के महासचिव कामरेड मंगतराम पासला, अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव कामरेड राजा राम सिंह व सचिव पुरुषोत्तम शर्मा, जम्हूरी किसान सभा के अध्यक्ष कामरेड डाॅ. सतनाम सिंह अजनाला व महासचिव कामरेड कुलवंत सिंह संधू, आरएमपीआइ के पंजाब राज्य सचिव कामरेड परगट सिंह जमराइ, भाकपा(माले) लिबरेशन के केन्द्रीय कमेटी सदस्य कामरेड राजविंदर सिंह राणा प्रमुख रूप से मौजूद थे.
रैली का उद्घाटन डाॅ. सतनाम सिंह अजनाला (जम्हूरी किसान सभा के राज्य अध्यक्ष) ने किया. रैली के मुख्य वक्ता भाकपा(माले) लिबरेशन के महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य और विशिष्ट वक्ता आरएमपीआइ के महासचिव कामरेड मंगतराम पासला थे. कामरेड राजा राम सिंह (लोकसभा सांसद और एआइकेएम के राष्ट्रीय महासचिव), कुलवंत सिंह संधू (जेकेएस के महासचिव), कामरेड राजीव डिमरी (महासचिव एक्टू), कामरेड सत्यदेव राम (ऑल इंडिया एग्रीकल्चरल एंड रूरल लेबर एसोसिएशन के राष्ट्रिय अध्यक्ष), डाॅ. सुनीलम (किसान संघर्ष समिति, मध्य प्रदेश के संयोजक और पूर्व विधायक), बलदेव सिंह निहालगढ़ (अखिल भारतीय किसान सभा, अजय भवन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष), कामरेड निर्भय सिंह (कीर्ति किसान यूनियन, पंजाब के नेता), गोबिंद सिंह छाजली (मजदूर मुक्ति मोर्चा, पंजाब के अध्यक्ष), दर्शन नाहर (देहाती मजदूर सभा के अध्यक्ष), आमीन (आइसा नेता) आदि ने सभा को संबोधित किया. सम्मेलन के लिए अखिल भारतीय किसान सभा केनिंग लेन के अध्यक्ष कामरेड अशोक धावले और महासचिव कामरेड बीजू कृष्णन तथा अखिल भारतीय किसान एवं खेत मजदूर संगठन के अध्यक्ष कामरेड सत्यवान ने भी अपने संगठन की ओर से शुभकामना सन्देश भेजे.
रैली को संबोधित करते हुए भाकपा(माले) लिबरेशन के महासचिव काॅमरेड दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि पंजाब के दो बड़े किसान संगठनों – ‘जम्हूरी किसान सभा, पंजाब’, ‘पंजाब किसान यूनियन’ और हरियाणा के किसान संगठन ‘पगड़ी संभल जट्टा किसान संघर्ष समिति’ का ऐतिहासिक विलय और उनका ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’ में शामिल होना, किसानों के संघर्ष और काॅरपोरेट-समर्थक, सांप्रदायिक-फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ व्यापक जनांदोलन को नई गति देगा. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन, दिल्ली में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का सफल आंदोलन, और अब पेपर-लीक घोटाले और बदहाल होती सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के खिलाफ देशव्यापी ‘जेन-जी’ (Gen-Z) आंदोलन हुए हैं. ये आंदोलन एक-दूसरे की खूबियों और कमियों से सीख कर आगे बढ़े हैं और जनता को एकजुट कर के देश में लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि किसानों, मजदूरों और युवाओं की मौजूदा पीढ़ी के लिए सबसे जरूरी काम देश को फासीवाद से मुक्त कराना है.
इस मौके पर बोलते हुए, आरएमपीआइ के महासचिव काॅमरेड मंगत राम पासला ने कहा कि पंजाब से शुरू हुई किसान संगठनों के बीच एकता की लहर पूरे देश में फैलेगी और देश भर के किसान और मजदूर संगठनों को एकजुट होने के लिए प्रेरित करेगी. संघ-बीजेपी की विचारधारा मजदूरों, किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों, लोकतंत्र और संघवाद की विरोधी है. इनकी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए देश की क्रांतिकारी, लोकतांत्रिक और देशभक्त ताकतों के बीच व्यापक एकता समय की जरूरत है. उन्होंने कहा कि भले ही पंजाब की मान सरकार ‘बदलाव’ के नारे के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन सरकारी दफ्तरों में शहीद भगत सिंह और डाॅ. अंबेडकर की तस्वीरें लगाने के अलावा राज्य में कहीं भी कोई सार्थक बदलाव नहीं दिख रहा है. यह सरकार आर्थिक मोर्चे पर सुधार करने और पुलिस व नौकरशाही पर लगाम लगाने में पूरी तरह नाकाम रही है. पंजाब के लोग बीजेपी के झूठे दावों को पूरी तरह से खारिज करें और आने वाले चुनावों में ऐसे सच्चे प्रतिनिधियों को चुनकर विधानसभा में भेजें जो किसानों, मजदूरों और युवाओं के लिए बिना किसी समझौते के संघर्ष कर रहे हैं.
कामरेड राजा राम सिंह ने कहा कि अमेरिकी साम्राज्यवाद वेनेजुएला पर कब्जे और गाजा व ईरान पर हमलों के जरिए दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों और उपजाऊ जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है. मोदी सरकार ने मुक्त व्यापार समझौते को लेकर ट्रंप प्रशासन के सामने घुटने टेक दिए हैं, लेकिन देश के किसान और मजदूर इन कदमों का डटकर विरोध करेंगे. जालंधर में किसान संगठनों की यह एकता देश भर में किसान आंदोलन को मजबूती देगी.
सम्मेलन स्थल का ऐतिहासिक महत्व
सम्मेलन का उद्घाटन (रैली) स्थल ‘शहीद भगत सिंह आडिटोरियम’ था जबकि मंच हाल ही में दिवंगत हुए एआइकेएम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड प्रेम सिंह गहलावत और देहाती मजदूर सभा के महासचिव कामरेड गुरनाम दाउद को समर्पित किया गया था. सम्मेलन हाॅल को पंजाब में किसान सभा के पहले राज्य अध्यक्ष बाबा ज्वाला सिंह ठंठियां के नाम समर्पित किया गया था. सम्मेलन के लिए इस पूरे परिसर और उसके बाहर के क्षेत्र को किसान महासभा के नए झंडे, जम्हूरि किसान सभा और पंजाब किसान यूनियन के झंडों-बैनरों, शहीदों और दिवंगत साथियों की तस्वीरों, नारे लिखे फ्लेक्सों से सजाया गया था. जालंधर का यह ऐतिहासिक ‘देशभक्त यादगार परिसर’, जिसमें यह सम्मेलन आयोजित किया गया था, अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई में अपने जीवन को कुर्बान करने वाले सैकड़ों ‘गदरी’ बाबाओं की याद में बनाया गया है. पंजाब में कम्युनिस्ट आन्दोलन, ऐतिहासिक मुजारा (बटाईदार) किसान आंदोलन और बाद में नक्सलबाड़ी लहर को पंजाब में शुरू करने वाले लोगों में भी गदर आंदोलन से जुड़े लोगों का बड़ा योगदान रहा है. सम्मेलन ने गदर आंदोलन के प्रणेता लाला हरदयाल, 19 वर्ष की कम आयु में फांसी चढ़ने वाले गदरी करतार सिंह सराभा, बाबा सोहन सिंह भाखना सहित गदर आन्दोलन से जुड़े सभी क्रांतिकारियों को याद कर अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की.
सम्मेलन में पंजाब और भारत की धरती के उन वीर सपूतों को श्रद्धा से याद किया, जिन्होंने भारत में किसानों-गरीबों को संगठित कर जमीन और आजादी दिलाने के लिए खुद को समर्पित किया था. उनमें किसानों को पहली बार भूमि का मालिकाना देनेवाले दसवें गुरु गोबिंद सिंह के शिष्य बंदा बहादुर सिंह, ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन के नायक चाचा अजीत सिंह, अवध के ऐतिहासिक किसान आंदोलन के नेता बाबा रामचंद्र और मदारी पासी, देश की आजादी और साम्यवाद के लिए 23 वर्ष की आयु में फांसी चढने वाले जनता के सबसे चहेते शहीदे आजम भगत सिंह, ‘जमींदारी विनाश नारे’ को एक राजनीतिक एजेंडा बनाकर किसान सभा का गठन करने वाले स्वामी सहजानंद सरस्वती, पंजाब का मुजारा किसान आंदोलन के अगुआ जागीर सिंह जोगा, तेजा सिंह स्वतंत्र, एपीएमसी एक्ट के प्रणेता सर छोटूराम, बारदोली, तेलंगाना, तेभागा और नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के सभी नायकों, पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर के अगुआ बाबा बूझा सिंह सहित उनके साथ लड़े हजारों क्रान्तिकारी शामिल थे. सम्मेलन के लिए जालंधर का नामकरण किसान सभा के संस्थापक स्वामी सहजानंद सरस्वती के नाम किया गया था.
दो क्रांतिकारी किसान संगठनों के एकीकरण का सम्मेलन
किसान महासभा का 5वां राष्ट्रीय सम्मेलन भारत के किसान आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन में एक ऐतिहासिक और यादगार स्थान बना गया. सम्मेलन भारत के किसान आंदोलन के दो क्रान्तिकारी संगठनों ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’ और ‘जम्हूरी किसान सभा’ के एकीकरण के ऐतिहासिक क्षण का गवाह बना. इस सम्मेलन के आयोजक दो किसान संगठन ‘जम्हूरी किसान सभा’ और ‘पंजाब किसान यूनियन (सम्बद्ध-एआइकेएम)’ ने न सिर्फ पंजाब के अन्दर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी किसान आन्दोलन को मजबूत और विस्तारित करने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है. सन् 2020 में मोदी सरकार द्वारा खेती के कारपोरेटीकरण के लिए लाए गए तीन कृषि कानूनों की वापसी, एमएसपी गारंटी कानून और कर्ज मुक्ति के सवाल पर, पंजाब से लेकर दिल्ली के बार्डर पर 13 माह तक चले ऐतिहासिक किसान आन्दोलन में ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’, ‘जम्हूरी किसान सभा’, ‘पंजाब किसान यूनियन’ और ‘पगड़ी संभाल जट्टा किसान संगठन (सम्बद्ध-जम्हूरी किसान सभा) अगुआ भूमिका में थे. उनकी संगठित, जुझारू और वैचारिक भूमिका को भारत के किसान आन्दोलन के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा. भारत के ऐतिहासिक किसान आन्दोलन में अपनी यादगार भूमिका निभाने वाले ये तीनों सगठन इस सम्मेलन के बाद ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’ में विलय कर और भी बड़ी राष्ट्रीय भूमिका निभाने की तरफ बढ़ गए हैं.
सम्मेलन के मंच पर बैठे अन्य प्रमुख किसान नेता
इस मौके पर सम्मेलन स्वागत समिति के अध्यक्ष कान सिंह पन्नू, आरा से लोकसभा सदस्य कामरेड सुदामा प्रसाद; ऐक्टू के महासचिव काॅमरेड राजीव डिमरी; भाकपा(माले) ‘लिबरेशन’ के राज्य सचिव काॅमरेड गुरमीत सिंह बख्तपुर, अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के पूर्व विधायक सत्यदेव राम, काॅमरेड रतन सिंह रंधावा (चेयरमेन, आरएमपीआई), रेलवे कर्मचारी संघ के नेता सरबजीत सिंह; पगड़ी संभाल जट्टा यूनियन (हरियाणा) के अध्यक्ष मनदीप सिंह नाथवान; सत्य शोधक किसान सभा (महाराष्ट्र) के अध्यक्ष काॅमरेड किशोर धमाले; कार्तिक पाल (प. बंगाल), फूलचंद ढेवा (राजस्थान), गुरनाम भिखी (पंजाब), मंदीप नाथवान (हरियाणा), थिरुनावुकरासु (तमिलनाडु), तेजेंदर थिंड और आजाद मिरान (हरियाणा), जयप्रकाश नारायण (यूपी), रामबली सिंह यादव (बिहार), डी हरिनाथ (आंध्र प्रदेश), देवेन्द्र सिंह चौहान (मध्य प्रदेश), संजय राउत (महाराष्ट्र), पूर्व विधायक कामरेड तरसेम जोधा सहित सभी राज्यों से आए सभी प्रमुख किसान नेता सभा मंच पर मौजूद थे. रैली का संचालन पुरुषोत्तम शर्मा और परगट सिंह जमराई ने किया. सम्मेलन के दौरान, राज्य अध्यक्ष डाॅ. धन्नामल के नेतृत्व में मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन द्वारा एक चिकित्सा सहायता शिविर भी लगाया गया था. इस कार्यक्रम के दौरान मंगत राम पासला द्वारा लिखी गई और भदौर संगीत मंडली द्वारा प्रस्तुत एक गजल भी जारी की गई.
प्रतिनिधि सत्र
सम्मेलन का प्रतिनिधि सत्र बाबा ज्वाला सिंह हाॅल में सायं 6 बजे से शुरू हुआ. प्रतिनिधि सत्र के संचालन के लिए सात सदस्यीय अध्यक्ष मंडल, पांच सदस्यीय संचालन समिति और पांच सदस्यीय तकनीकी समिति बनाई गयी थी. सत्र की शुरुआत स्वागत समिति के अध्यक्ष कान सिंह पन्नू (सेवानिवृत्त आईएएस) के स्वागत भाषण से हुआ. कान सिंह पन्नू ने देश भर से आए प्रतिनिधियों और पंजाब स्थित दो किसान संगठनों के एकीकरण का गर्मजोशी से स्वागत किया.
उन्होंने मोदी सरकार द्वारा अपनाए गए तथाकथित विकास माॅडल की भी तीखी आलोचना की, जो शीर्ष 1% अति-धनवान लोगों के मुनाफे को प्राथमिकता देता है. ऐसे समय में जब बड़ी काॅरपोरेट कंपनियां दुनिया पर हावी होने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रही हैं, सभी संघर्षशील संगठनों और जन-हितैषी ताकतों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे एकजुट हों और इन शोषण करने वालों का सामना करने के लिए अपनी सामूहिक शक्ति को काफी मजबूत करें.
इसके बाद विदाई कमेटी की ओर से महासचिव कामरेड राजा राम सिंह ने चर्चा के लिए राजनीतिक-संगठनिक रिपोर्ट पेश की. दूसरे दिन तक तीन सत्रों में चले प्रतिनिधि सत्र में राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट पर चर्चा हुई. इस चर्चा में विभिन्न राज्यों के 61 प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
सम्मेलन में 21 राज्यों से आए 876 प्रतिनिधि/पर्यवेक्षकों ने हिस्सा लिया. इनमें 50 महिला प्रतिनिधि भी शामिल थीं. सम्मेलन ने सर्व सम्मति से 153 सदस्यीय राष्ट्रीय परिषद और उसके बाद नव निर्वाचित राष्ट्रीय परिषद ने अपनी संक्षिप्त बैठक में 57 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव किया. राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से कामरेड डाॅ. सतनाम सिंह अजनाला को राष्ट्रीय अध्यक्ष और कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा को राष्ट्रीय महासचिव चुना. पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड रुल्दू सिंह मानसा राष्ट्रीय कार्यकारिणी का मानद सदस्य और पूर्व महासचिव कामरेड राजा राम सिंह को संरक्षक बनाया गया है.
एआईकेएम और ज्यादा एकजुटता और फौलादी संकल्प के साथ आगे बढ़ें !
(कामरेड दीपंकर के संबोधन का संक्षिप्त अंश)
अखिल भारतीय किसान महासभा (एआइकेएम) के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन की सबसे खास बात यह रही कि पंजाब और हरियाणा के तीन जुझारू किसान संगठन अब एआईकेएम के साझे बैनर तले एकजुट हो गए हैं. इनमें एआइकेएम से पहले से संबद्ध ‘पंजाब किसान यूनियन’ के साथ-साथ ‘जम्हूरी किसान सभा’ और ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ का एक मंच पर आना एक बड़ी घटना है. दिल्ली की सरहदों पर हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन की अगली कतार में रहे इन तीनों संगठनों का नए लाल-हरे झंडे के साथ एकजुट होना ऐसे दौर में बेहद ही हौसला अफजाई करने वाला कदम है, जब किसान आंदोलन खेती पर काॅरपोरेट कब्जे के सीधे खतरे और चौतरफा साम्राज्यवादी हमलों का सामना कर रहा है.
ये तीनों ही संगठन कम्युनिस्ट परंपरा की धारा से निकले हैं. इसीलिए यह एकता पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन और भारत के गहराते कृषि संकट को यकीनी तौर पर हल करने के लिए ‘कृषि क्रांति’ के कम्युनिस्ट एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिहाज से भी बेहद मायने रखती है. ऐसे वक्त में यह बिल्कुल मुनासिब है कि हम किसान आंदोलन में कम्युनिस्ट नजरिया और उसके बुनियादी उसूलों को एक बार फिर शिद्दत से याद करें.
किसान अपनी फितरत से ही बेहद सब्र वाले होते हैं, और वे अच्छी तरह जानते हैं कि फसल के तैयार होने का इंतजार कैसे किया जाता है. खेती-किसानी के चौतरफा ढांचागत संकट के बीच, फसल की बर्बादी उनके लिए कोई नई बात नहीं है. इस अंतहीन संकट को झेलने और उससे टकराने का जबर्दस्त जुझारूपन और हौसला उनके भीतर मौजूद है.
कम्युनिस्ट कभी किसानों के इस धैर्य और सहनशीलता को उनका पिछड़ापन समझने की भूल नहीं करते. कम्युनिस्टों की नजर में किसान सामाजिक बदलाव के खिलाफ खड़ी ताकत नहीं, बल्कि इसके उलट, वे किसानों को एक ऐसी लड़ाकू ताकत के रूप में पहचानते हैं जो सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक बदलाव के लिए भी लंबे समय से संघर्ष करती रही है. यही वजह है कि मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में शुरू होने के बावजूद कम्युनिस्ट आंदोलन ने बहुत जल्द किसानी की इस क्रांतिकारी ताकत और संभावनाओं को पहचान लिया. इसी समझ से जन्म हुआ ‘मजदूर-किसान एकता’ के उस ऐतिहासिक विचार का, जो समाजवाद की सबसे मजबूत बुनियाद है.
कम्युनिस्ट कभी भी किसानों को कोई एक जैसी जमात नहीं मानते. हालांकि खेती-किसानी से सीधे जुड़े समाज के सभी हिस्सों की कई साझा विशेषताएं और कमजोरियां होती हैं, फिर भी कम्युनिस्ट इस बुनियादी हकीकत को कभी नजरअंदाज नहीं होने देते कि खेती करने वाली आबादी दरअसल कई वर्गों में बंटी है. एक छोर पर अमीर किसान हैं, तो दूसरे छोर पर बहुत छोटी जोत वाले किसान, बटाईदार, और भूमिहीन गरीब मजदूर.
स्वामी सहजानंद सरस्वती के समय से, जिनके नाम पर आपने इस सम्मेलन के लिए जालंधर का नामकरण किया है, कम्युनिस्टों ने सबसे पहले भूमिहीन गरीब मजदूरों और बहुत छोटी जोत वाले किसानों पर ध्यान केंद्रित किया है, जो ऐतिहासिक रूप से हमारे समाज के सबसे शोषित और दमित हिस्से रहे हैं. यही वह नजरिया था जिसने बंगाल के महान तेभागा, केरल के पुन्नप्रा-वायलार, पूर्व आंध्र प्रदेश के तेलंगाना या पंजाब की मुजारा लहर के क्रांतिकारी वारिस के तौर पर नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक किसान आंदोलन को जन्म दिया.
चालीस साल पहले हमने बिहार के क्रांतिकारी किसान आंदोलन का एक प्रामाणिक दस्तावेज पेश किया था, जिसका नाम था ‘रिपोर्ट फ्रॉम द फ्लेमिंग फील्ड्स ऑफ बिहार’. उस किताब की भूमिका में कामरेड विनोद मिश्र ने भारत के कृषि संघर्षों में पूरब और पश्चिम की हवाओं के बीच के अंतर्विरोध और टकराहट का जिक्र किया था. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में चले महान बहस के दौरान माओ द्वारा इस्तेमाल किए गए पूरब और पश्चिम की हवा के रूपक को भारतीय संदर्भ में अपनाया था. वहां पूरब की हवा समाजवाद की बढ़त का प्रतीक थी, जबकि पश्चिम की हवा पश्चिमी पूंजीवाद की निशानी थी. भारतीय संदर्भ में कामरेड वीएम ने हरित क्रांति के संकट के सूरत-ए-हाल में महाराष्ट्र से शरद जोशी द्वारा शुरू किए गए अमीर किसानों के उभरते आंदोलन के लिए पश्चिम की हवा की बात की थी, वहीं पूरब की हवा का मतलब बिहार के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाला क्रांतिकारी किसान आंदोलन था.
दिल्ली की सरहदों पर हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन में ये दोनों पश्चिम और पूरब की हवाएं एक साथ आईं और हुकूमत को काॅरपोरेट हितों वाले तीनों कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया. दोनों धाराओं के बीच का अंदरूनी अंतर्विरोध व्यापक काॅरपोरेट-विरोधी और साम्राज्यवादी-विरोधी संघर्ष में उनके साझे सहयोग की राह में आड़े नहीं आया. यह पूरब-पश्चिम का तर्क-वितर्क भारत का कोई भौगोलिक बंटवारा नहीं है, बल्कि यह अंतर्विरोध पूरे देश में मौजूद है. पंजाब और महाराष्ट्र के भीतर भी कम्युनिस्ट अगुवाई वाला किसान आंदोलन छोटे और बहुत ही छोटे जोत वाले किसानों के हितों की हिफाजत के लिए पूरी मजबूती से डटा रहा है. वहीं बिहार में, 1857 की पहली आजादी की लड़ाई की 153वीं सालगिरह पर 10 मई 2010 को एआइकेएम ने अपने सफर की शुरूआत उस दौर में शुरू की थी, जब भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सामंती ताकतें खून-खराबे की धमकियां दे रही थीं.
क्रांतिकारी किसान आंदोलन का सफर आज एक नए दौर में दाखिल हो रहा है, जिसमें भारत के किसानों को काॅरपोरेट और साम्राज्यवादी हमलों से बचाने, फासीवाद के खिलाफ देश की जंग को धार देने और बराबरी वाले समाज को बनाने के लिये लंबी लड़ाई को आगे बढ़ाने का नया हौसला और ताकत है. भाकपा(माले) इस ऐतिहासिक लंबी कूच में अखिल भारतीय किसान महासभा के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन की शानदार कामयाबी की कामना करती है.
प्रतिनिधि सत्र में कामरेड मंगतराम पासला ने कहा
“किसान संगठनों के एकीकरण से आज हम बहुत खुश हैं. इस मौके का हमें काफी समय से इंतजार था. हमें दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को भी अपने साथ किसान आन्दोलन से जोड़ना होगा. आगे चलकर हमें आन्दोलन की तमाम धाराओं को अपने साथ जोड़ना है. इसके लिए हमें जमीनी स्तर पर और भी ज्यादा मेहनत करनी होगी. हमें यह ध्यान रखना होगा कि सिर्फ नाम बड़ा नहीं होता है. राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों का आह्वान राष्ट्रीय स्तर का ढांचा देगा, पर हमें स्थानीय सवालों पर भी राज्य या क्षेत्र के आधार पर लड़ना होगा. राष्ट्रीय आह्वानों को गंभीरता से लागू करना होगा. हम यह न भूलें कि हमें किसानों का वैचारिक राजनीतिक स्तर उठाना है, तभी वे राजनीतिक रूप से भी हमारे साथ जुड़ेंगे.”