वर्ष 35 / अंक - 14 / ईरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी अवाम के नाम खुला खत

ईरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी अवाम के नाम खुला खत

ईरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी अवाम के नाम खुला खत

(अमेरिका के लोगों के नाम, और उन सबके नाम जो तोड़-मरोड़ कर गढ़े गए बयानों और प्रोपेगेंडा के इस सैलाब के बीच भी सच तलाश करना चाहते हैं और एक बेहतर जिंदगी का ख्वाब देखते हैं)

ईरान – अपने नाम, अपनी पहचान और अपने पूरे इतिहास के साथ – इंसानी तहजीब की सबसे पुरानी लगातार चली आ रही सभ्यताओं में से एक है. अपने इतिहास और भौगोलिक मजबूती के बावजूद, आधुनिक दौर में ईरान ने कभी भी हमले, विस्तारवाद, उपनिवेशवाद या दबदबे का रास्ता नहीं चुना.

दुनिया की बड़ी ताकतों के कब्जे, हमलों और लगातार दबाव को झेलने के बावजूद – और अपने कई पड़ोसियों से फौजी ताकत में आगे होने के बावजूद – ईरान ने कभी जंग की शुरुआत नहीं की. लेकिन जिसने भी उस पर हमला किया, उसका उसने डटकर और बहादुरी से जवाब दिया.

ईरान के लोगों के दिल में किसी भी कौम के लिए दुश्मनी नहीं है – न अमेरिका के लोगों के लिए, न यूरोप के, न अपने पड़ोसी मुल्कों के लिए. अपने पूरे इतिहास में बार-बार बाहरी दखल और दबाव झेलने के बावजूद, ईरानी अवाम ने हमेशा हुकूमतों और उन हुकूमतों के लोगों के बीच साफ फर्क रखा है. यह कोई अस्थाई राजनीतिक रुख नहीं, बल्कि ईरानी समाज और उसकी सामूहिक सोच में गहराई से बसा हुआ एक उसूल है.

इसलिए, ईरान को खतरे के तौर पर पेश करना न तो इतिहास की सच्चाई से मेल खाता है और न ही आज की जमीनी हकीकत से. दरअसल, ऐसी तस्वीर ताकतवर मुल्कों की राजनीतिक और आर्थिक जरूरतों की ऊपज है – जहां दबाव को जायज ठहराने, फौजी दबदबा बनाए रखने, हथियारों के कारोबार को जिंदा रखने और अहम बाजारों पर नियंत्रण के लिए एक दुश्मन गढ़ना जरूरी बना दिया जाता है. ऐसे माहौल में अगर कोई खतरा मौजूद न हो, तो उसे पैदा कर लिया जाता है.

इसी सोच के तहत, अमेरिका ने अपनी सबसे बड़ी फौजी मौजूदगी – अपने ठिकाने, बेस और हथियारों की ताकत – ईरान के इर्द-गिर्द जमा कर रखी है. एक ऐसा मुल्क, जिसने कम-से-कम अमेरिका के वजूद में आने के बाद से कभी जंग की शुरुआत नहीं की. हाल के अमेरिकी हमले, जो इन्हीं ठिकानों से किए गए, यह साफ दिखाते हैं कि असली खतरा दरअसल यही फौजी मौजूदगी है.

ऐसे हालात में किसी भी मुल्क से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपनी हिफाजत को मजबूत न करे. ईरान ने जो किया है, और जो वह कर रहा है, वह वैध आत्मरक्षा के तहत एक संयमित जवाब है – न कि जंग या हमले की शुरुआत.

ईरान और अमेरिका के रिश्ते शुरू से दुश्मनी भरे नहीं थे. शुरुआत में दोनों अवामों के बीच ताल्लुकात न तो दुश्मनाना थे, न ही किसी तख्तापलट जैसी घटना से दागदार. लेकिन मोड़ तब आया, जब ईरान के अपने संसाधनों के राष्ट्रीयकरण को रोकने के लिए दखल दिया गया. 1953 का वह गैर-कानूनी तख्तापलट ईरान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित कर गया, एक तानाशाही को फिर से थोप दिया और ईरानियों के दिलों में अमेरिकी नीतियों के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया.

यह अविश्वास और गहरा होता गया – शाह के निजाम को अमेरिका की सरपरस्ती, 1980 के दशक की थोपी गई जंग में सद्दाम हुसैन का साथ देना, आधुनिक इतिहास के सबसे लंबे और सबसे सख्त प्रतिबंध थोपना, और आखिर में – बातचीत के दौर के बीच – बिना किसी उकसावे के दो बार सैन्य हमला करना. इन सबने इस अविश्वास को और पुख्ता किया.

लेकिन इन तमाम दबावों के बावजूद ईरान कमजोर नहीं हुआ. उल्टा, कई क्षेत्रों में वह और मजबूत होकर उभरा हैः साक्षरता दर तीन गुना बढ़ी है. उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से फैला है. आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अहम तरक्की हुई है. स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं. और बुनियादी ढांचे का विकास उस रफ्तार और पैमाने पर हुआ है, जिसकी पहले कोई मिसाल नहीं मिलती. ये सब ठोस, देखी-परखी हकीकतें हैं – जो किसी गढ़ी गई कहानी या प्रोपेगेंडा से अलग, अपने दम पर खड़ी हैं.

साथ ही, प्रतिबंधों, जंग और हमलों का ईरानी अवाम की जिंदगी पर जो विनाशकारी और अमानवीय असर पड़ा है, उसे कम करके नहीं आंका जा सकता. हालिया बमबारी और फौजी हमलों के इस सिलसिले ने लोगों की जिंदगी, उनकी सोच और नजरिए पर गहरा असर डाला है. यह एक बुनियादी इंसानी सच्चाई को सामने लाता हैः जब जंग लोगों की जिंदगियों, घरों, शहरों और उनके भविष्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है, तो लोग इसके जिम्मेदारों के प्रति उदासीन नहीं रह सकते.

यहीं एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है : आखिर इस जंग से अमेरिकी अवाम के कौन-से हित पूरे हो रहे हैं? क्या ईरान से कोई ऐसा वास्तविक खतरा था, जो इस तरह के रवैये को जायज ठहरा सके? क्या मासूम बच्चों का कत्ल, कैंसर के इलाज की दवाएं बनाने वाली फैक्ट्रियों को तबाह करना, या किसी मुल्क को ‘पत्थर के दौर में वापस भेज देने’ पर शेखी बघारना – इन सबका मकसद बस यही है कि दुनिया में अमेरिका की बची-खुची साख और गिरे?

ईरान ने बातचीत का रास्ता अपनाया, समझौता किया और अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी कीं. उस समझौते से पीछे हटने का फैसला, टकराव की ओर बढ़ना और बातचीत के बीच दो बार हमला करना – ये सब अमेरिकी हुकूमत के ऐसे विनाशकारी फैसले थे, जिन्होंने एक बाहरी हमलावर की खतरनाक गलतफहमियों को ही बढ़ावा दिया.

ईरान के अहम बुनियादी ढांचे – जैसे ऊर्जा और औद्योगिक ठिकानों – पर हमला करना सीधे तौर पर ईरानी अवाम को निशाना बनाना है. यह न सिर्फ एक युद्ध अपराध है, बल्कि इसके असर ईरान की सरहदों से बहुत आगे तक जाते हैं. इससे अस्थिरता बढ़ रही है, मानवीय और आर्थिक नुकसान बढ़ता जा रहा है, और टकराव का एक ऐसा चक्र जारी रहता है जो सालों तक नफरत और कड़वाहट के बीज बोता रहता है. यह ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि रणनीतिक भटकाव और किसी टिकाऊ हल तक पहुंचने में नाकामी की निशानी है.

क्या यह सच नहीं है कि अमेरिका इस हमले में इस्राइल की चालाकी और साजिश के जाल में फंसकर उसका एजेंट बनकर उतरा है? क्या यह सच नहीं है कि इस्राइल, ईरान का झूठा खतरा गढ़कर, दुनिया का ध्यान फिलिस्तीनियों के खिलाफ अपने जनसंहार के अपराधों से हटाना चाहता है? क्या यह साफ नहीं दिख रहा कि इस्राइल अब ईरान से लड़ाई को आखिरी अमेरिकी सैनिक और आखिरी अमेरिकी करदाता के डॉलर तक ले जाना चाहता है – अपने खब्त और नाजायज मंसूबों का बोझ ईरान, पूरे इलाके और खुद अमेरिका पर डालते हुए?

तो क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ आज सच में अमेरिकी हुकूमत की प्राथमिकताओं में शामिल है?

मैं आपको आमंत्रण देता हूं कि आप इस दुष्प्रचार की मशीनरी से बाहर निकलकर – जो इस हमले का अहम हिस्सा है – खुद हकीकत को देखेंं. उन लोगों से बात करें जो ईरान गए हैं. उन कामयाब ईरानी प्रवासियों को देखें – जो ईरान में पढ़े-लिखे हैं – और आज दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में पढ़ा रहे हैं, रिसर्च कर रहे हैं, या पश्चिम की सबसे उन्नत टेक्नोलॉजी कंपनियों में अहम योगदान दे रहे हैं. क्या ये हकीकतें उस झूठी तस्वीर से मेल खाती हैं, जो आपको ईरान और उसके लोगों के बारे में दिखाई जा रही है?

आज दुनिया एक चौराहे पर खड़ी है. टकराव का रास्ता अब पहले से कहीं ज्यादा महंगा और बेकार साबित हो रहा है. टकराव और संवाद के बीच चुनाव असली है, और इसके नतीजे आने वाली कई नस्लों का भविष्य तय करेंगे.

हजारों साल के अपने गौरवशाली इतिहास में, ईरान ने कई हमलावरों को झेला है. आज उनका नाम इतिहास में बदनामी के साथ दर्ज है – लेकिन ईरान आज भी कायम है : मजबूत, सरबुलंद और बाइज्जत.

(हिंदी अनुवाद – मनमोहन)


04 April, 2026