-- सुबोध मोरे
“चवदार तालाब का पानी पी लेने से हम-तुम अमर नहीं हो जाएंगे. आज तक हमने वह पानी नहीं पिया था, फिर भी हम मरे नहीं थे. चवदार तालाब पर जाने का मकसद सिर्फ पानी पीना नहीं है. वहां हमें इसलिए जाना है कि यह साबित कर सकें – हम भी दूसरों की तरह इंसान हैं!”
(– डॉ. बाबासाहेब अंबेडक रदूसरी बहिष्कृत परिषद, महाड, 1927)
इस सत्याग्रह से पहले भी छुआ-छूत की प्रथा और उससे जुड़ी रूढ़ियों के खिलाफ सामाजिक बराबरी के लिए कई संघर्ष हुए थे. इनमें महात्मा जोतिबा फुले, सावित्राीबाई फुले, रामस्वामी पेरियार, छत्रपति शाहू महाराज जैसे समाज सुधारकों का अहम योगदान था. लेकिन महाड के चवदार तालाब सत्याग्रह की असली खासियत यह थी कि यह लड़ाई अछूतों पर हो रहे जुल्म और गैर-बराबरी के खिलाफ खुद उन्हीं पीड़ित लोगों ने शुरू की और उसकी अगुवाई भी की. यह पहल किसी गैर-दलित तबके की तरफ से नहीं आई थी. जाति और धार्मिक व्यवस्था के शिकार, मनुस्मृति की सोच के कारण अमानवीय और हीन जिंदगी जीने को मजबूर लोगों ने खुद उठकर इस संघर्ष का नेतृत्व किया. भारतीय समाज परिवर्तन के इतिहास में यह पहली बार हुआ था. इसी संघर्ष से आगे चलकर एक स्वतंत्र दलित आंदोलन की मजबूत बुनियाद पड़ी.
महाड में सामाजिक बदलाव की लहर
महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में स्थित महाड – जो रायगढ़ की तलहटी में बसा है और छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रहा – वहीं यह ऐतिहासिक चवदार तालाब सत्याग्रह और मनुस्मृति दहन हुआ. उस समय महाड सामाजिक परिवर्तन की एक उभरती हुई जमीन बन चुका था, जिसके पीछे ठोस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि थी. ब्रिटिश राज के आने के बाद कोंकण के अछूतों को सेना में नौकरी के मौके मिले. इससे उनकी जिंदगी में बदलाव आया – उन्होंने गुलामी की मानसिकता को ठुकराकर स्वाभिमान के साथ जीना शुरू किया और शिक्षा तक उनकी पहुंच बनी. इसी दौर में महात्मा जोतिबा फुले जैसे समाज क्रांतिकारियों के विचारों और आंदोलनों का असर फैल रहा था. ब्रिटिश सेना से जुड़े गोपालबाबा वलंगकर जैसे सुधारक महाड, दसगांव और दापोली इलाके में ‘अनार्य दोष परिहार मंडल’ जैसी संस्थाओं के जरिए अछूतों के बीच जनजागरण और बराबरी की चेतना फैला रहे थे. उस समय उनके साथ डॉ. अंबेडकर के पिता, रामजी सकपाल, दसगांव के माडीवाले जोशी उर्फ विठ्ठल हाटे, बीड़ के गंगाराम भागोजी सवादकर और पनवेल के सुबेदार गंगाराम भातणकर जैसे कार्यकर्ता कोकण की इस सामाजिक बदलाव की मुहिम में अगली कतार में खड़े थे.
पानी के स्रोत अछूतों के लिए खोलने का वलंगकर का प्रस्ताव
कोकण के शुरुआती समाज सुधारकों और पहले पत्रकारों में गिने जाने वाले गोपाल बाबा वलंगकर ‘अनार्य दोष परिहार मंडल’ के चिटणीस, यानी सचिव थे. सामाजिक जागरूकता और जन-जागरण के उनके काम के कारण ही ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1895 में महाड लोकल बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया था. उसी दौर में उन्होंने सबसे पहले यह प्रस्ताव रखा कि सभी सार्वजनिक तालाब, कुएं और पानी के स्रोत अछूतों के लिए खोले जाएं, और अछूत बच्चों को स्कूलों में दाखिला मिले – यह अपने समय की एक बेहद अहम और साहसिक पहल थी.
बाद में 1923 में मुंबई असेम्बली में रावबहादुर सी. के. बोले ने वलंगकर की इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए ‘बोले प्रस्ताव’ पास कराया, जिसमें कहा गया कि सभी सार्वजनिक जगहें – कुएं, तालाब, पनघट और धर्मशालाएं – अछूतों समेत सभी के लिए खुली हों. इसी कड़ी में 1924 में महाड नगरपालिका के अध्यक्ष सुरबानाना टिपणीस ने भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित कराया. लेकिन हकीकत यह रही कि इन प्रस्तावों को महाड और दूसरे इलाकों में जमीन पर लागू नहीं किया जा सका.
दसगांव के रामचंद्र मोरे की पहल
दसगांव के पढ़े-लिखे अछूत नौजवान रामचंद्र मोरे ने सार्वजनिक जगहों पर मौजूद कुओं, तालाबों और पनघटों को खोलने के इस प्रस्ताव को जमीन पर उतारने की पहल की. रामचंद्र को अपनी पढ़ाई के दौरान भी अछूत होने का अपमान झेलना पड़ा था. स्कूल में दाखिले के लिए उन्हें महाड के कट्टर सनातनी सोच वाले लोगों से संघर्ष करना पड़ा. कलेक्टर को आवेदन और अखबारों में पत्र लिखने के बाद ही, उसके हस्तक्षेप से उन्हें हाई स्कूल में प्रवेश मिल सका. रामचंद्र मोरे को वैचारिक प्रेरणा गोपाल बाबा वलंगकर से मिली, और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के बड़े भाई बलरामदादा अंबेडकर का भी उन पर गहरा असर था.
इसी युवा रामचंद्र मोरे ने आगे बढ़कर 1924 में महाड नगरपालिका के प्रस्ताव को लागू करने के लिए दसगांव, बीड़ और महाड इलाके के अछूत युवाओं की पहली सभा बुलाई. यह सभा महाड के तत्कालीन महारवाड़ा में हुई, जो आज की क्रांति भूमि के पास है. इस बैठक में रामचंद्र मोरे ने ‘बोले प्रस्ताव’ की जानकारी सबके सामने रखी और तय किया गया कि इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए महाड में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की अगुवाई में ‘बहिष्कृत परिषद’ आयोजित की जाएगी. खास बात यह थी कि इस सभा में कोई भी गैर-अछूत मौजूद नहीं था – यह पूरी तरह पीड़ित समाज की अपनी पहल थी. इसी सभा ने रामचंद्र मोरे को डॉ. अंबेडकर को परिषद में लाने की जिम्मेदारी सौंपी. इसके बाद मोरे, मुंबई में रह रहे कोंकण के दलित समाज के वरिष्ठ नेता संभाजी तुकाराम गायकवाड़ के साथ, डॉ. अंबेडकर से उनके दफ्तर में मिलने गए. उस समय उनके साथ सामाजिक कार्यकर्ता भाई अनंत चित्रो भी मौजूद थे. दोनों ने मोरे से परिषद की पूरी जानकारी ली और कहा कि फैसला बाद में बताया जाएगा. इसके बाद जब-जब रामचंद्र मोरे मुंबई आते, वे डॉ. अंबेडकर से मिलकर परिषद में आने के लिए लगातार प्रयास करते रहे.
‘महार समाज सेवा संघ’ की स्थापना
महाड में होने वाली परिषद की तैयारियों का जायजा लेने के लिए डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने एक बार ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ के सदस्य और अपने सहयोगी कमलाकांत चित्रो को महाड भेजा. उनके साथ रामचंद्र मोरे ने महाड इलाके के अछूत समाज के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई, जिसमें सूबेदार विश्राम सवादकर, चर्मकार समाज के भानुदास कांबले और अन्य साथी मौजूद थे. इस बैठक के बाद कमलाकांत चित्रो, मोरे और सवादकर महाड के मेयर सुरबानाना टिपणीस से मिले और उन्होंने प्रस्ताव के कानूनी पहलू को समझाया. साथ ही बताया कि जल्द ही महाड में ‘बोले प्रस्ताव’ की अमलदारी के लिए डॉ. अंबेडकर की अगुवाई में ‘बहिष्कृत परिषद’ आयोजित की जाएगी. उस समय सुरबानाना टिपणीस ने इस कॉन्फ्रेेंस को सहयोग देने का भरोसा दिया.
इसके बाद अगले दो वर्षों तक रामचंद्र मोरे कॉन्फ्रेेंस की तैयारी को लेकर लगातार बाबासाहेब से और मुंबई में रह रहे मेहनतकश दलित युवाओं से संपर्क में बने रहे. इसी दौर में 1926 में मुंबई में मोरे ने संभाजी तुकाराम गायकवाड़ की मदद से युवाओं का संगठन ‘महार समाज सेवा संघ’ की स्थापना की. वे स्वयं इसके जनरल सेक्रेटरी बने, जबकि भीकाजी गायकवाड़ और केशवराव आड्रेकर क्रमशः प्रेसिडेंट और ट्रेजरर बने. इस संगठन के कार्यकर्ता मुंबई और कोंकण इलाके में प्रस्तावित महाड परिषद के प्रचार-प्रसार और फंड जुटाने के लिए दिन-रात सक्रिय रहे. इन्हीं के प्रयास से परिषद के लिए चंदा जुटाने हेतु मुंबई के दामोदर हॉल नाट्यगृह में ‘संत तुकाराम’ नाटक का एक विशेष मंचन भी आयोजित किया गया.
दसगांव के क्रॉफर्ड तालाब और कुएं पर पानी सत्याग्रह
रामचंद्र मोरे ने ‘बोले प्रस्ताव’ को जमीन पर लागू करने के लिए अपने गांव दसगांव के क्रॉफर्ड तालाब और कुएं पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम करने की सूचना तहसीलदार और पुलिस प्रशासन को दी. इस कार्यक्रम में लगभग 200-250 लोगों की मौजूदगी रही. 4 दिसंबर 1926 को मोरे ने इस तालाब और कुएं का पानी सार्वजनिक रूप से पिया और महाड सत्याग्रह से पहले ही ‘बोले प्रस्ताव’ को व्यवहार में लागू कर दिया. इस कार्यक्रम में महाड और आसपास के पांच कोस के इलाकों के अछूत समाज के प्रमुख कार्यकर्ता शामिल हुए. कार्यक्रम की अध्यक्षता गांव के सोनार समाज के आर. बी. पोतदार ने की.
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की मौजूदगी में चवदार तालाब आंदोलन
दसगांव के इस कार्यक्रम के बाद महाड और पूरे कोंकण क्षेत्र के अछूत समाज में नई ऊर्जा और जोश पैदा हुआ, और लोग महाड बहिष्कृत परिषद की तैयारियों में पूरी ताकत से जुट गए. इसी दौरान भाई अनंत चित्रो ने जनवरी 1927 में बापू सहस्रबुद्धे को एक पत्र में बताया कि रामचंद्र मोरे और विश्राम सवादकर परिषद की तैयारी तेजी से कर रहे हैं, इसलिए डॉ. अंबेडकर से कॉन्फ्रेंस की तारीख तय करवाई जाए. इसके बाद फरवरी में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने 19-20 मार्च 1927 की तारीख तय कर दी. ऐतिहासिक ‘बहिष्कृत परिषद’ महाड के वीरेश्वर थिएटर के सभागार में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की अध्यक्षता में संपन्न हुई, जिसमें कोंकण के पहले दादासाहेब उर्फ कर्मवीर संभाजी तुकाराम गायकवाड़ स्वागताध्यक्ष थे. इस परिषद के प्रमुख आयोजक आर. बी. मोरे थे, जिन्होंने अतिथियों का परिचय भी कराया. गैर-दलित पक्ष से केवल मुंबई से आए भाई अनंत चित्रो और बापूसाहेब सहस्रबुद्धे ही मंच पर मार्गदर्शक के रूप में मौजूद थे. इसके अलावा नगराध्यक्ष सुरबानाना टिपणीस और महाड के कुछ ही गैर-अछूत लोग इस परिषद में शामिल हुए. 20 मार्च को दोपहर में, परिषद में भाई चित्रो के आह्वान के बाद डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के नेतृत्व में सभी लोग बाजार से जुलूस के रूप में चवदार तालाब पहुंचे और वहां सभी ने अपनी हथेलियों में पानी लेकर सार्वजनिक रूप से पिया. इस तरह ‘बोले प्रस्ताव’ और बुनियादी मानव अधिकारों को पहली बार जमीन पर लागू किया गया.
महाड में सनातनियों द्वारा सत्याग्रहियों पर हमला
इस घटना के बाद गांव के जातिवादी, सनातनी और धार्मिक कट्टरपंथियों ने झूठी अफवाहें फैला दीं कि ये अछूत लोग अब वीरेश्वर मंदिर में घुसकर मंदिर को अपवित्र कर देंगे. इस अफवाह से आम लोगों और श्रद्धांलुओं को भड़काया गया और उन्होंने परिषद में आए सत्याग्रहियों पर बेरहमी से हमला कर दिया. इस हमले में बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं भी बड़ी संख्या में घायल हुईं. कुछ जगहों पर सत्याग्रहियों ने भी हमलावरों का प्रतिरोध करते हुए जवाबी कार्रवाई की. पूरे महाड में हिंसा, अफरा-तफरी और तनाव का माहौल फैल गया. बाद में पुलिस ने हस्तक्षेप कर हालात को काबू में किया, हमलावरों को खदेड़ा और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर समेत सभी सत्याग्रही कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान की. इसी तरह यह पहली परिषद किसी तरह संपन्न हो सकी.
अछूतों द्वारा तालाब का पानी पीने के बाद, महाड के ब्राह्मणों और तथाकथित सनातनी संस्कृति के ठेकेदारों ने हंगामा खड़ा कर दिया और यह दावा किया कि ‘चवदार तालाब अपवित्रा हो चुका है और उसे शुद्ध करने की जरूरत है’. इसके बाद 108 घड़ों में गोबर और गोमूत्र (पंचगव्य) भरकर, मंत्रोच्चार और धार्मिक जयघोष के बीच उस पानी को तालाब में डाला गया, ताकि उसे ‘शुद्ध’ किया जा सके – यह पूरी तरह ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि चवदार तालाब सार्वजनिक नहीं बल्कि निजी संपत्ति है. इस आधार पर उन्होंने अदालत में मामला दायर कर अछूतों को वहां से पानी भरने पर फिर से रोक लगाने की कोशिश की.
महाड चवदार तालाब सत्याग्रह से अछूतों में जागी नई चेतना
इस परिषद के बाद अछूत समाज को अपनी ताकत का एहसास हुआ. उनके भीतर एक नया आत्मबोध और आत्मविश्वास पैदा हुआ. सामूहिक रूप से संगठित होकर पानी पीने की इस कार्रवाई ने महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में यह संदेश पहुंचा दिया कि अछूत जनता अब जाग चुकी है और अब वे बेबसी, बेइज्जती और अपमान की जिंदगी नहीं जिएंगे. इस चवदार तालाब ‘बहिष्कृत परिषद’ ने उनके भीतर दबे हुए स्वाभिमान को जगाने का काम किया. अछूतों को अब अपने ही समाज में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर जैसा काबिल, शानदार नेतृत्व मिल गया था. इस संघर्ष के माध्यम से दलितों की एक स्वतंत्र अस्मिता सामने आई.
यही चवदार तालाब सत्याग्रह आगे चलकर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के स्वतंत्र नेतृत्व के उदय का ऐतिहासिक आधार बना. इस पूरी ऐतिहासिक लड़ाई और बहिष्कृत परिषद के आयोजन में ‘महार समाज सेवा संघ’ की भूमिका बेहद अहम रही, जिसे खासतौर पर रेखांकित करना जरूरी है. क्योंकि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के कई जीवनीकारों और शोधकर्ताओं ने इस योगदान का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया है.
‘बहिष्कृत भारत’ पाक्षिक की शुरुआत, दूसरी बहिष्कृत परिषद की तैयारी
इस ऐतिहासिक परिषद के बाद डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने अपने संपादन में 3 अप्रैल 1927 को ‘बहिष्कृत भारत’ नामक एक नया पाक्षिक शुरू किया. इसमें उन्होंने महाड चवदार तालाब बहिष्कृत परिषद का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया और यह ऐलान किया कि “हम दिसंबर में फिर महाड आएंगे और दूसरी बहिष्कृत परिषद आयोजित करेंगे.” डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के नेतृत्व में हुए चवदार तालाब आंदोलन को उस समय की कुछ अंग्रेजी अखबारों ने एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील सामाजिक घटना के रूप में दर्ज किया. लेकिन दूसरी ओर लोकमान्य तिलक का ‘केसरी’, ‘कुलाबा समाचार’, भोपटकर बंधुओं का ‘भाला’, ‘चाबुक’ जैसे समाचारपत्रों ने डॉ. अंबेडकर और दलित आंदोलन के सत्याग्रहियों पर ही दंगों का ठीकरा फोड़ने की कोशिश की, आग में तेल डालने का प्रयास किया और उनके नेतृत्व पर तंज कसे.
इन पत्रों ने पीड़ित और घायल अछूतों की जगह जातिवादी और सनातनी पक्ष का समर्थन किया. इन सभी आलोचनाओं का जवाब डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत भारत’ में संपादकीय और स्तंभों के माध्यम से बेहद स्पष्ट और तर्कपूर्ण ढंग से दिया और उन्हें करारा जवाब दिया. इससे दूसरी ‘बहिष्कृत परिषद’ का संदेश अछूत समाज तक तेजी से पहुंचा. इसके बाद लोग छोटे-बड़े स्तर पर सभाएं और बैठकें करने लगे और परिषद में जाने की तैयारी शुरू हो गई. पहली परिषद के बाद हुए हमले को देखते हुए, लोगों को सुरक्षा और संगठित तैयारी के साथ आगे बढ़ने की जरूरत महसूस हुई. इसी दिशा में प्रमुख संगठनकर्ता आर. बी. मोरे के नेतृत्व और मार्गदर्शन में, कांग्रेस सेवा दल की तर्ज पर ‘अंबेडकर सेवा दल’ नामक एक युवा लड़ाकू संगठन की स्थापना की गई, जिसका बाद में नाम बदलकर बाबासाहेब ने ‘समता सैनिक दल’ रखा था. दूसरी परिषद में लोग संघर्ष और प्रतिरोध की पूरी तैयारी के साथ पहुंचे. कुछ लोग तो अपनी पत्नी का कुंकुम मिटाकर आए थे, और ‘महार समाज सेवा संघ’ के प्रमुख कार्यकर्ता आड्रेकर अपने साथ कफन लेकर आए थे.
मनुस्मृति दहन
इसी 25 से 27 दिसंबर 1927 के बीच आयोजित दूसरी ‘बहिष्कृत परिषद’ के दौरान डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने बापूसाहेब सहस्रबुद्धे के हाथों हिंदू धर्म की तथाकथित ‘पवित्र’ मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन कराया. यह वही ग्रंथ था, जिसने महिलाओं, शूद्रों और अतिशूद्रों पर अमानवीय हालात थोपे, उनके मानवाधिकार छीने, सनातनी विचारों का महिमामंडन किया और असमानता को वैध ठहराया. यह दहन महाड की आज की ‘क्रांति भूमि’ पर किया गया और सनातनी हिंदू धर्म-मठाधीशों को सीधी चुनौती दी गई. संक्षेप में, लगभग 99 वर्ष पहले इसी महाड में विद्रोह की आग भड़की और ब्राह्मणवादी-सनातनी विचारधारा को खुली चुनौती दी गई. 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में, और ‘भारतीय महिला मुक्ति दिवस’ के तौर पर भी मनाया जाता है.
मौजूदा दौर में मनुस्मृति के वारिसों की बढ़ती आक्रामकता
यह हुआ महाड चवदार तालाब सत्याग्रह और मनुस्मृति दहन का संक्षिप्त, लेकिन रोमांचक इतिहास. लेकिन आज, महाड चवदार तालाब सत्याग्रह और मनुस्मृति दहन की सौवीं सालगिरह मनाते हुए, इस ज्वलंत इतिहास की मौजूदा स्थिति पर भी सोचना जरूरी है. आज वही मनुस्मृति की विचारधारा के वारिस और ज्यादा आक्रामक होकर सामने आ रहे हैं. वे दलितों और महिलाओं पर हमले कर रहे हैं और उन्हें दबाने की कोशिश कर रहे हैं.
राजस्थान की राजधानी जयपुर के हाई कोर्ट परिसर में गैर-बराबरी की वकालत करने वाले मनु की मूर्ति आज भी पुलिस सुरक्षा में खड़ी है. यह अपने आप में बताता है कि कैसी सोच अब भी जिंदा रखी जा रही है. जाहिर है, इसी राजस्थान में 2022 में इंद्र मेघवाल नाम के एक दलित छात्र को सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीटा गया क्योंकि उसने तथाकथित सवर्ण शिक्षक के मटके का पानी पी लिया था. इस अमानवीय मारपीट में उस मासूम बच्चे की जान चली गई. महाराष्ट्र के खानदेश क्षेत्र में 2018 में दलित समाज के छोटे बच्चों को सिर्फ इसलिए बुरी तरह पीटा गया क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक कुएं पर नहाया था. और इससे कुछ साल पहले, 2003 में महाराष्ट्र के जालना में एक ऊंची जाति के मंत्री के रिश्तेदारों ने दिलीप शेंडगे नाम के दलित युवक की हत्या कर दी, सिर्फ इसलिए कि उसने सार्वजनिक कुएं से पानी लिया था – और उसके घर को भी जला दिया गया.
संविधान पर चलने वाले इस देश में आज भी हालात यह हैं कि दलितों को सिर्फ इसलिए मार दिया जाता है कि उन्होंने पांव में चप्पल पहन ली, दूल्हा बनकर फेटा बांधकर घोड़े पर बैठ गए, मूंछ रख ली या मोबाइल पर ‘जय भीम’ की रिंगटोन बजा ली. कुछ राज्यों में दलितों को इसलिए भी निशाना बनाया गया कि उन्होंने गांव में पक्के घर बना लिए या घर में नया सामान रख लिया. मनुवादी सोच के लोग आज भी ऐसी छोटी-छोटी बातों पर हिंसा पर उतर आते हैं. दलितों को छोटे-बड़े शहरों में तथाकथित ऊंची जाति के लोग किराये पर घर देने से मना कर देते हैं. महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में तो हालत यह है कि मरने के बाद भी दलितों को दफनाने या अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं दी जाती. यानी मौत के बाद भी छुआछूत और भेदभाव खुलेआम जारी है.
दलित विद्यार्थियों के साथ भेदभाव
आइआइटी सरीखे संस्थानों, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले दलित छात्रों को हर कदम पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है. उन्हें जातिसूचक तानों और अपमान का सामना करना पड़ता है. इसी माहौल में दर्शन सोलंकी और डॉ. पायल तडवी जैसे प्रतिभाशाली छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. ऐसी ही संस्थागत भेदभावपूर्ण व्यवस्था ने रोहित वेमुला जैसे मेधावी दलित छात्र की संस्थागत हत्या की, जो इस व्यवस्था की क्रूर सच्चाई को उजागर करती है.
जाति व्यवस्था को मजबूत करने का संघ परिवार का छुपा एजेंडा
खैरलांजी (2006) से लेकर हाथरस (2020) तक दलित महिलाओं के साथ बलात्कार और अत्याचार की घटनाएं आज भी बेखौफ जारी हैं. न्याय मिलना तो दूर, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले परिवारों को भी निशाना बनाया जाता है – उन्हें जिंदा जलाया जाता है, उनकी हत्याएं की जाती हैं. जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथी सत्ता के इशारों पर चलने वाली पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था अक्सर मूक दर्शक बनकर रह जाती है.
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने मनुस्मृति दहन के जरिए सामाजिक बराबरी, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच की बुनियाद रखने की कोशिश की थी, जिसे भारतीय संविधान के जरिए आगे बढ़ाया गया. लेकिन आज वही संवैधानिक मूल्य धर्मांध सत्ताधारियों द्वारा रोज कुचले जा रहे हैं.
‘आध्यात्मिक शिक्षा’ के नाम पर छुपे तरीके से ‘मनुस्मृति’ जैसे विचारों को कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करने और उनका महिमामंडन करने की कोशिशें सत्ताधारियों के संरक्षण में चल रही हैं. ‘कौशल विकास’ के नाम पर पारंपरिक जाति-आधारित पेशों को बढ़ावा देकर, जाति व्यवस्था को और मजबूत करने का संघ परिवार का छुपा एजेंडा सरकार शिक्षा के नाम पर लागू कर रही है.
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने कालाराम मंदिर आंदोलन के बाद 1935 में नासिक के पास येवला में ऐतिहासिक घोषणा की थी – “मैं हिंदू के रूप में जन्मा हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं.” करीब 21 साल बाद उन्होंने असमानता को वैध ठहराने वाले हिंदू धर्म का त्याग कर, समानता और वैज्ञानिक दृष्टि पर आधारित बौद्ध धम्म को अपनाया.
धम्म दीक्षा के समय उन्होंने लोगों को 22 प्रतिज्ञाएं लेने को कहा, जिनमें यह भी शामिल था कि वे हिंदू देवी-देवताओं को नहीं मानेंगे और उनकी पूजा नहीं करेंगे. इस तरह उन्होंने हिंदू धर्म की रूढ़ियों और परंपराओं से निर्णायक रूप से अलग रास्ता चुना.
क्या देशभर में ‘मनुस्मृति दहन दिवस’ मनाया जाएगा?
आज संघ परिवार और सरकार महाड चवदार तालाब शताब्दी को एक “इवेंट” की तरह मना रहे हैं. वे बराबरी की नहीं, ‘समरसता’ की भाषा बोलते हुए डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर को एम. एस. गोलवलकर, के. बी. हेडगेवार और वी. डी. सावरकर की कतार में बैठाने की कोशिश कर रहे हैं. यह संघ परिवार की ब्राह्मणवादी राजनीतिक साजिश है, जिसे प्रगतिशील ताकतों और खुद को अंबेडकरी कहने वालों को मिलकर नाकाम करना होगा. महाड सत्याग्रह की शताब्दी मनाने वालों को सरकार से सीधे सवाल करने चाहिए कि क्या यह सरकार आने वाले 25 दिसंबर को देशभर में ‘मनुस्मृति दहन दिवस’ मनाएगी? क्या मनुस्मृति दहन का इतिहास स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा? और क्या इस शताब्दी वर्ष में राजस्थान के हाईकोर्ट से मनु की मूर्ति हटाई जाएगी?
जो लोग “हिंदू राष्ट्र” बनने का दावा करते हैं, उनसे इन सवालों का सकारात्मक जवाब मिलेगा – यह मानने के लिए किसी भविष्यवक्ता की जरूरत नहीं है. डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने महाड सत्याग्रह के समय ही ‘हिंदू राज्य’ के खतरे को पहचान लिया था. महाड दंगों का संदर्भ देते हुए उन्होंने 1927 में लिखा:
“सेल्फ-गवर्नमेंट के मामले में आपकी नाकाबिलियत परसों महाड दंगों ने साबित कर दी है. आप अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकार मानने को तैयार नहीं हैं. आपमें गरीबों और कमजोर लोगों के साथ न्याय करने की कोई इच्छा नहीं है; अगर हिंदू राज्य बनेगा, तो ‘बहिष्कृत वर्गों’ की हालत बहुत बुरी होगी; अगर कलेक्टर यूरोपीय न होते, पुलिस इंस्पेक्टर मुस्लिम न होते, और महाड के मुसलमानों ने बहिष्कृत वर्गों के स्त्री-पुरुषों और बच्चों को अपने घरों में पनाह न दी होती, तो स्वयं को ‘स्पृश्य’ कहने वाले हिंदुओं ने अत्याचार की सारी हदें पार कर दी होतीं.” (बहिष्कृत भारत, 1927)
यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. सवाल साफ है – क्या हम महाड की उस विरासत को आगे बढ़ाएंगे, या उसे सिर्फ रस्मी समारोहों तक सीमित कर देंगे?
संदर्भ सूचीः
गोपाल बाबा वलंगकरः आंबेडकरी चळवळीचे आधारवड, प्रेम हनवते, 2021, स्वयंदीप प्रकाशन
(लेखक कम्युनिस्ट और प्रतिरोधी सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े एक्टिविस्ट हैं.)