-- मीना तिवारी
रोजगार और अन्य मांगों को लेकर बिहार की महिलाएं लंबे समय से आवाज उठा रही हैं लेकिन सरकार उनकी आवाज अनसुनी करती रही है. अब जबकि पूरे बिहार की महिलाएं इस सरकार के खिलाफ हो रही हैं तब सरकार अपनी डूबती चुनावी नैया को बचाने की कोशिश में हाथ-पैर मार रही है. इसी क्रम में महिला रोजगार योजना शुरू हुई है.
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना दरअसल एक प्रचार योजना है. इस योजना के तहत महिलाओं को अभी शुरुआती दस हजार की राशि मिली नहीं है लेकिन सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए, सरकारी खजाने से 23 करोड़ रुपये खर्च कर बिहार में 10 हजार 62 जगहों पर महिला संवाद के नाम पर एनडीए का प्रचार अभियान शुरू हो गया है.
29 अगस्त को मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि महिलाओं को अपना रोजगार शुरू करने के लिए सरकार 2 लाख रुपए तक देगी जिसकी पहली किस्त में 10 हजार रुपए मिलेंगे, इस राशि से जब कोई महिला व्यवसाय शुरू करेगी तब अगले 6 महीने में उसकी समीक्षा के बाद सरकार अतिरिक्त 2 लाख रुपए तक देगी. कहा गया कि इस योजना का लाभ बिहार की सभी महिलाओं को मिलेगा. दो दिनों के बाद कहा गया कि जीविका समूहों के जरिए ही महिलाओं को ‘अपना मनपसंद रोजगार’ शुरू करने के लिए यह राशि मिलेगी, इसलिए इच्छुक सभी महिलाओं को जीविका समूहों में जुड़ना होगा. इसके बाद सरकार ने राशि हासिल करने की पात्रता के लिए अन्य कई शर्तें जोड़ दी. दरअसल हाल के वर्षों में महिलाओं का जीविका समूहों से मोहभंग हुआ है. ये समूह महिलाओं की जमाराशि की लूट और भ्रष्टाचार का अड्डा बन गए थे और इसका काम नीतीश मोदी की सभा में भीड़ जुटाने का रह गया था. इस कारण से समूह की महिलाएं सरकार के खिलाफ गोलबंद होने लगी थीं. इस संकट से निकलने में भी सरकार रोजगार योजना के नाम पर इस दस हजार रुपए का इस्तेमाल करना चाहती है.
7 सितंबर से ग्रामीण इलाकों में और 10 सितंबर से शहरी इलाकों में रोजगार योजना का फार्म भरने का काम शुरू हो गया है. फार्म भरने की कोई अंतिम तिथि निर्धारित नहीं है. सरकार ने कहा है कि दो करोड़ से अधिक महिलाएं इस योजना का लाभ उठाएंगी. लेकिन सरकार ने इसके लिए पर्याप्त राशि नहीं दी है. सरकार ने सितंबर महीने में ही 10,000 रु. देने की घोषणा की है. देखना है कि यह राशि कितनी महिलाओं को मिल पाती है.
महंगाई के इस दौर में दस हजार रुपए में कौन सा रोजगार होगा? जीविका ने 14 ‘सांकेतिक रोजगार’ की लिस्ट जारी की है. इसमें से कोई भी रोजगार दस हजार रुपए से संभव नहीं है. दूसरे, जो जीविका निधि साख सहकारी संघ लिमिटेड बनाया गया है, उसके बारे में भी अभी स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे काम करेगा. दरअसल सरकार इतनी बदहवास है कि वह घोषणा पहले कर रही है और उसके नियम-नीति बनाने के बारे में बाद में विचार कर रही है. वैसे भी इस बैंक के उद्घाटन भाषण में मोदी जी ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की योजना पर बात करने की जगह अपने लिए मिली गाली पर ज्यादा बात की.
रोजगार के लिए पहले भी सरकार ने लघु उद्यमी योजना के तहत हर गरीब परिवार को 2 लाख रुपए देने की घोषणा की थी. यह राशि 94 लाख परिवारों को मिलनी थी. इसके लिए पिछले वर्ष हर प्रखंड मुख्यालय पर गरीबों ने बड़े-बड़े प्रदर्शन किए जिसमें अधिकांश संख्या महिलाओं की ही होती थी. लेकिन वो दो लाख रुपए नहीं मिले. अगर सरकार वास्तव में रोजगार की चिंता कर रही होती तो अपनी इस पहली घोषणा को पूरा करती. लेकिन जो सरकार 94 लाख परिवारों को 2 लाख रुपए नहीं दे सकी वह आज दो करोड़ महिलाओं को 2 लाख रुपए देने की बात कर रही है!
जैसा कि कोविड के दौर से ही हम लोगों ने सवाल उठाया है कि समूह की सभी महिलाओं को रोजगार मिले. सभी जीविका समूह का मूल्यांकन किया जाए कि उस समूह की महिलाएं कौन सा काम कर सकती हैं. उन्हें उसकी ट्रेनिंग देकर वह रोजगार उपलब्ध कराया जाए और उसके उत्पाद को लाभकारी मूल्य पर खरीदने की गारंटी सरकार करे. अगर ऐसा होता तो वास्तव में महिलाओं की नियमित आय होती लेकिन यहां तो कुछ महिलाओं को दस हजार रुपए थमा कर सरकार चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है.
एनडीए से अलग इंडिया गठबंधन ने ढाई हजार रुपए हर महीने देने की घोषणा की है. अगर यह योजना सही ढंग से लागू हो तो महिलाओं के हाथ में एक नियमित आय होगी. बिहार में 64 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10 हजार रुपए से कम है. यह आमदनी परिवार के लिए दोनों समय का भोजन जुटाने के लिए भी पूरा नहीं पड़ती. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, बीमारी या आकस्मिक खर्च के लिए उनके पास कुछ नहीं बचता. सरकारी स्कूल-कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों को खत्म करने की योजनाबद्ध कोशिश के कारण आज गरीब परिवार भी प्राइवेट स्कूलों और अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं जिसके लिए बिहार में महिलाओं को कर्ज लेना पड़ रहा है. अगर महिलाओं को कर्ज से मुक्ति नहीं मिलेगी तो ये 10,000 रुपए उनकी जरूरतों के लिए ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ की तरह है.
कर्ज के कारण महिलाएं माइक्रो फाइनेंस व ननबैंकिंग संस्थाओं की जाल में फंसती जा रही हैं. माइक्रो फाइनेंस कंपनियां भी रोजगार शुरू करने के नाम पर ही महिलाओं को कर्ज देती हैं. लेकिन तथ्य यही है कि है यह कर्ज महिलाएं अपने घरेलू जरूरतों के लिए लेती हैं और किसी तरह उसका किस्त भरती हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का किस्त गरीब परिवारों की आमदनी को सोख लेने का माध्यम है.
कर्ज मुक्ति, सभी महिलाओं को रोजगार, माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं की मनमानी पर रोक, 2% सालाना ब्याज दर पर महिलाओं को 2 लाख रुपए तक के कर्ज की उपलब्धता और 2500 रुपए की मासिक सहायता राशि महिलाओं की बड़ी मांग बन गई है.