दिल्ली में 24 सितंबर को भाकपा(माले), भाकपा और माकपा के महासचिवों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया.
23 सितंबर को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा उठाए गए मुद्दों से जुड़ी रिपोर्टें प्रकाशित हुईं, जो इस बात पर कई बुनियादी सवाल खड़े करती हैं कि मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में निर्वाचन आयोग किस तरह काम कर रहा है. ये सवाल केवल मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) तक सीमित नहीं हैं. ये भारत के निर्वाचन आयोग के कामकाज और उसकी प्रणाली की निष्पक्षता को लेकर भी गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं. ये सवाल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं और यह भी दिखाते हैं कि यह पद अपनी विश्वसनीयता खो चुका है. तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों ने कम से कम 14 मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने-बालने और एसआइआर के संचालन से जुड़े फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की हैं. उन्होंने ऐसे फैसलों पर भी गंभीर चिंता जताई है, जो उनकी सहमति के बिना लिए जा रहे थे. ये खुलासे विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा बार-बार उठाई गई चिंताओं की पुष्टि करते हैं और एसआइआर तथा मतदाता सूची प्रबंधन में पारदर्शिता और विकेंद्रीकरण के दावों की खोखलापन उजागर करते हैं. दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने विशेष रूप से मतदाता डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण और राज्य तथा निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर वैधानिक अधिकारियों की पहुंच पर लगाई जा रही पाबंदियों को रेखांकित किया है. इसके परिणाम केवल प्रशासनिक नहीं हैं. मसलन, गोवा में साॅफ्टवेयर संबंधी पाबंदियों के कारण निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को 97 ऐसे मतदाताओं के संबंध में अपने फैसले दर्ज करने से रोक दिया गया, जिन्हें उन्होंने मतदान के लिए पात्र पाया था. इसलिए यह मुद्दा एसआइआर से कहीं आगे का है. यह निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली तथा सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार की रक्षा से जुड़ा है. ऐसा कोई भी सिस्टम, जिसमें मतदान का अधिकार अपारदर्शी और केंद्रीकृत नियंत्रण वाली प्रक्रियाओं पर निर्भर हो, चुनावी व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करता है. निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पहले कभी इतनी कमजोर नहीं रही है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सिस्टम में हेरफेर करने और जनता के विश्वास को कमजोर करने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.
कम्युनिस्ट पार्टियों की मांगें:
- ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए.
- एसआइआर प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए और मतदाता सूचियों से गलत तरीके से बाहर किए गए सभी लोगों का मतदान अधिकार बहाल किया जाए.
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली बहाल की जाए.
- निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था को बदलकर सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तावित चयन समिति पर आधारित किया जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों.
कम्युनिस्ट पार्टियों ने देशभर में अपनी इकाइयों से 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक सप्ताह व्यापी विरोध कार्यक्रम आयोजित करने का आह्वान किया है. इन कार्यक्रमों में 28 सितंबर को शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती और 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर कार्यक्रमों का समापन होगा. ये विरोध कार्यक्रम चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता के खिलाफ तथा मतदान के अधिकार और भारत के चुनावी लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए जाएंगे.
मतदान के अधिकार की रक्षा करें.
निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता बहाल करें. चुनावी लोकतंत्र की रक्षा करें.
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जंतर-मंतर से उठी आवाज देश के अब हर कोने से उठेगी: का. दीपंकर
‘वोट चोरी देशद्रोह है, ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो’ के आह्वान के साथ 25 सितंबर को भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव, आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, चर्चित अधिवक्ता प्रशांत भूषण, जनाधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज तथा किसान नेता पुरुषोत्तम शर्मा तथा एन साईं बालाजी, प्रसेनजीत, अंजलि, नीतीश, सावी व अभिज्ञान समेत अन्य भाकपा(माले) तथा आइसा नेताओं और नागरिकों की अगुआई में जंतर मंतर दिल्ली में हुए नागरिक प्रतिवाद; दिल्ली पुलिस, रैफ, सीआरपीएफ और बीएसएफ तक का भारी जमावड़ा कर इन प्रतिवादकर्मियों (यहां तक कि मीडियाकर्मियों) को रोके जाने और अंततः सबको गिरफ्तार कर वहां से दिल्ली के विभिन्न दूरदराज के थानों – जफरपुर, नरेला, कंझावाला और समयपुर बादली में डिटेन किए जाने और देशव्यापी जन प्रतिवाद की आशंका को देखते हुए शाम तक उनकी रिहाई ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे मांग को पूरे देश में फैला दिया है.
गिरफ्तारी के बाद भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य का जो वीडियो जारी हुआ, उसका संदेश बिल्कुल साफ है – ज्ञानेश कुमार के दिन अब गिनती के ही रह गए हैं. का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा – ‘ज्ञानेश कुमार पूरे देश में, वोट चारी करते हुए और इस देश में लोकतंत्र की हत्या करते हुए, रंगे हाथ पकड़े गए हैं. आज इसीलिए जब पूरे देश में ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठी है, मोदी और शाह ने जिन्होंने ज्ञानेश कुमार को चीफ इलेक्शन कमिश्नर बनाया, उनको बचाने के लिए पूरी दिल्ली पुलिस को आगे कर दिया. जिस तरह से जंतर-मंतर पर हमारे प्रदर्शन को रोका गया, तमाम प्रदर्शनकारियों को यहा घसीटा गया, किसी को छोड़ा नहीं गया उसमें आप देख सकते हैं कि सरकार ने लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है. यह आवाज जंतर मंतर से उठी है और देश के हर कोने से उठ रही है. यह देश के लोकतंत्र का सवाल है, देश के करोडों लोगों के वोट का सवाल है. इस सवाल को मोदी सरकार कत्तई दबा नहीं सकती.’