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संपत्ति से सत्ता तक : भारत में सामाजिक न्याय एक इतिहास, संरचना और अंतर्विरोध

संपत्ति से सत्ता तक : भारत में सामाजिक न्याय एक इतिहास, संरचना और अंतर्विरोध

-- शांतम निधि

भारत में सामाजिक न्याय को उसकी गहराई में समझने के लिए हमें सबसे पहले इस बात को स्वीकार करना होगा कि असमानता कोई आकस्मिक या अपवादात्मक स्थिति नहीं है, बल्कि यह इतिहास के भीतर निर्मित एक संरचित प्रक्रिया का परिणाम है, और इसलिए सामाजिक न्याय को केवल नैतिक आग्रह या संवैधानिक वादा मानकर नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसे उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में देखना होगा जिनके भीतर असमानता पैदा होती है, स्थिर होती है और नए रूपों में बदलती रहती है. जब हम “सामाजिक न्याय” कहते हैं, तो हम अक्सर यह मान लेते हैं कि समाज स्वयं एक तटस्थ ढांचा है जिसमें कुछ असमानताएं उत्पन्न हो गई हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि समाज की संरचना ही इस प्रकार निर्मित होती है कि असमानता उसमें अंतर्निहित रहती है. इसीलिए पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि समाज क्या है और वह कैसे बना, क्योंकि जब तक हम यह नहीं समझते, तब तक सामाजिक न्याय की कोई भी चर्चा अधूरी रहती है.

जैसा कि कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने स्पष्ट किया, समाज की संरचना इस बात से निर्धारित होती है कि मनुष्य अपने जीवन के साधनों का उत्पादन और वितरण किस प्रकार करते हैं. प्रारंभिक मानव समाज, विशेषकर कृषि से पहले के समाज, अपेक्षाकृत अधिक समानतावादी थे, क्योंकि उस समय संसाधनों पर स्थायी नियंत्रण संभव नहीं था. लोग छोटे समूहों में रहते थे, लगातार स्थान बदलते थे, और संसाधनों का साझा उपयोग करते थे, जिसके कारण कोई भी समूह लंबे समय तक दूसरों पर स्थायी प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता था. इसका अर्थ यह नहीं है कि वहां कोई संघर्ष या भिन्नता नहीं थी, बल्कि यह कि वे भिन्नताएं उस रूप में स्थिर नहीं थीं, जिन्हें हम आज वर्ग या जाति के रूप में पहचानते हैं.

यह स्थिति तब मूल रूप से बदलती है जब मनुष्य स्थायी कृषि की ओर बढ़ता है, क्योंकि कृषि के साथ अधिशेष उत्पादन संभव हो जाता है, अर्थात् जितना जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक है उससे अधिक उत्पादन. यही अधिशेष असमानता का आधार बनता है, क्योंकि अब यह प्रश्न केंद्रीय हो जाता है कि इस अधिशेष पर नियंत्रण किसका होगा. जैसे ही कुछ समूह इस अधिशेष पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने लगते हैं, वे दूसरों पर भी नियंत्रण स्थापित करने लगते हैं, और यहीं से सामाजिक शक्ति का स्थायी ढांचा बनना शुरू होता है. निजी संपत्ति का उदय इसी प्रक्रिया का परिणाम है, और इसके साथ ही समाज इस प्रकार संगठित होने लगता है कि संपत्ति और संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाले समूह अपनी स्थिति को स्थिर और सुरक्षित रख सकें.

एंगेल्स ने यह दिखाया कि इस प्रक्रिया के साथ परिवार की संरचना में भी बदलाव आता है, विशेषकर महिलाओं की स्थिति में, क्योंकि संपत्ति के हस्तांतरण को सुनिश्चित करने के लिए वंश की शुद्धता आवश्यक हो जाती है, और इसके लिए महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है. इस प्रकार पितृसत्ता केवल सांस्कृतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि संपत्ति और वंशानुक्रम से जुड़ी एक संरचनात्मक आवश्यकता है. इसी के साथ राज्य का उदय होता है, जो इस पूरी व्यवस्था को बनाए रखने का काम करता है. राज्य को अक्सर एक निष्पक्ष संस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तव में वह उन सामाजिक संबंधों को स्थिर करने का काम करता है जिनमें संपत्ति और सत्ता का असमान वितरण शामिल होता है. कानून, प्रशासन और दमनकारी तंत्र इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि जो समूह संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं, उनका प्रभुत्व बना रहे.

भारतीय संदर्भ में यही ऐतिहासिक प्रक्रिया जाति व्यवस्था के रूप में सामने आती है, जो केवल धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न नहीं है, बल्कि समाज को संगठित करने का एक ठोस भौतिक ढांचा है. जैसा कि भीमराव आंबेडकर ने कहा, जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है, अर्थात् यह केवल काम को नहीं बांटती बल्कि लोगों को उन कामों में जन्म से स्थायी रूप से बांधा देती है. यही कारण है कि जाति व्यवस्था में सामाजिक गतिशीलता अत्यंत सीमित हो जाती है और व्यक्ति की स्थिति उसके जन्म से तय हो जाती है.

इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए विवाह और परिवार के नियमों को नियंत्रित किया जाता है, विशेषकर अंतर्जातीय विवाह पर रोक के माध्यम से, क्योंकि यही वह तंत्र है जिसके माध्यम से जाति अपनी सीमाओं को बनाए रखती है. उमा चक्रवर्ती ने इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के रूप में समझाया है, जिसमें महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण के माध्यम से जाति और संपत्ति दोनों की संरचना को स्थिर किया जाता है. इस प्रकार महिलाओं का नियंत्राण केवल सामाजिक नैतिकता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शक्ति और संपत्ति के हस्तांतरण का प्रश्न है.

इसके साथ ही जाति श्रम को इस प्रकार संगठित करती है कि समाज के निचले तबकों को सबसे कठिन और अपमानजनक काम करने के लिए बाध्य किया जाता है, जबकि ऊंची जातियां संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति पर नियंत्रण बनाए रखती हैं. इस विभाजन को वैध ठहराने के लिए शुद्धता और अशुद्धता के विचारों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें लुई द्यूमों ने विस्तार से समझाया है, लेकिन आंबेडकर का विश्लेषण यह दिखाता है कि यह केवल विचारधारा नहीं है बल्कि एक ठोस भौतिक व्यवस्था है जो श्रम और संसाधनों के असमान वितरण को बनाए रखती है.

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन इस व्यवस्था को समाप्त नहीं करता, बल्कि इसे एक नए ढांचे में पुनर्गठित करता है, जिसमें पूंंजीवादी शोषण और जाति आधारित शोषण एक साथ काम करते हैं. भूमि को एक वस्तु में बदल दिया जाता है और जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से ऐसे वर्ग बनाए जाते हैं जो औपनिवेशिक राज्य और किसानों के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं. ये मध्यस्थ अक्सर उच्च जातियों से आते हैं, जिससे जाति और आर्थिक शक्ति का संबंध और गहरा हो जाता है. रणजीत गुहा ने दिखाया कि औपनिवेशिक शासन मौजूदा सामाजिक संबंधों को समाप्त नहीं करता, बल्कि उन्हें इस तरह बदलता है कि उनसे अधिकतम आर्थिक लाभ लिया जा सके.

1857 का विद्रोह इस व्यवस्था को चुनौती देता है, लेकिन इसके बाद औपनिवेशिक शासन अपनी रणनीति बदलता है और भारतीयों को सीमित रूप से शासन में शामिल करता है. मॉर्ले-मिंटो सुधार के माध्यम से अलग-अलग समुदायों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था बनाई जाती है, जिससे राजनीति पहचान के आधार पर संगठित होने लगती है और वर्ग आधारित एकता कमजोर हो जाती है. इसी प्रक्रिया के भीतर महात्मा गांधी और भीमराव आंबेडकर के बीच का संघर्ष सामने आता है, जहां गांधी जाति को सुधरने योग्य मानते हैं, जबकि आंबेडकर इसे समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं.

स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भूमि सुधर और नियोजित विकास की नीतियां लागू की जाती हैं, लेकिन ये सुधार सीमित रहते हैं और सत्ता संरचना में मूलभूत परिवर्तन नहीं कर पाते. इसी विफलता के परिणामस्वरूप 1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह जैसे आंदोलन सामने आते हैं, जो भूमि और श्रम के प्रश्न को केंद्र में रखते हैं.

इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के भीतर भोजपुर का संघर्ष उभरता है, जो इस पूरे तर्क को सबसे स्पष्ट रूप में सामने लाता है, क्योंकि यहां जाति, भूमि और श्रम के संबंध एक साथ दिखाई देते हैं. भोजपुर में भूमि का स्वामित्व ऊंची जातियों के पास केंद्रित था, जबकि दलित और भूमिहीन मजदूर श्रम करते थे और उन्हें न केवल आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ता था बल्कि सामाजिक अपमान और हिंसा का भी. बेगार जैसी प्रथाएं केवल आर्थिक नहीं थीं बल्कि जाति आधारित प्रभुत्व का हिस्सा थीं. इस स्थिति में जो आंदोलन उभरा उसने जाति और वर्ग को अलग-अलग नहीं देखा, बल्कि एक ही संरचना के रूप में समझा और उसी के खिलाफ संघर्ष किया.

यहां मजदूरों ने बेगार करने से इनकार किया, न्यूनतम मजदूरी की मांग की और भूमि पर अपने अधिकार का दावा किया, जिससे सीधे उस व्यवस्था को चुनौती मिली जो सदियों से बनी हुई थी. इस संघर्ष का जवाब भी उतना ही संगठित था, जहां जमींदारों ने निजी सेनाएं बनाईं और राज्य ने अक्सर दमन के माध्यम से यथास्थिति को बनाए रखने का काम किया. इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य केवल निष्पक्ष संस्था नहीं है, बल्कि वह उन शक्तियों के साथ खड़ा होता है जिनके पास संपत्ति और नियंत्रण है.

भोजपुर इस अर्थ में केवल एक आंदोलन नहीं है बल्कि एक वैकल्पिक दिशा का संकेत है, जहां सामाजिक न्याय को प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं किया गया बल्कि उसे संपत्ति और श्रम के संबंधों को बदलने के रूप में समझा गया. लेकिन यह दिशा व्यापक स्तर पर विकसित नहीं हो सकी और इसके स्थान पर मंडल के बाद की राजनीति उभरती है, जहां प्रतिनिधित्व बढ़ता है लेकिन आर्थिक संरचना में बड़ा परिवर्तन नहीं होता. इसी समय आर्थिक उदारीकरण भी आता है, जिससे राज्य की भूमिका कम होती है और असमानता नए रूपों में बढ़ती है.

यहीं सामाजिक न्याय की राजनीति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध सामने आता है, जहां पहचान और प्रतिनिधित्व तो बढ़ते हैं लेकिन संपत्ति और श्रम के संबंध जस के तस बने रहते हैं. नैंसी फ्रेजर ने इसे “मान्यता बिना पुनर्वितरण” के रूप में समझाया है, जहां पहचान को स्वीकार किया जाता है लेकिन संसाधनों का पुनर्वितरण नहीं होता.

इस पूरे इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक न्याय केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रश्न है कि समाज में संपत्ति का नियंत्रण किसके पास है, श्रम कौन करता है और राज्य किसके हित में काम करता है. जब तक इन संबंधों को नहीं बदला जाएगा, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा, और यह केवल समानता का वादा बनकर रह जाएगा, वास्तविक परिवर्तन नहीं.


04 April, 2026