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अमेरिका-ईरान ‘युद्धविराम’ पर मतभेद के बीच लेबनान पर कहर : बिना इंसाफ अमन नहीं

अमेरिका-ईरान ‘युद्धविराम’ पर मतभेद के बीच लेबनान पर कहर : बिना इंसाफ अमन नहीं

-- मनमोहन

ट्रंप द्वारा मंगलवार रात ईरान के साथ घोषित दो हफ्ते का तथाकथित ‘युद्धविराम’ अब गहरे संकट में है. समझौते के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद, बुधवार को इजराइल ने लेबनान पर भीषण बमबारी शुरू कर दी, जबकि ईरान ने लेबनान पर हमले रोकने की मांग की है और अब भी वार्ता की गुंजाइश बनी हुई है.

यह हमला इस जंग का सबसे खूनी दिन साबित हुआ – कम से कम 254 लोग मारे गए और 1100 से ज्यादा घायल हुए, जिनमें 35 बच्चे शामिल हैं. इजराइली लड़ाकू विमानों ने बेरूत के केंद्रीय इलाकों, दक्षिणी उपनगरों, रिहायशी इमारतों और भीड़भाड़ वाले बाजारों को निशाना बनाया. बमबारी अब भी जारी है.

उधर अमेरिका के अंदर भी हुक्मरान तबके में गहरा संकट उभर रहा है. जंग के घोषित मकसद पूरे न होने के बाद शासक हलकों और राज्य तंत्र के भीतर आगे की रणनीति को लेकर तीखे मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं.

युद्धविराम का ऐलान और तत्काल उल्लंघन

अमेरिका और ईरान के बीच ‘युद्धविराम’ की खबर सबसे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दी, जिन्होंने इस समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाई. मंगलवार शाम अपने बयान में शरीफ ने कहा कि अमेरिका और ईरान ‘अपने सहयोगियों सहित हर जगह – लेबनान समेत – तत्काल युद्धविराम’ पर सहमत हो गए हैं.

लेकिन बुधवार को ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने लेबनान पर भीषण इजराइली हमले के बाद अमेरिका पर युद्धविराम तोड़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि ‘ऐसी स्थिति में द्विपक्षीय युद्धविराम या बातचीत बेमानी हो जाती है.’ दूसरी तरफ इजराइल का दावा है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा ही नहीं था. ट्रंप और व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने भी इस दावे का समर्थन किया, जबकि ट्रंप ने इसे ‘अलग झड़प’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की.

इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि इजराइल ने जानबूझकर लेबनान पर हमला कर अमेरिका-ईरान ‘युद्धविराम’ को पटरी से उतारने की कोशिश की. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल को इस समझौते की जानकारी देर से दी गई थी और वह इससे नाखुश था. हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर हमला अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के अंदर मौजूद अहम गुटों की रजामंदी के बिना मुमकिन नहीं था.

अमेरिका के भीतर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन – दोनों खेमों से ट्रंप की ‘युद्धविराम’ घोषणा की तीखी आलोचना हो रही है. इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए ‘बड़ी नाकामी’ और ईरान के प्रति ‘खतरनाक और अस्वीकार्य रियायत’ बताया जा रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने बुधवार को लिखा कि यह ‘युद्धविराम’ जंग के बुनियादी सवालों को छू तक नहीं पाया – ईरान अब भी होरमुज की खाड़ी पर अपनी पकड़ बनाए हुए है, और इस लिहाज से यह नतीजा जंग से पहले की स्थिति से भी ज्यादा अस्थिर है.

ट्रंप की रणनीतिः युद्धविराम महज एक विराम है

ट्रंप प्रशासन के नजरिए से ‘युद्धविराम’ महज एक रणनीतिक विराम होता है. मध्य पूर्व में ट्रंप द्वारा घोषित हर ‘युद्धविराम’ आगे और ज्यादा खूनी सैन्य कार्रवाई की भूमिका बनता रहा है. जून 2025 में ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ – जिसमें ईरान के परमाणु ठिकानों पर  बमबारी की गई – के बाद घोषित ‘युद्धविराम’ महज कुछ ही महीनों में, 28 फरवरी को शुरू हुए पूर्ण पैमाने के जंग में बदल गया. इजराइल का रिकॉर्ड भी यही बताता है – वह लेबनान में पहले से जारी युद्धविराम का 1300 से ज्यादा बार और गाजा में पिछले फरवरी से लागू युद्धविराम का 300 से अधिक बार उल्लंघन कर चुका है.

बुधवार देर रात ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ‘अमेरिकी जहाज, विमान और सैन्यकर्मी’ अतिरिक्त हथियारों और गोला-बारूद के साथ – ईरान के अंदर और आसपास तैनात रहेंगे, ताकि जरूरत पड़ने पर पहले से कमजोर किए गए दुश्मन को पूरी तरह तबाह किया जा सके.’ उन्होंने खुले शब्दों में धमकी दी कि ईरान पर ‘पहले कभी न देखा गया – उससे भी बड़ा, बेहतर और ज्यादा ताकतवर’ हमला किया जाएगा.

साफ है – अमेरिका के सामरिक लक्ष्य बदले नहीं हैं. वाशिंगटन का इस जंग के जरिए फारस की खाड़ी और होरमुज जलडमरूमध्य पर सीधा नियंत्रण कायम करने और 1979 की ईरानी क्रांति के नतीजों को पलटने के मकसद बदला नहीं है. ईरान के खिलाफ यह जंग दरअसल फैलते वैश्विक टकराव का हिस्सा है – जो मध्य पूर्व से आगे बढ़कर रूस और चीन से सीधी टक्कर तक जा पहुंचा है.

परमाणु युद्ध का खतरा और जनसंहारी बयानबाजी

पिछले दो हफ्तों का अनुभव पूरी दुनिया के लिए एक सख्त चेतावनी है. महज 24 घंटे पहले ट्रंप ‘ईरानी सभ्यता को खत्म कर देने’ की बात कर रहे थे और गाजा के जनसंहार वाले तरीकों को 9 करोड़ की आबादी वाले देश पर लागू करने की धमकी दे रहे थे. एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुलेआम जनसंहार को जंग की रणनीति के तौर पर पेश कर दिया है – यह इतिहास दर्ज करेगा.

सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह जंग किसी भी वक्त परमाणु युद्ध में बदल सकती है – लेकिन इस पर बहुत कम चर्चा हो रही है. अमेरिका और इजराइल – दोनों के पास परमाणु हथियार हैं. दोनों हुकूमतें जंगखोर और हद दर्जे तक आक्रामक रवैया अपना रही हैं. दोनों तरफ से परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की धमकियां दी जा चुकी हैं, और खबरें हैं कि रूस और चीन ने भी सख्त जवाबी चेतावनी दी है.

हिटलरी अंदाज की बयानबाजी और पूरी सभ्यता को मिटा देने की खुली धमकियों के जरिये ट्रंप ने ‘मानवाधिकार’ और ‘लोकतंत्र’ के नाम पर अमेरिकी दखलअंदाजी के आखिरी परदे को भी तार-तार कर दिया है. अब दुनिया साफ देख रही है कि अमेरिका एक अपराधी कुलीनतंत्र के हाथों चल रहा है. अमेरिका की तथाकथित ‘नैतिक सत्ता’ का जो भी ढांचा बचा था, वह अब हमेशा के लिए चकनाचूर हो चुका है.

होरमुज और अमेरिकी वर्चस्व का संकट

किसी घिरे हुए मुल्क द्वारा एक अहम समुद्री रास्ते को बंद कर देना, वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास की सबसे दुर्लभ और सबसे दूरगामी असर वाली घटनाओं में गिना जाता है. द्वितीय  विश्व युद्ध के बाद के दौर में ऐसा सिर्फ दो बार हुआ है. 1956 में मिस्र ने पांच महीनों के लिए स्वेज नहर बंद कर दी थी – एक ऐसा कदम जिसने ब्रिटेन की साम्राज्यवादी ताकत की कमर तोड़ दी और पेट्रोडॉलर दौर की बुनियाद रखी.

आज ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य को प्रभावी तौर पर जकड़ लिया है – वही रास्ता जिससे दुनिया के समुद्री तेल का करीब एक चौथाई गुजरता है. यह सिर्फ एक सैन्य या आर्थिक कदम नहीं, बल्कि एक बड़े ऐतिहासिक टकराव का इशारा है – जहां यह तय होगा कि अमेरिकी वर्चस्व की जगह कौन-सी ताकत लेगी और किस तरह की नई वैश्विक व्यवस्था उभरेगी.

होरमुज का संकट अमेरिकी वर्चस्व के अंत को एक ठोस संभावना में बदल रहा है. साथ ही, पहली बार इतने साफ तौर पर दिख रहा है कि ग्लोबल साउथ के पास न सिर्फ सियासी इरादा, बल्कि वैचारिक और सामरिक क्षमता भी है जिससे वह एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद रख सके.

वॉशिंगटन और उसके सहयोगियों ने यह जंग इस भ्रम में छेड़ी थी कि उसे दहशत, तबाही और कत्लेआम के जरिये जीता जा सकता है. लेकिन उन्होंने ईरानी अवाम के प्रतिरोध को बुरी तरह कम करके आंका. ईरान के भीतर अनुमानित सता का बदलना नहीं हो सका – इसके बजाय समाज ने अपनी एकजुटता बढ़ाई और बिजली घरों, पुलों को उड़ा देने की अमरीकी धमकी के खिलाफ लाखों  की तादाद में इन प्रतिष्ठानों के आगे मानवीय श्रृंखला बना खड़े हो गए. भारी दबाव और नुकसान के बावजूद, सार्वजनिक एकता ने राज्य की झेलने की क्षमता को मजबूत किया. वाशिंगटन और तेल अवीव की आंतरिक अशांति की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं.

युद्धविराम क्यों टिकना मुश्किल है

पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुआ यह ‘युद्धविराम’ बेहद नाजुक है – इसके टिकने की गुंजाइश बहुत कम दिखती है. इसके पीछे दो बुनियादी वजहें हैं.

पहली – इजराइल ईरान के बुनियादी ढांचे पर बमबारी रोकने को तैयार नहीं है. यह बमबारी कोई अलग-थलग कार्रवाई नहीं, बल्कि उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत ईरान को अस्थिर और कमजोर राज्य में धकेलने की कोशिश की जा रही है. इस समझौते को पटरी से उतारने की ताकत इजराइल के पास है – और लेबनान पर हमले जारी रखकर वह इसका संकेत पहले ही दे चुका है.

दूसरी – ईरान की न्यूनतम मांगें अब भी अमेरिका और इजराइल के लिए काबिले-कबूल नहीं हैं. इन मांगों में शामिल हैं : जंग का स्थायी और औपचारिक अंत, होरमुज पर नियंत्राण, लेबनान में इजराइली हमलों की पूर्ण समाप्ति, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य ठिकानों की वापसी, युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा, यूरेनियम संवर्धन के अधिकार की मान्यता, और ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों का खात्मा. इन मांगों को मनवाने के लिए ईरान दबाव बढ़ा सकता है – खासकर होरमुज के रास्ते तेल-गैस की ढुलाई रोककर.

अरब दुनिया, खासकर खाड़ी के हुक्मरान हलकों में, इस ‘युद्धविराम’ पर प्रतिक्रिया तीखी और अर्थपूर्ण रही है. नेतन्याहू का गुस्सा भी इसी वजह से है – अगर यह युद्धविराम टिक गया और स्थायी समझौते में बदला, तो ‘ग्रेटर इजराइल’ की उसकी परियोजना को गहरा झटका लगेगा. पिछले वर्षों में इजराइल – अरब नजदीकी और सामान्यीकरण समझौतों ने एक ऐसे क्षेत्रीय गठजोड़ को जन्म दिया था जिसका साझा निशाना ईरान और फिलीस्तीनी प्रतिरोध था. फिर 7 अक्टूबर आया – और गाजा में इजराइल के जनसंहार ने पूरी प्रक्रिया की नाजुकता उजागर कर दी. जंग का रुकना इन हुक्मरानों के लिए राहत नहीं, बल्कि उनकी बनाई पूरी रणनीतिक दिशा के बिखरने का संकेत है.

जीता कौन?

ईरान ने यह जंग शुरू नहीं की; वह आत्मरक्षा की स्थिति में था और अपने क्षेत्र, अपने लोगों और अपने संसाधनों की हिफाजत में कामयाब रहा.

ट्रंप या नेतन्याहू के बारे में यही नहीं कहा जा सकता. खासकर नेतन्याहू के लिए दांव अस्तित्वगत था – यह वह निर्णायक टक्कर थी जो उसके सबसे ताकतवर विरोधियों को खत्म करे, इजराइल की सर्वोच्चता सुनिश्चित करे, और उसकी बरसों से रची ‘ग्रेटर इजराइल’ की कल्पना को ठोस रूप दे.

अमेरिकी जनता ने इस युद्ध के लिए कभी सतत समर्थन नहीं दिखाया. विरोध लगातार बढ़ता गया, खासकर जमीनी हमले की किसी भी संभावना के खिलाफ. जनता के समर्थन के बिना लंबा युद्ध राजनीतिक रूप से टिकाऊ नहीं रह सकता. अंततः दो ताकतें निर्णायक साबित हुईं : ईरानी जनता और अमेरिकी जनता.

इजराइल और अमेरिका ईरान को हराने में नाकाम रहे, शासन-परिवर्तन और देश को भीतर से अस्थिर करने में नाकाम रहे, प्रतिरोध की धुरी को तोड़ने में नाकाम रहे, और होरमुज पर अपनी मर्जी थोपने में भी नाकाम रहे. अब बचता है एक सवाल : क्या अरब सरकारें इस असफल इजराइल – अमेरिकी परियोजना के साथ बनी रहेंगी, या पुनर्संतुलन करेंगी – इससे पहले कि क्षेत्र उनके बिना ही नए सिरे से बने और नया पश्चिम एशिया उभरे – नेतन्याहू की कल्पना के अनुसार नहीं, बल्कि अपने लोगों की आजादी और सहनशक्ति से परिभाषित – फिलस्तीन से लेबनान तक, ईरान से यमन तक.

भारत और ग्लोबल साउथ की जिम्मेदारी

भारत के लिए यह हालात बेहद खतरनाक हैं. दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश होने के बावजूद भारत अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहा, क्योंकि पीएम मोदी ने इस युद्ध के ठीक पहले इजराइल जाकर युद्ध अपराधी नेतन्याहू के साथ खुलेआम खड़े होकर अमेरिका-इजराइल की जनसंहारी योजना का साथ दिया. यह कोई सामान्य विदेश नीति की चूक नहीं – विदेश नीति घरेलू नीति का ही विस्तार होती है, और हिंदुत्व का एजेंडा सीधे इस्लाम-विरोध पर टिका है. फिर भी ब्रिक्स देशों के अध्यक्ष होने के नाते भारत के पास अभी भी सुधार का मौका है : उसकी अध्यक्षता में इस साम्राज्यवादी युद्ध की मुखालफत और निंदा हो सकती है.

यह युद्ध अमेरिका के लिए इसलिए जरूरी बन गया है ताकि गिरती मुनाफे की दर रोकी जा सके और ठहरी हुई सैन्य-औद्योगिक पूंजी को युद्ध और तबाही के जरिये, फिर ‘पुनर्निर्माण’ के नाम पर, दोबारा जिंदा किया जा सके. असल में यह युद्ध पूंजीवाद के तर्क को पूरा कर रहा है और दुनिया के गरीब और विकासशील देशों को फिर से औपनिवेशिक शिकंजे में कसने की दिशा में बढ़ा रहा है.

इन परिस्थितियों में ईरान एक निर्णायक रुकावट बनकर खड़ा है. अगर यह प्रतिरोध कामयाब होता है, तो यह जमे हुए वैश्विक ढांचे को तोड़ सकता है और आखिरकार ग्लोबल साउथ के देशों को असली मायनों में आजादी और स्वायत्तता की राह पर ले जा सकता है. बिना इंसाफ के अमन नहीं – यह इस पूरे टकराव का सबक है.


18 April, 2026