(07.03.1942 - 30.10.2026)
भाकपा(माले) के संस्थापक नेताओं में से एक, पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य व केंद्रीय संगठन विभाग के प्रभारी काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य अब हमारे बीच नहीं हैं. वे 84 वर्ष पूरे कर चुके थे. 30 अक्टूबर 2026 को रात्रि 11.15 बजे उन्होंने पटना के रूबन मेमोरियल अस्पताल में अंतिम सांसें लीं. उनका लम्बे समय से कैंसर का इलाज चल रहा था.
कामरेड स्वदेश भट्टाचार्य 28 जुलाई 1974 को भाकपा(माले) की पुनर्गठित केंद्रीय कमेटी के अंतिम जीवित सदस्य थे और तभी से अनथक रूप से पार्टी के विस्तार व विकास में अंतिम सांस तक सक्रिय नेतृत्व दे रहे थे. 1974 में पुर्नगठित केंद्रीय कमेटी के अन्य दो सदस्य कामरेड जौहर (सुब्रत दत्त) और कामरेड विनोद मिश्र थे.
का. स्वदेश भट्टाचार्य 1974 से 1980 तक पार्टी के बिहार राज्य सचिव भी रहे. राष्ट्रव्यापी स्तर पर पार्टी निर्माण व विस्तार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा. तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश से लेकर असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा तक, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड तक – भाकपा(माले) विस्तार के लगभग सभी राज्यों में पार्टी कतारों को उनका राजनीतिक, वैचारिक व सांगठनिक मार्गदर्शन मिलता था. पिछले पांच दशकों में पार्टी की निरंतर प्रगति में और इंडियन पीपुल्स फ्रंट, अखिल भारतीय किसान महासभा और अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा (आइरला) आदि के निर्माण व संचालन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. आइरला के तो स्थापना काल से ही वे आजीवन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने रहे.
काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य का निजी जीवन भी कठिन संघर्षों से भरा हुआ था. बचपन में उनके परिवार को देश विभाजन की पीड़ा झेलते हुये पूर्वी बंगाल से पश्चिम बंगाल आना पड़ा. पूर्वी बंगाल (तब पूर्वी पाकिस्तान और आज का बांग्लादेश) के कोमिल्ला में उनकी प्राथमिक शिक्षा पूरी हुयी थी. किशोरावस्था में ही पिता का साया सर से उठ जाने के कारण परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उन्होंने पैतृक व्यवसाय का भार उठा कर पूरी की. पारिवारिक जिम्मेदारी उठाते हुये ही अंततः उन्होंने कलकत्ता से हायर सेकन्डरी और फिर कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बी.काॅम. की डिग्री हासिल की. बाद में उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के एक बड़े उपक्रम एचईसी (रांची) में कुछ साल नौकरी भी की. एचईसी (रांची) में नौकरी करते हुए वे क्रांतिकारी राजनीति से जुडे़ और नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक किसान विद्रोह के बर्बर राज्य दमन के बीच संघर्षरत क्रांतिकारियों के साथ पार्टी के पुर्ननिर्माण और आन्दोलन को नये सिरे से आगे बढ़ाने की जद्दोजहद में लग गए.
जाहिर है पार्टी निर्माण के लिये समर्पित कामरेड स्वदेश सत्तर के दशक की शुरूआत के उन वर्षों में चल रहे राज्य दमन का सामना करते हुये लम्बे समय तक उस नौकरी में नहीं रह सकते थे, और उन्होंने नौकरी छोड़ कर पूरी तरह से क्रांतिकारी राजनीति में रहने का निर्णय ले लिया. तब से लेकर अपनी अंतिम सांस तक उनका जीवन सिर्फ और सिर्फ पार्टी व जनता की लिये समर्पित रहा. पार्टी के प्रति उनकी निस्वार्थ कम्युनिस्ट प्रतिबद्धता, त्याग और सभी साथियों के प्रति उनकी आत्मीयता एवं संवेदनशीलता के लिए वे हमेशा याद रहेंगे.
वे लगभग शुरू से ही पार्टी के संगठन विभाग के प्रभारी रहे और निरंतर विकासमान परिस्थितियों के अनुरूप बेहतरीन पार्टी संगठन निर्माण की दिशा में सर्वाधिक सचेत साथी एवं मार्गदर्शक बने रहे. पार्टी संविधान एवं नियम-उपनियमों के सूत्रीकरण से लेकर रोजमर्रा के सांगठनिक कार्यभारों में उनके मार्गदर्शन की अपेक्षा सभी साथियों को रहती थी.
पार्टी के केन्द्रीय साप्ताहिक बुलेटिन – एमएल अपडेट – के स्थापना काल से ही वे सम्पादक थे. पार्टी के केंद्रीय मुखपत्र लिबरेशन में भी उनके लेख प्रकाशित होते रहे. 1992 में पार्टी के पांचवें महाधिवेशन के बाद राजधानी दिल्ली में पार्टी मुख्यालय की स्थापना एवं संचालन का कार्यभार भी उन्हीं ने सम्भाला.
काॅ. स्वदेश भट्टाचार्य पिछले पांच दशकों में हमारी पार्टी भाकपा(माले) लिबरेशन की वैचारिक दृढ़ता व ताकत, हौसला व हिम्मत तथा प्रगति व विस्तार के प्रतीक हैं. उनका निधन पार्टी के लिये मात्र शोक नहीं, बल्कि उसी संकल्प को दोहराने और साकार करने के लिये, पूरी मेहनत से काम करने की ओर प्रेरित करता है जिसके लिये उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया था. उनका निधन पार्टी के लिए अपूरणीय क्षति है. उनकी जीवन यात्रा एवं संघर्ष हमेशा पार्टी के लिए, सामाजिक परिवर्तन के लिये संघर्षरत युवा पीढ़ी के कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, छात्रा-नौजवानों, महिलाओं और मजदूर-किसान कार्यकर्ताओं के लिये प्रेरणास्रोत है एवं विकट परिस्थितियों में हम सबका संबल बना रहेगा.
काॅ. स्वदेश भट्टाचार्य अमर रहें!
काॅ. स्वदेश भट्टाचार्य को लाल सलाम!
केन्द्रीय कमेटी, भाकपा(माले)