वर्ष 35 / अंक - 02 / मनुवादी संवेदना : कन्या भ्रूणहत्या और विवाह के लिए...

मनुवादी संवेदना : कन्या भ्रूणहत्या और विवाह के लिए लड़कियों की खरीद

मनुवादी संवेदना : कन्या भ्रूणहत्या और विवाह के लिए लड़कियों की खरीद

कुछ दिनों पहले उत्तराखंड के भाजपा के एक नेता गिरधारी लाल साहू ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए एक कार्यकर्ता से पूछा कि उसकी शादी हुई है या नहीं. यह जानकर कि उसकी शादी नहीं हो सकी है, गिरधारी लाल ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा कि बिहार में 20-25 हजार रुपए में लड़कियां मिल जाती हैं इसलिए बिहार से लड़की खरीद कर उसकी शादी करवा देंगे.

गिरधारी लाल के वक्तव्य पर बिहार में तीखी प्रतिक्रिया हुई. इसे बिहार की महिलाओं के अपमान के रूप में देखा गया कि उन्हें बिकाऊ कहा जा रहा है और बिहार की महिलाओं के सम्मान को लेकर वाजिब आवाजें उठीं. लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि क्या यह उत्तराखंड के लड़कों या पुरुषों का अपमान नहीं है? हम सभ्यता के किस दौर में हैं जहां किसी पुरुष को पत्नी के रूप में  संगिनी की जगह एक खरीदी हुई अर्थात गुलाम स्त्री की जरूरत है जो उसे सेक्स सुख देगी, उसके बच्चों को जन्म देगी और उसके घर का कामकाज संभालेगी! क्या पुरुष को पत्नी के रूप में बस इन्हीं कामों को करने वाली हाड़-मांस की एक मशीन की जरूरत है? क्या इससे उत्तराखंड के पुरुषों के आत्मसम्मान पर चोट नहीं पड़ती कि वह किसी स्त्री से प्रेम के कारण विवाह नहीं कर रहा है बल्कि अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए खरीददारी कर रहा है?

हमारे देश में कोई लड़का या लड़की अपनी मर्जी से शादी कर ले तो उसकी ‘ऑनर किलिंग’ कर दी जाती है लेकिन ‘अभिभावक’ बहू खरीद कर परोपकारी बन जाते हैं! दरअसल हमारे पुरुष सत्तात्मक समाज की संवेदना इसी तरह की है, उसे हर हाल में औरतों पर नियंत्रण रखना है. ऐसी मनुवादी संवेदना से ग्रसित समाज कन्या भ्रूणहत्या और विवाह के लिए लड़कियों की खरीद एक ही भाव से करता है. यह समाज लड़की खरीद कर शादी करे या दहेज लेकर, स्त्री इसके लिए दोयम दर्जे की इंसान है.

गिरधारी लाल से पहले, नीतीश सरकार के संभवतः दूसरे कार्यकाल में हरियाणा के एक भाजपा नेता ने हरियाणा विधानसभा चुनाव के समय युवा मतदाताओं से कहा था ‘सुशील मोदी हमारे मित्र हैं, वे बिहार से लड़कियों का इंतजाम कर देंगे’. मतलब वोट के लिए पत्नियों का इंतजाम भी इनके चुनावी मुद्दे रहे हैं. चुनावी घोषणा पत्र में यह घोषणा भले न की जाए लेकिन मतदाताओं से वायदा किया जाता रहा है.

दशकों से हरियाणा में स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में काफी अंतर रहा है और अब उत्तराखंड की स्थिति भी यही होती जा रही है. एक समय उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में 1000 पुरुषों पर 1000 महिलाएं होती थी लेकिन वहां भी लिंगानुपात में अंतर लगातार बढ़ता गया है और नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में जन्म के समय 1000 लड़कों पर 840 लड़कियों का जन्म हुआ है. यह राष्ट्रीय औसत से भी कम है.

जहां तक बिहार की बात है अगर हम इसे स्त्री के बिकाऊ होने के मुहावरे से अलग करके देखें तो बिहार में समस्या दोहरी है. यहां लड़कियों की जन्म दर घट रही है और यहां से लड़कियों की ट्रैफिकिंग लगातार बढ़ती जा रही है. 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार मानव तस्करी के मामले में बिहार देश में तीसरे स्थान पर है. 20 वर्षों से बिहार में भाजपा गठबंधन की सरकार है और लड़कियों की ट्रैफिकिंग लगातार बढ़ती जा रही है. अब तो इसके कोई ठोस आंकड़े भी सामने नहीं आ रहे हैं.

समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता के युग में बिहार की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भयंकर गरीबी से जूझ रहा है और बेटियों की शादी उनके लिए बोझ बनती जा रही है. लड़कियों को शादी या नौकरी दिलाने के बहाने उनके गरीब मां-बाप को कुछ मामूली रकम देकर लड़कियों को बाहर भेजने का व्यवसाय चल रहा है. औरतों और बच्चों की ट्रैफिकिंग एक बड़ा मुनाफा देने वाला व्यवसाय बन गया है. गाहे-बगाहे अखबारों में कुछ रिपोर्ट छपती है जिसे एक सामान्य खबर की तरह देख लिया जाता है. यहां हम बिहार की बात कर रहे हैं लेकिन उत्तर-पूर्व के राज्यों और मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों में भी स्त्रियों की यही स्थिति है, जहां से विवाह के लिए और उससे ज्यादा सेक्स वर्क के बाजार के लिए लड़कियों की ट्रैफिकिंग बढ़ती जा रही है. इस गंभीर समस्या पर बात किए बगैर लड़कियों-महिलाओं के सम्मान की बात करना कई बार एक पाखंड बन जाता है.


10 January, 2026