--- प्रणव कुमार चौधरी
सैनिक पिता की बेटी, जेएनयू की शोधार्थी से आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक – 23 दिन की भूख हड़ताल, सड़कों के आंदोलन और युवा असंतोष के बीच उभरता एक नया महिला चेहरा. नारे लगाती लड़कियों की भीड़ में एक आवाज बार-बार अलग से सुनाई देती है. आवाज में गुस्सा है, लेकिन केवल गुस्सा नहीं. उसमें सवाल हैं, असहमति है और अपने भविष्य को लेकर बेचैनी भी है. यह आवाज है नेहा बोरा की.
29 वर्षीय नेहा आज भारतीय छात्रा राजनीति में तेजी से उभरते युवा चेहरों में हैं. वह ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही हैं. छात्र आंदोलनों के मंच से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों तक में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने उन्हें विश्वविद्यालय परिसर की सीमाओं से बाहर एक पहचान दी है.
लेकिन नेहा की कहानी केवल एक छात्र नेता के उभार की कहानी नहीं है. इसमें एक दिलचस्प विरोधाभास भी है – उनके पिता भारतीय सेना में रहे हैं, जबकि नेहा ने अपने लिए एक स्पष्ट वामपंथी छात्र-राजनीतिक रास्ता चुना है. वह स्वयं स्वीकार करती हैं कि उनकी राजनीतिक सोच और परिवार की राजनीतिक समझ में अंतर है. यही विरोधाभास उनके व्यक्तित्व को समझने की पहली कुंजी है.
खटीमा से दिल्ली तक
नेहा मूल रूप से उत्तराखंड के खटीमा की रहने वाली हैं. सैन्य परिवार में जन्म और परवरिश के कारण बचपन का एक हिस्सा अलग-अलग जगहों पर बीता. उनके पिता भारतीय सेना में रहे हैं.
उनकी शुरुआती शिक्षा और आगे की पढ़ाई दिल्ली से जुड़ी रही. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और बाद में डाॅ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से मास्टर डिग्री हासिल की. इसके बाद उनका अकादमिक सफर उन्हें जेएनयू तक ले आया, जहां वह स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्समें पीएचडी कर रही हैं. उनका अकादमिक जुड़ाव थिएटर और परफाॅर्मेंस स्टडीज से है.
यही थिएटर उनके राजनीतिक जीवन का भी शुरुआती रास्ता बना. विश्वविद्यालय में सामाजिक मुद्दों पर थिएटर करते हुए उन्होंने यह महसूस किया कि मंच पर किसी सामाजिक सवाल को उठाना और सड़क पर उसी सवाल के लिए संघर्ष करना दो अलग चीजें नहीं हैं. उनकी राजनीति धीरे-धीरे उसी अनुभव से विकसित हुई.
थिएटर से आंदोलन तक
नेहा की राजनीतिक यात्रा अचानक नहीं हुई. सामाजिक मुद्दों पर थिएटर करते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय के भीतर होने वाली बहसों और आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू किया. छात्रा राजनीति से उनका जुड़ाव बढ़ा और वह आइसा से जुड़ गईं. उनके राजनीतिक जीवन में 2019 के नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ हुए आंदोलन को भी महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. यहीं से विश्वविद्यालय की एक छात्रा धीरे-धीरे पूर्णकालिक छात्र कार्यकर्ता की भूमिका में दिखाई देने लगी.
उनकी राजनीति शिक्षा, छात्र अधिकार, परीक्षा व्यवस्था, रोजगार, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के आसपास विकसित हुई. आइसा में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाते हुए वह राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचीं. आज वह संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
इसलिए उन्हें केवल किसी एक आंदोलन से अचानक उभरी “वायरल” छात्र नेता के रूप में देखना उनकी यात्रा को अधूरा समझना होगा. उनके पीछे वर्षों की छात्र राजनीति और संगठनात्मक काम का अनुभव है.
परिवार की राह से अलग अपनी राह
नेहा के व्यक्तित्व का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यही है कि वह जिस परिवार से आती हैं, उसकी पृष्ठभूमि और उनकी राजनीति एक जैसी नहीं है. एक तरफ पिता भारतीय सेना में रहे हैं. दूसरी तरफ बेटी देश के प्रमुख वामपंथी छात्रा संगठनों में से एक की राष्ट्रीय अध्यक्ष है.
नेहा इस अंतर को छिपाती नहीं हैं. उनका कहना है कि परिवार की राजनीतिक सोच और उनकी अपनी राजनीतिक समझ अलग है. लेकिन उन्होंने अपने विश्वासों के आधार पर रास्ता चुना. यही स्वतंत्रता-बोध उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
उनकी राजनीति में एक सवाल बार-बार दिखाई देता है – क्या किसी युवा को अपने जीवन और भविष्य से जुड़े फैसलों में अपनी आवाज रखने का अधिकार है? नेहा के लिए यह सवाल व्यक्तिगत भी है और राजनीतिक भी.
23 दिन की भूख हड़ताल
नेहा को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक पहचान जिस आंदोलन से मिली, वह था दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन. परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और छात्रों से जुड़े सवालों को लेकर चले आंदोलन में उन्होंने 23 दिन की भूख हड़ताल की. यह केवल राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था. 23 दिनों का उपवास किसी भी व्यक्ति के लिए गंभीर शारीरिक चुनौती है.
इस दौरान नेहा की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से प्रसारित हुए. कमजोर होता शरीर और लगातार जारी राजनीतिक प्रतिरोध उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बन गया. उनके लिए यह आंदोलन केवल एक संगठन का कार्यक्रम नहीं था. वह इसे छात्रों के व्यापक असंतोष से जोड़ती हैं.
उनका तर्क था कि परीक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल केवल परीक्षा देने वाले छात्रों का मामला नहीं हैं. यह उनके भविष्य, रोजगार और जीवन की दिशा से जुड़ा प्रश्न है.
यही वह बिंदु था जहां नेहा का चेहरा संगठन की सीमा से बाहर दिखाई देने लगा.
अपनी जिंदगी दांव पर लगाई
नेहा ने अपने आंदोलन को केवल भाषण और नारों तक सीमित नहीं रखा. 23 दिन की भूख हड़ताल उनके लिए व्यक्तिगत जोखिम भी थी.
वह मानती हैं कि आंदोलन में हिस्सा लेने वालों ने ‘अपनी जिंदगी दांव पर लगाई’. यह वाक्य उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.
उनकी राजनीति में संघर्ष केवल मंच पर भाषण देने तक सीमित नहीं है. वह स्वयं भी उस संघर्ष का हिस्सा बनती हैं. यही कारण है कि समर्थकों के बीच उनकी छवि एक ऐसी नेता की बनी है जो ‘दूसरों को संघर्ष करने के लिए कहने’ के बजाय ‘स्वयं संघर्ष में उतरती’ है.
‘स्याही’ से बना नया प्रतीक
झारखंड में छात्र आंदोलन के दौरान नेहा पर कथित तौर पर काली स्याही फेंके जाने की घटना ने उनकी सार्वजनिक छवि को और मजबूत किया. घटना उस समय हुई जब वह छात्रों और कार्यकर्ताओं के मार्च का नेतृत्व कर रही थीं.
चेहरे पर स्याही पड़ने के बाद भी उन्होंने आंदोलन से पीछे हटने के बजाय उसे प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि वह इस ‘स्याही’ को गर्व के साथ स्वीकार करेंगी और उन्होंने भविष्य को इसी ‘स्याही’ से लिखने की बात कही.
राजनीतिक आंदोलनों में प्रतीक महत्वपूर्ण होते हैं. नेहा के मामले में 23 दिन की भूख हड़ताल और चेहरे पर पड़ी ‘स्याही’ – दोनों तस्वीरें उनके आंदोलनकारी व्यक्तित्व की पहचान बन गई हैं.
एक सामान्य लड़की का चेहरा
नेहा की लोकप्रियता को केवल उनके संगठनात्मक पद से समझना मुश्किल है. उनकी सबसे बड़ी ताकत शायद यह है कि वह बहुत से युवाओं को ‘अपनी जैसी’ लगती हैं.
वह किसी बड़े राजनीतिक परिवार से नहीं आतीं. उनका परिचय किसी निर्वाचित पद से नहीं बना. उनकी पहचान एक छात्रा, शोधार्थी और कार्यकर्ता के रूप में बनी. एक विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली युवा महिला का राष्ट्रीय छात्रा संगठन का नेतृत्व करना अपने आप में भी महत्वपूर्ण है.
वह मंच पर आक्रामक हो सकती हैं, नारे लगा सकती हैं, सरकार और व्यवस्था पर तीखे सवाल उठा सकती हैं, पुलिस कार्रवाई की आलोचना कर सकती हैं, लेकिन साथ ही, वह अकादमिक दुनिया से भी जुड़ी हुई हैं.
यही दोहरी पहचान – शोधार्थी और आंदोलनकारी – उन्हें अलग बनाती है.
महिला होने का संकोच, एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में
भारतीय छात्र राजनीति में महिला नेतृत्व नया नहीं है. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सड़कों और आंदोलनों में सक्रिय रहने वाली युवा महिला नेताओं की संख्या सीमित रही है.
नेहा इस परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण चेहरा बनकर सामने आई हैं. उनकी राजनीति में महिला होने को लेकर कोई संकोच नहीं है. वह मंच पर उतनी ही मुखर दिखाई देती हैं जितने उनके पुरुष सहकर्मी.
उनका मानना है कि महिलाओं को अक्सर शांत, संकोची और पीछे रहने वाली छवि में देखा जाता है. वह इस धारणा को चुनौती देती हैं. यही कारण है कि छात्र आंदोलनों में उनकी मौजूदगी केवल आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नहीं दिखाई देती.
वह एक ऐसे युवा महिला चेहरे के रूप में भी सामने आती हैं जो राजनीतिक असहमति को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से नहीं हिचकती.
‘आंदोलन’ और ‘राजनीति’ के बीच
नेहा की राजनीति स्पष्ट रूप से विचारधारात्मक है. वह आइसा से जुड़ी हैं, जो वामपंथी छात्र राजनीति का हिस्सा है. इसलिए उनकी राजनीति को गैर-राजनीतिक छात्र असंतोष के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा. उनकी अपनी विचारधारा है और वह उसे खुले तौर पर सामने रखती हैं.
उनके आलोचक उनकी राजनीति और उनके संगठनों के रुख पर सवाल उठाते हैं. समर्थक इसे लोकतांत्रिक छात्रा राजनीति और असहमति की आवाज मानते हैं.
कुछ राजनीतिक विवादों में उन्हें लेकर ‘उग्र’, ‘कट्टर’ अथवा अन्य राजनीतिक विशेषणों का इस्तेमाल भी किया गया है. ऐसे शब्दों को तथ्य के रूप में स्वीकार करने के बजाय उन्हें राजनीतिक आरोप या आलोचना के रूप में ही देखा जाना चाहिए. नेहा स्वयं अपने राजनीतिक रुख को लोकतांत्रिक अधिकारों, शिक्षा और युवाओं के सवालों से जोड़ती हैं.
पटना से रांची तक
दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुई उनकी राष्ट्रीय पहचान अब कई राज्यों तक पहुंच चुकी है. बिहार में छात्र आंदोलनों के दौरान उनकी सक्रियता दिखाई दी. पटना में छात्र संगठनों के कार्यक्रमों में उन्होंने हिस्सा लिया और छात्रों से संवाद किया. झारखंड में परीक्षा और भर्ती से जुड़े मुद्दों पर छात्र आंदोलन में उनकी भागीदारी हुई. उत्तर प्रदेश सहित दूसरे राज्यों में भी युवा और छात्र आंदोलनों से जुड़ी गतिविधियों में उनकी मौजूदगी रही है. यह यात्रा बताती है कि उनका लक्ष्य केवल जेएनयू या दिल्ली तक सीमित नहीं है. वह छात्रा मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की कोशिश कर रही हैं.
आखिर नेहा में ऐसा क्या है?
यह सवाल महत्वपूर्ण है. भारत में हर साल हजारों छात्र आंदोलन करते हैं. सैकड़ों छात्र नेता भाषण देते हैं. सोशल मीडिया पर हर दिन नए चेहरे सामने आते हैं. फिर नेहा बोरा का चेहरा क्यों टिक गया?
शायद इसका उत्तर उनके व्यक्तित्व के कई पहलुओं के मेल में है. एक तरफ वह जेएनयू की शोधार्थी हैं. दूसरी तरफ सड़क पर आंदोलन करती हैं. एक तरफ वह थिएटर की दुनिया से आती हैं. दूसरी तरफ राजनीतिक संगठन का नेतृत्व करती हैं. एक तरफ वह सेना के परिवार से आती हैं. दूसरी तरफ उनकी राजनीति परिवार की सोच से अलग है. एक तरफ वह युवा महिला हैं. दूसरी तरफ वह राष्ट्रीय संगठन की अध्यक्ष हैं. और सबसे महत्वपूर्ण – उन्होंने केवल आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया, बल्कि उसमें व्यक्तिगत जोखिम भी उठाया.
23 दिन की भूख हड़ताल ने उन्हें एक तस्वीर दी. चेहरे पर पड़ी ‘स्याही’ ने दूसरी. लेकिन इन तस्वीरों के पीछे वर्षों का संगठनात्मक काम है.
‘सामान्य युवा’ से आंदोलन के चेहरे तक
नेहा की कहानी को केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी के रूप में देखना भी शायद उचित नहीं होगा. वह जिस समय उभरी हैं, उस समय भारतीय युवाओं के सामने शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े कई सवाल हैं.
उनके भाषणों में यही सवाल बार-बार लौटते हैं. इसलिए नारे लगाती लड़कियों की भीड़ में जब नेहा की आवाज सुनाई देती है तो उसमें केवल एक राजनीतिक संगठन का स्वर नहीं सुनाई देता. उसमें एक सामान्य युवा लड़की की बेचैनी भी सुनाई देती है. शायद यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है.
वह अपने समर्थकों के लिए संघर्ष का प्रतीक बन रही हैं क्योंकि वह खुद को उनसे अलग किसी विशेष वर्ग में खड़ा नहीं करतीं. वह उसी विश्वविद्यालय व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसके खिलाफ बोलती हैं. परीक्षा और रोजगार की उसी चिंता को समझती हैं, जिसे लेकर छात्र सड़क पर उतरते हैं. और जब वह मंच से कहती हैं कि युवाओं के भविष्य से जुड़े फैसले उनकी भागीदारी के बिना नहीं हो सकते, तो वह बात केवल राजनीतिक नारा नहीं रह जाता. वह एक पीढ़ी की मांग बन जाती है.
आगे की राह
नेहा बोरा का राजनीतिक सफर अभी लंबा है. उनकी उम्र 30 वर्ष भी नहीं हुई है. उनके सामने अकादमिक जीवन है, छात्र संगठन का नेतृत्व है और देशभर में बढ़ती राजनीतिक पहचान है. लेकिन इसी के साथ चुनौतियां भी हैं.
राष्ट्रीय छात्र नेता के रूप में लोकप्रियता को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होता. आंदोलन की ऊर्जा को संगठन में बदलना अलग चुनौती है. सड़क के संघर्ष को नीतिगत बहस में बदलना उससे भी बड़ी चुनौती है.
नेहा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वह आंदोलन के प्रतीक से आगे बढ़कर एक व्यापक राजनीतिक बौद्धिक आवाज बन पाती हैं.
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वह भारतीय छात्र राजनीति के पुराने चेहरों के बीच एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती दिखाई दे रही हैं. उनकी कहानी में कोई फिल्मी नाटकीयता नहीं है.
एक सैन्य परिवार की बेटी. दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा. थिएटर से प्रभावित युवा. जेएनयू की शोधार्थी. आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष. 23 दिन की भूख हड़ताल करने वाली कार्यकर्ता. चेहरे पर ‘स्याही’ लेकर भी मंच पर लौटने वाली आंदोलनकारी. और हजारों छात्रों के बीच अपनी आवाज बुलंद करती एक युवा महिला.
नेहा बोरा की असली कहानी शायद यही है – उन्होंने अभी कोई चुनाव नहीं जीता है, कोई सरकारी पद नहीं संभाला है और सत्ता के किसी गलियारे में नहीं पहुंची हैं. फिर भी वह युवाओं के बीच एक राजनीतिक पहचान बना चुकी हैं. और भारतीय लोकतंत्र में कभी-कभी सत्ता से बाहर खड़ा यही युवा चेहरा आने वाले समय की राजनीति का संकेत देता है.
( प्रणव कुमार चौधरी जेएनयू के छात्र और ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ के संवाददाता रह चुके हैं.)