वर्ष 35 / अंक - 42 / एक चेहरा, हजार हाथ: नेहा बोरा, मीडिया और प्रतिरोध

एक चेहरा, हजार हाथ: नेहा बोरा, मीडिया और प्रतिरोध

एक चेहरा, हजार हाथ: नेहा बोरा, मीडिया और प्रतिरोध

-- मनमोहन

गुलों में रंग भरने वाली बहार फिर लौट रही है. अक्टूबर 2026 की दिल्ली की सड़कें गवाह हैं कि वतन को उजाड़ने पर आमादा निजाम के खिलाफ बगावत की चिंगारियां अब सुलगने लगी हैं. एसआइआर के खिलाफ युवाओं का गुस्सा अब वोट के हक से आगे बढ़कर तानाशाही निजाम को बदलने, लोकतंत्र और संविधान की हिफाजत करने और वतन को बचाने की लड़ाई बन रहा है. जेन-जी का यह आंदोलन अब जंतर-मंतर से थानों तक और दिल्ली से देश के दूसरे शहरों तक फैल रहा है.

लाठियां, हिरासत और क्रूर दमन भी उनकी आवाज को दबा नहीं पा रहे हैं. निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बरसती लाठियों को देखकर सवाल उठता है: क्या हम उन संघर्षों को भूल गए हैं, जिनके दम पर हमारे लोगों ने आजादी हासिल की थी?

सड़कों पर उठती ये आवाजें लंबे समय से जमा गुस्से, निराशा और टूटते भरोसे का इजहार हैं. खामोशी टूट रही है, डर की जगह हौसला ले रहा है और अकेली आवाजें एकजुट होकर बुलंद हो रही हैं. लोगों को एहसास हो रहा है कि उनका दर्द साझा है और उनकी लड़ाई भी साझा है. यही एकजुटता प्रतिरोध की ताकत बनती है. यह जमीर का विद्रोह है. यह आजादी के उस वादे को पूरा करने की मांग है, जो देश की जनता से किया गया था.

इस पूरे आंदोलन में एक चेहरा सबसे ज्यादा उभरकर सामने आया है: नेहा बोरा, जेएनयू की शोधार्थी, रंगमंच से जुड़ी कलाकार और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष. उनकी राजनीति को उनके संगठन से अलग करके नहीं समझा जा सकता. आइसा की स्थापना 9 अगस्त 1990 को हुई थी. यह भाकपा(माले) लिबरेशन का छात्र संगठन है, जिसकी नींव इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में मंडल आयोग लागू होने के एक दिन बाद पड़ी. यानी, यह संगठन शुरू से ही सामाजिक न्याय और वर्ग-संघर्ष की जमीन से निकला है. नेहा आइसा की उस इंकलाबी विरासत को बुलंद करती हैं, जिसे नक्सलबाड़ी के धधकते खेत-खलिहानों से लेकर जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष चंदू की शहादत और अन्याय के खिलाफ हुए अनगिनत संघर्षों ने अपने खून से सींचा है. वे खुद कई मौकों पर कह चुकी हैं कि मौजूदा आंदोलन आसमान से नहीं टपका है. यह रोहित वेमुला के सवाल, जेएनयू पर हमले, फीस-वृद्धि, सीएए विरोधी आंदोलन और किसान आंदोलन जैसी लड़ाइयों की कड़ी है, जिन्हें वाम संगठनों ने बरसों तक लड़ा है.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया का आईना

विदेशी मीडिया ने इस आंदोलन में एक आसानी से समझ आने वाली कहानी देखी: एक युवा, एक पुलिस बैरिकेड और एक ताकतवर सरकार. लेकिन यह कहना गलत होगा कि उसने सिर्फ चमक-दमक देखी. उसने नेहा की कई असली खूबियों को भी पहचाना.

न्यूयाॅर्क टाइम्स ने भारत के युवाओं के ‘अपने शरीर को दांव पर लगाने’ की बात की. रिपोर्टों के मुताबिक, उसने नेहा का वह वीडियो भी दिखाया, जिसमें वे बार-बार हिरासत में लिए जाने के बाद अपने घावों को फिटनेस इन्फ्लुएंसर की शैली में मजाकिया अंदाज में दिखाती हैं और फिर पुलिस से कहती हैं कि डराने से युवा रुकने वाले नहीं हैं, वे अगले दिन फिर मार्च करेंगे. यहां गौर करने वाली बात यह है कि दमन के बीच हास्य और आत्मविश्वास को उनकी खासियत के तौर पर पहचाना गया. अखबार ने सोशल मीडिया पर उनके एक लाख से ज्यादा फाॅलोअर्स का भी जिक्र किया.

बीबीसी ने उन्हें ‘जुझारू जेन-जी प्रदर्शनकारी’ कहा और उनके भाषणों की तीव्रता तथा हिरासत के बावजूद बार-बार लौट आने के उनके हौसले को रेखांकित किया. बीबीसी हिंदी ने नरेला थाने से उनकी रिहाई की खबर में यह ठोस ब्योरा भी दिया कि उनके पास न फोन था, न बैग.

राॅयटर्स ने उनकी यात्रा को ‘थिएटर से सड़कों तक’ के सफर के रूप में पेश किया. उसने बताया कि वे 2019-20 के नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन के दौर से ही सक्रिय हैं और एसआइआर में नाम कटने के खिलाफ चल रहे आंदोलन को उनके नेतृत्व से जोड़ा.

स्ट्रेट्स टाइम्स ने उन्हें ‘असंभावित नायिका’ कहा. उसने साहित्यिक हिंदी और अंग्रेजी में राजनीतिक बात रखने की उनकी क्षमता, जेएनयू में उनके शोध, उत्तराखंड के लोक नाट्य पर उनके काम और नुक्कड़ नाटक के अनुभव को उनकी वक्तृता का स्रोत बताया. उसने उनके 23 दिन के अनशन का भी जिक्र किया और बताया कि उन्हें विपक्षी नेताओं तथा फिल्मी हस्तियों का समर्थन मिला. परिवार के साथ वैचारिक मतभेद और मां से संवाद जैसे निजी पहलुओं ने उनकी छवि को और मानवीय बनाया.

गल्फ न्यूज ने उन्हें सत्ता-प्रतिष्ठान को हिला देने वाली आवाज के रूप में पेश किया. मलेशिया के द स्टार जैसे मंचों ने एसआइआर में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटने के सवाल को नेहा के शब्दों में सामने रखा. उन्होंने इसे समाज के हाशिए पर खड़े तबकों के वोट और अधिकार छीनने का एक लक्षित अभियान बताया.

इन तमाम रिपोर्टों में उनकी जो खूबियां बार-बार उभरकर सामने आईं, वे हैं: वे हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में संविधान, नागरिक अधिकार, सामाजिक समानता और चुनावी जवाबदेही की भाषा बोलती हैं. वे सड़क की राजनीति और रंगमंच की संवाद-कला को जोड़ती हैं. वे दमन के सामने हौसला और हास्य बनाए रखती हैं. साथ ही, वे एसआइआर को वंचित तबकों के राजनीतिक अधिकारों का सवाल बनाती हैं. विदेशी पाठकों के लिए यही खूबियां उन्हें भारत के जेन-जी विद्रोह का ‘मानवीय चेहरा’ बनाती हैं.

लेकिन इस कवरेज की एक सीमा भी साफ है. वामपंथी पृष्ठभूमि का जिक्र तो होता है, लेकिन भाकपा(माले) की सोच, उसके कार्यक्रम और बरसों की संगठनात्मक मेहनत पर गहराई से बात नहीं होती. ‘असंभावित’ शब्द में यह धारणा भी छिपी है कि एक साधारण दिखने वाली लड़की से इतने साहस की उम्मीद नहीं थी. इस तरह कहानी अक्सर व्यक्ति की बहादुरी की बनकर रह जाती है, जबकि संगठन और आंदोलन के सामूहिक निर्माण की कहानी पीछे छूट जाती है.

घरेलू मीडिया की तस्वीर

भारत के भीतर नेहा की छवि एक नहीं, कई हैं. विदेशी मीडिया जहां उनके व्यक्तिगत साहस पर जोर देता है, वहीं घरेलू मीडिया के कई हिस्सों में उनके संगठन और पार्टी का साफ जिक्र मिलता है.

मुख्यधारा के अखबार और वेबसाइटें उनकी सांगठनिक पहचान पर खुलकर लिखते हैं. इंडियन एक्सप्रेस और आउटलुक इंडिया जैसे मंचों ने आइसा के इतिहास, उसकी कम्युनिस्ट जड़ों और भाकपा(माले) लिबरेशन से उसके रिश्ते पर विस्तार से लिखा. इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में नेहा ने बड़ी पार्टियों में शामिल होने के सुझाव को ठुकराते हुए साफ कहा कि वे अपनी पार्टी से जुड़ी रहेंगी. द ट्रिब्यून में उन्होंने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन को वाम संगठनों की वर्षों की सक्रियता की निरंतरता बताया.

स्वतंत्र और प्रगतिशील मीडिया ने उन्हें उम्मीद और संवैधानिक अधिकारों के चेहरे के रूप में देखा. काउंटरकरेंट्स जैसे मंच पर उन्हें ‘मार्क्सवादी आत्मा और गांधीवादी रीढ़’ वाली नई पीढ़ी की नेता कहा गया, जो बेरोजगारी और जवाबदेही के सवालों को मार्क्सवादी मूल्यों से जोड़ती हैं. द प्रिंट हिंदी के एक लेख में उनके साहस की तारीफ की गई, लेकिन साथ ही उन्हें ‘मसीहा’ बनाने के खिलाफ आगाह किया गया. लेख में यह भी कहा गया कि असली चुनौती आंदोलन को कैंपस से बाहर ले जाने की है. इन तमाम प्रतिक्रियाओं में एक जरूरी बात है: प्रशंसा के साथ चेतावनी भी जुड़ी है.

मुख्यधारा के टीवी चैनलों और दक्षिणपंथी तंत्र ने इसी चेहरे का उलटा इस्तेमाल किया. उन्हें ‘रेजीम चेंज की पोस्टर गर्ल’ कहा गया. यानी, आंदोलन को लोकतांत्रिक असहमति के बजाय सत्ता पलटने की बाहरी साजिश के रूप में पेश किया गया और उसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधियों से जोड़ दिया गया. ‘डिजाइनर नक्सली’ जैसे लेबल इसी हथियार के औजार हैं. स्वराज्य जैसे दक्षिणपंथी मंचों ने आइसा और भाकपा(माले) के क्रांतिकारी कार्यक्रम पर हमला किया और नेहा की लोकप्रियता को पार्टी के एजेंडे से जोड़कर निशाना साधने की कोशिश की. पड़ोसी देश में उठे जन-उभार के प्रति युवाओं की सहानुभूति को देशद्रोह बताने का मतलब यही है कि इस देश के नागरिकों को सोचने तक का हक नहीं है.

अब इस विरोधाभास की सबसे अहम बात देखिए. विदेशी मीडिया पार्टी को लगभग नजरअंदाज करके व्यक्ति को महिमामंडित करता है. घरेलू प्रगतिशील मीडिया पार्टी और व्यक्ति, दोनों को जोड़कर देखता है और अक्सर साथ में चेतावनी भी देता है. दक्षिणपंथी मीडिया पार्टी के नाम को गाली और व्यक्ति को निशाना बनाने के औजार की तरह इस्तेमाल करता है. तीनों के अपने-अपने मकसद हैं, लेकिन तीनों की निगाह एक ही जगह टिकी है: एक व्यक्ति पर. एसआईआर में कटे नामों की सूची, किस जिले में कितने मतदाता गायब हुए और किस समुदाय पर इसका कितना असर पड़ा, जैसे सवाल इन बहसों से अक्सर बाहर रह जाते हैं.

तस्वीरों का पाठ

आज के आंदोलन अपनी बात बड़े दायरे तक पहुंचाने के लिए तस्वीरों और वीडियो की ताकत का इस्तेमाल करते हैं. नेहा और उनके साथियों ने इस मैदान में कमाल का काम किया है. आइए, उन तस्वीरों को पढ़ें जो सबसे ज्यादा साझा की गईं.

तितलियां, परिंदे और खुला आसमान: नेहा की एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें वे कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ सड़क पर दौड़ती दिखाई देती हैं. पीछे रंगीन दीवार, तितलियां, उड़ते पक्षी और खुला आसमान है. आम तौर पर किसी आंदोलन की तस्वीरों में हम पुलिस, बैरिकेड, तनाव, लाठीचार्ज या टकराव देखने की उम्मीद करते हैं. लेकिन यहां ये सभी तत्व अनुपस्थित हैं. यही अनुपस्थिति इस तस्वीर की सबसे बड़ी मौजूदगी है: आजादी, आकांक्षा, मुक्ति और भविष्य की संभावना.

यह एक तरह की ‘प्रतिरोधी कल्पना’ है. ऐसा लगता है कि यहां युवा किसी बैरिकेड को तोड़ने के लिए नहीं भाग रहे, बल्कि किसी सपने की ओर दौड़ रहे हैं. इस तस्वीर में दौड़ते हुए शरीर बेहद अहम हैं, क्योंकि सत्ता सबसे पहले शरीरों को नियंत्रित करती है: कहां जाओगे, कैसे चलोगे, कहां रुकोगे?

इस तस्वीर में शरीर नियंत्रण से मुक्त दिखाई देते हैं. यहां दौड़ना महज शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का रूपक बन जाता है. सड़क पर दौड़ता युवा शरीर एक ऐसे लोकतांत्रिक स्पेस की मांग करता है, जहां निगरानी और अवरोध न हों. सड़क, जो आम तौर पर सत्ता के नियंत्रण और निगरानी का ठिकाना होती है, अचानक स्वतंत्र नागरिकता के मैदान में बदल जाती है.

पुलिस के हाथों दमन के बीच मुस्कुराना: शरीर पर सत्ता का बल है, लेकिन चेहरे पर बेखौफी. यह मुस्कान कहती है: तुम मुझे उठा सकते हो, डरा नहीं सकते. आंदोलन के लिए यह बहुत बड़ी जीत है. इसने लाखों युवाओं के भीतर बैठे डर को तोड़ा और दमन की तस्वीर को सत्ता के खिलाफ गवाही में बदल दिया.

बैरिकेड पर चढ़ना: बैरिकेड राज्य की खींची हुई रेखा है. उसे फांदती तस्वीर में ऊंचाई और आगे बढ़ने का भाव है, जबकि सामने खड़ी वर्दी रुकावट का प्रतीक है. कैमरा अक्सर नीचे से ऊपर की ओर होता है, जिससे तस्वीर में नायकीय कोण बनता है. यह तस्वीर बेहद असरदार है, क्योंकि एक ही नजर में बता देती है कि जनता और सत्ता के बीच क्या चल रहा है.

गांधी और अंबेडकर की तस्वीरों के नीचे: 

एक वायरल तस्वीर में नेहा और एक लोकप्रिय यूट्यूबर सोफे पर बैठे हैं. उनके ऊपर दीवार पर अंबेडकर और गांधी की तस्वीरें हैं. यह फ्रेम बिना एक शब्द बोले एक रिश्ता बना देता है: ये लोग उसी परंपरा के वारिस हैं. इससे आंदोलन को व्यापक स्वीकार्यता मिलती है, खासकर उन दर्शकों के बीच जो पार्टी की राजनीति से दूर रहते हैं.

चेहरे पर स्याही: झारखंड में उन पर स्याही फेंके जाने के बाद उन्होंने उसे पोंछा नहीं और उसी हालत में अपनी बात पूरी की. रंगमंच की समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस दृश्य की ताकत पहचान लेगा. यह हमले को उसी के खिलाफ इस्तेमाल करने वाला दृश्य है. यहां तस्वीर बनाने वाला खुद आंदोलनकारी है. यह इस बात का सबूत है कि जब हम अपनी छवि का संचालन अपने हाथ में रखते हैं, तो वही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है. लेकिन इसके साथ एक हिदायत भी जुड़ी है: यह नियंत्रण हमेशा हमारे हाथ में रहना चाहिए. तस्वीर का मतलब कैमरे, एल्गोरिदम या बाजार के हाथों में नहीं चला जाना चाहिए.

इन तस्वीरों से हम तीन बातें सीख सकते हैं. पहली, तस्वीर आंदोलन को बड़े दायरे तक ले जाती है. यह सच है और इसका इस्तेमाल पूरी हिम्मत से होना चाहिए. दूसरी, तस्वीर अपने आप कुछ नहीं कहती. उसे पढ़ने वाला मीडिया उसका मतलब गढ़ता है. इसलिए हमारी अपनी व्याख्या, कैप्शन और मांगें भी उसके साथ जानी चाहिए. तीसरी, सोशल मीडिया का एल्गोरिदम हमारी विचारधारा नहीं देखता. वह सिर्फ यह देखता है कि कौन-सी तस्वीर ज्यादा देर तक आंखों को बांधे रखती है. जो तस्वीर ‘आकर्षक’ होती है, वह फैलती है. लेकिन राजनीति के सौंदर्यीकरण में असली पीड़ा एक सुंदर, आसानी से पचाई जा सकने वाली वस्तु बन जाती है. यह ताकत दोधारी तलवार है. वह दुश्मन पर वार करती है और जरा-सी चूक होने पर अपने हाथ को भी काट सकती है.

हम इस जाल से तभी बच सकते हैं, जब हर वायरल तस्वीर के पीछे ठोस सांगठनिक काम खड़ा हो और हम हर ‘लाइक’ को सड़क पर उतरने के इंकलाबी जुनून में बदल सकें.


17 October, 2026