– कुमार दिव्यम
आज चुनाव आयोग संविधान, कानून और न्याय की भावना का मजाक बना रहा है. आज खतरा सिर्फ लोगों के वोट देने के अधिकार पर ही नहीं है बल्कि उसके साथ-साथ उनके आधार व पहचान, राशन और दूसरे अन्य नागरिक अधिकारों पर भी आ गया है. मतदाता पहचान पत्र इस देश में पहचान का दस्तावेज है. चुनाव आयोग देश के नागरिकों को अपने ही देश में पहचान के संकट में डाल रहा है. चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाए, न कि ऐसी प्रक्रिया खड़ी करे जिसमें सही मतदाता को अपने अधिकार के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़े.
नागरिकों के मताधिकार की हिफाजत करने की जगह एसआइआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-विशेष गहन पुनरीक्षण) के नाम पर ठीक इसका उल्टा हो रहा है. यह देश के नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने का हथियार बन चुका है. यह एक ऐसी प्रक्रिया बन चुका है जिसमें एक आजाद और लोकतांत्रिक मुल्क में मतदाताओं को अपने ही मताधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. अब तो इस बात के सबूत भी आ गए हैं कि यह पूरी प्रक्रिया सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने के लिए अपनायी जा रही है और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त इस पूरी पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया के केंद्र में हैं. जो तथ्य सामने आए हैं वे तो इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि यह कोई मामूली गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह वोटों की खुलेआम चोरी है.
एसआइआर बिहार से शुरू हुआ था. तब भी भाकपा(माले) और विपक्षी इंडिया गठबंधन के दलों ने इसके जरिए लोगों के वोट चोरी का दावा करते हुए इसका कड़ा विरोध किया था और पूरे बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली थी. इसके विपरीत चुनाव आयोग ने दावा किया गया था कि इसके जरिए एकदम शुद्ध और सही मतदाता सूची तैयार की गई है.
एक बार फिर अपने दावे को सच साबित करने की मुहिम चलाते हुए भाकपा(माले) ने पिछले दिनों बिहार के 10 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची से अलग-अलग कारण बता कर नाम काटे गए लोगों के बीच सर्वे अभियान संचालित किया. इस सर्वे अभियान ने बेहद चौंकाने वाले आंकड़ों को सामने लाया है. इन आंकड़ों ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के त्रुटिहीन और शुद्ध मतदाता सूची और उसके आधार पर हुए निष्पक्ष चुनाव के दावे की कलई खोल दी है.
सर्वे की टीम टीम ने एसआइआर के दौरान तथा उससे पहले मतदाता सूची से हटाए गए एवं जोड़े गए नामों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए बूथ स्तर पर घर-घर (डोर-टू-डोर) सर्वे किया. यह सर्वे दो चरणों में संपन्न किया गया – पहले चरण में जून 2026 में और दूसरे चरण में सितंबर 2026 में 102 बूथों पर 13,759 मतदाताओं के बीच यह सर्वे किया गया. ये ऐसे मतदाता हैं, जिनके नाम अलग अलग कारणों से मतदाता सूची से बाहर कर दिये गये हैं. इस सर्वे में ऐसे 36 मतदाता भी मिले जो अब भी जीवित हैं लेकिन उन्हें घोषित कर उनका नाम मतदाता सूची से बाहर (विलुप्त) कर दिया गया है.
सर्वे के दौरान 10 विधानसभा के कुल 50 बूथों पर मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए कुल 9288 मतदाताओं के घरों तक पहुंचकर जांच की गई. इसमें 1550 लोग, यानि लगभग 18 प्रतिशत मतदाता अपने पते पर उपस्थित मिले. मात्र 50 बूथों पर 18% मतदाताओं का नाम अवैध ढंग से मतदाता सूची से गायब कर देना – यह आंकड़ा मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा करता है. इसी तरह एसआइआर से पहले मतदाता सूची से हटाए गए नामों यानि प्री-एसआइआर डिलीशन (जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच) की श्रेणी में कुल 24 बूथों पर 1964 मतदाताओं के बीच सर्वे किया गया. इनमें से भी 351 लोग यानि 18 प्रतिशत अपने पते पर मौजूद मिले, जबकि उनके नाम तो मतदाता सूची से पहले ही हटाए जा चुके थे.
वहीं, एसआइआर से पहले मतदाता सूची में जोड़े गए नामों यानी प्री-एसआइआर एडीशन (जनवरी 2024-जून 2025 के बीच) की श्रेणी में 28 बूथों पर 2507 मतदाताओं के बीच जब सर्वे किया गया तो इनमें 548 मतदाता यानी लगभग 22 % अपने पते पर नहीं मिले. यह स्थिति मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया की पारदर्शिता तथा सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
विधानसभा क्षेत्रवार स्थिति
अलग-अलग दस विधानसभा क्षेत्रों में किए गए सर्वे रिपोर्ट पर नजर डालें तो जो तथ्य निकलकर सामने आए हैं वे कुछ इसप्रकार हैं:
103-भोरे विधानसभा क्षेत्र: यहां कुल 12 बूथों पर 1,724 मतदाताओं के बीच सर्वे किया गया. एसआइआर डिलीशन के तहत यहां पांच बूथों पर 1,111 मतदाताओं केे नाम मतदाता सूची से हटाए गए. लेंकिन, जब इनकी जांच की गई तो 233 मतदाता अपने घरों पर उपस्थित मिले जो संख्या लगभग 21 प्रतिशत हैं. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 303 मतदाताओं के सर्वे में 73 लोग उपस्थित मिले, यानी लगभग 24 प्रतिशत. वहीं, प्री-एसआइआर एडीशन के तहत तीन बूथों पर 310 मतदाताओं के सर्वे में 100 लोग अपने पते पर नहीं मिले, जो लगभग 32 प्रतिशत है.
106-जीरादेई विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 665 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 122 लोग उपस्थित मिले. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 189 मतदाताओं के सर्वे में 15 लोग उपस्थित मिले. वहीं, प्री-एसआइआर एडीशन के तहत तीन बूथों पर 231 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 48 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
107-दरौली विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत सात बूथों पर 1,253 मतदाताओं के बीच सर्वे किया गया, जिसमें वैसे 216 लोग उपस्थित मिले, जिनके नाम वोटर लिस्ट से गायब थे. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 237 मतदाताओं की जांच में 15 लोग उपस्थित मिले. वहीं, प्री-एसआइआर एडीशन के तहत तीन बूथों पर 339 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 102 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
190-पालीगंज विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 782 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 111 लोग उपस्थित मिले. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 182 मतदाताओं की जांच में 30 लोग उपस्थित मिले. वहीं, प्री-एसआइआर एडीशन के तहत दो बूथों पर 144 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 48 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
194-आरा विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत पांच बूथों पर 1,356 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 160 लोग उपस्थित मिले. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत एक बूथ पर 148 मतदाताओं की जांच में तीन लोग उपस्थित मिले. वहीं, प्री-एसआइआर एडीशन के तहत चार बूथों पर 513 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 51 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
195-अगिआंव विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 735 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 77 लोग उपस्थित मिले. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत तीन बूथों पर 204 मतदाताओं की जांच में 46 लोग उपस्थित मिले. वहीं, एसआइआर एडीशन के तहत तीन बूथों पर 209 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 29 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
196-तरारी विधानसभा क्षेत्र: यहां कुल 10 बूथों पर 1,241 मतदाताओं के बीच डोर-टू-डोर सर्वे किया गया. एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 697 मतदाताओं की जांच की गई, जिनमें 151 लोग अपने घरों पर उपस्थित मिले, जबकि उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 241 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 54 लोग उपस्थित मिले. वहीं, एसआइआर एडीशन के तहत दो बूथों पर 122 मतदाताओं की जांच की गई, जिनमें 3 लोग अपने पते पर नहीं मिले.
201-डुमरांव विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत चार बूथों पर 697 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 151 लोग उपस्थित मिले, लेकिन उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 94 मतदाताओं की जांच में 42 लोग उपस्थित मिले, जो लगभग 45 प्रतिशत हैं. वहीं, एसआइआर एडीशन के तहत दो बूथों पर 172 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 69 लोग अपने पते पर नहीं मिले. यह कुल संख्या का लगभग 40 प्रतिशत है.
214-अरवल विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत छह बूथों पर 785 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 173 लोग अपने घरों पर उपस्थित मिले, जबकि उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे. यह लगभग 22 प्रतिशत है. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 125 मतदाताओं की जांच में 11 लोग उपस्थित मिले, जो लगभग 9 प्रतिशत हैं. वहीं, एसआइआर एडीशन के तहत दो बूथों पर 191 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 27 लोग अपने पते पर नहीं मिले. यह लगभग 14 प्रतिशत है.
217-घोसी विधानसभा क्षेत्र: यहां एसआइआर डिलीशन के तहत पांच बूथों पर 1,026 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 124 लोग, जिनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे. अपने पते पर मौजूद मिले, यह लगभग 12 प्रतिशत है. प्री-एसआइआर डिलीशन के तहत दो बूथों पर 241 मतदाताओं की जांच में 62 लोग उपस्थित मिले, जो लगभग 26 प्रतिशत हैं. वहीं, एसआइआर एडीशन के तहत तीन बूथों पर 276 मतदाताओं का सर्वे किया गया, जिसमें 71 लोग अपने पते पर नहीं मिले जो कि लगभग 26 प्रतिशत है.
गौर करने वाली बात ये है कि ये तमाम आकड़े सिर्फ 10 विधानसभा क्षेत्र के सिर्फ 102 बूथों के हैं. यही अनुपात बिहार में काटे गए 65 लाख नामों पर लागू हो तो लगभग 14 लाख मतदाता ऐसे मिलेंगे जिनके नाम मतदाता सूची से अवैध ढंग से काटे गए हैं. इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को चुनाव से बाहर कर बिहार में चुनाव करवा लिया गया. लोकतंत्र में क्या यह जायज है?