भाकपा (माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए उम्मीदवार सूची पर बयान

शहीदों को याद करो, उनके अभियान को आगे बढ़ाओ. संघर्ष किया है-जीते हैं, संघर्ष करेंगे- जीतेंगे.

चुनाव, सामूहिक संघर्ष का एक रूप हैं, जहाँ व्यक्ति, प्रत्याशी की भूमिका, केवल सैकड़ों कार्यकर्ताओं के कठोर परिश्रम व संगठित अनथक प्रयासों के दम पर अदा कर पाता है तथा हज़ारों नागरिकों की सद्भावना और दसियों हज़ार मतदाताओं के समर्थन व सहभागिता से सफल हो पाता है.

बहुत सारे हमारे कार्यकर्ता और शुभचिंतक 2025 के बिहार चुनाव में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के प्रत्याशियों की सूची, थोड़ी और लंबी होने की अपेक्षा कर रहे थे, जिसमें कुछ और जिलों से, कुछ और नाम होते. यह तो नहीं हो सका पर हमें ख़ुशी है कि इस बार, कुछ और पार्टियों की भागीदारी के साथ, हम पहले से थोडा बड़ा गठबंधन बनाने में सफल हुए.

हमने तय किया है कि किसी भी सीट पर कोई “मैत्रीपूर्ण संघर्ष” नहीं होगा. केवल बीस सीटों की सीमित तालिका होने के बावजूद अपनी तरफ से हम इस सिद्धांत पर कायम रहे हैं. कांग्रेस, राजद और कोई अन्य दल, जो संभावित “मैत्रीपूर्ण संघर्ष” के द्वंद में उलझे हैं, हम उम्मीद करते हैं कि वे अपनी सीट-बंटवारे की समस्याओं को सुलझा लेंगे और उम्मीद्वारों की नाम वापसी के समय तक पूर्ण एकता सुनिश्चित करेंगे.

स्वाभाविक रूप से हमारी सूची कई तरह के असंतुलनों से ग्रसित है और हम अपने कई सुयोग्य कॉमरेडों को मौका नहीं दे पाए. खासतौर पर सीटों की ऐसी सीमित संख्या और गठबंधन की व्यवस्थाओं के दबाव के भीतर, स्थानीय विधानसभा क्षेत्र स्तर की आकांक्षाओं का, व्यापक प्रतिनिधित्व के सवाल के साथ संतुलन स्थापित करना एक कठिन काम है. उम्मीद है कि हमारे सभी कॉमरेड और मित्र, इस स्थिति को समझेंगे और इस जबरदस्त चुनावी संघर्ष में खुले दिल से हमारे सभी प्रत्याशियों का सहयोग करेंगे.

चुनाव, सामूहिक संघर्ष का एक रूप हैं, जहाँ व्यक्ति, प्रत्याशी की भूमिका, केवल सैकड़ों कार्यकर्ताओं के कठोर परिश्रम व संगठित अनथक प्रयासों के दम पर अदा कर पाता है तथा हज़ारों नागरिकों की सद्भावना और दसियों हज़ार मतदाताओं के समर्थन व सहभागिता से सफल हो पाता है. और हमारी जैसी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए, संघर्ष का हर रूप, हर तरह की सत्ता द्वारा दमन और उत्पीड़न के अंतर्निहित जोखिमों के साथ आता है और चुनाव भी इस मामले में अलग नहीं है.
गोपालगंज में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित भोरे सीट का ही उदहारण लें. भोरे से हमारे प्रस्तावित उम्मीद्वार कॉमरेड जितेंद्र पासवान को नामांकन के बाद गिरफ्तार कर लिया गया और हमें, जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कॉमरेड धनंजय को परिस्थितिजन्य प्रत्याशी के रूप में उतारना पडा ताकि भोरे में राजनीतिक प्रतिशोध, राज्य दमन और सामंती- सांप्रदायिक हिंसा के सभी पीड़ितों के न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया जा सके. इस सीट पर 1995 में कॉमरेड उमेश पासवान हमारे पहले प्रत्याशी थे, जिन्हें लगभग 16000 वोट पड़े और वो तीसरे नंबर पर रहे पर दो साल बाद वे शहीद हो गए.

2020 में कॉमरेड जितेंद्र पासवान को 70000 से अधिक वोट पड़े पर जीत से वे 400 वोट के मामूली अंतर से दूर कर दिए गए. चुनाव के तुरंत बाद उन्हें एक फर्जी केस में फंसा दिया गया और बिल्कुल भोजपुर के अगियांव (अ.जा.) के 2020 के हमारे विधायक कॉमरेड मनोज मंज़िल की तरह ही, उन पर दोष सिद्ध होने की दशा में चुनावी अयोग्यता का खतरा मंडरा रहा है. भाकपा (माले) का चुनाव अभियान महज़ सीटों के बंटवारे और चुनावी गुणा-गणित तक सीमित नहीं है- यह इस दमन का डट कर मुकाबला करने और एक असमान लड़ाई में बाधाओं की श्रृंखला से पार पाने का अभियान है. 1989 में वोट डालने के अधिकार का, हमारे बहुत सारे कॉमरेड पहली बार प्रयोग कर सके और एक बड़े जनसंहार के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी. फरवरी 2000 के चुनावों के बाद अरवल में कॉमरेड शाह चांद और अन्य पर टाडा के तहत थोपी गयी कैद हो फिर फरवरी 1998 में असम के डिब्रूगढ़ में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कॉमरेड अनिल बरुआ की शहादत हो या फिर झारखंड में 2005 में नामांकन दाखिल करने के बाद कॉमरेड महेंद्र सिंह की हत्या हो- चुनाव क्षेत्र की हमारी यात्रा, कुर्बानियों से भरी हुई है.

शहीदों को याद करो, उनके अभियान को आगे बढ़ाओ. संघर्ष किया है-जीते हैं, संघर्ष करेंगे- जीतेंगे.

18 October, 2025